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Geography of Governance System | Hindi

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1980 के दशक में शासन व्यवस्थाओं के अध्ययन में उत्तरोत्तर बढ़ती व्यवस्था की दृष्टि से राज्य सामाजिक संगठन का अनिवार्य तत्व नहीं है । इसके विपरीत शासन सामाजिक व्यवस्था की अनिवार्य शर्त है  ।

शासन नियंत्रण विहीन समाज अपने आप में विरोधाभासपूर्ण संकल्पना है क्योंकि व्यवस्था के अभाव में कोई समाज समग्र इकाई नहीं बन सकता । अत: यह आश्चर्य की बात है कि मानव भूगोल में शासन प्रणालियों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का अध्ययन लम्बे अरसे तक तिरस्कृत रहा ।

मानव भूगोल के क्षेत्र में शासन तथा शासन की नीतियों के अध्ययन  में रुचि उत्पन्न करने की दिशा में इकनॉमिक जिओग्राफी नामक पत्रिका में प्रकाशित सील कोहेन (1966) एक आमंत्रित सम्पादकीय टिप्पणी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

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इससे प्रेरित होकर प्रेस्कॉट (1968) ने ”राज्य की नीतियों का भूगोल” (जिओग्राफी ऑफ स्टेट पालिसीज़) शीर्षक  से एक संक्षिप्त पुस्तक प्रकाशित की । परन्तु इस पुस्तक में भविष्य में अध्ययन हेतु महत्वपूर्ण विषयों के बारे में सुझाव मात्र थे न कि किसी प्रकार का सैद्धान्तिक दिशा निर्देश अथवा पूर्वगामी शोध की समन्वित प्रस्तुति  ।

सैद्धांतिक दिशा निर्देश की दृष्टि से दीक्षित (1971 बी) द्वारा प्रकाशित लेख शायद पहला समग्र प्रयास था । यह लेख परिसंघीय शासन व्यवस्था पर लेखक के विस्तृत अध्ययन का एक अंश था । शासन मूलत संस्थाओं पर आधारित प्रक्रिया और व्यवस्था है । इसके माध्यम से देश के नागरिकों के आपसी सम्बन्धों तथा उनके और अन्य देशों के नागरिकों के बीच होने वाले विविध सम्पर्को को समग्रता और अनुशासनबद्धता प्राप्त होती है ।

विभिन्न शासकीय संस्थाओं के माध्यम से देश के अन्तर्गत शांति व्यवस्था स्थापित करने, नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने और जनकल्याण तथा सामाजिक जीवन के अन्य महत्वपूर्ण मुद्‌दों पर नीति निर्धारण की प्रक्रिया का संचालन होता है ।

लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में देश के प्रशासन का दिशा निर्देश नागरिकों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की सभा के माध्यम से उनके द्वारा स्वयं पारित संविधान के उपबंधों के अंतर्गत होता है । सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था का अंतिम संदर्भ बिन्दु राष्ट्रीय संविधान ही है ।

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प्रत्येक देश अपने संविधान की रचना अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर और अपने भौगोलिक तथा सामाजिक परिवेश के अनुरूप करता है । अत: संविधान संस्कृति और स्थान सापेक्ष हैं । अत: प्रत्येक देश का संविधान दूसरों से भिन्न होता है ।

परन्तु सैद्धांतिक स्तर पर लोकतांत्रिक राज व्यवस्था में दो भिन्न-भिन्न प्रकार की शासन पद्धतियों और तदनुरूप दो अलग प्रकार की संवैधानिक व्यवस्थाओं का प्रचलन है । एक को केन्द्रीकृत ऐकिक प्रणाली तथा दूसरे को परिसंघ प्रणाली की संज्ञा दी गई है ।

ऐकिक शासन प्रणाली:

ऐकिक शासन प्रणाली के अन्तर्गत नीति निर्धारण के सम्पूर्ण अधिकार केन्द्रीय सरकार में निहित होते हें । इनके कार्यान्वयन का उत्तरदायित्व स्थानीय तणमूल स्तरीय प्रशासनिक संस्थाओं पर होता हैं जो सीधे केन्द्रीय प्रशासन के प्रति उत्तरदायी होती हैं ।

संक्षेप में ऐकिक शासन प्रणाली दो स्तरीय प्रणाली है, एक केन्द्रीय और दूसरी स्थानीय । ऐसी व्यवस्था उन देशों के लिए सर्वोत्तम है जिनकी जनसंख्या-संरचना राष्ट्रीय स्तर पर प्राय एक सी है और जिनके ऐतिहासिक संस्कार, भाषा साहित्य, तथा जीवन मूल्यों में समरसता व्याप्त है, और जहां पाई जाने वाली सामाजिक विविधताएं क्षेत्रीय रूप में केन्द्रित न होकर सम्पूर्ण देश में मिले जुले रूप में वितरित हें ।

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विश्व के अधिकांश ऐतिहासिक देश (भारत जैसे कुछ अपवादों को छोड़) ऐकिक शासन व्यवस्था वाले हैं । परन्तु उनकी वास्तविक संस्थात्मक व्यवस्था और शासन प्रक्रिया में पर्याप्त विविधता विद्यमान हैं । उदाहरणार्थ ऐतिहासिक कारणों से ब्रिटिश शासन व्यवस्था में क्षेत्रीय विविधताओं को ध्यान में रखते हुए देश की तीन ऐतिहासिक इकाइयों, स्कॉटलैण्ड, वेलस, ओर उत्तरी आयरलैण्ड को विशेष सुरक्षा प्राप्त फ्रांस प्रारम्भ से ही एक अत्यधिक केन्द्रीकृत ऐकिक राजनीतिक इकाई रहा है ।

परिसंघीय शासन प्रणाली:

भारत, संयुक्त राज्य अमरीका, कनाडा और आस्ट्रेलिया जैसे अनेक वृहदाकार देशों में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक कारणों से अन्तरक्षेत्रीय विविधताएं अपेक्षाकृत अधिक मुखर हैं । अत: उन्हें एक पूर्णतया केन्द्रीकृत सूत्र में बांधे रखना अपेक्षाकृत बहुत कठिन कार्य है । आधुनिक तकनीकी विकास के पहले यह कार्य अनेक गुणा और कठिन था ।

ऐसी स्थिति में देश के राजनीतिक प्रबन्धन का मुख्य उद्‌देश्य एक देसी शासन व्यवस्था की स्थापना है जिसके माध्यम से अनेकता में एकता का संचार सरल हो सके तथा क्षेत्रीय स्तर पर राजनीतिक असंतोष को जन्म दिए विना राष्ट्र के केन्द्रीय मूल्यों और उद्‌देश्यों के प्रति आम नागरिकों को अधिक आस्थावान बनाया जा सके ।

परिसंघीय शासन प्रणाली इस दिशा में किए गए ऐतिहासिक प्रयासों की अंतिम परिणति है । परिसंघ व्यवस्था एक त्रिस्तरीय प्रशासनिक व्यवस्था है जिसमें केन्द्रीय और स्थानीय स्तरों के बीच क्षेत्रीय स्तर पर स्वायत्त प्रादेशिक सरकारों का अस्तित्व है प्रत्येक क्षेत्र की स्थानीय प्रशासनिक संस्थाएं अपने क्षेत्र की प्रांतीय सरकार के प्रति उत्तरदायी होती हैं ।

केन्द्र और स्थानीय संस्थाओं के बीच किसी प्रकार का सम्पर्क स्वायत्त क्षेत्रीय प्रशासनिक इकाइयों के माध्यम से ही हो सकता है । देश के संविधान में संघ में सम्मिलित विभिन्न क्षेत्रीय इकाइयों की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षा प्रदान करने के उद्‌देश्य से नीति निर्धारण के अधिकार केन्द्रीय और प्रांतीय सूचियों में विभक्त होते हैं तथा एक स्तर की सरकार दूसरे स्तर के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं कर सकती ।

ऐसे मामले जिनका सम्बन्ध क्षेत्रीय पहचानों की सुरक्षा से जुड़ा है प्रान्तीय सरकारों के नीति-निर्धारण अधिकार क्षेत्र में होते हें, तथा शेष केन्द्रीय सरकार के अधिकार क्षेत्र में । इस अध्याय में हम परिसंघ प्रणाली की सविस्तार चर्चा करेंगे ।

परिसंघीय शासन व्यवस्था की प्रकृति और उसका स्वरूप:

राजनीतिक विमर्श में परिसंघ व्यवस्था का प्रयोग बहुधा चलताऊ ढंग से किया जाता है । परिणामस्वरूप इसकी प्रकृति ओर स्वरूप के प्रति भ्रामक स्थिति बनी रहती हैं । 1996 में भारत में मिली-जुली सरकारों द्वारा केन्द्र में सत्ता संभालने के बाद तथा सत्ता में क्षेत्रीय दलों की प्रमुख भागीदारी के परिणामस्वरूप यह भ्रम और भी गहन हो गया है ।

परन्तु विमर्श के शास्त्रीय स्तर पर इस व्यवस्था की मूलभूत विशेषताओं के प्रति मतैक्य है । जब किसी एक वृहद क्षेत्र में स्थित अलग-अलग पहचान वाली (स्वायत्त अथवा स्वतंत्र, अथवा स्वायत्तता के लिए प्रयत्नशील) प्रान्तीय इकाइयां अपने विशिष्ट क्षेत्रीय हितों की सुरक्षा हेतु, अपने पड़ोसी सामूहिक इकाइयों से पृथक् राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने की इच्छूक हैं, परन्तु साथ ही कुछ ऐतिहासिक संस्कारों, सांस्कृतिक बंधुता की भावना, समान मूल्यबोध, अथवा बाहरी खतरों से समानरूप से आक्रांत होने के कारण अस्तित्व सुरक्षा हेतु उनकी विवशता हो कि वे परस्पर एक जुट होकर अपने सम्मिलित संसाधनों और राजनीतिक ऊर्जा का पूर्ण संयोग कर अपने अलग-अलग और सामूहिक अस्तित्व की रक्षा हेतु एक सशक्त केन्द्रीय सत्ता का निर्माण करें तो ऐसी स्थिति में परिसंघ व्यवस्था उनकी समस्या का सर्वोपयुक्त और एकमात्र समाधान है ।

महान विधिविद ए.वी. डाइसी (1888) के अनुसार परिसंघ व्यवस्था के उद्‌भव के लिए आवश्यक शर्त यह है कि संघ में मिलने की इच्छूक इकाइयां अपनी स्थानीय अस्मिता के रक्षा हेतु एक दूसरे से अलग रहने के इच्छूक हों परन्तु साथ ही अनेक वृहतर और महत्वपूर्ण उद्‌देश्यों की प्राप्ति हेतु वे समानरूप से एकजुट होकर एक ही केन्द्रीय राजनीतिक संगठन का अंग बनने के लिए प्रतिबद्ध भी हों ।

ऐसी मन स्थिति में निर्मित संघ एक सार्वभौम केन्द्रीय प्रभुसत्ता का तो निर्माण करेगा परन्तु पूर्णतया ऐकिक राज्य का नहीं क्योंकि पृथक्-पृथक् क्षेत्रीय पहचानों की अस्तित्व रक्षा के लिए क्षेत्रीय स्तर पर संवैधानिक स्वायत्तता उनके एक जुट होने की अनिवार्य शर्त होगी ।

इस दृष्टि से किसी भी देश का परिसंघ संविधान पूर्ण केन्द्रीयकरण के पक्षधर राष्ट्र नायको और अधिकतम क्षेत्रीय स्वायत्तता की मांग करने वाली क्षेत्रीय शक्तियों के बीच मोल-भाव के आधार पर निर्मित व्यवस्था है दूसरे शब्दों में परिसंघ व्यवस्था एक विशिष्ट प्रकार की संविदा (कांट्रैक्ट) का परिणाम है ।

अन्य प्रकार का संविदा की भांति इस राजनीतिक संविदा की शर्तें भी लिखित रूप में होनी अनिवार्य हैं । देश का परिसंघ संविधान यही लिखित शर्तनामा है जिसका अनुपालन केन्द्रीय और क्षेत्रीय सरकारों के लिए समान रूप से अनिवार्य है, तथा जिसकी शर्तो को एक पक्षीय निर्णय से बदला नहीं जा सकता ।

किसी भी संवैधानिक परिवर्तन के लिए केन्द्रीय सत्ता और क्षेत्रीय इकाइयों की संस्कृति समानरूप से आवश्यक है । कोई भी पक्ष संविधान के उपबंधों का उल्लंघन और एक दूसरे की अधिकारिता का अतिक्रमण न कर सके यह सुनिश्चित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की जाती है । उपर्युक्त चर्चा से स्पष्ट है कि परिसंघ व्यवस्था एक विशेष प्रकार की ऐतिहासिक-सामाजिक समस्याओं के समाधान हेतु निर्मित व्यवस्था है ।

अत: परिसंघवाद एक सोद्‌देश्य प्रक्रिया है, न कि एक स्थूल अचल कृति । समाज के उददेश्यों, नागरिकों की अपेक्षाएं और राज्यों के परस्पर सम्बन्ध तथा उनकी आन्तरिक और बाह्य राजनीति तथा तकनीकी विकासजन्य अनेक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप सतत् परिवर्तित होते रहते हैं ।

इन परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए देश की शासन व्यवस्था और उसकी संवैधानिक संरचना तथा केन्द्र और क्षेत्रों के कार्यक्षेत्रों में समय-समय पर प्रत्यक्ष और परोक्ष बदलाव आना, तथा इसके परिणामस्वरूप केन्द्र और राज्यों के बीच पुनर्सामंजस्य की स्थापना एक अनिवार्य और स्वाभाविक प्रक्रिया है । संक्षेप में प्रत्येक परिसंघ व्यवस्था स्वभाव से ही निरन्तर विकासशील व्यवस्था है ।

