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Experiments on Metals and Non-Metals | Experiments | Chemistry

Here is a compilation on experiments on metals and non-metals in Hindi language.

दैनिक जीवन में हमें अपने आसपास अनेक वस्तुएँ तथा पदार्थ दिखाई देते हैं । वस्तुएँ तथा पदार्थ वास्तव में तत्वों द्‌वारा ही निर्मित होते हैं । पदार्थ ठोस, द्रव तथा गैसीय अवस्था में होते हैं । कुछ ठोस पदार्थ चमकदार, कठोर तो कुछ चमकरहित, मृदु, भुरभुरे होते है । जैसे, चाँदी, ताँबा, सोना चमकदार हैं जबकि लकड़ी, मिट्टी, खड़िया आदि चमकरहित हैं ।

करो और देखो:

ताँबा, एल्यूमीनियम, चाँदी जैसे पदार्थ चमकदार होते हैं । ये कठोर होते हैं । इसके विपरीत कोयला तथा गंधक आदि पदार्थों में चमक नहीं होती और उनका आसानी से चूर्ण बनाया जा सकता है ।

तत्वों का विभाजन दो प्रकारों में किया जाता है:

(A) धातुएँ

(B) अधातुएँ ।

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धातुओं और अधातुओं के गुणधर्म एक-दूसरे से भिन्न होते हैं ।

धातुओं तथा अधातुओं के कुछ भौतिक गुणधर्म:

पत्रणीयता (Malleability):

करो और देखो:

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लोहे की एक  कील लो । हथौड़ी द्‌वारा उसपर आघात करके उसे चपटा करो । हथौड़ी से आघात करने पर यह  कील चपटी होती जाती है और उससे पतला पतरा तैयार होता है । अत: पत्रणीयता धातुओं का गुणधर्म है ।  ठोस अवस्थावाले पदार्थों पर आघात करके उनसे पतला पतरा बनाने के गुणधर्म को ‘पत्रणीयता’ कहते हैं । कोयले (चारकोल) पर हथौड़ी से आघात करो । उससे पतरा नहीं बनता ।

प्रेक्षण करो:

किसी लोहार की दुकान में जाकर देखो । वह भट्‌ठी में गरम किए गए लाल लोहे को निहाई पर रखकर उसपर भारी घन से आघात करता है । गरम किया गया लोहा मृदु होता है । घन के आघात से वह पतले पतरे में बदल जाता है और उसे अपेक्षित आकार दिया जा सकता है ।

तन्यता (Ductility):

किसी पदार्थ से तार खींचे जाने से संबंधित गुणधर्म को ‘तन्यता’ कहते है । धातुओं से तार खींचे जा सकते हैं । प्लेटिनम तथा सोना तन्य के रूप में प्रसिद्ध हैं । केवल १.२७ ग्राम प्लेटिनम से २.५ किमी लंबा तार बनाया जा सकता है । कोयले का अर्थ है  कार्बन । कार्बन अधातु है । अधातुएँ न तो पत्रणीय होती हैं और न ही तन्य ।

ऊष्मा चालकता तथा विद्‌युत चालकता:

रसोईघर में भोजन बनाने के लिए धातुओं के बरतनों का उपयोग किया जाता है । इसका कारण यह है कि लोहे तथा ताँबे जैसी धातुएँ ऊष्मा की सुचालक होती हैं । प्राय: अधिकांश धातुएँ विद्‌युत तथा ऊष्मा की सुचालक होती हैं । घरों में लगी बिजली की वायरिंग तुमने देखी है ।

उसमें ताँबे के तारों का उपयोग किया जाता है परंतु दीवार पर लगा स्विच बोर्ड लकड़ी से बना होता है । ताँबा विद्युत का सुचालक है जबकि लकड़ी कुचालक है । जिन पदार्थों में से ऊष्मा तथा विद्युत का प्रवाह आसानी से होता हैं, उन पदार्थों को ‘ऊष्मा चालक’ तथा ‘विद्युत चालक’ कहते हैं । धातुओं में ध्वनि उत्पन्न होती है । अधातुओं में ध्वनि उत्पन्न नहीं होती ।

