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Development of Foreign Policy | India

राजनीतिक दल विदेश नीति के विकास में किस तरह योगदान देते हैं | “Development of Foreign Policy” in Hindi Language!

राजनीतिक दल और विदेश नीति:

राजनीतिक दलों की मुख्य चिंता सत्ता हासिल करना होती है । राजनीतिक सत्ता हथियाने और उस पर काबिल रहने के अपने प्रयासों के अंतर्गत ही राजनीतिक दल विदेश नीति संबंधी समस्याएँ उठाते हैं और नीति निर्धारण की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं ।

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत किसी एक या दो या संयुक्त सरकारों के कारण कुछ ही दलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है । संसद के अंतर्गत विरोधी दल की नीतिगत घोषणाएं भी उसके सत्तारूढ़ होने पर लोगों की नीतिगत आकांक्षाएँ बन जाती हैं ।

उदाहरण के लिए जब कोई विरोधी दल कहता है कि वह रोजगार की तलाश में आने वाले बंगलादेशी लोगों की घुसपैठ पर रोक लगाएगा तो उससे अपेक्षा रहती है कि सरकार में आने पर वह अपना वचन पूरा       करे । किंतु राजनीतिक दल अपने महत्त्वपूर्ण वायदों को पूरा नहीं करता और उसकी जल्दी ही विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है ।

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सौम्यवादी सरकारों वाले देशों पर यह बात लागू नहीं होती क्योंकि अकेली कम्यूनिस्ट पार्टी ही विदेश नीति तय करती है । भारत की तरह जहाँ बहुत सारे राजनीतिक वल हैं, वहाँ उनका प्रभाव सरकार के साथ उसकी निकटता पर आधारित होता है ।

स्वतंत्रता से पहले विशेषकर 1930 के दशक से ही राजनीतिक दलों का अस्तित्व रहा है, परंतु उपनिवेशवादी इंग्लैंड का ही भारत की विदेश नीति पर नियंत्रण था, इसलिए विदेश नीति का निर्धारण तो दूर उसे प्रभावित करने में भी भारतीयों द्वारा गठित राजनीतिक दलों का कोई योगदान नहीं था ।

परंतु इन दलों ने अपने उद्देश्यों के अनुरूप भारत के विदेशी संबंधों के व्यापक मानदंडों के निर्धारण को प्रभावित किया । यह भी कहा जा सकता है कि उन्होंने सत्ता केंद्र की बजाय दबाव समूह के रूप में काम किया ।

यही कारण है कि कांग्रेस ने अंतर्राष्ट्रीय मामलों में लोकतंत्र-समर्थक रवैया अपनाया जबकि समाजवादी दल समाजवाद के पक्ष में रहे । परंतु हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग जैसी संकीर्णतावादी पार्टियाँ केवल हिंदुओं और मुसलमानों के हितों की बात करती रहीं ।

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कम्यूनिस्टों ने साम्यवाद-समर्थक रुख अपनाया । इस सबके बावजूद ये दल साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद के खिलाफ रहे और उन्होंने एशिया पर यूरोपीय नियंत्रण और दक्षिण एशिया में ब्रिटिश नीति का विरोध किया । कांग्रेस ने सत्ता के प्रारंभिक वर्षों में साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद तथा नस्लवाद के विरोध पर बल दिया ।

कांग्रेस की विदेश नीति का उद्देश्य वही है जिनका जिक्र कांग्रेस कार्यकारिणी के 1948 के अधिवेशन में किया गया था । स्वतंत्र भारत की विदेश नीति उन्हीं सिद्धांतों पर आधारित बनी जिन पर कांग्रेस पिछले वर्षों में अमल करती रही थी ।

ये सिद्धांत हैं-विश्व शांति को बढ़ावा सभी देशों की स्वतंत्रता नस्ल संबंधी समानता और साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का उन्मूलन । कांग्रेस विशेष रूप से एशिया और अफ्रीका के उन देशों की आजादी के पक्ष में थी जो कई पीढ़ियों से तरह-तरह के उपनिवेशवाद का बोझ झेल रहे थे ।

भारत की विदेश नीति का यह सतत् उद्देश्य होना चाहिए कि सभी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण और सहयोगात्मक संबंध बनाए जाएं देश सैनिक गुटों तथा इसी तरह के अन्य ऐसे गठबंधनों के चंगुल मैं न फँसे जो विश्व को प्रतिद्वंद्वी गुटों में बाँटकर विश्व शांति के लिए खतरे पैदा करते हैं ।

