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Staging of Various Types of Cancer | Medicine | Hindi

Read this article to learn about staging of various types of cancer in Hindi language.

यह कैंसर के फैलाव (एक्सटेंट) पता करने के लिए की जाती है, जो उपचार के प्लानिंग व उपचार से लाभ जानने में सहायक होती है । सर्वाधिक प्रयोग होने वाला वितरण टी॰एन॰एम॰ (T.N.M) क्लासीफिकेशन है । जिसमें टी॰ ट्‌यूमर के आकार व एन॰ नोड, व एम॰ मेटास्टेसिस को निरूपित करता है ।

उपचार के तथ्य:

रोगी की उपचार के पूर्व ठीक ढंग से जांच की जानी चाहिए ।

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1. रोगी की सामान्य स्थिति ।

2. रोग को फैलाव ।

i. क्लीनिक्ल जांच द्वारा ।

ii. निदान विधियों का प्रयोग कर, रेडियोग्राफी, सीटी स्कैन व आइसोटोप स्कैन आदि ।

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iii. फाइन नीडल एसपिरेशन साइटोलॉजी व सेल साइटोलॉजी ।

रेडिकल ट्रीटमेंट:

इसका उपचार का उद्‌देश्य रोग को ठीक करना होता है । इसको प्राइमरी व फैलाव वाले भागों दोनों के लिए देते हैं । जैसे स्तन के कैंसर में चेस्ट बाल के साथ-साथ एक्जिला, सुप्राक्लेविकुलर व इन्टर्नल मैमरी लिम्फ ग्रन्थियों को भी रेडियेशन देते हैं ।

पैलियेटिव ट्रीटमेंट:

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जब रोगी की उम्र ज्यादा, खराब स्वास्थ्य तथा काफी बढ़ चुकी बीमारी में रोगी को रेडिकल ट्रीटमेंट देना संभव न हो । इसका उद्देश्य लक्षणों को दूर करना है जैसे दर्द, रक्त स्राव । पैथोलॉजिकल फ्रैंक्चर आदि ।

उपचार विधियां (मोड):

i. सर्जरी

ii. रेडियोथेरेपी

iii. कीमोथेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, हारमोन थेरेपी

स्तन कैंसर (स्टेजिंग):

स्टेज-I:

स्तन में सीमित कैंसर, आसानीपूर्वक मोबाइल, कोई लिम्फ ग्रन्थि नहीं ।

स्टेज-II:

स्टेज-I की तरह उसी तरफ से एक्जलरी नोड पलपेबुल पर मोबाइल ।

स्टेज-III:

प्राइमरी रोग स्टेज-I की अपेक्षा ज्यादा फैला हुआ अर्थात त्वचा तक यह रोग नीचे स्थित पेशियों से फिक्स हो सकता है । एक्जलरी लिम्फ ग्रन्थिया यदि उपस्थित हों तो फिक्स्ड हो सकती है या सुप्राक्लेविकुलर लिम्फ ग्रन्थियों में भी रोग फैल सकता है ।

स्टेज-IV:

चेस्ट एरिया के बाहर फैलाव, दूसरी तरफ का स्तन भी रोगग्रस्त हो सकता है, दूसरी एक्जिला में भी लिम्फ ग्रन्थियां या डिस्टेन्ट मेटास्टेसिस के लक्षण ।

निदान:

सामान्य: हीमोग्राम

i. रक्त बायोकेमिस्ट्री = रक्त यूरिया, सीरम क्रियेटिनिन, यकृत फन्कशनल टेस्ट

ii. पेशाब की जांच = रूटीन, माइक्रोस्कोपिक

iii. सीने का एक्स-रे (पी॰ए॰)

iv. अल्ट्रासाउंड

v. फाइन नीडल एसपिरेशन साइटोलॉजी

आप्सनल:

1. मैमोग्राफी दूसरी स्तन की ।

2. हड्डीयों की आइसोटोप स्टडी ।

3. सी॰ टी॰ स्कैन ।

मैनेजमेंट:

