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“Secularism” in Hindi Language

धर्मनिरपेक्षता । “Secularism” in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ।

3. धर्मनिरपेक्षता और राजनीति ।

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4. धर्मनिरपेक्षता का दुरूपयोग ।

5. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

15 अगस्त, 1947 को हमारा देश स्वतन्त्र हुआ । इस स्वतन्त्रता के बाद हमें देश विभाजन की त्रासदी सहनी पड़ी और यह देश विभाजन धार्मिक कट्टरता का ही परिणाम था । इस धार्मिक कट्टरता ने पाकिस्तान जैसे राष्ट्र को जन्म दिया ।

यद्यपि स्वतन्त्रता के बाद भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया तथा संविधान की प्रस्तावना में यह कहा गया कि हम भारत के लोग भागा को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की क्षमता प्राप्त करने के लिए तथा अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बसुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्पित होकर संविधान सभा में 26 जनवरी सन् 1949 को अंगीकृत, अधिनियमित और समर्पित करते हैं ।

2. धर्मनिरपेक्षता का अर्थ:

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धर्मनिरपेक्षता अंग्रेजी के शब्द सेक्यूलरिज्म का हिन्दी रूपान्तर है । इस शब्द का प्रयोग यूरोप में चर्च तथा पोप के प्रभाव को कम करने के साथ-साथ राज्य एवं शासन पर किसी प्रकार का धर्म न लादने के लिए किया गया था । जो राज्य चर्च के प्रभाव से मुक्त रहे, उसे सैक्यूलर राज्य कहा गया ।

Secular का अर्थ है: Pertaining to the present world, or to things not spiritual not bound by monstic rules तथा secularism का अर्थ है: to convert from spiritual to common use. One who discarding religious belive and worship applies himself exclusively to the things of this life. One who holds that education should be of art from religion.

भारत में संविधान के मौलिक अधिकारों में धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार सभी सम्प्रदायों के लोगों को दिया गया है, जिसमें धर्म का प्रचार-प्रसार करने की पूर्ण स्वतन्त्रता है ।

3. धर्मनिरपेक्षता और राजनीति:

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है । इस लोकतान्त्रिक देश में सभी धर्म तथा सम्प्रदाय के लोगों को समान अधिकार दिये गये हैं । किसी भी धर्म को बहुसंख्यक मानकर भी विशेषाधिकार या एकाधिकार नहीं दिये गये हैं । पाकिस्तान या बंगलादेश की तरह भारत का कोई राजधर्म नहीं है । यही इसकी धर्मनिरपेक्षता की पहचान है ।

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भारत में कोई भी धर्म का नागरिक जीवन के सभी क्षेत्रों में विकास के समान अवसर पा सकता है । न्याय हो या राजनीति, सेवा हो या कोई शासकीय, अशासकीय नौकरी, किसी प्रकार का पक्षपात यहां नहीं किया जाता । भारत में धर्म को राजनीति से अलग करके देखा जाता है, यही उसकी धर्मनिरपेक्षता की पहचान है ।


4. धर्मनिरपेक्षता का दुरूपयोग:

भारत में बहुत-से राजनीतिक दल हैं । इन दलों में से कुछ दलों का निर्धारण क्षेत्रीयता, जातीयता और धर्म के उण्धार पर हुआ है और ये राजनीतिक दल कुर्सी के लालच में धर्मनिरपेक्षतावादी सिद्धान्तों को तिलांजलि देकर धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगते हैं । कुछ दल साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देते हैं ।

कुछ दल तो अल्पसंख्यकों के हितैषी बनकर बहुसंख्यक लोगों को अधर्मनिरपेक्ष बताकर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने से बाज नहीं आते हैं । भले ही उनके इस आचरण से देश की एकता और अखण्डता को ठेस पहुंचती हो । उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है ।

कुछ स्वार्थी नेता तो अल्पसंख्यकों से वोट पाने के लिए उन्हें सभी क्षेत्रों में आरक्षण देने की नाजायज मांग भी करते हुए लोगों के बीच धार्मिक अलगाव की खाई बढ़ाते हैं । किसी दल का नेता कहता है-वह मुस्लिमों का परमहितैषी है, तो कोई बहुसंख्यकों का । ऐसे ही नेताओं के कुचक्रों के कारण भिवंडी, मुरादाबाद गुजरात, लखनऊ आदि के दंगे हुए हैं ।

रामजन्म भूमि, बावरी मस्जिद जैसे विवाद ऐसे ही नेताओं के दिमाग की उपज हैं । देश को धर्म एवं जाति के नाम पर क्षेत्रों और प्रदेशों में बांटने का कार्य भी ये करते हैं । हमारे देश में हिन्दू मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई एकता के सूत्र में बंधे हुए राष्ट्रीय एकता का परिचय देते हैं, लेकिन इनको लड़ाती है-दूषित, स्वार्थी, कुर्सीलोलुप नेताओं की राजनीति ।


5. उपसंहार:

भारत विभिन्न धर्मावलम्बियों का राष्ट्र है । विभिन्नता में एकता ही इसकी पहचान है । विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश भारत में विभिन्न प्रकार के धर्मो को मानने वाले लोग रहते हैं । लोककल्याणकारी राज्य के रूप में भारत सभी धर्म के लोगों के साथ समान व्यवहार रखते हुए विकास के समान अवसर तथा समान सुविधाएं प्रदान करता है, वह भी बिना किसी भेदभाव के ।

हमारा प्रजातन्त्र आज भी इसी कारण विश्व में अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है । हमारी धर्मनिरपेक्षता को सबसे बड़ा खतरा वोटों की राजनीति करने वाले नेताओं से है । जनता तो धार्मिक सहिष्णुता के महत्त्व को जानते हुए धार्मिक सद्‌भाव से रहती है, यही भारत की पहचान है ।

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