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विदेशी मामलों तथा देश के आर्थिक विकास में कार्य करने की स्वतंत्रता कायम रखते हुए भारत को संयुक्त राष्ट्र के सदस्य के रूप में शांति और स्वतंत्रता बनाए रखने में अन्य देशों से सहयोग करने का काम जारी रखना चाहिए । 1980 के दशक तक कांग्रेस की विदेश नीति इन्हीं सिद्धांतों से निर्देशित होती रही ।

भारत की विदेश नीति की नींव देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने डाली । उनका मूल सिद्धांत था: गुटनिरपेक्षता, यानी एक नवोदित राष्ट्र के रूप में भारत सोवियत संघ तथा अमेरिका के नेतृत्व वाले किसी भी गुट में शामिल नहीं होगा । कांग्रेस पार्टी गुटनिरपेक्षता की मुखर प्रवक्ता बन गई ।

अन्य अधिकतर पार्टियाँ इस नीति में मामूली मीन-मेख निकालती थीं या उसके अमल की आलोचना ही कर पाती थीं । केंद्र में बनी पहली गैर-कांग्रेस सरकार 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी सरकार थी । विपक्ष में रहते हुए देसाई गुटनिरपेक्षता की नीति के हमेशा आलोचक रहे ।

परंतु जनता पार्टी सरकार अपनी विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता से पहले ‘वास्तविक’ (genuine) शब्द जोड़ने से अधिक कोई परिवर्तन नहीं कर पाई और वह कांग्रेस द्वारा निर्धारित विदेश नीति का ही पालन करती रही । परंतु समय बीतने के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी अपने अधिवेशनों में गुटनिरपेक्षता की नीति में अपनी आस्था व्यक्त करती रही ।

1991 में सोवियत गुट के बिखर जाने के बाद गुटनिरपेक्षता की नीति पर प्रश्नचिह्न लगने लगा । 1993 में तिरुपति अधिवेशन मे कांग्रेस ने गुटनिरपेक्षता की नीति में अपना विश्वास दोहराया । तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने इसके समर्थन में जोरदार भाषण दिया ।

1996 के चुनाव के बाद सत्ता संभालने वाली संयुक्त मोर्चा सरकार ने भी गुटनिरपेक्षता की नीति के अनुसरण का संकल्प व्यक्त किया । परंतु 1998 में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में 12 दलों के गठबंधन की सरकार ने अपने एजेंडे में गुटनिरपेक्षता का उल्लेख नहीं किया ।

भारतीय जनता पार्टी और उसका पूर्ववर्ती रूप भारतीय जनसंघ इस बात के पक्षधर रहे हैं कि देश के पास राष्ट्रीय सुरक्षा के हथियार के रूप में परमाणु बम होना चाहिए । 1991 के अपने चुनाव घोषणा-पत्र में भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि यदि वह सत्ता में आई तो वह भारतीय सेनाओं को ‘परमाणु क्षमता’ प्रदान करेगी ।

1998 में वह 12 अन्य दलों के गठबंधन की मुख्य पार्टी के रूप में सत्ता में आई । गठबंधन ने शासन का राष्ट्रीय एजेंडा जारी किया । एजेंडे में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् गठित करने का वायदा किया गया । एजेंडे में कहा गया ‘यह परिषद् देश की अब तक की पहली सामरिक सुरक्षा समीक्षा करेगी ।’

उस समय तक बची एकमात्र महाशक्ति अमेरिका यह देखने के लिए गठबंधन की गतिविधियों की निगरानी करता रहा कि क्या भारत सरकार परमाणु परीक्षण करेगी । मई 1998 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किए और भारत को परमाणु-शस्त्र संपन्न घोषित कर दिया ।

इससे अमेरिका को गहरा धक्का लगा । अमेरिका शायद यह सोच रहा था कि भारत परमाणु हथियार बनाने से पहले सामरिक रक्षा समीक्षा करेगा परंतु भारत सरकार ने परमाणु बम के परीक्षण का निर्णय कोई अचानक ही नहीं ले लिया था ।

इस एजेंडे में कहा गया: ‘देश की सुरक्षा, क्षेत्रीय अखंडता और एकता को बनाए रखने के लिए हम सब तरह के उपाय करेंगे और सभी उपलब्ध विकल्पों का इस्तेमाल करेंगे । इस उद्देश्य के लिए हम परमाणु नीति का पुनर्मूल्यांकन करेंगे और परमाणु शस्त्र बनाने के विकल्प का उपयोग करेंगे ।’

राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्र:

राजनीतिक दल जिन मुख्य तरीकों से विदेश नीति के निर्धारण को प्रभावित करते हैं उनमें से एक है-चुनाव के समय जारी किए जाने वाले घोषणा-पत्र । सनकी लोगों का कहना है कि चुनाव घोषणा-पत्र रेलवे प्लेटफॉर्म की तरह है, जो रेलगाड़ी में चढ़ने के खास मकसद के लिए काम में लाया जाता है और बाद में सभी प्लेटफॉर्म को भूल जाते हैं ।

परंतु कई बार घोषणा-पत्र में उठाए गए मसले अपने पक्ष में लोकमत बनाने के आधार बन जाते हैं । 1980 में श्रीमती इंदिरा गाँधी सत्ता में आ गई । भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी इस बात पर जोर दिया था । संसद में पार्टी के सदस्य यह मामला उठाकर सरकार पर दबाव बनाने लगे जिसके फलस्वरूप श्रीमती गाँधी को जुलाई, 1980 में हैंग सैमेरिन सरकार को मान्यता देनी पड़ी ।

भारतीय जनता पार्टी ने 1998 में अपने चुनाव घोषणा-पत्र में नीति निर्धारण के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् गठित करने की बात कही । उस समय सभी बड़े दलों के चुनाव घोषणा-पत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् के गठन की चर्चा की गई थी ।

वास्तव में यह विचार 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाले जनता दल की ओर से सबसे पहले लाया गया था । बुद्धिजीवी तथा रक्षा विशेषज्ञ विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार से माँग करने लगे कि वह अपना वायदा पूरा करे ।

अक्तूबर 1990 में पहली बार विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राष्ट्रीय परिषद् का गठन किया । कांग्रेस ने भी इस बारे में वायदा किया परंतु 1991 से 1995 तक 5 वर्ष तक सत्ता में रहने के दौरान उसने इस पर अमल नहीं किया । 1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार सत्ता में आई परंतु उसने भी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् नहीं बनाई, हालाँकि उसने भी ऐसा करने का वायदा किया था ।

इसके बाद, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन सरकार बनी जिसने शासन के अपने राष्ट्रीय एजेंडे में देश को सैनिक आर्थिक और राजनीतिक खतरों का विश्लेषण करने और सरकार को लगातार परामर्श देने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् के गठन का वायदा किया ।

परिषद् का समर्थन करने वाले समूहों ने इसके गठन के लिए सरकार पर दबाव डाला । तब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय गठबंधन सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा की नीति कारगर ढंग से तैयार करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् का गठन किया ।

जनमत और राजनीतिक दल:

राजनीतिक दलों द्वारा निभाई जाने वाली एक और महत्वपूर्ण भूमिका है: किसी खास विदेश नीति के पक्ष में जनमत तैयार करना । उदाहरण के लिए भूतपूर्व राजनीतिक दल स्वतंत्र पार्टी, कांग्रेस (ओ) और जनसंघ तथा बाद में भारतीय जनता पार्टी इजराइल के साथ राजनयिक संबंध बढ़ाने के अग्रणी पक्षधरों में थे ।

कांग्रेस (ओ) के नेता और बाद में जनता पार्टी सरकार के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने इसी नीति को आगे बढ़ाने के लिए इजराइल के रक्षा मंत्री मोशे डायन के साथ छिपे तौर पर मुलाकात भी की थी । इसके बाद 1992 में कांग्रेस (आई) की नरसिम्हा राव सरकार ने इजराइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए ।

दूसरी ओर, विपक्षी दल अपने द्वारा समर्थित विदेश नीति के पक्ष में जनमत जुटाते हैं । मुस्लिम लीग और छोटी मुस्लिम पार्टियाँ इजराइल के साथ राजनयिक संबंध बढ़ाए जाने का जोरदार विरोध करती रही हैं क्योंकि वे पश्चिमी किनारा क्षेत्र में फिलीस्तीन प्रशासन तथा जनता के साथ लगातार टकराव करने के कारण इजराइल को इस्लाम-विरोधी मानती हैं ।

राजनीतिक दलों की मुख्य चिंता होती है सत्ता हासिल करना । वे विदेश-मामलों में अपनी सफलताओं को चुनाव प्रचार के दौरान उछालते हैं । परंतु कुछ अपवादों को छोड्‌कर विदेश नीति संबंधी मुद्दों पर कभी कोई पार्टी चुनाव नहीं जीतती या हारती ।

फिर भी सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के विशेष प्रकोष्ठ होते हैं जो विदेश मामलों से संबंधित मसलों का अध्ययन और अनुसंधान करते हैं, बैठकें बुलाते हैं और प्रचार-सामग्री तैयार करते हैं । इस प्रकार विदेश नीति के निर्धारण में राजनीतिक पार्टियों की भूमिका स्थाई रहती है ।

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