आरम्भिक स्टेज- एक और दो के लिए:

पहला स्टेज रेडिकल मैस्टैकटमी या एक्सटेन्डिड सिम्पल मैस्टेक्टमी फिर लिम्फ ग्रन्थियों व हिस्टीपेथोलॉजी के आधार पर रेडियोथेरेपी या कीमोथेरेपी देते हैं । यदि रोगी जवान है तथा बीमारी आरम्भिक स्थिति में है (स्टेज-प्रथम) तो केवल लम्पेक्टमी करके रेडियोथेरेपी दी जा सकती है ।

स्टेज-तृतीय व चतुर्थ:

इनमें रेडिकल सर्जरी नहीं की जा सकती है । रेडियोथेरेपी का प्रयोग प्राइमरी, रीजनल लिम्फ ग्रन्थियों व सेकेन्डरीज के लिए किया जा सकता है । सर्जरी का कार्य बहुत कम है जो टायलेट मैस्टेक्टमी के रूप में होता है । रेडियोथेरेपी के बाद कीमोथेरेपी या हारमोन थेरेपी दी जाती है ।

शल्य क्रिया:

लम्पेक्टमी, एक्सटेन्डिड सिम्पल मैस्टेक्टमी, रेडिकल मैसटेक्टमी (हाल्सटेड), माडीफाइड रेडिकल मैस्टेक्टमी (पैटीज) या टायलेट मैस्टेक्टमी के रूप में हो सकती है ।

रेडियोथेरेपी:

स्तन कैंसर रेडियोथेरेपी के लिए माडरेडली सेन्सिटिव होता है । इसका प्रयोग सप्लीमेन्ट्री या एडजुएन्ट के रूप में सर्जरी के पश्चात किया जाता है । इसका उद्‌देश्य बची हुई कैंसर कोशिकाओं को समाप्त करना है । (लिम्फ ग्रन्थियों व आस पास के भागों में)

इसे एडजुवेन्ट के रूप में निम्न स्थितियों में दे सकते हैं:

1. पोस्ट आपरेटिव रेडिकल रेडियोथेरेपी ।

2. पैलियेटिव- जब रोग बहुत बढ़ चुका हो, हडडी या मस्तिष्क के दर्द वाले डिपाजिट के लिए ।

3. आर्टीफिशियल मीनोपोज हेतु ।

पोस्ट आपरेटिव रेडिकल रेडियोथेरेपी:

प्राय: फेफड़ों को बचाने के लिए मल्टीपल फील्ड विधि अपनायी जाती है । मेगावोल्टेज या कोबाल्ट सोर्स का प्रयोग किया जाता है । जिनकी अच्छी डेप्थ डोज व फिजिकल एडवान्टेज होती है ।

फील्डों का चुनाव:

1. एण्टीरोपोस्टीरियर:

इन्टरनल मैमरी ग्रन्थियों के लिए 5000 रेड/25 फ्रैक्सन में लगभग पांच हफ्तों में लगभग तीन से॰ मी॰ की गहराई पर 5.6 से॰मी॰ चौड़ी स्ट्रिपx15.16 से॰मी॰

फील्ड दो व तीन:

एण्टीरियर सुप्राक्लेविकुलर और एक्जलरी तथा पोस्टीरियर सुप्राक्लेविकुलर व एक्जलरी फील्ड x 5000 रैड/25 फ्रैक्सन लगभग पांच हफ्तों में ।

फील्ड चार व पांच:

लैदल टैन्जेन्शियल फील्ड और मीडियन टैन्जेशिन्यल फील्ड (ग्लेन्सिंग फील्ड) जिससे चेस्ट वाल के उपयुक्त डोज मिलने के साथ फेफड़ों को कम से कम डोज मिले । पैरास्टर्नल व सुप्राक्लेविकुलर फील्ड अलग-अलग या एक उल्टे ”एल” फील्ड के रूप में प्रयोग की जा सकती है । चेस्ट वाल के लिए इलेक्ट्रान सबसे उपयुक्त रेडियेशन हैं ।

