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Notes on Human Geography | Hindi

This article provides a note on human geography all around the world in Hindi language.

अठारहवीं सदी के अंत तक भूगोल मूल रूप से पृथ्वी के वातावरण का अध्ययन था । इसके अध्ययन का मूल उददेश्य मानव पर्यावास के रूप में पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में विकास की सम्भावनाओं और सीमाओं का निरूपण करना था ।

इस प्रकार ज्ञान की पृथक् शाखा के रूप में भूगोल पृथ्वी की सतह का बहुपक्षीय अध्ययन बन गया । वर्तमान युग में यह निश्चय ही आश्चर्यजनक प्रतीत होता है कि किसी एक वैज्ञानिक के लिए पृथ्वी का समग्र अध्ययन कैसे सम्भव था । परन्तु तब स्थितियां आज जैसी नहीं थीं ।

पृथ्वी के भौतिक स्वरूप तथा उसमें निहित विविधता और अन्तरक्षेत्रीय विभिन्नता के बारे- में ज्ञान अत्यधिक सीमित था । पृथ्वी के भौतिक स्वरूप के बारे में ज्ञान विस्फोट उत्तर-कोलम्बस युग की महान अन्वेषणात्मक यात्राओं से प्राप्त ज्ञान के विश्लेषण तथा उनके वर्गीकरण और सत्यापन की लंबी और जटिल प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ही संभव हो सका था ।

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यह तथ्य कैप्टन जेम्स कुक (1728-1779) और अलेक्जंडर वॉन इम्बोल्ट (1769-1859) की विश्व यात्राओं के वृतांतों से भली प्रकार स्पष्ट है । ज्ञान प्रसार की यह प्रक्रिया उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भिक चरण तक चलती रही थी । पृथ्वी के वातावरण के बारे में ज्ञान के इस आशातीत विस्फोट के पश्चात अब किसी भी विद्वान के लिए पृथ्वी का समग्र अध्ययन सम्भव नहीं रहा ।

उत्तरोत्तर यह कार्य और भी दुष्कर होता गया । इन्ही कारणो से पृथ्वी के वातावरण के अध्ययन में विशेषीकरण की आवश्यकता हुई तथा पृथ्वी के विभिन्न पक्षों के अध्ययन के लिए पृथक-पृथक क्रमबद्ध विज्ञानों का जन्म हुआ ।

फलस्वरूप वातावरण के वे सभी पक्ष जो अभी तक भूगोल के अध्ययन क्षेत्र में सम्मिलित थे एक-एक कर विभिन्न क्रमबद्ध विज्ञानों के अध्ययन के विशिष्ट क्षेत्र बन गए । परिणामस्वरूप भूगोल के सामने पहचान का संकट उत्पन्न हो गया । अध्ययन की स्वतंत्र शाखा के रूप में इसका अस्तित्व खतरे में पड़ गया ।

उन्नीसवीं सदी के पूवर्द्धि में रिट्टर तथा इम्बोल्ट ने भूगोल को नई पहचान देकर इसका पुनर्जन्म किया । इन दोनों विद्वानों ने अपनी-अपनी तरह से रेखांकित किया कि पृथ्वी के अध्ययन क्षेत्र के भौतिक पक्षों के अलग-अलग क्रमबद्ध विज्ञानों के विषय क्षेत्रों में बट जाने के पश्चात भी एक महत्वपूर्ण पक्ष अछूता रह गया है और वह हे मानव की कार्य स्थली के रूप में पृथ्वी की सतह का निरूपण और विश्लेषण ।

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अत: भूगोल अब मूल रूप से मानव की क्रिया स्थली और उसके पर्यावास के रूप में पृथ्वी की सतह का क्षेत्रीय और स्थानिक अध्ययन बन गया । इस अध्ययन के दो पक्ष हैं । प्रथम, पृथ्वी को छोटे-छोटे क्षेत्रों में बांट कर प्रत्येक का सर्वपक्षीय, समग्र अध्ययन जिससे कि क्षेत्र विशेष में विकास की सम्भावनाओं तथा कठिनाइयों का आकलन हो सके ।

द्वितीय, पृथ्वी के वातावरण के विभिन्न तत्वों, उदाहरणार्थ जलवायु, प्राणी जीवन, उच्चावच स्वरूप, मानव संसाधन और आर्थिक संसाधनों के अलग-अलग क्षेत्रीय निरूपण (वितरण प्रारूप) के माध्यम से समग्र पृथ्वी का प्रकरणात्मक अर्थात् क्रमबद्ध अध्ययन जिससे कि मानव पर्यावास के रूप में पुथ्वी का सम्यक् ज्ञान प्राप्त हो सके ।

पहले प्रकार के अध्ययन को प्रादेशिक भूगोल तथा दूसरे को क्रमबद्ध भूगोल की संज्ञा दी गई । दोनों ही भौगोलिक अध्ययन के अनिवार्य अंग हैं और उनका सम्मिलित योगदान भूगोल को समग्रता प्रदान करता है । उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भूगोल ज्ञान की वह शाखा है जो पृथ्वी की सतह का मनुष्य की क्रिया स्थली के रूप में अध्ययन करती हैं । यद्यपि इसके अध्ययन का ”विषय” पृथ्वी की सतह, अर्थात् एक भौतिक और क्षेत्रीय इकाई है, परन्तु अध्ययन का उद्‌देश्य मानव केन्द्रित है ।

इसीलिए अन्य विषयों के विपरीत भूगोल एक साथ ही प्राकृतिक विज्ञान भी है तथा सामाजिक विज्ञान भी । ज्ञान की स्वतंत्र शाखा के रूप में सम्पूर्ण भौगोलिक विमर्श मानव और प्रकृति (परिवेश) के अन्तरसम्बन्ध के अवबोध पर केन्द्रित है ।

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अध्ययन की विशिष्ट शाखा के रूप में भूगोल की इमारत सांस्कृतिक विकास की दीर्घकालीन ऐतिहासिक प्रक्रिया के दौर में मनुष्य जाति द्वारा पृथ्वी और उसके परिवेश को समझने की दिशा में प्राप्त किए गए अनुभवों की आधारशिला पर खड़ी है ।

भूगोल का इतिहास प्रकृति में निहित मानव विकास की सम्भावनाओं और सीमाओं के प्रति संचेतना के विकास का इतिहास है तथा इसकी मूल परिदृष्टि क्षेत्रीय और स्थानिक है । सामाजिक संगठन के अध्ययन में भूगोल प्रमुखतया मानव जीवन की स्थानिकता और क्षेत्रीयता पर आधारित सम्बन्धों के संगठनात्मक प्रभाव पर ध्यान केन्द्रित करता है ।

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