आधुनिक परिसंघ राजनीतिक शासन व्यवस्था का जन्म करीब दो सो साल पुराना है । इसका प्रादुर्भाव 1787 में संयुक्त राज्य अमरीका के संविधान की घोषणा के साथ हुआ था । तब से अमरीकी संविधान परिसंघ शासन व्यवस्था के निर्माण में संदर्भ बिन्दु बना हुआ है ।

परिसंघ व्यवस्था की परिवर्तनशीलता, उसके विकासशील स्वरूप और इसके विकास की प्रक्रिया का अनुमान अमरीकी उदाहरण से भली प्रकार स्पष्ट है । ध्यातव्य है कि बीसवीं सदी के पहले तक अमरीकी शासन व्यवस्था मूलत: द्वैध (डुअलिस्टिक) व्यवस्था थी जिसके अन्तर्गत संघीय और क्षेत्रीय सरकारें व्यावहारिक स्तर पर एक दूसरे से प्राय: स्वतंत्र प्रशासनिक इकाइयों के रूप में क्रियाशील थीं ।

एक अमरीकी विद्वान के शब्दों में इस दौर में संघीय और प्रादेशिक प्रशासन दो समीपस्थ परन्तु समान्तर रूप में प्रवाहित होने वाली सरिताओं के समान थे जिनकी धाराएं उनकी भौगोलिक समीपता के होते हुए भी एक दूसरे से सर्वथा अछूती थीं ।

कारण यह था कि अमरीकी  गृह युद्ध के काफी बाद तक राज्यों के सामाजिक प्रशासन का कार्य क्षेत्र इतना सीमित था कि केन्द्रीय प्रशासन के किसी प्रकार के निर्देश तथा हस्तक्षेप के बिना ही प्रादेशिक सरकारें अपना प्रशासनिक कार्य सुचारु रूप से चलाने में सक्षम थी ।

एक विद्वान के शब्दों में तत्कालीन परिसंघ व्यवस्था सामान्यतया एक प्रकार्यहीन परिसंघ व्यवस्था (फंक्शनलेस फेडरलिज़्म) थी  । परन्तु वर्तमान दौर में इस प्रकार की द्वेद्ध व्यवस्था कल्पना से परे है । किसी देश का आर्थिक और राजनीतिक दर्शन चाहे साम्यवादी हो अथवा उदारवादी, आज उसके प्रादेशिक शासन में केन्द्रीय सहयोग और निदेश एक अनिवार्य आवश्यकता बन गई है ।

आधुनिक युग कल्याणकारी प्रशासन का युग है अत: कोई भी राष्ट्रीय शासन जन कल्याण सम्बन्धी कर्तव्यों के प्रति उदासीन नहीं रह सकता । आज नागरिको के दैनिक जीवन के प्राय सभी पक्षों में प्रशासन की सीधी भागीदारी है ।

अत: नागरिकों की अपनी सरकार से जनसेवा और कल्याणकारी शासन की अपेक्षा प्राय असीम हो गई हैं । ऐसे में केन्द्रीय और प्रान्तीय प्रशासन के बीच व्यापक ताल-मेल और सहयोग नितान्त आवश्यक है ।  अब यह प्रश्न अर्थहीन हो गया है कि अमुक सेवा प्रदान करना किस सरकार का उत्तरदायित्व है, केन्द्रीय सरकार का अथवा प्रान्तीय सरकार का । महत्वपूर्ण बात यह है कि किस स्तर का प्रशासन अमुक सेवपिण के लिए सर्वाधिक सक्षम है । आर्थिक और सामाजिक नियोजन आज युग की पुकार है ।

सामाजिक और आर्थिक नियोजन अनिवार्यत अन्तरप्रान्तीय प्रक्रिया है अत: केन्द्र स्तरीय प्रशासन ही इसके लिए अधिक सक्षम है, वहीं देश के सभी नागरिकों को न्यूनतम सुविधाएं प्रदान कर सकता है । साथ ही केन्द्र अधिक संसाधन सम्पन्न भी है । उन्नीसवीं सदी में तात्कालिक स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में निर्मित परिसंघीय संविधान में केन्द्रीय सरकार की अधिकारिता सीमित थी ।

अत: वांछित स्तर की अन्तरप्रान्तीय क्रियाशीलता ओर प्रशासनिक उत्तरदायित्व संविधान में निर्दिष्ट केन्द्रीय अधिकार क्षेत्र के परे थे । परिणामस्वरूप समय की पुकार के अनुसार केन्द्र और प्रान्तीय सरकारों के आपसी सहयोग से केन्द्रीय सरकार का कार्य क्षेत्र उत्तरोत्तर व्यापक होता गया है ।

समकक्षता के सिद्धान्त पर आधारित पुरानी परिसंघ व्यवस्था (कोआर्डिनेट फेडरलिज़्म) सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है । परिणामस्वरूप प्रांतीय और केन्द्रीय सरकारो के बीच पुराना द्वैध भाव धीरे-धीरे परस्पर सहयोग में बदल गया और परिसंघ व्यवस्था अब समकक्ष व्यवस्था के स्थान पर एक सहयोगी व्यवस्था (कोआगरेटिव फेडरलिज़्म) बन गई ।

केन्द्रीय नियोजन की प्रक्रिया केन्द्र और प्रांतों की समकक्षता की संकल्पना से पूरी तरह बेमेल थी क्योंकि कलि लोवेंस्टाइन (1951) के शब्दों में आर्थिक नियोजन की प्रक्रिया परिसंघ व्यवस्था के लिए ”डी.डी.टी.” जैसी है । अर्थात् दोनों का परस्पर सहयोग सम्भव नहीं हैं । यहां लोवेंस्टाइन का तात्पर्य समकक्ष द्वैध परिसंघ व्यवस्था से था । नियोजन की प्रक्रिया ने इसी द्वैधता का विनाश किया है क्योंकि इसके कारण केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारें एक दूसरे के उत्तरोत्तर समीप आ गई हैं ।

डैलियल एलाजार के अनुसार विद्वान उन्नीसवीं सदी में अमरीकी परिसंघ व्यवस्था की द्वैध प्रवृत्ति पर आवश्यकता से अधिक बल देते रहे हैं । वास्तव में अमरीकी परिसंघ व्यवस्था सदा से ही सहयोगपूर्ण व्यवस्था रही है ।

समकक्ष व्यवस्था से सहयोगी व्यवस्था में परिवर्तन की यह प्रक्रिया उन्नीस सौ सैंतीस की आर्थिक मंदी और तज्जनित कठिनाइयों से उबरने की दिशा में किए गए प्रयासों का परिणाम थी तभी से प्रशासनिक केन्द्रीयकरण की प्रक्रिया उत्तरोत्तर गहन होती गई है ।

इसमें राष्ट्रीय इकाइयों की परस्पर निर्भरता और अन्तरराष्ट्रीय व्यापार में उनकी बढती हुई प्रतिस्पर्धा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । आज विकसित अर्थव्यवस्था वाले अधिकांश देशों में केन्द्रीय और प्रान्तीय अधिकारों में परस्पर इतना अधिक अधिच्छादन हुआ है कि परिसंघ व्यवस्था और ऐकिक व्यवस्था के बीच अन्तर करना उत्तरोत्तर कठिन हो गया है ।

परिसंघ व्यवस्था के विकास में आए इस नए चरण को जैविक परिसंघ व्यवस्था (ऑर्गेनिक फेडरत्निज्म) की संज्ञा दी गई है । ज्योफ्रेय सोयर (1969) के अनुसार आस्ट्रिया इस प्रकार की परिसंघ व्यवस्था का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है और क्लासिकी परिसंघ राज्यों में संयुक्त राज्य अमरीका इस दिशा में काफी आगे बढ़ चुका है ।

जैविक परिसंघ व्यवस्था और ऐकिक राजव्यवस्था के अन्तर को रेखांकित करते हुए सोयर (1969) ने स्पष्ट किया है कि जब तक किसी परिसंघ राज्य में संविधान संशोधन की प्रक्रिया और उसकी न्यायिक प्रणाली का संचालन, तथा देश की राजनीति का क्रियात्मक स्वरूप, अथवा इनमें से कोई दो बातें संयुक्त रूप में केन्द्र द्वारा क्षेत्रीय सरकारों के अस्तित्व को समाप्त करने के किसी भी आशय को प्रभावी रूप से निरस्त करने में सक्षम हैं तब तक क्षेत्रीय सरकारों का अस्तित्व सर्वथा सुरक्षित है, अत ऐसी राजव्यवस्था सर्वथा परिसंघ व्यवस्था है ।

अधिच्छादन और अतिक्रमण के किसी केन्द्रीय प्रयास से प्रादेशिक इकाइयों की सवैधानिक सुरक्षा की निरन्तरता का अटल आश्वासन ही परिसंघ व्यवस्था का मूल मंत्र है । यही तथ्य परिसंघ और ऐकिक व्यवस्था के बीच का न्यूनतम अन्तर है ।

ऐकिक व्यवस्था में क्षेत्रीय इकाइयां केन्द्र की इच्छा और निर्णय पर निर्भर है, जबकि परिसंघ व्यवस्था में उनकी स्वायत्तता और उनकी निरन्तरता संविधान प्रदत्त अत: सर्वथा सुरक्षित है । इस सन्दर्भ में दो भिन्न-भिन्न प्रकार की परिसंघ राजनीतिक व्यवस्थाओं का अन्तर स्पष्ट करना आवश्यक हे । एक ”फेडरेशन” (परिसंघ) और दूसरा “कॉनफीडरेशन” (महापरिसंघ) ।

दोनों ही शब्दों की व्यत्पत्ति समानार्थी होते हुए भी राजनीति तथा विधि के शास्त्रीय विमर्श में दोनों की परिभाषाएं सर्वथा भिन्न हैं । अत दोनों शब्दों को समानार्थक रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता इस सत्य के बावजूद कि स्विट्‌जरलैण्ड तथा कनाडा प्रारम्भ से ही अपने आपको कॉन्‌फीडरेशन कहते हैं ।

के.सी. ह्वीयर के अनुसार वर्तमान समय में “कॉन्‌फीडरेशन” (महापरिसंघ) से हमारा तात्पर्य स्वतंत्र राजनीतिक इकाइयों के परिसंघ से है जिसके अन्तर्गत केन्द्रीय सत्ता विभिन्न क्षेत्रीय सत्ताओं पर निर्भर है, अर्थात् ऐसे संघों के संविधान में केन्द्रीय सरकार की क्षेत्रीय सरकारो पर निर्भरता का सिद्धान्त समाविष्ट होता है ।

केन्द्रीय सत्ता ऐसा कोई निर्णय नहीं ले सकती जो कि प्रत्येक क्षेत्रीय इकाई को पूरी तरह स्वीकार्य न हो । इसके विपरीत परिसंघ व्यवस्था (फेडरेशन) के अन्तर्गत देश का संविधान केन्द्रीय सरकार को उसके विनिर्दिष्ट कार्य क्षेत्र में देश सभी भागों में स्वतंत्र प्रशासकीय निर्णय का पूर्ण अधिकार प्रदान करता है ।

अत: देश के नागरिक एक साथ ही द्विस्तरीय राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया के प्रभाव क्षेत्र में रहते हैं, एक केन्द्रीय तथा दूसरा क्षेत्रीय । साथ ही दोनों स्तर दूसरे के कार्यक्षेत्र का अतिक्रमण नहीं कर सकते । संक्षेप में महापरिसंघ (कॉन्‌फीडरेशन) स्वतंत्र राज्यों के आपसी समझौते के आधार पर निर्मित अन्तरराष्ट्रीय प्रशासनिक व्यवस्था है, जब कि (फेडरेशन) स्वायत्त क्षेत्रों के संयोग से निर्मित पुक प्रमुतासम्पन्न और सन्निहित राष्ट्रीय इकाई है ।

परिसंघ व्यवस्था और बहुदलीय लोकतंत्र:

परिसंघ व्यवस्था का वरण क्षेत्रीय रूप में परस्पर अलग-अलग केन्द्रित सामाजिक विविधताओं की अस्तित्व सुरक्षा के उद्‌देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है । अत: आवश्यक है कि देश के अन्तर्गत राजनीति का संचालन इस प्रकार का हो कि प्रत्येक क्षेत्रीय इकाई निवासियों को अपने हितों की सुरक्षा हेतु केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारों के चयन के लिए संसद तथा विधान सभाओं में अपनी रुचि के अनुरूप प्रतिनिधियों को निर्वाचित करके भेजने का अधिकार हो ।

परिसंघ राज्यों के संविधान सम्बद्ध क्षेत्रों और केन्द्र के बीच की गई शाश्वत संविदारर हैं । अत: क्षेत्रीय जनता को विचार स्वातंज्य का आश्वासन इसकी निरन्तरता की अनिवार्य शर्त है । राजनीतिक वरण और विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता तभी सम्भव होगी जब कि भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की जनता को अपनी रुचि के राजनीतिक दल को सत्ता सौंपने की पूर्ण स्वतंत्रता हो ।

इसी कारण स्वेच्छाचारी एकतंत्रीय व्यवस्था और एकदलीय राजनीति जिसके अन्तर्गत केवल एक पार्टी द्वारा प्रस्तुत उम्मीदवारों में से ही चयन करना नागरिकों की विवशता है, परिसंघ व्यवस्था की मूल आत्मा के विरुद्ध है । यही कारण है कि साम्यवादी व्यवस्था वाले परिसंघ राज्य, उदाहरणार्थ भूतपूर्व सोवियत संघ अथवा यूगोरूविया विद्वानों के मत में परिसंघीय राज्यों की श्रेणी में नहीं रखे जा सकते थे ।

परिसंघ व्यवस्था का भौगोलिक आधार:

1961 में प्रकाशित एक लेख में के इन्द्र, रॉबिन्सन का इस आशय का कथन कि परिसंघ व्यवस्था सभी राजनीतिक व्यवस्थाओं में भौगोलिक दृष्टि से सर्वाधिक अभिव्यंजना पूर्ण व्यवस्था है, राजनीतिक भूगोल में पिछले तीन दशकों में पर्याप्त चर्चा का विषय रहा है ।