लम्पेक्टमी के बाद रेडियोथेरेपी:

संपूर्ण स्तन व ड्रिनेज एरिया को उसके पश्चात लोकल बूस्ट इरीडियम 192 द्वारा या इलेक्ट्रान बूस्ट (3000-5000 रेड) ।

आर्टीफिशयल मीनोपाज:

ओवेरियन इरेडियेशन की डोज उम्र पर निर्भर करती है । कम उग्र के सके । रोगियों में अधिक तथा वृद्धों के कम डोज लगती है । 15×10 से॰मी॰ की फील्ड एण्टीरियर व पोस्टीरियर पेल्विक फील्ड का प्रयोग कर डोज मध्य बिन्दु पर कैलकुलेट करते हैं । मीनोपाज के नजदीक रोगी के 450 रैड एक फ्रैक्सन में या कम उम्र के रोगी में 1200-1400 रैड 5-6 फ्रैक्शनों में दे सकते हैं ।

फेफड़ों का कैंसर:

प्राय: मेजर ब्रोन्क्स से शुरू होकर फेफड़े व प्लूरा, चेस्टवाल और मिडियास्टाइनम में पहुंचता है । लिम्फ द्वारा यह हाइलर रीजन, पैराट्रेकियल व सबकेराइनल लिम्फ ग्रन्थियों में फैलता है । रक्त द्वारा भी मेटास्टेसिस हो सकती है ।

हिस्टोलाजिकस प्रकार:

1. स्क्वामस सेल कैंसर ।

2. स्माल सेल कैंसर (ओट सेल कार्सिनोमा) ।

3. एडीनोकार्सिनोमा ।

उपचार:

यह तीन बातों पर निर्भर है ।

1. कैंसर का प्रकार ।

2. ट्‌यूमर की शल्य क्रिया हो सकती है, या नहीं ।

3. उपचार की प्लानिंग-रेडिकल या पैलियेटिव ।

शल्य क्रिया:

यह उपचार की सर्वोत्तम विधि है पर यह स्क्वामस सेल कैंसर के कुछ रोगियों में ही संभव है । स्माल सेल कैंसर में इसका प्रयोग लोवेक्टमी या फेफड़ों के निकालने (न्यूमोनेक्टमी) में कर सकते हैं । सर्जरी बहुत वृद्ध रोगियों, खराब स्वास्थ्य तथा रोगियों जिनमें चेस्टवाल या मिडियास्टाइनम तक फैलाव हो, इसे नहीं करना चाहिए ।

रेडियोथेरेपी:

1. शाल्य किया के बाद ।

2. मुख्य उपचार विधि के रूप में जहां शल्य क्रिया न की जा सके ।

फेफड़े के कैंसर में ट्रीटमेंट प्लानिंग के सिद्धान्त:

1. रेडिकल ट्रीटमेंट के रुप में:

रोगयुक्त फेफड़ा व स्पाइनल कार्ड को रेडियेशन से बचाना आवश्यक होता है । अत: उपचार दो फेजों मे करते हैं । पहले फेज में पूरा मिडयास्टाइनम व सब केराइनल लिम्फ ग्रन्थियों को 4000 रेड / 20 फ्रैक्सन में तथा द्वितीय फेज में वोल्यूम घटाकर केवल प्राइमरी साइट तथा उसी तरफ की लिम्फ ग्रन्थियों को 6000-6500 रेड 30 फ्रैक्सन मे रेडिकल ट्रीटमेंट के रूप में देते हैं ।

2. पैलियेटिव ट्रीटमेंट के रूप में:

प्राइमरी ट्‌यूमर दो सेमी. की सामान्य मार्जिन के साथ व मिडयास्टाइनल लिम्फ ग्रन्थियां रेडियेट की जाती है । इसमें एण्टीरियर व पोस्टीरियर समानान्तर विपरीत फील्ड प्रयोग की जाती है । डोज 3000-5000 रेड 10 फ्रैक्सन में देते हैं ।