नीचे दी गई तालिका द्‌वारा धातुओं तथा अधातुओं के गुणधर्मों का अध्ययन करो:

धातुएँ:

i. धातुओं में चमक होती है ।

ii. धातुएँ पत्रणीय होती है अर्थात पीटकर इनसे पतरा बनाया जा सकता है ।

iii. धातुओं में तन्यता होती है अर्थात इनसे तार खींचे जा सकते हैं ।

iv. धातुएँ प्राय: ऊष्मा तथा विदयुत की सुचालक होती हें ।

v. सामान्य तापमान पर धातुएँ प्राय: ठोस अवस्था में होती हैं । अपवाद – पारा द्रव अवस्थावाला धातु तत्व है ।

vi. धातुओं का घनत्व प्राय: अधिक होता है ।

अधातुएँ:

i. अधातुओं में चमक नहीं होती ।

ii. अधातुएँ भंगुर होती हैं । इसलिए ये पत्रणीय नहीं होती ।

iii. भंगुर होने के कारण अधातुओं में तन्यता नहीं होती । इनसे पतले तार नहीं बनाए जा सकते ।

iv. अधातुएँ प्राय: ऊष्मा तथा विद्युत की कुचालक होती हैं ।

v. सामान्य तापमान पर अधातुएँ प्राय: ठोस या गैसीय अवस्था में होती हैं । अपवाद – ब्रोमीन द्रव अवस्थावाली अधातु है ।

vi. अधातुओं का घनत्व प्राय: कम होता है ।

धातुओं के रासायनिक गुणधर्म:

1. आक्सीजन के साथ अभिक्रिया:

(a) धातुएँ आक्सीजन के साथ रासायनिक संयोग करती हैं और उनके आक्साइड निर्मित होते हैं ।

करो और देखो:

दीपावली में तुमने मैगनीशियम का फीता जलाकर असे निकलनेवाला प्रकाश देखा  है । मैगनीशियम हवा में जलकर आक्सीजन से संयोग करके मैगनीशियम आक्साइड देता है ।

(b) तर-नम हवा में रखे हुए लोहे पर जंग लग जाता है । उसपर सर्वत्र लाल रंगवाला पदार्थ फैल जाता है । यह लोहे की हवा में स्थित आक्सीजन के साथ होनेवाली रासायनिक अभिक्रिया ही है ।

करो और देख:

किसी परखनली में थोड़ा-सा पानी लो । उसमें मैगनीशियम आक्साइड डालो । पानी हिलाओ । इसमें क्रमश: लाल तथा नीला लिटमस कागज डालो । तुम्हें क्या दिखा ? लाल लिटमस कागज नीला हो जाता है । इससे यह ज्ञात होता है कि धातुओं के आक्साइड भास्मिक गुणधर्मवाले होते हैं ।

2. धातुओं पर अम्लों की होनेवाली अभिक्रिया:

करो और देखो:

चार परखनलियों लो । इन्हें क्रमश: A, B, C तथा D नाम दो । इनमें क्रमश मैगनीशिय का फीता, एल्युमीनियम का पतला पतरा, लोहे का चूर्ण तथा ताँबे का तार डालो । अब ड्रापर की सहायता से प्रत्येक परखनली में ५ मिली तनु हाइड्रॉक्लोरिक अम्ल डालो ।

होनेवाली अभिक्रिया को सावधानी से देखो । यदि अभिक्रिया न हो रही हो, तो परखनली को थोड़ा गर्म करो । अब प्रत्येक परखनली के मुँह के पास जलती हुई तीली लाओ । तुम्हें क्या दिखता है ? जलती तीली लाने के क्षण ही पाप् जैसी आवाज होती है ।

परखनली A:

अधिकांश धातुएँ जब किसी अम्ल से संयोग करती हैं, तब हाइड्रोजन गैस बाहर निकलती है । हाइड्रोजन ज्वलनशील गैस होने के कारण, परखनली के मुँह के पास जलती हुई तीली लाने पर तुरंत जलती है जिससे पाप् की आवाज होती है ।