परन्तु इस व्यवस्था को भौगोलिक अभिव्यंजना का स्वरूप ओर उसका आधार स्पष्ट करने की दिशा में प्रयास बहुत कम हुए हैं ।  सामान्यशास्त्रीय विमर्श में भी इस प्रश्न पर स्थिति भ्रामक बनी रही है ।

इसका एक प्रमुख कारण यह है कि अपने एक महत्वपूर्ण लेख में परिसंघ व्यवस्था के क्षेत्रीय रूप में केन्द्रित सामाजिक विविधता की चर्चा करते हुए लिविंग्स्टन (1952) ने परिसंघ व्यवस्था के अध्ययन में प्रस्तुत क्षेत्रीय परिदृष्टि को सामाजिक परिदृष्टि: का नाम दिया था ।

फलस्वरूप इस भ्रामक धारणा को बल मिला कि परिसंघ शासन पद्धति में निहित त्रिस्तरीय राजनीतिक व्यवस्था का मूलाधार सामाजिक विविधता है न कि सामाजिक मूल्यों और सामाजिक चेतना सम्बन्धी विविधताओं का परस्पर अलग-अलग क्षेत्रीय वितरण ।

परिसंघ व्यवस्था व्यापक स्वीकृति मिलने का मुख्य कारण यह है कि इसकी संरचना और प्रशासनिक द्वैधता, इसमें निहित क्षेत्रीय स्वायत्तता का सिद्धान्त तथा इसकी स्थानिकता और क्षेत्र-मूलकता इस विश्वास पर आधारित हैं कि विभिन्न क्षेत्रीय सामाजिक इकाइयां अपनी स्थानिकता के कारण अन्य क्षेत्रीय इकाइयों से अनेक अर्थो में विशिष्ट हैं, इस तथ्य के उपरान्त भी कि अपने अन्य पड़ोसी इकाइयों से उनके संबंध परस्पर मैत्रीपूर्ण हैं ओर उनके हितों और उद्‌देश्यों में पर्याप्त समानता है ।

परिसंघ व्यवस्था का विकास संचेतना के स्तर पर इसी स्थान मूलक द्वैधता, अर्थात् अन्तरक्षेत्रीय विविधता और परस्पर एकता की प्रवृत्तियों में सामंजस्य स्थापित करने के उद्‌देश्य से किया गया है । क्षेत्रीय स्वायत्तता के माध्यम से क्षेत्रीय समुदायों की सामाजिक विशिष्टता को सुरक्षा प्राप्त होती है तथा केन्द्रीय सरकार को संविधान में मिला व्यापक और सार्वभौम अधिकार परिसंघ व्यवस्था को पूर्णरूपेण क्रियाशील राष्ट्रीय इकाई के रूप में स्थापित करता है ।

परिसंघ व्यवस्था की भौगोलिक अभिव्यंजना का दूसरा कारण यह है कि इस प्रकार की प्रशासनिक व्यवस्था में क्षेत्रीय स्वायत्तता के परिणामस्वरूप क्षेत्रों को उनके संविधान द्वारा निर्धारित दायरे में विचार स्वातंज्य और राजनीतिक वरण की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है, परिणामस्वरूप उनकी क्षेत्रीय विविधता और स्थानिक अस्मिता को निरन्तरता मिल जाती है ।

इसके विपरीत ऐकिक व्यवस्था के अन्तर्गत क्षेत्रीय स्तर की स्वायत्तता के अभाव में विचार अभिव्यक्ति के अवसर सीमित होने के कारण क्षेत्रीय विविधता उत्तरोत्तर कुण्ठित होकर अन्तरक्षेत्रीय एकरूपता में परिवर्तित हो जाती है ।

स्थानीय निकायों और भूदृश्य निर्माण का भूगोल:

सत्तर के दशक के पहले राजनीतिक भूगोल का अध्ययन राष्ट्रीय स्तर के प्रश्नों और राज्य के अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों पर केन्द्रित था । राज्यों द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर अपने देश का आर्थिक विकास और उसकी शक्ति सम्पन्नता, तथा सम्पूर्ण देश को राष्ट्रीयता के गहन सूत्र में आबद्ध करने के उद्‌देश्य की प्राप्ति राजनीतिक भूगोल के विद्यार्थियों के मनन-चिन्तन के मुख्य विषय थे ।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन के प्रमुख मुद्‌दे उपनिवेशवादी प्रसार, राजनीतिक सीमाओं सम्बन्धी विवाद तथा अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक सम्बन्धों से जुड़े थे । अत: लम्बे समय तक राष्ट्रीय इकाइयों की आन्तरिक प्रशासनिक व्यवस्था तथा उनकी स्थानीय निकायों आदि का अध्ययन सर्वथा उपेक्षित था ।

इस दिशा में किया गया प्रयास पाठ्‌यपुस्तकों में देश की प्रशासनिक इकाइयों की गणना तक ही सीमित था । विद्वानों द्वारा स्थानीय शासन की उपेक्षा का प्रमुख कारण यह था कि रेटजेल द्वारा प्रतिपादित राज्य की जैविक संकल्पना के प्रभाव में राजनीतिक भूगोल में राज्यों को मुख्यतया विस्तारवादी और परस्पर प्रतिस्पर्धा इकाइयों के रूप में देखा जाता था ।

अत: राजनीतिक भूगोल शीर्ष अथवा ”उच्चस्तरीय” राजनीति के अध्ययन पर केन्द्रित हो गया । प्रत्येक राज्य मुख्यत ! विश्वव्यापी राजनीतिक व्यवस्था के एक सदस्य के रूप में देखा जाने लगा । अत: राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर की राजनीति राजनीतिक भूगोल के अध्ययन का मुख्या क्षेत्र बन गई और स्थानीय स्तर की राजनीति पूर्णतया उपेक्षित हो गई ।

स्थानीय स्तर का प्रशासन तथा देश के आन्तरिक राजनीतिक सम्बन्धो और राजनीतिक प्रक्रियाओं का विश्लेषण, पाद अथवा ”अधोस्तरीय” राजनीति का क्षेत्र है । इस प्रकार का अध्ययन राज्य और समाज के पारस्परिक सम्बन्धों, सामाजिक संसाधनों और सेवाओं के न्यायपूर्ण वितरण इत्यादि से सम्बद्ध प्रश्नों के अध्ययन पर केन्द्रित है ।

अधोस्तरीय राजनीति की ओर ध्यान सामाजिक चिन्तन में आमूल परिवर्तनवादी (रैडिकल) दृष्टि के विकास के बाद ही सम्भव हो सका । पश्चिमी समाज में इस प्रकार की परिवर्तनवादी वामपंथी चेतना का उदय सन साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में ही हुआ ।

इसका प्रमुख कारण यह था कि औद्योगिक दृष्टि से विकसित ओर सम्पन्न पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के वर्षों में आया उछाल तथा उससे उत्पन्न आथिइक सम्पन्नता का दौर अब हत गति से समाप्त होता दिखाई पड़ रहा था ।

श्रमिकों में बेरोजगारी बढ़ रही थी । युवकों को अपना भविष्य अनिश्चित दिखने लगा था । ऐसे में राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्था और उनकी व्यवस्थाजन्य खामियों, और सामान्यजन के दुख दर्द के प्रति उनकी उदासीनता तथा उनका दक्षिणोन्मुख झुकाव (जिसके कारण धनी-निर्धन की खाई और गहरी होती जा रही थी) इत्यादि की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक था ।

भूगोल में इस परिदृष्टि का प्रवेश सत्तर के दशक में हुआ । इसके साथ ही मानव भूगोल जनकल्याण उलूख अध्ययन बन गया । डेविड स्मिथ (1977) की पुस्तक ह्यूमन जिओग्राफी दर वेलफेयर एप्रोच के प्रकाशन ने मानव भूगोल में इस सामाजिक विचार परिवर्तन को स्वर दिया ।

सत्तर के दशक के समाप्त होते-होते मानव भूगोल में लोककल्याण पर केन्द्रित अर्थनीतिक (पोलिटिकल इकॉनोमी) परिदृष्टि प्राय सर्वव्यापी हो गई । अमरीकी राजनीतिशास्त्री हरोल्ड लासवेल (1936) द्वारा प्रतिपादित राजनीतिशास्त्र की परिभाषा के तर्ज पर स्मिथ तथा अन्य विद्वानों ने मानव भूगोल को ”कोने, क्या, कहा तथा कैसे प्राप्त करता है” के अध्ययन पर केन्द्रित विषय के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया ।

इस विचार परिवर्तन ने साथ ही लोककल्याण सम्बन्धी राज्य प्रदत्त सेवाओं के क्षेत्रीय स्वरूप का निरूपण मानव भूगोल के अध्ययन का मुख्य विषय बन गया । अध्ययन की इस परिदृष्टि की मूलभूत मान्यता यह थी कि किसी भी नागरिक को प्राप्त होने वाली सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता बहुत हद तक इस बात पर निर्भर है कि वह किस प्रकार की प्रशासनिक इकाई का निवासी है, घनी गरीब बस्तियों का अथवा उच्च वर्ग के सम्पन्न नागरिकों की वंगलेनुमा घरों वाले क्षेत्रों सिविल लाइन्स इत्यादि का ।

प्रथम प्रकार की बस्तियां सामान्यतया राजनीतिक प्रभाव विहीन साधारणजन की बस्तियां हैं जिनकी राजनीतिक निर्णय में सीधी भागीदारी प्राय नहीं के बराबर है । क्योंकि बहुधा सम्पन्न वर्ग के लोग ही नीति निर्धारण के कर्णधार होते हैं ।

सार्वजनिक सेवा की गुणवत्ता का क्षेत्रीय वितरण, तथा इस बात का निर्णय कि किन बस्तियों में नल में पानी चौबीस घण्टे मिलेगा ओर पानी का दबाव ठीक रहेगा, बिजली कभी गुल नहीं होगी, अन्य सार्वजनिक सेवाओं का स्तर उत्तम होगा, तथा किन क्षेत्रों में इन सुविधाओं की आपूर्ति दिन में कुछ घण्टे ही की जाएगी, सम्पन्न वर्ग के प्रतिनिधियों द्वारा ही निर्धारित किया जाता है । परिणामस्वरूप गरीब बस्तियों की उपेक्षा होती है ।

संक्षेप में 1970 के दशक में जनहित उलूम मानव भूगोल में स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों का महत्व अत्यधिक बढ़ गया म्यूनिसिपल बोर्ड और जिला परिषद आदि जैसी स्थानीय प्रशासनिक निकायों का छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजन किस प्रकार का है कौन से क्षेत्र किस आय वर्ग और किस जाति अथवा धर्म के लोगों के निवास क्षेत्र हें इत्यादि के स्वरूप का विश्लेषण सामाजिक न्याय के क्षेत्रीय वितरण को समझने के लिए नितान्त आवश्यक है ।

परिणामस्वरूप पिछले दो दशको में स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था का अध्ययन मानव भूगोल का महत्वपूर्ण विषय वन गया है । लोक कल्याण नियोजन की सारी प्रक्रिया के संचालन के लिए यही क्षेत्रीय इकाइयां, और स्थानीय निकाए, आधारभूत सन्दर्भ होती मोटे तौर पर क्षेत्रीय नियोजन दो प्रकार से किया जाता है ।

एक, ऊपर से नीचे की ओर अग्रसर होने वाला नियोजन तथा दूसरा, नीचे से ऊपर अग्रसर होने वाला नियोजन । दोनों ही विधियों में प्रशासनिक व्यवस्था का क्षेत्रीय निरूपण, अर्थात् निकायों अथवा प्रशासनिक परिषदों का वार्डों, मोहल्लों, ब्लाकों और पंचायत क्षेत्रों में विभाजन, तथा तृणमूल स्तर पर क्षेत्रीय इकाइयों के सामाजिक और आर्थिक स्वरूप का सूक्ष्म विश्लेषण लोक कल्याण केन्द्रित नियोजन प्रक्रिया के सफल संचालन के लिए अनिवार्य है ।

इस सामाजिक और आर्थिक निरूपण से सम्बद्ध प्रदेश के राजनीतिक-सामाजिक स्वास्थ्य तथा उसके सामाजिक असंतोष के क्षेत्रीय स्वरूप का पता चलता है । विभिन्न प्रकार के जन आन्दोलनों के अध्ययन में भी इस प्रकार के निरूपण की व्यापक उपयोगिता है ।

क्षेत्रीय प्रशासन का संस्थात्मक स्वरूप:

स्थानीय निकाए नागरिकों के दैनिक जीवन से जुड़ी समस्याओं पर केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारों ओर विभिन्न स्थानिक इकाइयों के निवासियों के बीच प्रशासनिक सम्बन्ध स्थापित करने का महत्वपूर्ण माध्यम       हैं । केन्द्रीय और क्षेत्रीय सरकारों के नीतिगत निर्णयों का स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप कार्यान्वयन इन्हीं के माध्यम से होता हे ।

स्थानीय प्रशासन में इन संस्थाओं के केन्द्रीय महत्व को ध्यान में रखते हुए उनके संस्थात्मक स्वरूप पर संक्षिप्त चर्चा आवश्यक है । स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों तथा केन्द्रीय और क्षेत्रीय सरकारों से उनके सम्बन्धों क्या स्वरूप, भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है ।

मोटे तौर पर ऐकिक व्यवस्था वाले राज्यों के स्थानीय प्रशासन की संरचना परिसंघीय राज्यों से बहुत भिन्न है । ऐकिक व्यवस्था के अधीन देश के सभी भागों में स्थानीय प्रशासनिक निकाएं केन्द्र के सीधे नियंत्रण में होती हैं । इसके विपरीत परिसंघ व्यवस्था के अधीन स्थानीय प्रशासन क्षेत्रीय सरकारों के दिशा निर्देश में काम करते हैं । परिणामस्वरूप दोनों प्रकार के राज्यों से भूदृश्य निर्माण में स्थानीय प्रशासन प्रभावोत्पादकता में बहुत अन्तर है ।