फील की अवस्था: तीन फील्ड विधि के लिए ।

प्रथम फेज: समानान्तर विपरीत एण्टीरियर व पोस्टीरियर

द्वितीय फेज: थ्री फील्ड प्लानिंग के पश्चात इसका प्रयोग परिधि या केन्द्र  में स्थित रोग के लिए किया जाता है ।

(a) यदि रोग परिधि पर है, तो एक एण्टीरियर वेज के साथ, एक पोस्टीरियर वेज के साथ तथा एक लैट्रल फील्ड भी वेज के साथ (चित्र 14.12 क) के अनुसार ।

(b) केन्द्र में स्थित रोग के लिए जब ट्रीटमेंट वोल्यूम ठीक स्पाइनल कार्ड के आगे स्थित हो तो एक एण्टीरियर व दो पोस्टीरियर ओब्लीक फील्डों वेज के साथ (चित्र 14.12 ख) के अनुसार फेफड़ों में उपस्थित हवा के कारण डोज केलकुलेशन में का करेक्शन करना आवश्यक होता है ।

सबसे अधिक होने वाला सर्विक्स का कैंसर है । इसके अतिरिक्त गर्भाशय, बेजाइना, वल्वा, ओवरी तथा कोरियोकार्सिनोमा आदि भी स्त्री जननांग तंत्र के कैंसर हैं ।

गर्भाशय की बाडी का कैंसर:

यह पैरीमीनोपाजल व पोस्ट मीनोपाजल औरतों का कैंसर है । यह प्राय: असामान्य रक्तस्राव के रूप में प्रकट होता है । यह मधुमेह, उच्च रक्त चाप, मोटापे के रोगियों में अधिक होता है ।

निदान: कैंसर सर्विक्स में होने वाले निदान तथा डाइलेटेशन व क्यूरेटाज ।

उपचार: कई उपचार विधियां हैं, जो कैंसर की स्टेज, रोगी को स्वास्थ्य, हिस्टोपैथोलॉजी आदि पर निर्भर करती हैं ।

स्टेज-प्रथम: रोग सिर्फ गर्भाशय में स्थित:

1. यदि शल्य क्रिया संभव हो तो टोटल या रेडिकल हिस्टरेक्टमी (गर्भाशय, ओवरी व ट्‌यूब का निष्कासन) सर्जरी के बाद यदि ट्‌यूमर अच्छी प्रागनोसिस वाला अर्थात स्टेज प्रथम, मायोमीट्रियम में 1/3 से कम गहराई तक, स्थित ओवरी व ट्‌यूब तक न फैला हो तो रेडियोथेरेपी की आवश्यकता नहीं होती है ।

2. यदि शल्य क्रिया के बाद रोग ग्रेड-II या III का ट्‌यूमर वाला, पूअरली डिफरेन्सियेस्टि, मायोमीट्रियम में 1/3 गहराई से अधिक हो तो इसके पुन: होने की अधिक संभावना होती है अत: रेडियोथेरेपी एक्सर्टनल व ब्रेकीथेरेपी के रूप में देनी आवश्यक होती हे ।

एक्सर्टनल रेडियोथेरेपी:

2000 रैड/10 फ्रैक्सन में, पूरी पेल्विस को तथा 3000 रैड पैरीमीट्रियम को । इसके पश्चात इन्ट्राकैविटेरी रेडियोथेरेपी (वाल्ट रेडियम) वाल्ट के बचाव के लिए देनी चाहिए । पोइंट “क” को अधिकतम डोज 8000 रैड से अधिक नहीं मिलना चाहिए ।

स्टेज—II:  ऊपर के समान:

3. यदि रोगी शल्य क्रिया के योग्य न हो तो रोगी को सिर्फ रेडियोथेरेपी दी जाती है । एक्सर्टनल रेडियोथेरेपी (पूरी पेल्विस को 2000 रेड तथा पैरीमीट्रियम को 3000 रेड) तथा इसके पश्चात इन्ट्राकैविटेरी ब्रेकीथेरेपी दो बार में पोइंट “क” को 8000 रैड से ज्यादा नहीं देनी चाहिए (प्राय: 7500-8000 मिग्रा के इन्सरसन) ।

स्टेज-II:

के शल्य क्रिया न हो सकने वाले रोगियों में भी ऐसा ही करते हैं ।

स्टेज-III:

रोग सर्विक्स से बाहर फैल चुका हो पर पेल्विस में ही स्थित हो । इन रोगियों मे केवल रेडियोथेरेपी ही संभव है । पूरी पेल्विस को 4000 रैड तथा पैरीमीट्रियम को 6000 रैड देते हैं । इसके बाद इन्ट्राकैवेटरी इन्सरसन (8000 मिग्रा प्रति घंटे) में इन्ट्राकैवेटरी इर्न्सट के रूप में देते हैं । बिन्दु “क” की डोज 8000 रैड से अधिक नहीं होनी चाहिए । इसके स्थान पर रोगी का केवल एक्सर्टनल रेडियोथेरेपी द्वारा फोर फील्ड बाक्स विधि (सर्विक्स की तरह) द्वारा उपचार किया जा सकता है ।

स्टेज-IV:

इक्ट्रापेल्विक मेटास्टेसिस, मूत्राशय व रेक्टम के इन्वाल्वमेन्ट होने पर रोगी की शल्य क्रिया प्राय: संभव नहीं होती है । पेलियेटिव रेडियोथेरेपी रक्तस्राव रोकने तथा दर्द से आराम के लिए किया जा सकता है ।

सर्विक्स का कैंसर:

यह भारत में औरतों में सबसे अधिक पाया जाने वाला कैंसर है जो औरतों के सभी कैंसरों का 25-30 प्रतिशत होता है ।

लक्षण:

असामान्य या पोस्ट मीनोपाजल रक्तस्राव, वेजाइनल डिस्चार्ज, कब्ज व पेशाब में गड़बड़ी ।

निदान:

1. हीमोग्राम

2. मूत्र की जांच

3. रक्त सुगर

4. किडनी फन्कसन टेस्ट

5. लिवर फन्कसन टेस्ट

6. सीरम विलिरूविन

7. एस॰ जी॰ ओ॰ टी॰ (S.G.O.T.)

8. एस॰ जी॰ पी॰ टी॰ (S.G.P.T.)

9. सीरम एल्केलाइन फास्फेटेज

10. वी॰ डी॰ आर॰ एल॰ (V.D.R.L.)

11. सीने का एक्स-रे

12. इन्ट्रावीनस पाइलोग्राम

13. सिस्टोस्कोपी

14. बेरियम एनीमा

15. लिम्फैन्जिपोग्राम (ऐच्छिक)

16. सी॰ ए॰ टी॰ स्कैन

उपचार:

रेडियोथेरेपी उपचार की मुख्य विधि है । आरम्भिक स्थिति में सर्जरी भी सहायक हो सकती है । पर इन रोगियों में भी दोनों समान रूप से उपयोगी हैं ।

स्टेज:

इसे स्टेज-0 से स्टेज-1 – चार स्टेजों में बांटा गया है ।

रेडियोथेरेपी:

इन्ट्राकैविटरी ब्रेकीथेरेपी व एक्सटर्नल रेडियोथेरेपी या तो अकेले या काम्बिनेशन में प्रयोग करते हैं ।

टेलीथेरेपी:

कोबाल्ट 60 या लीनियर एक्सीलरेटर का प्रयोग कर मेगावोल्टेज रेडियेशन का प्रयोग कर सकते हैं ।

ब्रेकीथेरेपी:

