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Nehru and India’s Foreign Policy | Hindi

भारत की विदेश नीति में नेहरू  का योगदान । “Nehru and India’s Foreign Policy” in Hindi Language!

भारतीय विदेश नीति में नेहरू का योगदान:

सरकार, संस्थाओं और सामाजिक-राजनीतिक स्तर के नेताओं के बीच गहन अंत क्रिया के बाद vअंतत: भारतीय विदेश नीति निर्मित हुई । जवांहरलाल नेहरू को भारतीय विदेश नीति का सूत्रधार कहा जा सकता है ।

वे न केवल स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और 17 वर्ष तक विदेश मंत्री रहे, वरन् उससे पूर्व भी लगभग 25 वर्षों से अखिल भारतीय कांग्रेस के विदेशी मामलों के प्रमुख प्रवक्ता भी थे । वे अंतर्राष्ट्रीयता और अखिल एशियावाद के समर्थक थे ।

वे साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और फासीवाद के विरोधी थे, वे चाहते थे कि सभी अंतर्राष्ट्रीय विवादों को, जहाँ ‘तक हो सके शांतिपूर्ण उपायों से सुलझाया जाए, यद्यपि वे साम्राज्यवादी और फासीवादी आक्रमणों को रोकने के लिए शक्ति के प्रयोग को भी अनुचित नहीं मानते थे ।

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वे सोवियत संघ और चीन के प्रति विशेष रूप से सहानुभूति रखते थे, क्योंकि उनका विश्वास था कि ये देश साम्राज्यवाद के शत्रु हैं । महाशक्तियों के संघर्ष में वे भारत के लिए तटस्थता और समानता की नीति के प्रबल प्रतिपादक थे । नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ प्रथम विदेश मंत्री भी थे ।

सरकार और पार्टी में उनके साथियों ने विदेश नीति के निर्माण और संचालन का दायित्व उनके ही कंधों पर डालना ठीक समझा क्योंकि स्वतंत्रता से पूर्व भी नेहरू कांग्रेस तथा शेष विश्व के बीच कड़ी का कार्य कर रहे थे ।

नेहरू की जीवनी के अंतर्गत लेखक माइकेल ब्रेशर ने लिखा है कि नेहरू विश्व के सामने अपने देश की आवाज थे वे शेष दुनिया के साथ अपने देश की नीति के दार्शनिक तथा निर्माता थे । अन्य किसी देश में कोई व्यक्ति विदेश नीति के निर्माण में इतनी प्रभावक भूमिका अदा नहीं करता जितनी नेहरू भारत में करते हैं ।

श्री जवाहरलाल नेहरू के बहुमुखी और जटिल व्यक्तित्व का भारतीय विदेश नीति पर प्रभाव पड़ा है । श्री नेहरू ने भारत की विदेश नीति की न केवल नींव डाली अपितु 1964 तक उसका सफल संचालन भी किया । अंतरिम सरकार के प्रधान के रूप में सितम्बर 1946 में भाषण करते हुए उन्होंने स्वतंत्र भारत की विदेश नीति को सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने का यत्न किया ।

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नेहरू ने इस महत्त्वपूर्ण घोषणा में कहा था कि अब भारत अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में निजी नीति के साथ हिस्सा लेगा, किसी और देश के रूप में नहीं । भारत शक्ति-संघर्ष में फँसने की इच्छा नहीं रखता पर शक्ति-संघर्ष के यथार्थ के प्रति अंधा नहीं है । ‘नेहरू युग’ में भारतीय विदेश नीति के कतिपय महत्वपूर्ण पहलू इस प्रकार हैं:

(1) महाशक्ति का सपना:

नेहरू भारत को एक महान् भविष्य अथवा महान् स्थिति का राष्ट्र मानते थे । उन्हें विदित था कि एशिया के मानचित्र पर भारत जिस प्रकार व्यवस्थित है उसमें उसकी स्थिति शक्ति एवं प्रभाव क्षमता स्वयंसिद्ध है । वह एक बहुत बड़ी राजनीतिक इकाई है ।

दक्षिण, पश्चिम और दक्षिण एशिया के देशों की स्थिति के प्रसंग में भारत की भूमिका इतनी केंद्रीय है कि यदि वह स्वयं इसे न भी स्वीकार करे तो भी इस भूमिका के प्रति उदासीन नहीं रह सकता । उनका अनुमान था कि यदि भविष्य में झाँककर देखा जाए और यदि कोई बड़ा संकट नहीं आता है तो भारत अमेरिका सोवियत संघ और चीन के बाद स्पष्टत चौथी महाशक्ति है ।