साथ ही एक ही प्रकार  की व्यवस्था वाले भिन्न-भिन्न देशों के बीच भी ऐतिहासिक तथा भौगोलिक कारणों से इस बात में पर्याप्त विभिन्नता पाई जाती है । प्रशासन का वास्तविक स्वरूप भिन्न-भिन्न राष्ट्रीय इकाइयों के राजनीतिक झुकाव और उनके नागरिकों के मूल्यबोध के क्षेत्रीय वितरण के स्वरूप पर निर्भर है  ।

देश के प्रशासन में इन इकाइयों के केन्द्रीय महत्व को देखते हुए अनेक विद्वानों ने इन्हें “स्थानीय राज्य” (लोकल स्टेट) की संज्ञा दी है इन्हें ”स्थानीय राज्य” की संज्ञा देने के पीछे मूलभूत मान्यता यह है कि राज्य के क्रियाकलाप कई स्तरों पर संचालित होते हैं, केन्द्रीय, क्षेत्रीय, और स्थानीय । प्राथमिक शिक्षा, आवास, भूमि उपयोग, और आवागमन व्यवस्था आदि का प्रशासन बहुधा नगरपालिकाओं तथा जिला परिषदों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर संचालित होता है ।

परन्तु स्थानीय स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था को राज्य का विशेषण देने से अनावश्यक भ्रउत्पन्न होता है । ”राज्य” शब्द से प्रभुसत्ता और सार्वभौमता का आभास अनिवार्यत: जुड़ा है, और सार्वभौमता का अधिकार केवल केन्द्रीय प्रशासन में निहित हैं ।

ये संस्थाएं किसी भी देश के राजनीतिक साधित्र (स्टेट अपरेटस) की नींव हैं कैस्टेल्स, (1983 क्लार्क और डीयर, 1984) क्योंकि इन्हीं के माध्यम से सामान्य जन के स्तर पर राजनीतिक सैनिरक्षिण (सर्विलेंस) और जनमानस में सामाजिक समग्रता का संचार सम्भव होता है ।

सांस्कृतिक संरचना की दृष्टि से कोई देश चाहे कितना भी समरसतापूर्ण हो, स्थानीय स्तर पर वह पर्याप्त विविधतापूर्ण होता है । इन विविधताओं में एकता का सूत्र पिरोने और उस सूत्र को उत्तरोत्तर पुष्ट बनाए रखने के लिए प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण की आवश्यकता पड़ती है ।

साथ ही सामान्य जनता को केन्द्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक व्यवस्था से जोड़कर स्थानीय निकाएं राजनीतिक व्यवस्था को नागरिकों की दृष्टि में वैधता और न्यायोचितता (लेजीटिमेसी) प्रदान करती हैं । इनके माध्यम से सरकार में स्थानीय जनता को अपनी हिस्सेदारी की अनुभूति होती है ।

संक्षेप में स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों का निर्माण जनता की क्षेत्रीय पहचान को समाहित करने तथा राजकीय प्रशासन को उनके द्वार पर ला खड़ा करने के उद्‌देश्य से हुआ है । ऐसी प्रशासनिक इकाइयां स्थानीय जनता की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के अनुकूल कार्य करने में अधिक सक्षम हो सकती हैं ।

इस दृष्टि से स्थानीय प्रशासनिक इकाइयां तृणमूल स्तरीय जनतांत्रिक व्यवस्था का मूलाधार हैं । इनके अस्तित्व के बिना सही अर्थों में उदारवादी बहुदलीय लोकतांत्रिक राजनीति सम्भव नहीं है । आधुनिक युग में बहुदलीय लोकतंत्र का श्री गणेश ग्रेट ब्रिटेन तथा फ्रांस में हुआ था ।

अत: स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों का उद्‌भव भी सर्वप्रथम इन्हीं दोनों देशों से प्रारम्भ होकर इनकी उपनिवेशीय इकाइयों के माध्यम से विश्वव्यापी बन गया । एक बहुचर्चित लेख में टाइबाउट (1956) ने स्थानीय प्रशासन के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करते हुए विचार व्यक्त किया था कि बृहत् प्रशासनिक इकाइयां (अर्थात् केन्द्रीय तथा क्षेत्रीय सरकारें) स्थानीय स्तर के सेवार्पण तथा करों की वसूली करने में वांछित रूप में प्रभावी नहीं होतीं क्योंकि बृहत् क्षेत्र में स्थानीय विविधताओं के कारण केन्द्र से संचालित समरूपी प्रशासन नागरिकों की स्थानीय आकांक्षाओं और अपेक्षाओं पर सम्यक ध्यान नहीं दे पाता ।

परिणामस्वरूप स्थानीय समुदायो में असंतोष उत्पन्न होता है तथा राज्य के अन्दर क्षेत्रीय द्वंद्व की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं । परन्तु स्थानीय इकाइयां केन्द्र द्वारा निर्धारित नियमों को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप लागू करने में अधिक सक्षम होती हैं । इनके माध्यम से स्थानीय जनसंख्या में असंतुष्ट ”अल्पसंख्यक” गुटों के उभरने की सम्भावना बहुत कम हो जाती है क्योंकि स्थानीय स्तर पर समस्याओं और आवश्यकताओं में पर्याप्त समरू-पता विद्यमान होती है ।

इसीलिए टाइबाउट ने स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों को “सेवार्पण और कराधान संवेष्टों” (सर्विस-टैक्सेशन पैकजेज़) की संज्ञा दी । यह बात ध्यान देने योग्य है कि टाइबाउट के स्थानीय प्रशासन के विकेन्द्रीकरण के सिद्धान्त में उपभोक्ता-स्वातंत्र्य की संकल्पना निहित थी ।

लेखक के अनुसार यदि कोई प्रशासनिक इकाई दक्षतापूर्ण प्रशासन देने में अक्षम है तो नागरिक उसके विरुद्ध अपने ”पैरों से मतदान” कर सकते हैं अर्थात् वहां से अन्य अपेक्षाकृत अधिक दक्ष प्रशासन वाली इकाइयों में वहिर्गमन कर सकते हैं ।

उपभोक्ता स्वातंज्य के इस सिद्धान्त की 1980 के दशक में काफी चर्चा थी । अमरीका में नया दक्षिण पंथ (न्यू राइट) इसका घोर समर्थक था । परन्तु निर्बन्ध नागरिक वहिर्गमन की अवधारणा यथार्थ के परे है । अनेक कारण से सामान्य नागरिक स्थानीय वातावरण से निकलने में अपने आप को असमर्थ पाता है ।

इस संकल्पना के आलोचकों के अनुसार अमरीकी महानगरीय क्षेत्रों के सन्दर्भ में प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण एक उपभोक्ता समर्थक उपबंध न होकर वास्तव में अपेक्षाकृत सम्पन्न वर्गों द्वारा अपने लिए सुरक्षित और कर मुक्त क्षेत्रों का निर्माण करके आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोगों को अपने क्षेत्र के बाहर रखने का उपकरण था  ।

सेवार्पण के स्तर में क्षेत्रीय असमानता:

प्रशासन को जनता के समीप लाने के सारे श्लाध्य उद्‌देश्यों के बावजूद तृणमूल स्तर पर सेवा की गुणवत्ता की दृष्टि से भिन्न-भिन्न स्थानीय निकायों के बीच पर्याप्त असमानता विद्यमान है । अनेक अध्ययनकर्ताओं ने इसके कारण जानने का प्रयास किया है  ।

ब्रिटेन के विशेष संदर्भ में बोडन (1971) ने इस असमानता के तीन प्रमुख कारण बताए:

(1) आवश्यकता यदि किसी सेवा के लिए स्थानीय मांग अधिक है तो उसके सेवार्पण का स्तर बेहतर होगा ।

(2) संसाधन जिस स्थानीय निकाय के पास संसाधन (अर्थात् आय के स्रोत) जितने अच्छे होंगे उसमें सेवा प्रदान का स्तर उतना ही उत्तम होगा ।

(3) राजनीतिक झुकाव किसी सेवा विशेष पर स्थानीय निकाएं कितना खर्च करने के लिए तैयार है तथा स्थानीय प्रशासन किस स्तर की सेवा की व्यवस्था करेगा यह बात वहां के शासक दल की राजनीतिक तथा आर्थिक रुझान पर निर्भर है । इनके अतिरिक्त स्थानीय स्तर पर अवस्थित सांस्कृतिक बहुलता, वर्ग-विभेद, और तत्सम्बन्धी राजनीति की भी सेवपिण के स्तर में महत्व की भूमिका है ।

भूदृश्य निर्माण पर प्रशासनिक प्रभाव:

मानव भूगोल दीर्घ काल तक पृथ्वी के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में मानव जीवन और स्थानीय पर्यावरण के अन्तरसम्बन्धों के अध्ययन पर केन्द्रित था । भूगोल की इस पारिस्थितिकीय संकल्पना के रैटज़ेल प्रबल समर्थक थे । अत: उनके द्वारा प्रतिपादित राजनीतिक भूगोल भी पारिस्थितिकीय अध्ययन के रूप में प्रतिष्ठित हुआ । इसके अन्तर्गत विद्यार्थी मुख्यतया राजनीतिक क्रियाकलापों पर परिस्थिति जन्य प्रभावों के विश्लेषण में लगे रहे ।

देश की राजनीति स्थानीय भूदृश्य पर क्या प्रभाव डालती है इस ओर ध्यान प्राय नहीं दिया गया । एक बहुचर्चित लेख में अमरीकी विद्वान ह्वीटलसी (1935) ने इस ओर ध्यान आकर्षित करते हुए बताया कि राजनीतिक प्रक्रियाएं भूदृश्य को उसी प्रकार प्रभावित करती हैं जैसे कि आर्थिक प्रक्रियाएं ।

चूंकि राजनीतिक भूगोल उस समय तक केन्द्रीय स्तर की राजनीति के अध्ययन तक ही सीमित था, अत: ह्वीटलसी ने दो राजनीतिक तत्वों:

(1) सुरक्षात्मक कार्यो और

(2) अन्तरराष्ट्रीय सीमा द्वारा उत्पन्न भूदृश्य प्रभावों का विशेष उल्लेख किया । इनके अतिरिक्त लेखक ने

(3) शासकीय कार्यो और

(4) विधिक उपबंधों के भूदृश्य निर्माण पर पड़ने वाले प्रभावों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया ।

ह्वीटलसी के शोध पत्र के प्रकाशन के पश्चात् शोधार्थियों ने विश्व के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में अन्तरराष्ट्रीय सीमाओं के भूदृश्य प्रभाव का अध्ययन किया । परन्तु लम्बे समय तक शासकीय कार्यों द्वारा हुए भूदृश्य निर्माण की ओर विद्यार्थियों का ध्यान नहीं गया था ।

इस दिशा में एस.बी. कोहेन (1966) द्वारा प्रकाशित एक संक्षिप्त टिप्पणी ने नई शुरुआत की । इस टिप्पणी के माध्यम से लेखक ने मानव भूगोल के विद्यार्थियों को शासकीय नीतियों और उनके कार्यान्वयन तथा उनसे उत्पन्न भूदृश्य प्रभावों के अध्ययन की ओर ध्यान देने की आवश्यकता पर बल दिया ।

परन्तु भूदृश्य निर्माण में प्रशासन की भागीदारी को समझने तथा उसके निरूपण हेतु स्पष्ट विधि निर्देश प्रस्तुत करने की दिशा में प्रेस्काट ने कोई प्रयास नहीं किया । इस दिशा में श्री गणेश सन् 1971 में प्रकाशित एक लेख  के बाद ही हो सका ।

इस लेख की संकल्पना के अनुसार ”देश में केन्द्रीय प्रशासन का उसके भूदृश्य निर्माण पर पड़ने वाला प्रभाव देश की संवेधानिक संरचना, उसमें प्रचलित राजनीतिक प्रक्रिया, तथा उसके संसाधन-उपयोग के विकास के स्तर पर निर्भर है ।

परन्तु भूदृश्य निर्माण में इन तत्वों का वास्तविक प्रभाव किसी राज्य विशेष के मानव-भौगोलिक प्रारूप अर्थात् क्षेत्रीय स्तर पर उसमें निहित राष्ट्रीय सांस्कृतिक समरसता अथवा विविधता पर निर्भर है ।” इस संकल्पना के मूलभूत तत्वों की संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकार है ।

संवैधानिक संरचना:

संवैधानिक संरचना की दृष्टि से दो परस्पर भिन्न-भिन्न शासन प्रणालियां प्रचलित हैं पहली ऐकिक तथा दूसरी परिसंघीय । पहले प्रकार की व्यवस्था के अधीन क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर का प्रशासन केन्द्रीय सरकार की नीतियों के अनुसार संचालित होने के कारण सर्वत्र समरूप होता है अर्थात् देश के सभी भागों मे एक ही प्रकार की नीतियां लागू होती हें ।

इसके विपरीत परिसंघीय व्यवस्था के अधीन स्थानीय मामलों में क्षेत्रीय सरकारों को स्वायत्त निर्णय का संवैधानिक अधिकार प्राप्त हे अत: स्थानीय प्रशासनिक निकाएं अपनी अलग-अलग क्षेत्रीय सरकारों द्वारा पारित नीतियों के अनुरूप ही प्रशासन संचालित करती हैं ।

भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के स्थानीय और क्षेत्रीय हित परिस्थितिजन्य कारणों से भिन्न-भिन्न होते हैं अत: विकास की प्रगति और उसकी दिशा  में  समरूपता का अभाव स्पष्टतया परिलक्षित होता है । विकास में अन्तरक्षेत्राय जन लाने के अपने प्रयासों के बावजूद केन्द्रीय प्रशासन विकास में अन्तरक्षेत्रीय समरूपता लाने में पूर्णतया सफल नहीं हो पाता ।