पहले (1920-1930) इन्ट्राकैवेटरी रेडियम का प्रयोग किया जाता था, तथा स्टाकहोम व पेरिस टेक्नीक अपनायी जाती थी । इसके पश्चात मैनचेस्टर विधि का प्रयोग किया गया जिसमें प्वाइंट “क” (ए) व (ख) ”बी” का प्रयोग होता है ।

पोइंट “क” (A):

सर्विक्स से स्थित सबसे निचले रेडियोएक्टिव सोर्स से दो से॰मी॰ ऊपर व लैट्रली स्थित बिन्दु जिस पर धमनी यूरेटर को क्रास करती है । इस बिन्दु की अधिकतम टालरेन्स 5000 रैड होती है ।

पोइंट “ख” (B):

प्वाइंट ए से तीन सेमी॰ लैट्रली

स्टेज के अनुसार उपचार:

1. स्टेज-I व आरम्भिक स्टेज-II:

i. यदि रोग छोटा हो तो पहले ब्रेकीथेरेपी दो सेसनों में प्रत्येक 4000 रैड/72 घण्टों में एक हफ्ते के अन्तर पर देते हैं । इस प्रकार बिन्दु (ए) “क” को 8000 रैड रेडियेशन मिल जाता है ।

ii. यदि रोग बल्की हो तो पहले एक्सर्टनल रेडियोथेरेपी (4000 रैड/चार हफ्ते में) फिर 3-4 हफ्तों के बाद एक इन्ट्राकैवेटरी इन्सर्सन (4000 रैड/72 घण्टों में) देते हैं ।

2. एडवान्सड स्टेज में:

रेडियोथेरेपी उपचार की सर्वोत्तम विधि है । आरम्भ में एक्सटर्नल रेडियोथेरेपी (4000 रेड 4-41/2 हफ्तों में पूरी पेल्विस को) । चार हफ्तों के बाद एक इन्ट्राकैवेटरी इन्सर्सन जिससे पोइंट ए को 3500 रैड मिल सके ।

3. स्टेज-I:

एक्सटर्नल रेडियोथेरेपी फोरफील्ड बाक्स विधि द्वारा (चित्र 14.13) 4000-4500 रैड/20 से 22 फ्रैक्सनों में देते हैं ।

4. जिन रोगियों में ब्रेकीथैरेपी संभव न हो, उनमें एक्सर्टनल रेडियेशन फोर फील्ड विधि (चित्र 14.13) से देते हैं ।

इन्ट्राकैवेटरी इन्सर्सन में आस पास के भागों की टालरेन्स क्षमता हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए जैसे:

रेक्टम = 6500 रैड

मूत्राशय = 7000 रैड

प्वाइंट-ए = 8000 रैड

मैनचेस्टर या बार्क विधि में प्राय: सीजियम का प्रयोग यूटेराइन टेन्डम व वेजाइनल ओवायड (7,8 व 9 यूनिट के) की सहायता से किया जाता है । रेडियोथेरेपी से रोगी को दस्त, बार-बार पेशाब लगना, त्वचा की रियेक्वान आदि हो सकते हैं । रोगी के उपयुक्त द्रव वाली चीजें तथा लक्षण के अनुसार दवा देनी चाहिए ।

अण्डकोष का कैंसर:

अण्डकोष के ट्‌यूमर दो प्रकार के होते हैं ।

1. सेमीनोमेटस ट्‌यूमर:

यह सबसे अधिक होने वाला अण्डकोष का ट्‌यूमर है जो 30-35 वर्ष की उम्र में होता है । यह रेडियेशन से बहुत सेन्सिटिव होता है ।

2. नॉन सेमिनोमेटस ट्‌यूमर:

15-40 वर्ष की आयु में होता है तथा कई प्रकार का जैसे इम्ब्रेयोनल सेल कार्सिनोमा, टिरेटोमा, कोरियोकार्सिनोमा आदि । ये बहुत अधिक रेडियोसेन्सिटिव नहीं होते हैं । अत: इनके लिए अधिक डोज की आवश्यकता होती है ।