परखनली B:

परखनली C:

परखनली D:

सामान्य तापमान अथवा उच्च तापमान पर ताँबे और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल की रासायनिक अभिक्रिया नहीं होती । उच्च तापमान पर ताँबे और सांद्र सल्फ्युरिक अम्ल (गंधकाम्ल) की रासायनिक अभिक्रिया होती है । अभिक्रिया होने के बाद कापर सल्फेट (नीला थोथा या तूतिया) का विलयन तैयार होता है और सल्फर डाइआक्साइड गैस बाहर निकलती है ।

3. धातुओं पर भस्मों की होनेवाली अभिक्रिया:

करो और देखो:

एक परखनली मैं ५-१० मिली सोडियम हाइड्राक्साइड का विलयन लो । उसमें एल्युमीनियम का एक पतला पतरा डालो । परखनली के मुँह के पास जलती हुई तीली लाओ । पाप् की आवाज होती है । पाप् की आवाज से तुम्हें यह ज्ञात होगा कि चलनेवाली गैस हाइड्रोजन है । धातुओं पर भस्मों की अभिक्रिया होने पर हाइड्रोजन गैस बाहर निकलती है ।

धातुओं के कुछ उपयोग:

(i) धातुओं के विशेष गुणधर्म के कारण भोजन बनाने में उपयोगी बरतनों के निर्माण में इनका बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है ।

(ii) बिजली के उपकरण, विद्युत वाहक तार के साथ-साथ रेडियो, प्रशीतक (फ्रिज) इत्यादि में मुख्य रूप से ताँबे के तारों का उपयोग किया जाता है ।

(iii) वर्षा तथा धूप से बचाव प्राप्त करने के उद्देश्य से मकानों में एल्युमीनियम तथा लोहे के पतरों का उपयोग करते हैं ।

(iv) आभूषणों तथा सिक्कों के निर्माण में सोने, चाँदी तथा टिन (वंग) का उपयोग किया जाता है ।

(v) पारा ऐसा तत्व है, जिसका उपयोग तापमापी में करते हैं ।

(vi) सोडियम क्लोराइड (सामान्य नमक), सोडियम कार्बोनेट (धोने का सोडा), सोडियम बाइकार्बोनेट (खाने का सोडा) इत्यादि यौगिकों का हम दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं, जो सोडियम धातु से प्राप्त होते हैं ।

अधातुओं के कुछ उपयोग:

(i) पेंसिलों में सीसे के विकल्प के रूप में ग्रेफाइट का उपयोग होता है ।

(ii) विद्युत सेल में एक ध्रुव के रूप में ग्रेफाइट का उपयोग करते हैं ।

(iii) सिलिकान नामक धातुसदृश (उपधातु) से निर्मित सिलिकान डाइआक्साइड़ का उपयोग काँच तथा सीमेंट के उत्पादन में किया जाता है ।

(iv) सौर विद्‌युत सेलों में सिलिकान का उपयोग करते हैं ।

(v) लाल फास्फोरस नामक अधातु का उपयोग दियासलाई, पटाखों, जंतुनाशकों तथा विस्फोटकों के उत्पादन में किया जाता है ।

(vi) गंधक नामक अधातु का उपयोग अम्लों के निर्माण में होता है तथा इसके अतिरिक्त इससे औषधियाँ तथा बारूद भी बनाया जाता है ।

राजधातुएं:

प्लेटिनम तथा सोना ऐसी धातुएँ हैं, जो प्रकृति में स्वतंत्र तत्वों के स्वरूप में ही पाई जाती हैं । इन धातुओं पर हवा, पानी, अम्लों एवं ऊष्मा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता । ये धातुएँ प्राय: रासायनिक अभिक्रियाओं में भी भाग नहीं लेती । इन्हीं धातुओं को राजधातुएँ कहते हैं ।