परिसंघ व्यवस्था की इसी मूलभूत विशेषता के कारण (एक कैनेडियन राजनीतिज्ञ के शब्दों में) एक ही राष्ट्रीय व्यवस्था के अधीन कहीं कैडिलक प्रधान तो अन्यत्र बैल गाड़ी प्रधान क्षेत्र अस्तित्व में आ जाते हैं (मैलोरी, 1965) । अर्थात् संघीय व्यवस्था में क्षेत्रीय स्वायत्तता के कारण सम्पूर्ण देश में समानरूप से संतुलित विकास एक दुष्प्राप्य आदर्श बन जाता ।

राजनीतिक वरण की प्रक्रिया:

एक ही प्रकार की संवैधानिक व्यवस्था के बावजूद भिन्न-भिन्न देशों में भूदृश्य विकास का क्षेत्रीय प्रारूप तथा उसकी प्रगति भिन्न-भिन्न होती है क्योंकि सम्बद्ध देशों में राजनीतिक चुनाव अर्थात् सरकार के संगठन और संचालन की प्रक्रिया अलग-अलग प्रकार की होती है ।

ग्रेट ब्रिटेन तया चीन दोनों ही संवैधानिक दृष्टि से ऐकिक शासन प्रणाली वाले राज्य हैं परन्तु उनकी राजनीतिक चुनाव और विकल्प की प्रक्रियाएं एक दूसरे से भिन्न हैं । एक में लोकतांत्रिक व्यवस्था है तथा दूसरे में एकदलीय तानाशाही ।

परिणामस्वरूप दोनों में स्थानीय भूदृश्य निर्माण और नीति निर्धारण की प्रक्रियाएं भी एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं । बहुदलीय जनतांत्रिक वरण प्रक्रिया वाले देशों में शासकों को प्रति पांचवें वर्ष मतदाता के सामने समर्थन हेतु प्रस्तुत होना व्यवस्थाजन्य अनिवार्यता है ।

इसके कारण राजनेता शासकीय कार्यो में अपने विवेक के अनुसार आदर्श निर्णय लेने के स्थान पर बहुधा मतदाताओं की तात्कालिक मांगों को ध्यान में रखते हुए समझौतापूर्ण निर्णय लेने के लिए वाध्य हो जाते

हैं । इसके विपरीत एकतंत्रीय और एक-दलीय व्यवस्था में शासकों को जनसमर्थन की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं रहती । परिणामस्वरूप भूदृश्य निर्माण पर प्रशासनिक प्रभाव अपेक्षाकृत समरूप तथा आर्थिक नियोजन की प्रक्रिया अधिक कारगार रोती है ।

संसाधन विकास का स्तर:

संसाधन विकास के स्तर के आधार पर विश्व के देशों को तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है:

(1) उन्नत संसाधन विकास वाले देश,

(2) विकासशील देश अर्थात् घनी जनसंख्या वाले परन्तु औद्योगीकरण में अपेक्षाकृत पिछड़े नेहा जैसे कि भारत, और

(3) वे देण जहर संसाधन बहुलता तथा जनसंरष्पा की विरलता के कारण तकनीक विकास के उच्च स्तर के होते हुए अर्थव्यवस्था प्राथमिक व्यवसाय प्रधान है (जैसे कि आस्ट्रेलिया) ।

सामान्यतया संसाधन विकास की प्रक्रिया जितनी ही उन्नत होगी तथा औद्योगीकरण और नगरीकरण जितना ही विकसित होगा अर्थव्यवस्था उतनी ही विनिमय प्रधान होगी तथा अन्तरराष्ट्रीय व्यापार में देश की भागीदारी उतनी ही अधिक होगी । परिणामस्वरूप व्यवस्था में निरन्तरता लाने के लिए प्रशासनिक केन्द्रीकरण में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी ।

फलस्वरूप देहा में भौगोलिक भूदृश्य निर्माण की प्रक्रिया अधिक समरसता पूर्ण होगी । इसके विपरीत संसाधन विकास की प्रक्रिया जितनी ही कम विकसित होगी आर्थिक व्यवस्था में स्थानीय परिस्थितियों का प्रभाव उतना ही अधिक होगा, फलस्वरूप राजव्यवस्था में केन्द्रीय निर्देश की आवश्यकता उतनी ही कम होगी ।

उदाहरण के लिए परिसंघीय व्यवस्था के अन्तर्गत उन्नत संसाधन विकास वाले देशों में आर्थिक और सामाजिक विकास अपेक्षाकृत अधिक संतुलित होता है अत: वहां केन्द्र और प्रांतीय सरकारों के बीच टकराव की प्रवृत्ति सहयोग में वदत्न जाती है ।

कनाडा के अतिरिक्त यूरोपीय संस्कृति वाले प्राय सभी परिसंघ राज्यों में यह प्रवृत्ति स्पष्टत परिलक्षित है । इसके विपरीत भारत में स्थिति बहुत भिन्न है । महात्मा गांधी के नेतृत्व में करीव तीस वर्ष लम्बे लोकसमर्थित राष्ट्रमुक्ति आन्दोलन के परिणामस्वरूप स्वतंत्र भारत की कांग्रेसी नेतृत्व वाली सरकार सशक्त केन्द्रीय निदेश की सरकार थी । कांग्रेस के इस सर्वव्यापी जनसमर्थन के परिणामस्वरूप ही भारत का संविधान तब तक बने परिसंघीय संविधानों में सवीधिक केन्द्रीकृत संविधान था ।

इसी कारण से अनेक विद्वानों ने भारतीय संविधान को ऐकिक प्रवृत्ति प्रधान परिसंघीय संविधान वताया था । परन्तु पचास वर्षों बाद आज स्थिति सर्वथा भिन्न है । देशव्यापी समर्थन वाले राजनीतिक दलों के प्रभाव में ह्रास हुआ है और 1984 के पश्चात् केन्द्र में किसी भो दल को वहुमत नहीं मिल सका है । अत: केन्द्र उत्तरोत्तर क्षेत्रीय दलों की बैसाखी पर निर्भर रहने लगा है जिसके परिणामस्वरूप केन्द्रीय सरकार के प्रभाव में उत्तरोत्तर हास हुआ है तथा केन्द्र ओर क्षेत्रीय इकाइयों के बीच दूरी बढ़ी है ।

सांस्कृतिक भौगोलिक परिवेश:

भूदृश्य विकास में संवैधानिक संरचना, राजनीतिक प्रक्रिया, और संसाधन विकास के स्तर का सम्मिलित प्रभाव वहुत हद तक देश विशेष की जनसंख्या की सांस्कृतिक संरचना और उसके नेत्रीय प्रारूप गर निर्भर है । यदि यह संरचना देश के सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्र में समरूप है, तो भूदृश्य निर्माण में किसी प्रकार की क्षेत्रीय वितृप्‌ता की संभावना नहीं होती ।

यदि अल्पसंख्यक भाषा-भाषियों और धर्मावलम्बियों की संख्या नगण्य है तथा भिन्न-भिन्न गुट अलग-अलग क्षेत्रीय जमाव वाले न होकर सर्वत्र अन्य लोगों के साथ मिले-जुले रूप में वितरित हैं, तो अलगाववादी प्रवृत्ति अपेक्षाकृत कमजोर होती है परिणामस्वरूप भूदृश्य निर्माण की प्रक्रिया अधिक समरसतापूर्ण और संतुलित होती है यद्यपि प्राकृतिक सम्पदाएं जिन क्षेत्रों में अधिक हैं वहां अन्य क्षेत्रों से अधिक उन्नत विकास की सम्भावना होगी ।

साथ ही प्राकृतिक संसाधन विहीन क्षेत्रों में विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी हो सकती है । इसके विपरीत सांस्कृतिक विविधतापूर्ण जनसंख्या वाले देशों में, विशेषकर यदि विविधतामूलक तत्व स्पप्ट पहचान वाले क्षेत्रीय प्रखण्डों में केन्द्रित हैं तो भूदृश्य निर्माण में समरसता और समरूरग्ता की मम्भावनाएं बहुत कम होंगी ।

ऐसी अवस्था में प्रत्येक क्षेत्र किसी एक उपसांस्कृतिक समुदाय का विशिष्ट गृह प्रदेश बन जाएगा । अत: अन्तरक्षेत्रीय सहयोग स्थापित करना कठिन होगा । इस स्थिति में परिसंघीय व्यवस्था वाले राज्यों में विभिन्न स्वायत्त क्षेत्रीय इकाइयां भिन्न-भिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के शासन वाली हो सकती हैं तथा उनके राजनीतिक-आर्थिक दर्शन एक दूसरे से भिन्न हो सकते हैं । परिणामस्वरूप भूदृश्य निर्माण में क्षेत्रीय विविधता आएगी ।

कनाडा तथा भारत दोनो ही इसके अच्छे उदाहरण हैं । उपर्युक्त विवेचन से भूदृश्य निर्माण में प्रशासनिक प्रभाव की व्याख्या के लिए दी गई संकल्पना का सत्यापन होता है । इस संकल्पना का चित्रात्मक विवरण चित्र 5.1 में प्रस्तुत है ।

 

भारत में प्रशासनिक व्यवस्था और भूदृश्य निर्माण: एक संक्षिप्त सर्वेक्षण:

पूर्वगामी व्याख्या में हमने देखा कि भारत को ऐकिक विशेषताओं वाला परिसंघ राज्य कहा गया हैं । संथानम के शब्दों में हमारी परिसंघ व्यवस्था में उपनिवेशीय प्रशासन के युग में क्षेत्रीय इकाइयों के सन्दर्भ में ब्रिटिश सरकार में निहित सर्वोपरि सत्ता (पैरामाउण्टसी) स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश र्को केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई ।

इस प्रकार परिसंघीय संवैधानिक संरचना के होते हुए भी भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था प्रारम्भ में ही समग्रतापूर्ण रही है । हमारे संविधान निर्माताओ ने उपनिवेशीय प्रशासन द्वारा स्थापित सर्वपक्षीय शासकीय समग्रता को यथावत बनाए रखा है ।

ब्रिटिश शासन काल में सम्पूर्ण भारत एक समग्र आर्थिक इकाई के रूप में संचालित था और पूरा देश एक साझा बाजार (कामन मार्किट) था । परिणामस्वरूप पूरे देश में अन्तरक्षेत्रीय श्रम और पूंजी संचार प्रतिबन्ध मुक्त्त था प्रान्तीय सीमाएं इस संचार में अवरोधक नहीं थीं । भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्निर्माण के बाद भी इसमें कोई अन्तर नहीं आया है ।

शासन की बागडोर संभालने के बाद ही स्वतंत्र भारत की सरकार ने एक नई औद्योगिक नीति के प्रस्ताव (1948) की घोषणा की जिसके अनुसार देश में औद्योगिक विकास की गति, उसके प्रारूप तथा उसकी दिशा का निर्देशन केन्द्र के अधिकार में निहित था ।

इस उद्‌घोषणा के अनुसार चार प्रकार के उद्योगों की पहचान की गई:

(1) केन्द्रीय स्वत्व वाले उद्योग जिनमें शस्त्र निर्माण उद्योग, अणु शक्ति उत्पादन तथा रेल परिवहन सम्मिलित ये ।

(2) आधारभूत उद्योग जिनके अन्तर्गत कोयला, लोहा, इस्पात, यान, जलयान, खनिज तेल, टेलीफोन, टेलीग्राफ तथा बेतार के तार के उपकरणों का निर्माण सम्मिलित था । ये सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक सेक्टर) केवायु लिए आरक्षित किए गए थे यद्यपि उनके उत्पादन में निजी इकाइयों की भागीदारी की सं भावना खुली रखी गई थी ।

(3) सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग जो केवल सरकारी नियंत्रण और अनुदेशों के अन्तर्गत चलाए जा सकते ये । इनमें मोटर गाड़ियों, ट्रेक्टरों, मशीनी यंत्रों तथा सीमेण्ट का उत्पादन सम्मिलित था ।

(4) निजी क्षेत्र के उद्योग जो राजकीय नियंत्रण और नियमन से मुक्त ये (परन्तु जिनमें सरकार आवश्यकतानुसार हस्तक्षेप कर सकती थी) । इस तरह सरकार ने देश की औद्योगिक प्रगति तथा उद्योगों के स्थानीयकरण में सक्रिय भागदिारी का उद्‌देश्य प्रारम्भ में ही स्पष्ट कर दिया ।

बाद में पारित किए गए नीति निर्धारक अधिनियमों के माध्यम से यह नियंत्रण उत्तरोत्तर और कठोर होता गया । परन्तु 1990 के दशक में आर्थिक व्यवस्था के भूमण्डलीकरण की नीति के कारण स्थिति में व्यापक गुणात्मक परिवर्तन आया है ।

सरकारी नियंत्रण और नियमन तथा कोटा-लाइसेंस राज द्रुत गति से विलुप्त हो रहा है, पब्लिक सेक्टर के उद्योगों को निजी भागीदारी के अन्तर्गत लाने का प्रयास किया जा रहा है यद्यपि इस प्रश्न पर काफी विरोध प्रकट हुआ है ।

औद्योगिक विकास में केन्द्रीय सरकार प्रारम्भ से ही क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने तथा अन्तरक्षेत्रीय विषमताओं को कम करने के लिए प्रयत्नशील रही है । 1951 में प्रारम्भ की गई पंचवर्षीय योजनाओं के अनेक उद्‌देश्यों में यह एक प्रमुख उद्‌देश्य रहा है ।

साठ के दशक से ही सरकार निरन्तर प्रयत्नशील रही है कि आर्थिक विकास में क्षेत्रीय संतुलन लाने के लिए नए उद्योगों की स्थापना महानगरों से दूर अपेक्षाकृत कम विकसित क्षेत्रों में की जाए जिससे कि विकास के नए केन्द्रों का उदय हो और स्थानीय जनता को रोजगार के अधिक अवसर मिरन सकें और उद्योगों का महानगरो की ओर उनका पलायन बन्द हो ।