लक्षण:

धीरे-धीरे बढ़ने वाली अण्डकोष की सूजन या मेटासटेसिस की वजह से सांस में तकलीफ ।

उपचार:

1. सर्जरी: आर्किडेक्टमी सबसे पहले करते हैं जिससे ट्‌यूमर की हिस्टोपैथोलॉजी जानी जा सके ।

2. रेडियोथैरेपी : स्टेज के अनुसार ।

स्टेज-I :

रोग स्पेरेमेटिक कार्ड व तेस्टिस में सीमित । इलेक्टिव रेडियेशन पैराएवोरटिक व उसी तरफ के पेल्विक रीजन को एण्टीरियर व पोस्टीरियर समानान्तर विपरीत एल के आकार की फील्डों द्वारा । दोनों गुर्दो को बचाना आवश्यक है ।

एण्टीरियर फील्ड में आर्किडेक्टमी स्कार व साथ के इन्ग्वाइनल लिम्फैटिक्स इन्क्लूड करने आवश्यक हैं । पोर्टल को ऊपर एक्सटेन्ड कर चौथी लम्बर वटिव्रा के निचले बार्डर तक के नोड इन्क्लूड करने के बाद पैराएवोरटिक व उसी तरफ का रीनल हाइलम 11वीं थोरेसिक वर्टिव्रा तक इन्क्लूड करते हैं । एण्टीरियर फील्ड का लोअर बार्डर सिम्फाइसिस प्यूबिस पर तथा पास्टीरियर सैक्रो काक्सीजियल जन्कशन पर स्थित होता है ।

स्टेज-II:

रोग अण्डकोष से बाहर फैल चुका पर डायाफ्राम के नीचे ।

स्टेज-III:

डायाफ्राम के ऊपर फैलाव । उपचार दो फैजों में करते हैं ।

फेज-I:

¾ उदर व पेल्विस की रेडियोथेरेपी

डीज-3000 रैड/ 4-5 हफ्तों में (150 रैड प्रतिदिन)

फेज-II:

चित्र 14.17 के अनुसार पूरे मिडयास्टाइनम व दोनों सुप्राक्लेविकुलर रीजन में समानान्तर विपरीत “टी” आकार की फील्डों द्वारा फेज-1 पूरे होने के दो हफ्तों पश्चात । डोज 2600 रैड/13 फ्रैक्सनों में । अन्य अण्डकोष के ट्यूमर 4000 रैड/25-27 फ्रैक्सनों में इनके उपचार में सर्जरी व कीमोथेरेपी का भी स्थान है ।

निचले कंठ, स्वर यंत्र व पोस्ट क्रिक्वायड का कैंसर:

ये मुख्य रूप से रक्वामस सेल कैंसर होते हैं । इनके लक्षण कैंसर के स्थान व विस्तार पर निर्मर है जो आवाज में बदलाव, सांस लेने में कठिनाई, गर्दन में गांठों को होना आदि हो सकते हैं । रोगी की सामान्य जांच के अलावा/इन्डायरेक्ट लैरेन्गोस्कोपी, एक्स-रे साफ्ट टिश्यू नेक, सीने का एक्स-रे तथा रक्त की जांच आदि करते हैं ।

उपचार:

आरम्भिक कैंसर सर्जरी या रेडियोथेरेपी द्वारा समान रूप से ठीक किया जा सकता है, पर सर्जरी से आवाज चली जाना तथा सदैव रहने वाली टेकियास्टमी आदि हानियां हैं । अत: रेडियेशनथेरेपी उपचार की उत्तम विधि है ।

रेडियेशन विधि:

यदि कैंसर सिर्फ स्वर-यंत्र तक ही सीमित है लोकल मेगावोल्टेज रेडियेशन 6000 रैड/30 फ्रैक्शनों में छह हफ्तों में एण्टीरियर फील्ड द्वारा सुप्राग्लाटिक व कंठ के कैंसर में लिम्फ़ ग्रन्थियों को भी रेडियेशन देना आवश्यक है । डोज 6000 रेड 6-7 हफ्तों में ।

