ADVERTISEMENTS:

Modification in Normal Diet | Home Science

Read this article in Hindi language to learn about the five main kinds of modification in normal diet of an individual. The kinds are: 1. Consistency of Bulk 2. Modification in Nutrients 3. Modification in Food Stuffs 4. Modification in Frequency of Food 5. Methods of Cooking.

सामान्य आहार को उपचारात्मक आहार में बदलने के लिए निम्नलिखित परिवर्तन किए जाते हैं:

1. आहार की बनावट या तरलता में परिवर्तन (Modification in Consistency),

2. पोषक तत्वों में परिवर्तन (Modification in Nutrients),

ADVERTISEMENTS:

3. भोज्य पदार्थों में परिवर्तन (Food Stuff),

4. भोजन की बारंबारता में परिवर्तन (Frequency of Meals),

5. भोजन को पकाने की विधियों में (Modification of Cooking Food) ।

Kind # 1 आहार की बनावट या तरलता में परिवर्तन (Consistency of Bulk):

कुछ परिस्थितियों में रोगी भोजन चबाने एवं निगलने में असमर्थ होता है तथा इन स्थितियों में उसे कठिनाइयों का अनुभव होता है । आहार में बनावट का अर्थ है: रोगी के आहार में तरल व ठोस पदार्थों में परिवर्तन करना ।

ADVERTISEMENTS:

तरल आहार (Liquid Diet):

तरल आहार में उन सभी भोज्य पदार्थों का समावेश रहता है जोकि सामान्य तापक्रम पर तरल हों ।

तरल आहार को दो भागों में बाँटा जा सकता है:

(i) शुद्ध तरल आहार (Clear Liquid Diet):

ADVERTISEMENTS:



शुद्ध तरल आहार में सिर्फ तरल पदार्थों का समावेश होता है । तरल आहार वह होते हैं जो सामान्य तापक्रम पर तरल होते हैं तथा आसानी से गिराये जाते हैं । यह आहार आमाशय व आँतों के रोगों में दिया जाता है और दस्त की अवस्था में रोगी को केवल नींबू की चाय, फलों का रस, उबला पानी, ग्लूकोज पानी, कार्बोनेटेड, पेय पदार्थों, बार्ले  पानी, जिन्जर एल, वसा रहित सूप (माँस) आदि ।

यह आहार व्यवस्था शुरू में एक या दो दिन तक 40-80 मिली प्रति घंटा दी जाती है । दूसरे दिन रोगी की स्थिति में सुधार होने पर तरल पदार्थों की मात्रा 100-120 मिली की जाती है तथा इसे प्रति दो घंटे बाद दिया जाना अति आवश्यक है ।

(ii) पूर्ण तरल आहार (Full Liquid Diet):

शुद्ध तरल आहार में दिये गये सभी पदार्थों का इसमें समावेश किया जाता है, इसके अतिरिक्त, इस आहार में सूजी की खीर, दूध दलिया, कस्टर्ड, आइसक्रीम, क्रीम सूप शर्बत, छाछ, एगनाँक, कार्बोनेट पेय पदार्थ आदि दिये जाते हैं । इस प्रकार की आहार व्यवस्था में दूध, अंडा, दलिया व जेलेटिन का उपयोग भी होता है । रोगी को प्रति दो या तीन घण्टों के पश्चात् कम से कम 180 से 240 मिली तक आहार दिया जा सकता है ।

कोमल आहार (Soft Diet):

इसे मानक आहार के रूप में स्वास्थ्य की देखभाल के लिए दिया जाता है । यह आहार व्यवस्था प्रतिदिन की आहार व्यवस्था के अनुसार ही होती है । इसकी बनावट में ही केवल अन्तर होता है ।

यह आहार निम्न मरीजों के लिए अति आवश्यक है:

i. शल्य चिकित्सा के पश्चात् ।

ii. आँत व आमाशय से सम्बन्धित रोगों में ।

iii. उन रोगियों को जिन्हें खाना चबाने व निगलने में तकलीफ हो ।

iv. तीव्र संक्रामक रोग से पीड़ित मरीजों को ।

कोमल आहार एवं सामान्य आहार व्यवस्था में कुछ भिन्नता होती है । इस आहार व्यवस्था में भोज्य पदार्थों को अच्छी तरह पकाया जाता है । यह आहार संयमित रेशे वाला होता है तथा इसको अच्छी तरह पकाया जाता है ताकि यह मुलायम हो जाये ।

मृदु आहार व्यवस्था में निम्न बातों को ध्यान में रखा जाता है:

i. भोज्य पदार्थ अच्छी तरह पका व गला होना चाहिये ।

ii. सब्जियों को महीन-महीन काटना चाहिये या कद्‌दूकस करना चाहिये ।

iii. सब्जियों को अच्छी तरह पकाना व गलाना चाहिये ।

iv. इस प्रकार के आहार में माँस, मछली या पक्षी के माँस को अच्छी तरह पकाकर गलाना चाहिये ।

v. इस आहार में पके फलों का जैसे: पपीता, केला, सेब आदि का उपयोग करना चाहिए । 

vi. अनाजों व दालों को अच्छी तरह पका कर एवं पूर्ण रूप से मिश्रित करके देना चाहिये; उदाहरणार्थ-दलिया, खिचड़ी, दाल, मुलायम रोटी आदि ।

vii. मुलायम पुडिंग, कस्टर्ड आदि का उपयोग भी किया जा सकता है ।

कोमल आहार में निम्न भोज्य पदार्थ दिये जाते हैं:

दूध, क्रीम, मक्खन, पनीर, अंडा, मुलायम मुर्गा, मछली, ब्रेड, क्रीम सूप, मुलायम पकी सब्जियाँ, पके हुए फलों व फलों का रस, महीन छना अनाज, मुलायम रोटी, ब्रेड, चाय, कॉफी, आइसक्रीम, पुडिंग, जेलेटिन, स्पंज केक, कुकीज आदि ।

Kind # 2 पोषक तत्वों में परिवर्तन (Modification in Nutrients):

विभिन्न रोगों में रोगी के आहार में पौष्टिक तत्वों में परिवर्तन निम्न प्रकार किया जाता है:

(i) कार्बोहाइड्रेट की मात्रा में परिवर्तन (Modifications in Carbohydrates Content):

कई रोगों में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा  अधिक दी जाती है; जैसे: ऑपरेशन के पहले व एडीसन्स रोग (Addison Disease) में कार्बोहाइड्रेट अधिक मात्रा में दिया जाता है । मधुमेह में कार्बोहाड्‌ड़ेट की मात्रा संयमित की जाती है ।

(ii) ऊष्मा की मात्रा में परिवर्तन (Modification in Calorie Content):

संक्रामक रोगों; जैसे: टाइफाइड, तपेदिक, कुपोषण (Malabsorption), अल्प भार (Under nutrition), हाइपर थायरॉडिज्म (Hyper thyrodism) आदि में अधिक ऊष्मा युक्त भोज्य  पदार्थो का समावेश होना चाहिए । हृदय रक्त परिसंचरण सम्बन्धी रोगों (Acute uraemia) और हिपैटिक (Hepatic) कोमा में कम ऊष्मा युक्त आहार देना चाहिये ।

(iii) प्रोटीन की मात्रा में परिवर्तन (Modification in Protein Content):

प्रोटीन कुपोषण यकृत सिरोसिस, पेप्टिक अल्सर, नेफ्रोसिस तथा सैलिक रोगों में अधिक मात्रा में प्रोटीन देनी चाहिए । हिपैटिक कोमा तथा यूरेमिया में प्रोटीन कम मात्रा में दी जाती है ।

(iv) वसा की मात्रा में परिवर्तन (Modification in Fat Content):

अल्पपोषण (Under nutrition) में वसा की मात्रा अधिक दी जाती है परन्तु मॉलएब्जॉर्पशन सिन्ड्रोम (Malabsorption syndrome) अन्य यकृत सम्बन्धी रोगों में वसा की मात्रा कम दी जाती है ।

(v) खनिज लवण की मात्रा में परिवर्तन (Modification in Mineral Content):

रिकेट्‌स व ऑस्टीयोमलेशिया में कैल्शियम की मात्रा अधिक दी जाती है । वृक्क में पथरी होने पर कैल्शियम व फॉस्फेट की मात्रा कम कर दी जाती है । हृदय रोग, रक्त दबाव व वृक्क रोग (Kidney disease) में सोडियम की मात्रा संयमित की जाती है ।

(vi) विटामिन्स की मात्रा में परिवर्तन (Modification in Mineral Content):

आहार में विटामिन्स की कमी से होने वाले रोगों में विटामिन्स अधिक मात्रा में दिया जाता है । दीर्घकालीन रुग्णावस्था के आहार में आधिकतर विटामिन्स की कमी होती है । अत: रोगी को विटामिन्स की गोलियाँ दी जाती हैं ।

(vii) रेशे की मात्रा में परिवर्तन (Modification in Fibre Content):

कब्ज की स्थिति में अधिक रेशेयुक्त आहार दिये जाते हैं । पेचिश, आँव, पेप्टिक अल्सर, अल्सरेटिव कोलाईटिस तथा सैलिक रोग में रेशेयुक्त भोज्य पदार्थ की मात्रा कम की जाती है ।

(viii) अन्य पदार्थों की मात्रा में परिवर्तन (Modification in other Contents):

गठिया (Gout) रोग में प्यूरिन (Purine) की मात्रा कम दी जाती है साथ ही वृक्क पथरी होने पर ऑक्जेलिक अम्ल (Coxalic acid) व प्यूरिन कम देनी चाहिए ।

Kind # 3 भोज्य पदार्थों में परिवर्तन (Modification in Food Stuffs):

भोज्य पदार्थों में अग्र कारकों से परिवर्तन किया जाता है:

(i) आर्थिक स्थिति (Economical Condition):