औद्योगिक केन्द्रीकरण और वितरण के अध्येताओं ने रेखांकित किया है कि अनेक नियमों और उपनियमों के माध्यम से सरकार बड़े नगरों में उद्योगों का और अधिक केन्द्रीकरण तो रोक सकती है परन्तु नए क्षेत्रों में उद्योगों के विस्तार की प्रगति में उसे विशेष सफलता नहीं मिली है ।

भूमण्डलीकरण तथा मुक्त आर्थिक नीति के बाद यह कार्य और भी दुष्कर हो गया है । विकसित और अविकसित क्षेत्रों के बीच की खाई और बढ़ती जा रही है । देश के सामाजिक स्वास्थ्य के लिए इस समस्या पर ध्यान देना नितांत आवश्यक है ।

भूदृश्य निर्माण पर प्रशासनिक प्रभाव सम्बन्धी ऊपर वर्णित सामान्य संकल्पना में हमने देखा कि संवैधानिक संरचना और राजनीतिक प्रक्रिया आदि का सम्मिलित प्रभाव बहुत हद तक देश की जनसंख्या में सांस्कृतिक पहचान के प्रमुख तत्वों के क्षेत्रीय वितरण पर निर्भर है ।

यदि ये पृथक-पृथक तत्व एक दूसरे से अलग-अलग क्षेत्रों में केन्द्रीकृत हों तो भूदृश्य निर्माण की प्रक्रिया क्षेत्रीय रूप में विषमतापूर्ण होगी । भारत के पिछले पचास वर्षों के आर्थिक विकास के इतिहास से यह भली प्रकार स्पष्ट है ।

जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत का केन्द्रीय शासन व्यावहारिक दृष्टि से प्राय सर्वशक्तिमान था मात्र इसलिए नहीं कि संविधान निर्माताओं ने केन्द्र को ब्रिटिश सरकार में निहित सर्वोपरि सत्ता के अधिकार से मण्डित कर दिया था परन्तु इसलिए भी कि गांघी-नेहरू-पटेल के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन से मुक्ति के लिए किए गए संघर्ष के लम्बे दौर में देश के सभी क्षेत्रों की जनता का कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व में अटूट विश्वास बन गया था, राष्ट्रीय एकता के सूत्र इतने सुदृढ़ थे कि कांग्रेस के नेतृत्व की न्यायप्रियता पर क्षेत्रों की जनता में किसी प्रकार की दुविधा अथवा आशंका नहीं थी ।

यही कारण था कि कांग्रेस पार्टी सम्पूर्ण देश में, केन्द्रीय और क्षेत्रीय दोनो ही स्तरों पर एक मात्र शासक दल के रूप में स्थापित हो गई थी । जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद स्थिति में हुत गति से परिवर्तन आया ।

केन्द्रीय नेतृत्व का जनाधार उत्तरोत्तर शिथिल हो गया । विशाल जन समर्थन वाली कांग्रेस पार्टी धीरे-धीरे नेताओं (न कि जनता) की पार्टी बन गई । पार्टी का क्षेत्रीय जनाधार खिसकने लगा । क्षेत्रों में कांग्रेस विरोधी गुटो की सरकारों का अस्तित्व बढ़ने लगा ।

अत: केन्द्रीय दिशा निदेश के प्रभाव में हुत गति से ह्रास आया । 1974 में आपात की घोषणा और 1977 में शासक दल के रूप में कांग्रेस का करीब-करीब पूर्ण अवसान इसी के परिणाम थे । 1977 का जनता पार्टी प्रयोग क्षेत्रीय असंतोषों के गठजोड़ के आधार पर खड़ा था ।

देश की शासन व्यवस्था में क्षेत्रीय भागीदारी की मुखरता ओर केन्द्रीय निदेश के प्रभाव में आई कमी इस परिवर्तित स्थिति की स्वाभाविक परिणति थी । 1980 में इन्दिरा गांधी के सत्ता में पुन आने के बाद भी इस स्थिति में परिवर्तन नहीं आया ।

परिणामस्वरूप 1994 के आम चुनाव के बाद से आज तक कांग्रेस अथवा अन्य किसी दल को लोक सभा में बहुमत नहीं मिल पाया है । परिणामस्वरूप विकास और भूदृश्य निर्माण में केन्द्रीय सरकार का प्रभाव उत्तरोत्तर कम होता गया है ।

नेहरू युग में ब्रिटिश युग की भांति ही सम्पूर्ण देश एक समग्र आर्थिक व्यवस्था और साझा बाजार के रूप में बना रहा था । श्रम और पूंजी का संचार पूरी तरह बन्धन मुक्त्त बना हुआ था । प्रान्तीय सीमाएं उनके मार्ग में किसी प्रकार का अवरोध नहीं उत्पन्न करती थीं ।

विकास और भूनिमणि की प्रक्रिया केन्द्र की नीतियों के अनुरूप निबधि गति से चलती रही थी । इस दृष्टि से उपनिवेश कालीन विकास के प्रारूप और स्वतंत्रता पश्चात् के विकास प्रारूप में कोई अन्तर नहीं था । उद्योगपतियों का उद्‌देश्य अधिकतम लाभ प्राप्ति है अत विकसित क्षेत्र और भी विकसित होते गए थे और अविकसित क्षेत्र और भी अविकसित ।

1953 से 1961 के बीच निजी क्षेत्र में उद्योग लगाने के लिए दिए गए लाइसेंसों में अस्सी प्रतिशत विकास स्तर की चार श्रेणियों (न्यूनतम, द्वितीय, तृतीय और अधिकतम) में से अंतिम दो अधिकतम विकास वाली श्रेणियों वाले क्षेत्रों के लिए दिए गए थे ।

इस चिन्ताजनक स्थिति से उबरने के उददेश्य से तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-1966) में उद्योगों के विकेन्द्रीकरण अर्थात् उन्हें अविकसित क्षेत्रों में स्थापित करने का उद्‌देश्य अपनाया गया । जवाहरलाल नेहरू के देहावसान के बाद कांग्रेस के उत्तरोत्तर सीमित होते क्षेत्रीय प्रभाव, और क्षेत्रीय दलों के बढ़ते हुए वर्चस्व के फलस्वरूप क्षेत्रीय हितों की सुरक्षा तथा केन्द्रीय सत्ता के बीच अधिकार की सघर्ष उत्तरोत्तर तीव्र होता गया ।

क्षेत्रों की सरकारों और जनता का केन्द्रीय शासन के प्रति आस्था भाव उत्तरोत्तर कमजोर होता गया । भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में विभिन्न आर्थिक दर्शन वाले राजनीतिक दल सत्ता में आ गए । परिणामस्वरूप भूदृश्य निर्माण में केन्द्रीय सत्ता का प्रभाव कम हो गया ।

अनेक राज्यों में रोजगार के अवसर अधिकाधिक रूप में स्थानीय निवासियों के लिए आरक्षित होते गए । परिणामस्वरूप साझा बाजार व्यवस्था का स्वरूप विकृत हो गया । इस प्रकार प्रांतीय सीमाएं अन्तरप्रान्तयि श्रम संचार में बाधक हुई हैं ।

साथ ही अनियंत्रित आर्थिक विकास की नीति के फलस्वरूप विकास में अन्तरक्षेत्रीय संतुलन लाने में केन्द्रीय सरकार की भूमिका उत्तरोत्तर कम होती जा रही है तथा पूंजी आकर्षित करने की होड़ में आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न क्षेत्र अपेक्षाकृत अविकसित क्षेत्रों को और भी पीछे छोड़ते जा रहे हें ।

भिन्न-भिन्न राज्यों में अलग-अलग क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के शासक दल के रूप में उभरने से देश में भूदृश्य निर्माण की बढ़ती विषमता के अनेक कारण हैं । इन दलों में से कुछ निजी क्षेत्र के उद्योग के सिद्धान्त रूप में कट्टर विरोधी तथा उद्योगों में लगे श्रम के अधिकारों और उनकी सुविधाओं को और बढ़ाने के पक्षधर हैं ।

व्यावसायिक श्रम संगठनों (ट्रेड यूनियनों) में अधिकांश का नेतृत्व इन दलों के पास है । अत: इनके सत्ता में आते ही श्रम असंतोष तथा हड़ताल को प्रोत्साहन मिलता है । अत: पूंजीपति भयभीत हो जाते हैं । परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों में औद्योगिक प्रगति धीमी पड़ जाती है लाभांश में भारी गिरावट आती है और राज्य से पूंजी का पलायन प्रारम्भ हो जाता है । केरल प्रदेश में औद्योगिक विकास की अत्यधिक धीमी दर का यही प्रमुख कारण है ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रारम्भिक दशक से ही यहां साम्यवादी दलों का वर्चस्व रहा है । फलस्वरूप पूंजीनिवेशक यहां आने से डरते हैं । ब्रिटिश शासन का प्रारम्भिक केन्द्र बिन्दु होने के परिणामस्वरूप तथा औद्योगिक विकास के संसाधनों की सहज उपलब्धता के कारण कलकत्ता क्षेत्र देश का एक प्रमुख औद्योगिक केन्द्र बन गया था और हुगली नदी के तट पर कालान्तर में एक विस्तृत औद्योगिक प्रदेश विकसित हो गया  था । परन्तु साठ के दशक में नक्सलवादी आन्दोलन के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण पूरे प्रदेश को शान्ति व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, औद्योगिक अशांति बढ़ती गई ।

साठ के दशक के अन्त तक पश्चिमी बंगाल साम्यवादी दलों के वर्चस्व वाली सरकारें शासन में आ गई । इससे वहां ओद्योगिक संस्थानों में श्रम ठासंतोष को प्रोत्साहन मिला, हड़ताल आम हो गए, पूंजी का लाभांश हुत गति से गिरता गया तथा उद्योगपति धीरे-धीरे प्रदेश से अपनी पूंजी अन्य क्षेत्रों को स्थानान्तरित करने लगे ।

सौभाग्यवश सत्तर के दशक में नक्सलवादी आन्दोलन ठण्डा पड़ गया, शान्ति स्थापित हुई तथा स्थिति पुन: सुधरने लगी । धीरे-धीरे साम्यवादी दलों के उद्योग विरोधी रुख में भी परिवर्तन आया । अस्सी के दशक में पंजाब, असम और जम्मू-कश्मीर को आतंकवाद के कारण कुछ इसी प्रकार की समस्या का सामना करना पड़ा था ।

पिछले दशक बिहार में जनता दल के शासन काल में सर्वत्र व्याप्त सामाजिक अशांति और लूट-खसोट की राजनीति के फलस्वरूप आर्थिक और सामाजिक विकास ठप पड़ गया है । अन्य प्रदेशों में भी जाति और धर्म के आधार पर खेली जाने वाली राजनीति के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं ।

भारत में क्षेत्रीय प्रशासन का स्वरूप:

परिसंघीय व्यवस्था के फलस्वरूप भारत में नीति निर्धारण के दो स्तर हैं अखिल भारतीय मामलों के लिए केन्द्रीय सरकार, तथा क्षेत्रीय हितों सम्बन्धी मामलों में राज्य अथवा प्रान्तीय सरकारें । दोनों ही स्तर की सरकारों के नीतिगत निर्णयों का कार्यन्वयन जिला स्तर के अधिकारियों द्वारा सम्पन्न होता है जो कि संवैधानिक प्राविधान के अनुसार सम्बद्ध प्रान्तीय सरकारों के निर्देश में काम करते हैं ।

अत: देश में क्षेत्रीय प्रशासन की धुरी जिला प्रशासन में केन्द्रित है । जिला का मुख्य प्रशासनिक अधिकारी जिलाधीश है जो कि भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी होता है । जिलाधीश को कलक्टर अथवा उपायुक्त (डिपुटी कमिश्नर) भी कहते हें ।

देश की वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था ब्रिटिश शासन की देन है अत: जिलाधीश का पद करीब दो सो वर्ष के विकास प्रक्रिया की परिणति हे । यह पद सर्वप्रथम 1772 में बनाया गया था परन्तु जिला प्रशासन की वास्तविक नींव 1786 में पड़ी थी ।

इस वर्ष ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रशासकों ने लगान वसूली और सामान्य प्रशासन के लिए देश के सम्पूर्ण ब्रिटिश शासित क्षेत्र को जिला स्तरीय इकाइयों में विभक्त करके उनमें कलक्टर नाम से मुख्य जिलाधिकारी की नियुक्ति का निर्णय लिया ।

बाद में इन अधिकारियों को अपराध नियंत्रण के अधिकार भी दे दिए गए । इस प्रकार जिलाधीश के अधिकार अत्यधिक व्यापक थे । 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तक जिलाधीश अपने क्षेत्र में कम्पनी सरकार का एक मात्र वित्तीय प्रतिनिधि था और विभिन्न प्रकार के करों की वसूली उसकी प्रमुरव जिम्मेदारी थी ।

साथ ही वह ”स्थानीय आरक्षित निधि” का कोषाध्यक्ष तथा मजिस्ट्रेट भी था । जिले का पुलिस प्रशासन, शान्ति व्यवस्था, और जेलों का नियंत्रण भी उसके अधिकार क्षेत्र में थे (जार्ज चेशेय, 1976) ।  1857 की क्रांति की विफलता के पश्चात् भारत का प्रशासन ईस्ट इण्डिया कम्पनी के स्थान पर सीधे ब्रिटेन की सम्राज्ञी के अधीन आ गया ।

भारतीय सैनिकों और जनता के बढ़ते हुए असंतोष को ध्यान मे रखते हुए जिलाधीश के पद को और भी प्रभावी बनाने के प्रयत्न किए गए । उसके अधिकार और व्यापक बना दिए गए । इस प्रकार भारत में ब्रिटिश शासन की जडों को मजबूत करने में जिलास्तरीय प्रशासन की भूमिका बहुत महत्व की थी ।

