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Non-Align Movement in Present World | History

वर्तमान विश्व में गुटनिरपेक्षवाद । “Non-Align Movement in Present World” in Hindi Language!

गुटनिरपेक्षवाद की प्रासंगिकता:

गुट निरपेक्ष आंदोलन सबसे बड़ा शांति आंदोलन के रूप में जाना जाता है । आज यह आवश्यक है कि गुटनिरपेक्षता के पीछे लिने भावना अर्थात् राष्ट्रीय नीति-निर्माण की स्वतंत्रता को सैनिक या आर्थिक दृष्टि से शक्तिशाली देशों के दबाव के अधीन समर्पित न होने देने की इच्छा की पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आवश्यकता है ।

गुट निरपेक्षता विश्व राजनीति में राष्ट्रों के लिए एक नए विकल्प के रूप में निश्चय ही स्थाई रूप धारण कर चुकी है । इसने विशेषत: राष्ट्र समाज के छोटे-छोटे और अपेक्षाकृत कमजोर, सदस्यों के सदंर्भ में राष्ट्रों की स्वतंत्रता और समता बनाए रखने में योगदान दिया है ।

इसने विश्व के पूर्ण ध्रुवीकरण को रोककर, विचारधारागत शिविरों  के विस्तार को और प्रभाव को संयत करके तथा गुटों के अंदर भी स्वतंत्रता की शक्तियों वतो प्रोत्साहन देकर अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने तथा उसे बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है ।

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इसने संयुक्त राष्ट्र संगठन के भीतर और बाहर दोनों जगह बहुत से कल्याणकारी क्षेत्रों में जैसे कि उपनिवेशों को स्वतंत्र कराने प्रजातीय समता को साकार करने तथा अल्प-विकसित देशों के आर्थिक विकास के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान दिया है । आज संयुक्त राष्ट्र संघ के दो-तिहाई देश गुटनिरपेक्षता के दायरे में आ चुके हैं ।

संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न मंचों से गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने विश्व-शांति उपनिवेशवाद के अंत परमाणु अस्त्रों पर रोक नि:शस्त्रीकरण हिन्द महासागर को शांति क्षेत्र घोषित करना नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के निर्माण आदि विषयों पर संगठित रूप से कार्यवाही की है और सफलता हासिल की है ।

गुटनिरपेक्षता की सार्थकता द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद शीत-युद्ध के वातावरण में तो थी किंतु पिछले 15-20 वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में बहुत सारे परिवर्तन हुए हैं । मसलन शीत युद्ध का अंत हो चुका है, सोवियत संघ का विघटन हो चुका है, पूर्वी यूरोप के देशों में साम्यवाद को कब्र में दफनाया जा चुका है, वारसा पैक्ट भंग कर दिया गया है, नाटो की भूमिका में परिवर्तन आ रहा है, जर्मनी का एकीकरण हो चुका है ।

गुटनिरपेक्षता का उदय शीत युद्ध के संदर्भ में हुआ था और आज शीत युद्ध के अंत हो जाने के कारण गुटनिरपेक्षता आंदोलन अप्रासंगिक हो गया है । निर्गुट आंदोलन के वें सम्मेलन में जिम्बाब्बे की राजधानी हरारे में लीबिया के नेता कर्नल गद्दाफी ने निर्गुट आंदोलन को ‘अंतर्राष्ट्रीय भ्रम का मजाकिया आंदोलन’ (A funny movement of international fallacy) कहा था और पूछा था कि जब अमेरिका ने उनके देश पर हवाई हमला करके उन्हें सपरिवार जान से मार देने की कोशिश की तो निर्गुट आंदोलन क्या कर रहा था ? क्या इसके बाद भी इसकी कोई प्रासंगिकता रह जाती है ?

