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Problems of Independent African States | History

स्वतंत्र अफ्रीकी राज्यों की समस्याओं | “Problems of Independent African States” in Hindi Language!

स्वतंत्र अफ्रीकी राज्यों की समस्याएँ (Problems of Independent African States):

अफ्रीका अंतर्राष्ट्रीय जगत में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है । नवोदित में अफ्रीका को अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है । इसमें अधिकांश समस्याएं यहाँ की पिछड़ी हुई आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं भौगोलिक स्थिति से उत्पन्न हुई हैं ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् यहाँ के कुछ देशों में क्रांति हुई, गृह-युद्ध हुए, जातीय भेदभाव के कारण अनेक उपद्रव हुए । विभिन्न राज्यों में सैनिक संघर्षों षड्‌यंत्रों विद्रोहों तथा हत्याओं का बोलबाला रहा है । जैसे ही यहाँ के देश स्वतंत्र हुए उनमें राजनीतिक प्रतिहन्हिता का सूत्रपात हुआ ।

फलस्वरूप राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक कारणों को लेकर संघर्ष होने लगे । सरकारी कर्मचारी अयोग्य एवं भ्रष्टाचारी सिद्ध हुए । सर्वत्र कठोर परिश्रम, लगन और दूर-दृष्टि की कमी दिखाई देती है । स्वतंत्रता पाने के बाद अफ्रीकी राज्यों में विघटन की प्रवृत्तियाँ प्रबल हुई हैं ।

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जाइरे (कांगो) और नाइजीरिया को छोड्‌कर कहीं भी शासन में स्थिरता नहीं दिखाई देती । सब राज्यों में गरीबी भुखमरी और बेरोजगारी की समस्याएँ प्रबल हो रही हैं । इस समय अफ्रीका की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं:

(1) आर्थिक विकास की समस्या:

अफ्रीका महाद्वीप की एक प्रमुख समस्या यहाँ के विविध संसाधनों के नियोजित विकास एवं उपयोग की है । यहाँ अनेक उपयोगी खनिज प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं । इन खनिजों के विकास के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि उनका स्थानीय विकास में अधिकतम उपयोग हो ।

इसी प्रकार यहाँ औद्योगिक विकास नगण्य हुआ है अत: उसके विकास के लिए अधिकतम प्रयत्न आवश्यक हैं क्योंकि औद्योगिक विकास ही यहाँ आर्थिक व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान कर सकता है ।

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(2) विदेशियों की उपस्थिति:

अफ्रीका के देशों में वर्तमान समय में विदेशी अर्थात् यूरोपीय एशियाई यहाँ के अनेक देशों के लिए समस्या है । यहाँ के देशों में अब विदेशी जनता के लिए भी क्रमश: विद्रोही भावना जाग्रत हो रही है, उनमें यह विश्वास घर करता जा रहा है कि विदेशी स्थानीय धन का शोषण कर रहे हैं । इसका प्रत्यक्ष उदाहरण युगाण्डा में एशियाइयों के निष्कासन के रूप में देखा जा चुका है । यही बात अन्य अफ्रीकी देशों में भी यदि निकट भविष्य में दोहरा जाए तो कोई आश्चर्य नहीं ।

(3) विदेशी प्रभावों से संरक्षण की समस्या:

आज अफ्रीका के देशों की प्रमुख समस्या विदेशी प्रभावों से संरक्षण की है क्योंकि जब अफ्रीका का कोई देश किसी एक गुट में शामिल हो जाता है उससे अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं । यहाँ पूँजीवादी एवं साम्यवादी दोनों ही अपना प्रभाव स्थापित करना चाहते हैं । यदि यहाँ के देश अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के दलदल में फँस गए तो विकास की अन्य संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं ।

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(4) अफ्रीकी एकता की समस्या:

अफ्रीका आज विघटन के कगार पर खड़ा है । अफ्रीकी एकता संगठन अपने एकता प्रयासों में पूर्णतया असफल रहा है । डॉ॰ एन्क्रूमा का ‘अफ्रीका का राज्य’ का सपना टूट चुका है, क्योंकि विघटनकारी शक्तियाँ बहुत व्यापक एवं सक्रिय हैं । दक्षिण अफ्रीका की राजनीति अभी भी अफ्रीकी एकता के मार्ग में रुकावट बनी हुई है ।

(5) साम्यवाद के प्रसार की समस्या:

अफ्रीका महाद्वीप में साम्यवाद के लिए प्राय: सभी आवश्यक परिस्थितियाँ उपस्थित हैं जिनके कारण इस विचारधारा का निर्बाध प्रचार एवं प्रसार किया जा सकता है । यहाँ के लोग आर्थिक शोषण तथा साम्राज्यवादी दमन एवं आतंक के कटु अनुभव प्राप्त कर चुके हैं ।

साम्यवादी देशों द्वारा साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद का विरोध आर्थिक विकास के कार्यक्रमों की सफलता तथा पूंजीपति वर्ग को समाप्त कर शोषण का अंत व्यक्तियों के बीच समानता की स्थापना और जातीय भेदभाव की नीति की निंदा आदि साम्यवादी नीतियों के कुछ उदाहरण हैं जो अफ्रीकावासियों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त हैं । सोवियत सघ और साम्यवादी चीन द्वारा इस महाद्वीप के अनेक देशों के राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय सहयोग प्रदान किया गया था ।

(6) राजनीतिक स्थायित्व की समस्या:

अफ्रीका के अनेक देशों में विदेशी शासन की समाप्ति के पश्चात् जैसे ही स्थानीय सरकारें बनने लगीं उनमें स्थायित्व की समस्या आई । इसी कारण अनेक देशों में सैनिक अधिनायकवादी सरकारें हैं ।

यहाँ की राजनीतिक परंपराएँ प्रारभ से ही अधिनायकवादी और सर्वसत्तावादी रही हैं । यहाँ की जनता का शोषण साम्राज्यवाद के समाप्त हो जाने पर भी जारी है । यहाँ लोकतंत्रीय परंपराओं का विकास नहीं हो सका ।

अल्लीरिया या घाना इथियोपिया या मिस्र किसी भी देश को लें हमें सर्वत्र यही दिखाई पड़ेगा कि इन देशों में निर्वाचित एकतंत्र की स्थापना की गई है । इसके अतिरिक्त यहाँ शासन में अत्यधिक उथल-पुथल होती रहती है ।

हाल ही में (1994) गाम्बिया बरूण्डी एवं  रवांडा में निर्वाचित सरकार का तख्ता पलट होने के साथ-साथ खून-खराबा भी हुआ । जनवरी 2001 में लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो में तख्ता पलट की कार्यवाही के तहत राष्ट्रपति लॉरेट कबीला की उनके एक अंगरक्षक ने हत्या कर दी । यहाँ के अधिकांश देशों की प्रमुख समस्या है स्थाई प्रशासन की स्थापना जिससे कि यहाँ का विकास हो सके ।

(7) जातिवाद अथवा गोरे-काले की समस्या:

अफ्रीका महाद्वीप की द्वितीय प्रमुख समस्या है जातिवाद की अथवा गोरे-काले की समस्या । इस समस्या का उदय यूरोपीय शक्तियों द्वारा किया गया । उनके शासनकाल में यहाँ श्वेत लोग आकर बसे तथा प्रशासन एवं उच्चस्तरीयकार्य इन्हीं के हाथों में था ।

ये शासक थे अत: स्थानीय निवासियों पर मनमाना अत्याचार करते तथा उनको दास समझते थे । यह क्रम उस समय तक चलता रहा जब तक उनका शासन था यद्यपि अनेक बार इसका विरोध किया गया ।

किंतु यूरोपीय अपनी जातीय उच्चता की भावना के कारण स्थानीय जनता का शोषण करते रहे । आज जबकि यहाँ के देश स्वतत्र हैं फिर भी जहाँ विदेशी हैं वही यह समस्या वर्तमान है ।

इसके अतिरिक्त यहाँ अनेक आदिवासी जातियाँ निवास करती हैं । उनका तथा शेष अफ्रीकियों में सामंजस्य करना इनके विकास के लिए अति आवश्यक है । यह समस्या दक्षिण रोडेशिया तथा दक्षिण अफ्रीका में उग्र रूप धारण कर चुकी है तथा वहाँ संघर्ष होता रहता है ।

उपर्युक्त समस्याओं के अतिरिक्त सामूहिक राष्ट्रीय चेतना का अभाव, विदेशी आर्थिक सहायता पर निर्भरता, कुशल राष्ट्रीय नौकरशाही का अभाव सत्ता के औचित्य की समस्या, शिक्षा की प्रगति, आदिवासियों का विकास, आदि अनेक समस्याएँ इस महाद्वीप के सम्मुख हैं । वास्तव में, संपूर्ण महाद्वीप के देश विकास की शैशवावस्था में हैं ।

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