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The Earthquake Tragedy of Gujarat | Hindi | Disasters | Geography

Read this article in Hindi to learn about the earthquake tragedy that happened in Gujarat.

बड़ी सुहानी बेला थी । सूरज की गुनगुनी किरणों ने धरती पर अभी-अभी कदम रखा था । बच्चे उस सर्दी में अपना शालेय गणवेश धारण किए हुए खुशी-खुशी अपना गणतंत्र दिवस मनाने के लिए जा रहे थे । सरकारी, गैर-सरकारी कार्यालयीन कर्मचारी भी अपनी कड़क पोशाकों में अपने-अपने दफ्तरों की ओर निकले थे ।

जगह-जगह स्कूलों, सरकारी कार्यालयों एवं गैर सरकारी कार्यालयों में से उठनेवाले देशभक्ति परक गीतों से सारा वातावरण गुंजायमान था । आज पूरा देश अपना गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी कर रहा था । लगभग आठ बजकर पैंतीस मिनट पर अचानक धरती सूखे पत्ते की तरह काँप गई । इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, ऊँची-ऊँची इमारतें ताश के पत्तों के घरों की तरह ढहने लगीं और देखते ही देखते धराशायी हो गईं ।

अभी कुछ क्षण पहले जहाँ देशभक्ति के गीत गुंजायमान थे वहाँ अब आर्तनाद, चीख-पुकार एवं चीत्कारें सुनाई पड़ने लगी । जो उल्लसित, प्रसन्न, प्रफुल्लित चेहरे थे उनपर बेघर होने का भय, अपनों से बिछड़ने का डर और रोंगटे खड़े कर देनेवाला आतंक झलक रहा था । जगह-जगह चीख-पुकार मची थी । अरे रे ! कई लोग मलबे में दबकर अपनी जान गँवा चुके थे ।

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कई लोग जख्मी हालत में मदद के अभाव में अपनी मौत से साक्षात्कार कर रहे थे । जहाँ अभी कुछ क्षण पहले विद्‌यार्थी भारतमाता का जयघोष कर रहे थे, उसी छत के नीचे उनकी आवाज सदा सर्वदा के लिए खामोश हो गई थी ।

अपने घरों में सोते हुए लोग सपरिवार सदा के लिए चिर-निद्रा में सो गए थे । कुछ मकानों को, सरकारी कार्यालयों को इस भीषण भूकंप केश कारण गंभीर क्षति पहुँची थी जिसके कारण जन-धन की बड़ी हानि हुई थी । लोग बुरी तरह घायल हुए, जख्मी  हुए थे ।

इस भूकंप की तीव्रता स्केल पर ६.८ की गई थी । भूकंप की यह तीव्रता इतनी अधिक थी कि इसने प्रभावित क्षेत्र को बुरी तरह तहस-नहस कर दिया था । कुछ साल पहले किल्लारी (लातूर) में आए भीषण भूकंप की विभीषिका से जनमानस अभी उबर भी नहीं पाया था कि गुजरात के अहमदाबाद में आए इस भूकंप ने अपना तांडव एक बार फिर दिखा दिया था ।

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भूकंप पीड़ितों के लिए प्राथमिक उपचार एवं राहत व्यवस्थाएँ मुहैया कराई गईं । उनके खानपान, आवास एवं स्वास्थ्य के लिए समुचित व्यवस्था, सरकारी, गैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्थाओं द्‌वारा की गई । इस भूकंप के कारण बहुमंजिली इमारतें सर्वाधिक प्रभावित हुई थीं जिनके मलबे में दबकर असंख्य लोग मर चुके थे । कमांडोज एवं स्वयं-सेवकों की सहायता से मलबे में फँसे लोगों को निकालने का कार्य अर्थमूवर मशीनों की सहायता से कुछ इस उम्मीद में तेजी से किया जा रहा था कि शायद कोई मलबे में दबा व्यक्ति जीवित हो ।

भूकंप प्रभावितों के लिए राहत शिविरों की स्थापना की गई थी । केंद्र सरकार द्‌वारा भूकंप प्रभावित क्षेत्र के लिए विशेष राहत राशि की अविलंब व्यवस्था की गई । इस भूकंप के कारण दूषित जल, दूषित वायु और दूषित अन्न खाने की वजह से तथा मृत शरीरों के सड़ने की वजह से महामारी का प्रकोप बढ़ने लगा था ।

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देशभर के डाक्टर इन राहत शिविरों में दिन-रात घायलों की, जख्मियों की और बीमारों की सेवा में जुटे थे । वह दृश्य बड़ा ही हृदयविदारक था जिसे देखकर रोंगटे खड़े हो जाते थे । छब्बीस जनवरी सन २००१ का यह दिन इतिहास में एक काले पन्ने के रूप में सदा के लिए जुड़ गया था ।

आज भी वह दृश्य भूकंप के नाम पर, छब्बीस जनवरी और गणतंत्र दिवस के नाम पर आँखों के सामने चल-चित्र की भांति सजीव हो उठता है । भूकंप, अकाल, त्सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं का हम संगठित होकर सामना कर रहे हैं, यही हमारी मानवता की पहचान है ।

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