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फरवरी 1992 में गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों के विदेश मंत्रियों की बैठक में मिस्र ने स्पष्ट तौर से अपील की थी कि इस आंदोलन को समाप्त कर दिया जाना चाहिए, उनका तर्क था कि सोवियत संघ के विघटन सोवियत गुट तथा शीत युद्ध की समाप्ति के बाद गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है ।

किंतु बहुसंख्यक विदेश मंत्रियों ने इस विचार का विरोध किया था । उनका कहना था कि बड़ी संख्या में गुटनिरपेक्ष देश अभी निर्धन हैं या आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं और समृद्ध राष्ट्रों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उनका नव-औपनिवेशिक शोषण किया जा रहा है, इस स्थिति में उन्हें बचाने के लिए यह जरूरी है की विकसित और विकासशील देशों के बीच सार्थक वार्ता के लिए दबाव डाला जाए और विकासशील देशों के बीच आपसी सहयोग सुदृढ़ एवं सक्रिय किया जाए ।

इसके लिए निर्गुट आंदोलन परिहार्य मंच का काम करेगा । आतंकवाद, पूर्ण निरस्त्रीकरण की समस्या के साथ आर्थिक उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के दौर से गुजर रही विश्व आर्थिक नीति पर विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक एवं अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के बढ़ते वर्चस्व के कारण विकासशील देशों की आर्थिक समस्याओं के समाधान का मुद्दा काफी जटिल होता जा रहा है ।

अत: ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ को केंद्र बनाकर ‘नाम’ (NAM) महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है । निरस्त्रीकरण के क्षेत्र में गुटनिरपेक्ष आंदोलन विश्व की पुकार की भूमिका निबाह सकता है और इसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि महाशक्तियाँ तीसरी दुनिया के देशों में घातक हथियारों का जमावड़ा न करें ।

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1993 में आंदोलन का सदस्य बनने के लिए प्राप्त नए आवेदनों से यह स्पष्ट है कि सार्वभौम कार्यों में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की निरंतर प्रासंगिकता बनी है और महत्त्व भी बढ़ा है ।  ऐसा कहा भी गया है कि 21वीं शताब्दी आर्थिक युद्ध की होगी । आर्थिक दृष्टि से समृद्ध राष्ठें के गुट उभरकर स्वयं ही प्रतिस्पर्द्धा कर लेंगे और इससे विकासशील राष्ट्रों की स्वतंत्रता और हितों को खतरा पहुँचेगा ।

इस खतरे को नियंत्रित करने के लिए उत्तर-दक्षिण सवाद को बनाए रखने में दक्षिण-दक्षिण सहयोग और अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को बनाने के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन और जी-77 को एक होकर कार्य करना     होगा ।

आज निम्नलिखित क्षेत्रों में गुटनिरपेक्ष आदोलन की प्रासंगिकता नजर आती है:

(1) दक्षिण-दक्षिण सहयोग को प्रोत्साहन देना ।

(2) एक-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अमेरिकी दादागिरी का विरोध करना ।

(3) विकसित और विकासशील (उत्तर-दक्षिण संवाद) देशों के बीच सार्थक वार्ता के लिए दबाव डालना ।

(4) अच्छी वित्तीय स्थिति वाले गुटनिरपेक्ष देशों (जैसे ओपेक राष्ट्र को इस बात के लिए तैयार करना कि वे अपना अधिशेष पश्चिमी देशों की बैंकों में जमा करने के बजाय विकासशील देशों में विकासात्मक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करें ।

(5) नव-औपनिवेशिक शोषण का विरोध किया जाए ।

(6) संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन के लिए दबाव डाला जाए ताकि बड़े राष्ट्र प्रस्तावित पुनर्गठन के लिए राजी हो सकें, यानी उनके वीटो परिषद् की सदस्यता में पर्याप्त बढ़ोतरी की जा सके या महासभा को और अधिकार दिए जा सकें ।

(7) नई अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की पुरजोर माँग करना ।

(8) आणविक निरस्त्रीकरण के लिए दबाव डालना ।

संक्षेप में विकासशील देशों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने की दिशा में यदि कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो गुटनिरपेक्ष आंदोलन का अस्तित्व अधिक समय तक नहीं रह पाएगा विशेषकर ऐसे में जबकि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद इसके सामने कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं रह गया है ।

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