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National Security Council | India

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् को स्थापित करने की आवश्यकता । “Need of Establishment of National Security Council” in Hindi Language!

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् (National Security Council):

राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के निर्माण एवं इस प्रणाली को व्यवस्थित करने हेतु राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् के गठन की जरूरत पड़ी । जैसा कि किसी भी देश की वैदेशिक नीति अथवा राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी नीति सामान्यतया दो कमजोरियों के कारण अव्यवस्थित होती है ।

इन दोनों कमजोरियों में है: (1) काफी अधिक तदर्थता, (2) प्रभावी नीति समन्वय का अभाव । श्रीमती गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में श्री दिनेश सिंह, विदेश मंत्री थे । उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान विदेश नीति सकारात्मक रूप से भारतीय नीति निर्धारित करने के स्थान पर ज्यादातर अन्य लोगों को उत्तर देने में रही ।

इसके क्या कारण हैं, इसके लिए हमें दूर जाने की जरूरत नहीं है । नेहरू, श्रीमती गाँधी और राजीव गाँधी जैसे प्रधानमंत्रियों का यह मानना था कि संकट की प्रत्येक स्थिति में उत्तर दिया जाए । किंतु मंत्री प्रशिक्षित विदेश सेवा अधिकारियों की भाँति कभी भी विशेषज्ञ नहीं हो सकता । उसे मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों को पर्याप्त महत्त्व देंना चाहिए ।

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प्रधानमंत्री नेहरू का ऊँचा व्यक्तित्व था और उन्होंने अपने शासनकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी निर्णय अकेले ही लिया, ज्यादा से ज्यादा कभी-कभी विशिष्ट मुद्दे पर वे एक अथवा दो विश्वसनीय लोगों से परामर्श कर लेते थे । उन्होंने कभी भी पूर्णकालिक विदेश मंत्री नियुक्त नहीं किया ।

इसलिए उदाहरण के लिए उन्होंने 1950 के दशक में अपनी कैबिनेट के कुछ समय रहे रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन पर विश्वास किया । श्रीमती गाँधी को जब आवश्यक प्रतीत होता तो अपनी सरकार के कुछ विश्वसनीय लोगों से परामर्श करती थीं ।

हमेशा विदेश/राष्ट्रीय सुरक्षा नीति निर्माण की प्रणाली को व्यवस्थित किए जाने के बारे में कुछ हल्की आवाज में विचार सामने आते रहे हैं । प्रोफेसर के.पी. मिश्रा और के सुबह्मण्यम ने सबसे पहले राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् गठित करने का सुझाव दिया था ।

के.पी. मिश्रा ने विशेषज्ञ सलाहकार समिति की आवश्यकता और नीति नियोजन की भी आवश्यकता को रेखांकित किया । किंतु सुबह्मण्यम ने नीति चर्चा परिषद् के स्थान पर नीति निर्माण सचिवालय सृजित करने पर, जोर दिया । यह मुख्य रूप से इसलिए था क्योंकि सामूहिक नीति निर्माण के लिए कैबिनेट प्रणाली उपलब्ध कराई जाती है ।

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तब उस समय की राजनीतिक मामलों से संबंधित कैबिनेट समिति ने अमेरिका के विचार-विमर्शी निकाय की भाँति राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् पर विचार किया । किंतु जे बंद्योपाध्याय ने अपनी कृति मेकिंग ऑफ इंडियाज फॉरेन पॉलिसी में अमेरिकी मॉडल पर विदेश नीति परिषद् बनाने के पक्ष में विचार व्यक्त किए ।

किंतु, हम जब भी भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् की बात करेंगे तो हमें इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि हमारे कई कार्यपालक हैं और यहाँ सामूहिक नीति-निर्माण तंत्र पहले से ही मौजूद है । लेकिन, अनुभव से पता चलता है कि प्रधानमंत्री अगर ऐसा उचित समझे तो राजनीतिक मामलों से संबंधित कैबिनेट समिति (CCPA) की बैठकें आयोजित नहीं कर सकता ।