सिर व गर्दन के कैंसर:

1. ओरल कैविटी:

कारण:

खराब दांत की हाइजीन, तम्बाकू एल्कोहल का सेवन सिफलिस, तेज दांत, ल्यूकोप्लेकिया । अधिकतर कैंसर स्कवामस सेल प्रकार के होते हैं । (चित्र 14.22) इसके लक्षण अल्सर, फिसर या रसौली आदि या ल्यूकोप्लेकिया हैं । गंभीर स्थिति में आवाज में परिवर्तन, जीभ का बाहर न निकलना, कान में दर्द, आदि लक्षण भी हो सकते हैं । ट्‌यूमर की टी॰एन॰एम॰ (ट्‌यूमर, नोड, मेटासटेसिस) स्टेजिंग करते हैं ।

उपचार:

मुख्य उपचार विधियां सर्जरी व रेडियोथेरेपी हैं । दोनों आरम्भिक स्थिति में समान रूप से प्रभावी हैं । प्राय: रेडियोथेरेपी का प्रयोग अधिक किया जाता है । क्योंकि इससे अंगों के कार्य पर प्रभाव बहुत कम पड़ता       है । आरम्भिक स्थिति (चार सेमी॰ आकार तक) में इन्टरस्टीशियल रेडियेशन उपयोगी होता है जो रेडियम, सीजियम या इरीडियम व गोल्ड 198 इम्प्लान्ट के रूप में दिया जा सकता है । एडवान्सड कैंसर जिनमें इप्लान्ट नहीं लगाये जा सकते मेनोवोल्टेज या कोवाल्ट बीम द्वारा टेलीथेरेपी दी जाती है ।

डोज प्राय: 6500 रैड 61/2-7 हफ्तों में दी जाती है । रेडियेशन फील्ड में प्राइमरी साइट के अलावा ऊपर डीप सरवाइकल लिम्फ़ ग्रन्थियों में आनी चाहिए । रेडियेशन से रोगी को म्यूकोसल रियेक्शन, अल्सर, स्वाद न आना, खाने में परेशानी हो सकती है । इसके लिए उपयुक्त माउथ वाश तथा स्थानीय निश्चेतक आइटमेंट का प्रयोग किया जा सकता है । बाद में मुंह को सूखापन, स्वाद का न आना, दांतों की परेशानी आदि प्रमुख हैं ।

ये प्राय: सिरदर्द, उल्टी, पैरों में कमजोरी, झटके, दिखने में परेशानी आदि लक्षणों के रूप में प्रकट होते हैं । निदान के लिए कपाल का एक्स-रे, ई॰ ई॰ जी॰ लम्बर पन्चर, सेरब्रोस्पाइनल फ्लूड की जांच व कम्प्यूटराइज्ड टोमोग्राफी आवश्यक है । इसके अतिरिक्त एन्जियोग्राफी व एम॰आर॰आई॰ की भी आवश्यकता पड़ सकती है ।

उपचार:

आदर्श रूप में सर्जरी सर्वोत्तम विधि है, पर हर स्थान व स्थिति में यह संभव नहीं है । अत: रेडियोथेरेपी प्रमुख या सर्जरी के बाद उपचार में प्रयोग की जाती है । पूरे मस्तिष्क के लिए समानान्तर विपरीत, फील्डों द्वारा 3500 रैड/10 फ्रैक्शनों में दी जाती है ।

व्रेनस्टेम को 5000 रेड पांच हफ्तों में रेडियेशन दिया जा सकता है । चित्र 14.30 व 14.31) स्पाइनल कार्ड के ट्‌यूमरों के लिए (15 से॰ मी॰ लम्बाई तक) रेडियेशन डोज 2500 रैड तीन हफ्तों से अधिक नहीं होनी चाहिए ।

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