1858 से 1909 के बीच जिलाधीश के अति व्यापक अधिकारों को देखते हुए कुछ विद्वानों ने उसे “छोटा नेपोलियन” की संज्ञा दी है । जिलाधीश लगान वसूली के लिए जिम्मेदार होने के साथ-साथ दण्डाधिकारी भी था और जिले के विकास तथा उसकी आपातकालीन समस्याओं के समाधान का उत्तरदायित्व भी उसके कार्य क्षेत्र में था अत: जिलाधीश के व्यापक उत्तरदायित्व के कारण उस पर पड़ने वाले काम के बोझ को हलका करने के लिए सरकार ने 1907 से 1909 की अवधि में प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण के लिए एक रॉयल कमीशन की नियुक्ति की ।

परन्तु विदेशी शासन को प्रभावी बनाए रखने के लिए जिलाधीश के पद के केन्द्रीय महत्व को देखते हुए रॉयल कमीशन ने उसके अधिकारों में कमी लाने के बदले जिलाधीश के पद को और भी महिमा मण्डित बना दिया । 1919 के अधिनियम के पारित होने के बाद भी जिलाधीश की स्थिति यथावत बनी रही ।

परन्तु इसके प्राविधानों के अन्तर्गत वर्ष 1921 में द्वैध तन्त्र (डायाकी) को लागू किए जाने के बाद स्थिति में गुणात्मक अन्तर आया और राज्य प्रशासन के अनेक अधिकार प्रांतीय सरकारों के निर्वाचित मंत्रियों को हस्तांतरित कर दिए गए । परिणामस्वरूप अब जिला स्तर के अनेक अधिकारी सम्बन्धित मंत्रीयों से सीधा सम्पर्क करने लगे जबके 1921 के पहले जिलाधीश उन अधिकारियों तथा राज्य प्रशासन के बीच एक मात्र सम्पर्कसूत्र था ।

अन्य सभी अधिकारी उसके अधीनस्थ थे । परन्तु नई संवैधानिक व्यवस्था के होते हुए भी व्यवहार के स्तर पर 1921 के बाद भी जनपद स्तर पर जिलाधीश सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी तथा वहां की जनता के लिए ”माई-बाप” बना रहा ।

1935 के शासन अधिनियम के पारित होने के बाद जिलाधीश प्रान्तीय सरकार के निर्चाचित मंत्रियों के सीधे नियंत्रण में आ गया । परन्तु चूंकि 1937 में बनी प्रांतीय सरकारें दो साल के अन्दर ही गिर गई थी अत: वास्तव में जिलाधीश के अधिकार 1947 तक यथावत बने रहे थे ।

इस सारे दौर में जिलाधीश जिलास्तर पर सम्पूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था, दण्डाधिकार और विकास प्रक्रिया के संचालन के लिए उत्तरदायी सर्वोच्च अधिकारी था । सम्पूर्ण क्षेत्र में प्रशासनिक और विकास कार्यों में समन्वय स्थापित करना उसी का उत्तरदायित्व था ।

अधिकारों में द्वैधता के अभाव में इस पद पर सही व्यक्ति के आसीन होने पर प्रशासन सुघड़ और न्यायप्रिय होता था । परन्तु यह सत्य है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तक जिला प्रशासनिक अधिकारी भारत के उपनिवेशक स्वामियों के प्रतिनिधि के रूप में जनता का स्वामी (सिविल मास्टर) था न कि जनता का सेवक (सिविल सर्वेण्ट) ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित होने के साथ ही योजनाबद्ध विकास की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई । जिला स्तर पर प्रशासनिक उत्तरदायित्व में अत्यधिक वृद्धि हुई ओर इनके वहन के लिए जिला स्तर पर अनेक विभाग बनाए गए जिनमें से कुछ के कार्य संचालन हेतु उन्नत तकनीकी ज्ञान आवश्यक था ।

उदाहरण के लिए लोक स्वास्थ्य, सार्वजनिक निर्माण, कृषि, सिंचाई, शिक्षा और सहकारिता । इन क्षेत्रों के जिलास्तरीय अधिकारी अब सीधे राज्य की राजधानी में स्थित सम्बद्ध विभागों के सचिवों से निर्देश प्राप्त करने लगे तथा ये नए अधिकारी अपने-अपने क्षेत्रों के विकास कार्य जिलाधीश से अलग स्वतंत्र रूप से संचालित करने लगे ।

परिणामस्वरूप जिलाधीश-एवं-कलक्टर अब स्थानीय जनता के दुख-दर्द का एक मात्र निवारक नहीं रहा । अत: पद की पुरनि गरिमा तथा उसके अधिकार क्षेत्र में ह्रास आया । प्रशासन में विभिन्न विभागों के विकास कार्यों में समन्वय के अभाव में क्षेत्रों का संतुलित विकास सम्भव नहीं है ।

दैनिक व्यवहार के स्तर पर प्रत्येक विभाग के कार्य संचालन मैं जिलाधीश का सहयोग आवश्यक होता है । अत: इन नए विभागों के प्रारम्भ होने तथा उनके जिलाधीश के सीधे नियंत्रण के परे कर दिए जाने के पश्चात भी वास्तविक व्यवहार में जिलाधीश के पद का केन्द्रीय महत्व समाप्त नहीं हुआ हे प्राकृतिक आपदाओं तथा अन्य आकस्मिक संकटों की घड़ी में उसके उत्तरदायित्व और उसके तात्कालिक निर्णय के अधिकार की व्यापकता अपरिमित हो जाती है ।

कुछ राज्यों में विकास कार्यों की देख-रेख के लिए जिला विकास अधिकारियों की नियुक्ति हुई है जो स्वयं जिलाधीश की ही तरह केन्द्रीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी होते हैं । इस पद के अस्तित्व में आने से विकास प्रक्रिया में सुधार आया हे और जिलाधीश के अधिकार और प्रभाव में कमी आई है ।

लेकिन इन परिवर्तनों के बावजूद विकास प्रक्रिया में जिलाधीश की भागीदारी का केन्द्रीय महत्व बना हुआ है । वह अनेक महत्वपूर्ण विकास संस्थाओं का पदेन अध्यक्ष है । जिला ग्रामीण विकास संस्था जोकि सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत एक स्वायत्त संस्था है, इसका अच्छा उदाहरण है ।

इसके कार्यान्वयन में राजकीय प्रशासन और स्वायत्त संस्थाओं की विशेषताओं का व्यावहारिक ओर उपयोगी संयोग है । इस संस्था (डी.आर.डी.ए.) के तत्वावधान में ग्रामीण विकास के अनेक कार्य संचालित किए जाते हैं । इनमें मरुस्थल विकास योजना (डिज़र्ट डेवलपमेण्ट प्रोग्राम), मरुस्थल प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम (ट्रेनिंग द रूरल यूथ फार सेल्फ एम्प्लायमेण्ट), राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना, तथा ग्रामीण क्षेत्रों में महिला और बाल विकास इत्यादि सम्मिलित हैं ।

जिलाधीश जिला उद्योग केन्द्र का भी पदेन मुख्य अधिकारी है ओर साथ ही बैंकर्स समिति का जिलास्तरीय अध्यक्ष भी । बीस सूत्रीय योजना के कार्यान्वयन में भी उसकी प्रमुख भूमिका है । जिलाधीश जिला के नगरों की संचालन समिति (मानिटरिंग कमेटी) का भी पदेन अध्यक्ष होता है ।

क्षेत्रीय प्रशासन में लोकतांत्रिक सिद्धान्त का प्रवेश और उसके परिणाम:

जिला प्रशासन में जनता की भागीदारी बढ़ाने के उद्‌देश्य से नियुक्त की गई बलवन्त राय मेहता कमेटी ने 1959 में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था जिसके अनुसार सभी प्रान्तों में पंचायती राज्य संस्थाओं का शुभारम्भ हुआ ।

इस व्यवस्था के अधीन जिलों का प्रशासन तीन स्तरीय व्यवस्था वाला बना दिया गया । ये तीन स्तर थे जिला परिषद, पंचायत समितियां, तथा ग्राम पंचायत । ये तीनों संस्थाएं जनमत के आधार पर निर्वाचित संस्थाएं थी तथा मेहता समिति की संस्तुति के अनुसार जिलाधीश जिला परिषद का अध्यक्ष था ।

इस संस्तुति का औचित्य स्पष्ट करते हुए मेहता कमेटी ने अपने प्रतिवेदन में लिखा था कि अपने व्यापक अधिकारों तथा गरिमा मण्डित पद के कारण जिलाधीश अध्यक्ष पद के माध्यम से पंचायती राज्य व्यवस्था को अधिक प्रभावपूर्ण बनाने में सफल होगा ।

परन्तु इस उपबंध की एक मूलभूत कठिनाई यह थी कि पंचायती राज व्यवस्था लोकतांत्रिक व्यवस्था थी, अत: आवश्यक था उसका अध्यक्ष परिषद के सदस्यों द्वारा मनोनीत हो । फलस्वरूप अनेक राज्यों ने इस व्यवस्था का कार्यान्वयन अपनी-अपनी तरह से किया ।

कहीं जिलाधीश जिला परिषद का अध्यक्ष बनाया गया तो अन्यत्र उसे परिषद की पदेन सदस्यता प्रदान की गई और उसकी कुछ समितियों का उसे अध्यक्ष नियुक्त किया गया । परन्तु महाराष्ट्र और बंगाल में तो उसे परिषद का सदस्य भी नहीं बनाया गया ।

1975 -1977 की आपात स्थिति के पश्चात जनता पाटी की सरकार ने अशोक मेहता की अध्यक्षता में स्थानीय प्रशासन को और जनतांत्रिक बनाने के उद्‌देश्य से एक नई समिति का गठन किया । इस समिति ने पंचायती राज व्यवस्था को और जनतान्त्रिक बनाने हेतु इसमें जिलाधीश की भागीदारी को सीमित करने का सुझाव दिया । इसके प्रतिवेदन के अनुसार ग्राम पंचायतों को आत्म निर्भर इकाइयां बनाना चाहिए जिससे कि वे अपनी व्यवस्था के खुद मुख्तार हो सके ।

परन्तु यह सुझाव प्रस्तुत करते हुए समिति ने भारत के गांवों में जीवन के इस व्यावहारिक पक्ष की ओर ध्यान नहीं दिया कि गांवों में ”जिसकी लाठी उसकी भैंस” का न्याय सर्वव्यापी है । अत: खुद मुख्तारी का वास्तविक तात्पर्य था कि योजनाओं के लाभ गरीबों को मिलने के बजाय समर्थो में बंट जाएंगे ।

परिणामस्वरूप पंचायती राज व्यवस्था गांव के समर्थ वर्गो के वर्चस्व में आ गई तथा निर्बल और गरीब इसके लाभ से प्राय वंचित रह गए । सन् 1980 में जनता पार्टी की सरकार के पतन के बाद कांग्रेस पार्टी पुन: सत्ता में आ गई थी । अत: जनता शासन के दौरान लाए गए सुधारों को समाप्त कर दिया गया । फलस्वरूप जिले के पंचायती राज प्रशासन में जिलाधीश की भूमिका पुनर्स्थापित हो गई ।

पंचायती राज्य व्यवस्था: 73वां संविधान संशोधन और उसके परिणाम:

1980 से 1989 के बीच पंचायती राज संस्थाओं के सुधार के लिए निरन्तर प्रयत्न किए जाते रहे । कई समितियां नियुक्त की गई । इनका सम्मिलित परिणाम 1989 में राजीव गांधी द्वारा प्रस्तावित हैं 64वें संवैधानिक संशोधन के रूप में सामने आया ।

परन्तु सम्बन्धित बिल राज्य सभा में पारित नहीं हो सका और उसके शीघ्र ही बाद सरकार बदल गई । इस बिल को संशोधित रूप में नरसिम्ह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा 7 वें तथा वे संविधान संशोधन के रूप में लोकसभा ने दिसम्बर 1992 में पारित किया तथा उसी महीने इसे राज्यसभा का अनुमोदन प्राप्त हो गया ।

ये संशोधन 24 अप्रैल 1993 से लागू माने गए । 73वें संविधान संशोधन के अनुसार इस संशोधन के पहले लागू व्यवस्था के वे सभी उपबंध जो नए कानून से मेल नहीं खाते थे निरस्त माने गए । परिणामस्वरूप विकास सम्बन्धी कार्य अब जिलाधीश के उत्तरदायित्व के बाहर हो गए ।

इस संशोधन के अनुसार गांव का प्रत्येक वयस्क निवासी अपनी ग्राम सभा का सदस्य है । ये ही सदस्य मुक्त मतदान के माध्यम से अपनी पंचायत का चुनाव करते हैं । पंचायत का अध्यक्ष सरन ग्राम सभा का अध्यक्ष होता है ।

पंचायत ग्राम सभा की कार्यकारी समिति होती है तथा समिति अपने कार्यों का डोरा, आय-व्यय का लेखा, वार्षिक बजट और विकास योजना ग्राम सभा की संस्तुति हेतु पेश करती है । 1993 के संशोधन के अनुसार ग्राम सभा एक संविधान सम्मत संस्था है ।

वर्ष में इसकी कम से कम दौ बैठकें होना आवश्यक हैं । इस उपबंध का पालन न होने पर सरपंच की नियुक्ति निरस्त की जा सकती है । पंचायत का वार्षिक बजट ग्राम सभा में पारित सुझावों के अनुरूप होता है और सभा के खुले अधिवेशन में सबके समक्ष निर्णय लिया जाता है कि पंचायत द्वारा अनुबंधित सहायता अनुदान किन लोगों को दिया जाएगा ।

नए पंचायती राज अधिनियम के अन्तर्गत स्थानीय स्तर की लोकतांत्रिक संस्थाओं के चुनाव कराने के लिए राज्यपाल नियुक्त एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग का प्राविधान है । केन्द्रीय आयोग की भांति ही वह एक संवैधानिक हस्ती है और राजनीतिक प्रभाव से सर्वथा मुक्त है ।