1991 के बाद नरसिम्हा राव को तरिक चुनौती का सामना करना पड़ा । उनके नेतृत्व को यह चुनौती तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने दी थी । 1993 के बाद, नरसिम्हा राव ने राजनीतिक मामलों से संबंधित कैबिनेट समिति की कोई बैठक नहीं बुलाई क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उस बैठक में अर्जुन सिंह आएँ ।

इसलिए नरसिम्हा राव के कार्यकाल के दौरान कोई संस्थागत और व्यवस्थित चर्चा नहीं हुई । इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् संसद के अधिनियम द्वारा बनाई गई, न कि कार्यकारिणी आदेश के द्वारा सृजित की गई ।

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लोगों की भारी माँग और विशेष तौर पर सभी राजनीतिक दल भारत में नीति निर्माण के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् स्थापित करने के पक्ष में थे । अंतत: वाजपेयी सरकार ने 1998 में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् की स्थापना की ।

प्रधानमंत्री इस परिषद् के अध्यक्ष तथा विदेश रक्षा, गृह और वित्त मंत्रीय एवं योजना आयोग के उपाध्यक्ष इस परिषद् के सदस्य हैं । इस परिषद् में रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकर रक्षा के क्षेत्र में नामित विशेषज्ञ विदेश सेवा के कुछ सेवानिवृत अधिकारी, शिक्षाविद्, वरिष्ठ नौकरशाह और सेना प्रमुख जैसे कुछ विशेषज्ञ भी शामिल हैं ।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् के लिए सचिवालय की आवश्यकता है, किंतु सरकार ने संयुक्त आसूचना समिति (Joint Intelligence Committee) को परिषद् के सचिवालय के रूप में द्विगुणित किया है । वैसे, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् की सफलता के लिए ऐसे अधिकारी की आवश्यकता है जो नीति निर्धारण में प्रधानमंत्री की सलाह से सभी संबद्ध पक्षों में समन्वय कर सके ।

वर्तमान योजना में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में काम कर रहे हैं । योजना में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड भी उपलब्ध है । 1998 में जब इस बोर्ड का गठन किया गया था तब इसके 27 सदस्य थे ।

इनमें शिक्षाविद्, पत्रकार, रक्षा विश्लेषक और आम लोगों में विशिष्ट पहचान बनाए हुए व्यक्ति शामिल थे । बोर्ड का गठन करने वालों ने के सुबह्मण्यम, जे.एन. दीक्षित और कई अन्य जाने-गिने लोग शामिल थे । राष्ट्रीय सुरक्षा यरिषद् की अध्यक्षता प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री ब्रजेश मिश्र हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष थे: श्री के. सुबह्नण्यम ।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड को परमाणु सिद्धांत का मसौदा तैयार करने का पहला काम सौंपा गया था । जब अगस्त 1999 में परमाणु सिद्धांत के विवरण की घोषणा की गई थी तब यह काम पूरा हुआ था । इस प्रकार बनाई गई राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् अनिच्छा से बनाई गई प्रतीत हाती है और साथ ही यह भी प्रतीत होता है कि सरकार इसका पर्याप्त इस्तेमाल नहीं कर रही है ।

जैसे फिजी द्वीप समूह में भारतीय मूल के प्रधानमंत्री को अपदस्थ कर सैनिक शासन परिवर्तन कर दिया गया या फिर श्रीलंका की जातीय समस्या को देखा जा सकता है, जिसके समाधान के लिए श्रीलंका सरकार ने सैनिक हल निकालने की कोशिश की । किंतु इन समस्याओं पर सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति (CCS) ने विचार किया ।

एक अन्य अवसर पर जम्मू और कश्मीर में चुनाव के बाद के परिदृश्य पर विचार करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् अक्तूबर 2002 में बुलाई गई । राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् के कार्यों का विवेचन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है:

(1) राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् की कार्यकारिणी आदेश के स्थान पर संसद के नियम से इस आधार पर स्थापना की गई थी कि परिषद् के बने रहने की पर्याप्त गारंटी रहे । विदेश और राष्ट्रीय सुरक्षा नीति निर्धारित करने के लिए मिलने वाली राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति नरसिम्हा राव के शासनकाल के दौरान 1993 से तीन सालों तक नहीं मिली थी क्योंकि श्री राव नहीं चाहते थे कि तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह इस समिति की बैठक में शामिल हों ।

हालाँकि, यह सही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् की वैधानिक तरीके से स्थापना हुई है, फिर भी यदि प्रधानमंत्री इसकी बैठक नहीं करना चाहते तो इसकी बैठक नहीं बुलाई जा सकती । किंतु ऐसी स्थिति में यदि कोई प्रधानमंत्री के इस दृष्टिकोण से प्रभावित है तो वह इसके विरुद्ध लोगों की राय बना सकता है ।

(2) राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् स्वयं में एक सलाहकार बोर्ड है । तो प्रश्न यह उठता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (NSAB) में सरकार द्वारा नियुक्त अधिकांश सेवानिवृत अधिकारी हैं जो केंद्र सरकार में कार्यरत थे और नई दिल्ली में रहते हैं ।

कारगिल समिति यह अध्ययन करने के लिए नियुक्त की गई कि कारगिल समस्या में क्या गलत हुआ और समिति को यह सुझाव भी देना था कि निर्णयन में किस प्रकार सुधार किया जाए । समिति ने यह सुझाव दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् के कार्य को सरल और कारगर बनाया जाए ।

(3) राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् में पूर्णकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अथवा निदेशक आदि की आवश्यकता है । प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव का काम स्वयं में पूर्णकालिक काम है । जैसा कि पूर्व-प्रधानमंत्री श्री इंद्रकुमार गुजराल का कहना है कि “प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के पास बहुत अधिक काम होता है ।”

इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों पर गंभीरता से समन्वयन करने के लिए उसके पास सोचने का समय ही नहीं होता । कारगिल समिति ने भी स्वतंत्र राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त करने की सिफारिश की       थी ।

(4) राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (NSAB) में ज्यादातर नई दिल्ली में रहने वाले विदेश सेवा के सेवानिवृत अधिकारी और सैनिक अधिकारी हैं जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रादेशिक पक्ष भी है । नई दिल्ली में रहने वाले सदस्य को नीति की प्रादेशिक संवेदनशीलता का यह बोध नहीं हो सकता कि इससे क्षेत्र के लोगों पर क्या प्रभाव पड़ेगा ।

उदाहरण के लिए, यदि श्रीलंका में जातीय समस्या पर भारत की नीति पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड में विचार किया जाता है तो बेहतर यह होगा कि इस चर्चा में क्षेत्र की संवेदनशीलता पर गंभीर विचार करने के लिए कोई प्रतिनिधि अवश्य हो । यदि कोई व्यक्ति उस क्षेत्र से संबंधित हो किंतु अगर दिल्ली में रहता हो तो संकट की स्थिति में अपने मत को व्यक्त करने के लिए वह दूसरा विकल्प होगा ।

(5) नीति निर्धारण में सफल सिद्ध होने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् का अपना स्वतंत्र सचिवालय होना चाहिए । संयुक्त आसूचना समिति (JIC) इस कार्य को पूरा नहीं कर सकती । एक बात यह भी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा नीति केवल समन्वित आसूचना नहीं है यह इससे बढ़कर है ।

जैसा कि पूर्व-अध्यक्षों ने संयुक्त आसूचना समिति की बैठकों में कहा है कि विभिन्न आसूचना एजेंसियों के निदेशक प्राप्त कच्ची गुप्त जानकारियों के बारे में बताना नहीं चाहते । वे केवल उच्चतम नीति निर्माताओं को ये जानकारियाँ देने के इच्छुक होते हैं । ऐसी स्थिति में रक्षा विदेश गृह आदि विभिन्न मंत्रालयों की जानकारियों को जिस तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के साथ समन्वित करने की आवश्यकता होती है वह समन्वयन नहीं किया जा सकता ।

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