रोगों की तीव्रता (Acute condition) या रोग में सुधार की स्थिति (Convalescence) में कुछ महँगे भोज्य पदार्थों का आहार में समावेश करना चाहिए । कुछ रोग जो जीवनपर्यन्त चलते हैं; जैसे: मधुमेह, पेप्टिक अल्सर, हृदय रोग आदि इनमें जो भी भोज्य पदार्थ रखे जाएं रोगी की आर्थिक स्थिति के अनुसार ही होने चाहिए ।

(ii) शाकाहारी या माँसाहारी (Vegetarian or Non-vegetarian):

रोगी को आहार उसकी आदतों के अनुसार शाकाहारी या माँसाहारी ही दें । हृदय रोग, मधुमेह के रोगी यदि माँसाहारी हैं तो उनके आहार में वसा रहित माँस का समावेश होना चाहिये । इस प्रकार तपेदिक का रोगी यदि शाकाहारी है तो उसे जल्द ठीक होने के लिए शाकाहारी भोजन देना चाहिए ।

(iii) भोजन सम्बन्धी एलर्जी होने पर भोज्य पदार्थों में परिवर्तन (Modification in Food Stuffs in Food Allergy):

कुछ व्यक्तियों को किसी विशेष भोज्य पदार्थ से एलर्जी होती है, जैसे: दूध, अंडा, आलू, मछली आदि । अत: रोगी के भोजन में उन भोज्य पदार्थों का समावेश नहीं होना चाहिए जिनसे उसे एलर्जी हो ।

(iv) भोज्य पदार्थ ग्रहण न कर पाना (Intolerance of Food):

कुछ व्यक्ति विशेष भोजन गृहण नहीं कर पाते, जैसे: दूध पीने से अतिसार, अधिक मिर्च-मसाले युक्त भोज्य पदार्थों से कब्ज आदि । कई रोगी दाल, माँस, मछली या किन्हीं अन्य भोज्य पदार्थों को गृहण नहीं कर पाते । अत: इन स्थितियों में भोजन में परिवर्तन किया जाता है ।

(v) भोज्य पदार्थों में उपस्थित पौष्टिक तत्वों के अनुसार परिवर्तन (Modification Presence of Nutrients in Food Stuffs):

i. अधिक व कम ऊर्जा युक्त भोज्य पदार्थ ।

ii. अधिक व कम प्रोटीन युक्त भोज्य पदार्थ ।

iii. अधिक व कम वसा युक्त भोज्य पदार्थ ।

iv. अधिक व कम कार्बोहाइड्रेट युक्त भोज्य पदार्थ ।

v. अधिक व कम खनिज लवण युक्त भोज्य पदार्थ ।

vi. अधिक व कम विटामिन्स युक्त भोज्य पदार्थ ।

vii. अधिक व कम रेशे युक्त भोज्य पदार्थ ।

Kind # 4 भोजन की बारंबारता में परिवर्तन (Modification in Frequency of Food):

एक सामान्य अवस्था में व्यक्ति 3-4 बार आहार लेते हैं; जैसे: सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना, शाम की चाय व रात का खाना । रुग्णावस्था में 3-4 बार में ही पूरा खाना नहीं ले सकते तथा एक बार में ही सभी पोषक तत्व प्राप्त नहीं हो सकते हैं ।

अत: रुग्णावस्था में आवश्यक है कि रोगी को सभी पौष्टिक तत्व उचित मात्रा व अनुपात में प्राप्त हो सके ताकि पीड़ित अंग को आराम मिले व रोगी शीघ्र निरोगी (स्वस्थ) हो सके । कई रोगों की अवस्था में 1-2 घंटे बाद, 2-3 घंटे बाद थोड़ा-थोड़ा आहार दिया जाता है । यहाँ भोजन की बारंबारता से तात्पर्य है कि सामान्य रूप से दिन में 3-4 बार दिये गये आहार के स्थान पर रुग्णावस्था में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में 8-10 बार आहार दिया जाये ।


Kind # 5 भोजन को पकाने की विधियाँ (Methods of Cooking):

रोगी के भोजन को पकाते समय निम्न विधियों का उपयोग करना चाहिए:

उबालना, खदकना, स्ट्यूगिं, भोज्य पदार्थों को महीन टुकड़ों में काटना, कद्‌दूकस करना ।

रोगी के लिए भोजन पकाते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए:

i. रोगी का भोजन अच्छी तरह से पका व गला हो । रोगी के भोजन में मिर्च-मसाले कम हों ।

ii. तले व गरिष्ठ भोज्य पदार्थों का समावेश कम हो ।

iii. संयमित नमक वाले आहार में नमक कम ही देना चाहिये ।

iv. रोगी के आहार में स्वाद व गंध का ध्यान रखना चाहिए ।

v. रोगी के भोजन को आकर्षक बनाना चाहिए । रोगी के खाने के समय को ध्यान में रखकर भोजन पकाना चाहिए ताकि उससे रोगी को समय से शुद्ध भोजन प्राप्त हो ।

vi. माँस-मछली को महीन-महीन काटकर अच्छी तरह पकाना चाहिये ।

, , , , ,

Kata Mutiara Kata Kata Mutiara Kata Kata Lucu Kata Mutiara Makanan Sehat Resep Masakan Kata Motivasi obat perangsang wanita