इसी प्रकार केन्द्रीय वित्त आयोग की तरह प्रत्येक राज्य के लिए एक स्वतंत्र वित्त आयोग की व्यवस्था है । यह आयोग स्थानीय निकायों के लिए प्राप्त सम्पूर्ण अनुदान राशि के आबण्टन के सिद्धान्त निधीरित करता है जिनका अनुपालन संवैधानिक अनिवार्यता है ।

इससे स्थानीय प्रशासन की स्वायत्तता को बहुत बल मिला है । ग्राम पंचायत ग्राम सभा की कार्यकारिणी समिति है । सामान्यतया प्रति 2000 ग्रामीण जनसंख्या पर ग्राम पंचायत बनाई जाती हैं । अत: कहीं-कहीं दो या दो से अधिक गांवों के लिए एक ही पंचायत का अस्तित्व हो सकता है ।

ग्राम पंचायत का कार्यकाल पांच वर्ष का है । इसके सदस्यों (पंचों) का चुनाव गुप्त मतदान द्वारा किया जाता है । मतदान की दृष्टि से ग्राम सभा को कई प्रखण्डों (वार्डो) में विभक्त किया जाता है और प्रत्येक वार्ड एक प्रतिनिधि का चुनाव करता है ।

निर्वाचन राज्यपाल द्वारा नियुक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी के निदेश में सम्पन्न होता है । सदस्यता में अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों, के लिए आरक्षण है । 1993 के सशोधन के बाद से पंचायत की कुल सदस्य संध्या का एक तिहाई भाग महिलाओं के लिए आरक्षित है ।

नियमानुसार महिलाओं के लिए कुछ वार्ड आरक्षित होते हैं जहां से केवल महिला प्रत्याशी ही चुनाव लड़ सकती हैं । सामान्यतया पंचायत की प्रति पखवाड़े एक बैठक होती है । संविधान के अन्तर्गत पंचायतों को उनके क्षेत्र के विकास से सम्बन्धित योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए व्यापक अधिकार प्राप्त हैं ।

इनमे कुओ की खुदाई, पेयजल की व्यवस्था सड़कों और गलियों की देख-रेख और सफाई, प्रकाश व्यवस्था, बिजली, स्वास्थ्य, कृषि, घरेलू उद्योग, सहकारिता, उन्नत बीजों का वितरण इत्यादि शामिल हैं । अत: संवैधानिक तोर पर ग्राम पंचायते ग्रामीण विकास की आधारभूत संस्थाएं बन गई हैं । इस प्रकार तृणमूल स्तर पर नागरिक स्वयं अपने भविष्य के निर्माता बन गए हैं ।

प्रत्येक विकास खण्ड (डेवलपमेण्ट ब्लाक) की विभिन्न पंचायतों को मिलाकर पंचायत समिति का निर्माण होता है । समिति के अध्यक्ष को प्रधान कहा जाता है तथा उपाध्यक्ष को उपप्रधान । ये दोनों ही अधिकारी सदस्यों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं । समिति का विश्वास खोने पर प्रधान को पद से हटाने का उपबंध है । पंचायत समिति का कार्य क्षेत्र अति व्यापक है ।

यह कार्य दो वर्गो में विभक्त हैं:

(1) वे कार्य जो पूरी तरह पंचायत समिति के अधीन हैं जैसे पेयजल व्यवस्था, पानी का निकास, मार्गो का निर्माण तथा रख-रखाव, प्राथमिक पाठशालाओं और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की व्यवस्था, युवा कल्याण और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन;

(2) विकास कार्य जिसके अर्न्तगत जिला परिषद की योजनाओं का विकास खण्ड के स्तर पर कार्यान्वयन सम्मिलित है, उदाहरण के लिए उन्नत वीजों और खादों का वितरण, भूमि संरक्षण, कृषि ऋण का वितरण, चारा आपूर्ति व्यवस्था में सुधार, घरेलू उद्योगों का विकास, सिंचाई सुविधा की देख-रेख, वनों की सुरक्षा, तथा सहकारिता ।

पंचायत समिति प्रत्येक कार्यक्षेत्र के लिए पृथक्-पृथक् समितियों का गठन करने के लिए स्वतंत्र है । विकास कार्यों के लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की सरकारी योजना के अन्तर्गत जिला परिषद शर्षिस्थ संस्था है । 73वें संविधान संशोधन के अनुसार जिला परिषद पूर्णतया निर्वाचित सदस्यों की संस्था है और इसका कार्यकाल पांच वर्षों का है ।

इसके अध्यक्ष को जिला प्रमुख कहते हैं और वह सदस्यो द्वारा निर्वाचित किया जाता है । नए संशोधन के अनुसार परिषद के सदस्य जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं । सदस्यगण चाहें तो मतदान द्वारा अपने प्रमुख को पद से हटा सकते हैं ।

परिषद का कार्यक्षेत्र व्यापक है । पूरे जिले की लोकतांत्रिक निर्णय व्यवस्था की शीर्ष संस्था होने के नाते जिला स्तर के लोक कल्याण प्रशासन में इसकी सर्वोच्च भूमिका है । पंचायत समितियों का बजट परिपद ही पास करती है ओर वह पूरे क्षेत्र के लिए विकास योजनाएं बनाती हैं तथा पंचायत समितियों द्वारा पारित योजनाओं के बीच समन्वय स्थापित करती है ।

राज्य सरकार को जिले की विकास सम्बन्धी आवश्यकताओं के बारे में सुझाव देना इसका प्रमुख कार्य है । राज्य सरकार से प्राप्त अनुदानों का पंचायत समितियों में आबंटन और उनके कार्यों में समन्वय लाना इसके उत्तरदायित्व का भाग है ।

नई पंचायती राज व्यवस्था के अन्तर्गत चुनाव सम्पन्न कर विभिन्न लोकतांत्रिक संस्थाओं की नियुक्ति 1995-1996 तक हो गई थी । इनके अस्तित्व में आए अभी थोड़ा समय ही हुआ है अत: इनकी सफलता के बारे में व्यापक टिप्पणी नहीं की जा सकती ।

परन्तु इतना स्पष्ट है कि व्यवस्था के प्राथमिक स्तर के पूर्णतया लोकतांत्रिक बन जाने और उसमें सदस्यता सम्बन्धी आरक्षण के माध्यम से समाज के अपेक्षाकृत दुर्बल वर्गो की भागीदारी और महिलाओं की अच्छी उपस्थिति होने से स्थिति में गुणात्मक सुधार आया है ।

प्रारम्भिक समस्याओं में जातीय द्बोश में वृद्धि और सदस्यों तथा सरपंचों के स्तर पर उत्तरदायी व्यवहार के तौर-तरीकों के बारे में अज्ञान, तथा उनमें उत्तरदायित्व वहन करने के अनुभव का अभाव प्रमुख हैं । व्यवस्था के सुचारु रूप से संचालन के लिए शांति व्यवस्था पर कड़ी निगरानी तथा प्रशासन में राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकना आवश्यक है । साथ ही राज्यस्तरीय वित्त आयोगों का प्रभावी संचालन और वित्तीय मामलों में धन के सम्भावित दुरुपयोग को रोकने के लिए निगरानी अतिआवश्यक है ।

नगरीय प्रशासन और 74वां संविधान संशोधन:

1992 में पारित 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से नगरों के प्रशासन में रनोकतांत्रिक स्वायत्तता का संचार हुआ है । यह संशोधन दिसम्बर 1992 में दोनों सदनों द्वारा पारित होकर राष्ट्रपति की स्वीकृति के पश्चात्र 24 अप्रैल 1993 से लागू हो गया था ।

इसके माध्यम से नगर स्तरीय लोकतांत्रिक प्रशासनिक संस्थाओं को संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त हो गई है । अभी तक नगरपालिकाएं मुख्य रूप से नागरिक सुविधाओं की व्यवस्था करने के कार्य सम्पन्न करने तक ही सीमित थी । इस अधिकरण के माध्यम से उनके कार्यक्षेत्र अब बहुत व्यापक हो गए हैं ।

नगरों के विकास के लिए योजनाएं बनाना, नगरों का स्थानीय विकास कार्य सम्पन्न करना, तथा राज्य तथा केन्द्र द्वारा तैयार की गई योजनाओं और कार्यक्रमों का नगर के स्तर पर कार्यान्वयन उनके उत्तरदायित्व का मुख्य हिस्सा है । नगरपालिकाओं के कार्यों का विवरण संविधान की बीसवीं सूची में प्रकाशित किया गया है ।

इसके अधिकार क्षेत्र में निम्नलिखित कार्य शामिल हैं:

1. नगर नियोजन (जिसमें छोटी नगरीय बस्तियां भी शामिल हैं),

2. भूमि उपयोग पर नियंत्रण और भवन निर्माण के लिए दिशा निर्देश,

3.आर्थिक और सामाजिक विकास सम्बन्धी नियोजन,

4. सड़कों और पुलों का निर्माण

5. जल आपूर्ति, जिसमें घरेलू उपयोग और व्यापारिक उपयोग दोनों ही शामिल हैं,

6. सार्वजनिक स्वास्थ्य, सफाई और कूड़ा आदि की व्यवस्था,

7. अग्निशमन सेवा,

8. नगरीय क्षेत्र के वनों की सुरक्षा तथा वातावरण में संतुलन बनाए रखने का दायित्व

9. समाज के दुर्बल वर्गो के हितों की सुरक्षा

10. गंदी बस्तियों का सुधार,

11. गरीबी उन्मूलन के उपाय

12. नगर सीमा के अन्दर उद्यानों और क्रीड़ा स्थलों की व्यवस्था,

13. सांस्कृतिक, शैक्षणिक तथा सौन्दर्यानुभूति सम्बन्धी आवश्कताओं की आपूर्ति का प्रबन्ध,

14. शमशानों, कब्रगाहों, और शवदाह ग्रहों का प्रबन्ध,

15. पशुओं के रख-रखाव की व्यवस्था तथा पशुओं पर होने वाले अत्याचार पर नियंत्रण,

16. जन्म और मृत्यु के आंकड़ों का लेखा-जोखा,

17. विभिन्न प्रकार की सार्वजनिक सुविधाओं, उदाहरण के लिए सड़कों पर प्रकाश की व्यवस्था, वाहनों को खड़ा करने के स्थानों का प्रबन्ध तथा यात्री बसों के संचालन की व्यवस्था,

18. बूचड़ खानों, तथा कच्चा चमड़ा पकाने की व्यवस्था करना और उस पर नियंत्रण रखना ।

प्रशासनिक कार्यो की यह सूची सभी प्रकार की नगरी इकाइयों के लिए समान रूप से लागू है (भारत सरकार, नगर विकास मंत्रालय, 1993 पावर टु द पीपुल: नगर पालिका) । नगरों की जनसंख्या के आकार के आधार पर उनके लोकतांत्रिक प्रबन्धन के लिए विभिन्न प्रकार की संस्थाएं बनाई गई हैं ।

इनमें निम्न शामिल हैं:

महानगर, नगरपालिका, नगर परिषद, और नगर समिति (अंग्रेजी में इनके नाम इस प्रकार हैं: म्यूनिसिपल कारपोरेशन, म्यूनिसिपैलिटी, म्यूनिसिपल काउंसिल तथा म्यूनिसिपल कमेटी) ।  इनका निर्माण प्रान्तीय सरकार द्वारा बनाए गए अधिनियम के अनुरूप होता है ।

अत: इनकी संरचना सम्बन्धी नियम भिन्न-भिन्न प्रान्तों में भिन्न-भिन्न हैं । इनकी सदस्यता जनता द्वारा निर्वाचित होकर आए प्रतिनिधियों को ही प्राप्त होती है । चुनाव में अनुसूचित जातियों और जनजातियों तथा महिलाओं के लिए पंचायतों की भांति ही नियमानुसार आरक्षण की व्यवस्था हैं और सदस्यों का कार्यकाल पांच वर्ष का है ।

सदस्य अपने में से एक अध्यक्ष ओर दो उपाध्यक्षों का चुनाव करते हैं । सदन का विश्वास खोने पर इन अधिकारियों को पद से हटाया जा सकता है । अध्यक्ष को व्यापक प्रशासनिक अधिकार प्राप्त हैं । सारे अधिकारी उसके निर्देश में काम करते हैं । वह सदन की बैठको की अध्यक्षता करता है और उसके निर्णयों का क्रियान्वयन कराता है ।

वित्तीय मामलों सम्बन्धी सारी संस्तुति अध्यक्ष द्वारा ही सदन में पेश की जाती है । नगरपालिकाओं, नगर परिषदों और नगर समितियों की प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए राज्य सरकार एक कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करती है जोकि सम्पूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था के लिए उत्तरदायी होता है ।

पंचायती तथा नगरी प्रशासनिक संस्थाओं को स्पष्ट वित्तीय आधार और स्वायत्तता प्रदान करने की दृष्टि से 73वें तथा 74वें संवैधानिक संशोधनों में राज्य स्तर पर एक वित्त आयोग की नियुक्ति का उपबंध किया गया है ।

वित्त आयोग ही विभिन्न संस्थाओ को मिलने वाले अनुदान राशि का निर्धारण करता है । आयोग की नियुक्ति राज्य की विधान सभा द्वारा पारित अधिनियम के अनुसार होगी परन्तु, आयोग सीधे तौर पर राज्यपाल के प्रति उत्तरदायी होगा न कि मुख्यमंत्री के प्रति ।

वित्तीय स्वायत्तता से इन संस्थाओं को अपने स्तर पर अपेक्षाकृत स्वतंत्र कार्य संचालन तथा नियोजन का अवसर प्राप्त हो गया है । इस प्रकार 73वें ओर 74वें संवैधानिक संशोधन के लागू हो जाने से भारतीय परिसंघ व्यवस्था दो स्तरीय निर्णय व्यवस्था के स्थान पर तीन स्तरीय प्रशासनिक व्यवस्था बन गई है ।

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