राजधातुओं के उपयोग:

a) सोने तथा प्लेटिनम का उपयोग मुख्य रूप से आभूषणों के निर्माण में किया जाता है ।

b) प्राचीन काल में सोने के सिक्कों का उपयोग किया जाता था ।

c) चाँदी पर सोने का मुलम्मा चढ़ाया जाता है ।

d) कुछ चिकित्सकीय उपकरणों के निर्माण में प्लेटिनम का उपयोग करते हैं ।

सोने की शुद्धता:

सोने की शुद्धता का मापन ‘कैरेट’ में किया जाता है । २४ कैरेट सोने का अर्थ है १०० प्रतिशत शुद्ध सोना । इसी आधार पर सोने का मूल्य निर्धारित होता है परंतु २४ कैरेट शुद्धतावाला सोना अत्यंत मृदु होता है ।

इसलिए शुद्ध सोने से निर्मित आभूषण थोड़े- से दाब द्‌वारा भी मुड़ जाते हैं या टूट जाते हैं । इसलिए इसमें आवश्यक मात्रा में ताँबा या चाँदी मिश्रित करते हैं । आभूषणों के निर्माण में प्राय: २२ कैरेट शुद्धतावाले सोने का उपयोग करते हैं ।

नीचे दी गई तालिका में सोने की शुद्धता का प्रतिशत:

क्षरण:

लोहे की वस्तुओं पर कुछ दिनों बाद ललछौंह लेप दिखाई देता है । नमी की उपस्थिति में ताँबे के बरतनों पर भी हरित-पीताभ दाग पड़ जाते हैं । हवा में रखने पर चाँदी के बरतन कुछ समय में काले पड़ जाते      है । ऊपर दिए गए सभी उदाहरणों में वास्तव में लोहे, ताँबे, चाँदी आदि धातुओं पर नमी की उपस्थिति में हवा की गैसों से अभिक्रिया होने के कारण यौगिक बनते हैं । इस प्रक्रिया के कारण धातुओं की छीजन होती है । इसे ही ‘क्षरण’ कहते हैं ।

लोहे पर हवा की आक्सीजन से अभिक्रिया होती है । ताँबे पर हवा की कार्बन डाइआक्साइड से अभिक्रिया होती है । चाँदी पर हाइड्रोजन सल्फाइड की अभिक्रिया होती है । क्षरण से धातुओं को बचाने के लिए उनपर तेल, ग्रीज आदि की परत चढ़ाई जाती है । इन पर जंग न लगनेवाली धातु का मुलम्मा दिया जाता है ।

लोहे पर जस्ते का मुलम्मा देकर उसको क्षरण से बचाया जाता है । सागर के नमकीन पानी से जलयानों में लगे पतरी का क्षरण रोकने के लिए उनपर इनेमल पेंट लगाया जाता है । इन पेंटों में जस्ते या मैगनीशियम धातुओं का उपयोग करते हैं, जिससे पतरे तथा हवा का संपर्क टूट जाता है और रासायनिक अभिक्रिया न हो पाने के कारण उसका क्षरण नहीं होता ।

मिश्रधातुएँ:

दो या दो से अधिक धातुओं अथवा धातुओं तथा अधातुओं के समांगी मिश्रण को ‘मिश्रधातु’ कहते हैं । किसी मिश्रधातु में उसकी घटक धातुओं (या अधातुओं) का एक निश्चित अनुपात होता है । मिश्रधातु निर्मित होने पर उनके घटकों के भौतिक गुणधर्म बदल जाते है परंतु रासायनिक गुणधर्म नही बदलते ।

उदाहरण, ताँबे तथा टिन (वंग) धातुओं को मिश्रित करने पर काँसा (ब्रांज) नामक मिश्रधातु बनती है । इस मिश्रधातु में तांबे के जैसी मृदुता लुप्त हो जाती है और उसमें कठोरता उत्पन्न हो जाती है । लोहे तथा कार्बन द्वारा इस्पात नामक मिश्रधातु मिलती है । यह अत्यंत मजबूत होती है । लोहे, कार्बन, क्रोमियम तथा निकेल से स्टेनलेस इस्पात नामक मिश्रधातु मिलती है । यह अधिक टिकाऊ तथा स्वच्छ होती है । इस पर जंग भी नहीं लगता ।

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