(2) पंचशील:

नेहरू ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में ‘पंचशील’ के सिद्धांत का प्रतिपादन किया और इस कारण उन्हें आदर्शवादी कहा जाता था किंतु वस्तुत: यह उनकी यथार्थवादी कूटनीतिक चाल थी । वे चीन को ‘पंचशील’ सिद्धांतों में उलझाए रखना चाहते थे ताकि कोई बड़ा संघर्ष टाला जा सके । तिब्बत के प्रश्न पर हमने जो कुछ भी किया उसे एक निजी मजबूरी कहा जा सकता है । हमारे सामने सभी विकल्प द्वार बंद हो चुके थे ।

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हिमालय का प्रांगण रणनीति की दृष्टि से उपयुक्त नहीं था । ब्रिटेन ने एक समुद्री शक्ति होने के कारण कोई विशेष उत्साहप्रद समर्थन नहीं दिया । फिर देश के विकास की आंतरिक प्रगति इतनी धीमी थी कि कोई भी व्यवहार-कुशल प्रधानमंत्री ऐसे आदर्शवादी निर्णय कैसे ले सकता था जिससे राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा होती थी ।

(3) भारत और राष्ट्रमंडल:

नेहरू ने विदेश नीति के क्षेत्र में यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया कि भारत राष्ट्रमंडल का सदस्य बना रहेगा । पंडित नेहरू ने कहा कि “वर्तमान विश्व में जबकि अनेक विध्वंसकारी शक्तियाँ सक्रिय हैं और हम प्राय: युद्ध के कगार पर खड़े हैं, मैं सोचता हूँ कि किसी समुदाय से संबंध-विच्छेद करना अच्छी बात नहीं है ।

राष्ट्रमंडल की सदस्यता भारत के और संपूर्ण विश्व के लिए लाभदायक है । इससे भारत को लक्ष्यों की प्राप्ति में सहयोग मिलेगा ।” जिस समय नेहरू ने राष्ट्रमंडल में बने रहने का फैसला किया उस समय उनके सामने अन्य उद्देश्यों के साथ शायद यह उद्देश्य भी रहा होगा कि इस मंच के द्वारा भारत नवोदित अफ्रीका और एशियाई देशों का सरगना बन सकता है ।

नेहरू यह जानते थे कि आर्थिक दृष्टि से भारत का अधिकांश व्यापार ब्रिटेन और राष्ट्रमंडल के देशों पर निर्भर है । इस हालत में एकाएक राष्ट्रमंडल से संबंध-विच्छेद कर लेने में कठिनाई थी । सैनिक दृष्टि से भी भारत पूर्णतया ब्रिटेन पर आश्रित था । अपनी विस्तृत समुद्र तटीय सीमा की रक्षा के लिए भारत ब्रिटेन की नौ-सेना पर आश्रित था । भारत का पूरा सैनिक संगठन ब्रिटिश पद्धति पर आधारित था और नौ-सैनिक आयुधों के लिए वह ब्रिटेन का मोहताज था ।


(4) असंलग्नता:

यद्यपि पंडित नेहरू ने यह कहा था कि असंलग्नता को ‘नेहरू नीति’ नहीं कहा जा सकता तथापि माइकेल ब्रेशर जैसे विद्वान यह मानते हैं कि असंलग्नता के सिद्धांत का निर्माण और क्रियान्वयन यथार्थ में नेहरू की बहुत बड़ी देन है । नेहरू ने ही विश्व को असंलग्नता का संदेश दिया है ।

नेहरू ने भारत के लिए जिस विदेश नीति का प्रतिपादन किया उससे देश की प्रतिष्ठा में अपार वृद्धि हुई । एशिया और अफ्रीका में बहुत से लोग नेहरू और उनकी सरकार को शोषित मानवता का प्रवक्ता मानते थे और राजनीतिक पराधीनता एवं उपनिवेशवाद के विरुद्ध जारी संघर्ष में उनसे नैतिक और भौतिक समर्थन की अपेक्षा करते थे ।

अंतरिम सरकार की स्थापना के कुछ समय पश्चात् 7 दिसम्बर, 1946 को आकाशवाणी से प्रसारित अपनी प्रथम शासकीय घोषणा में नेहरू ने कहा: हम अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपनी मौलिक नीति के अनुसार भाग लेंगे, अन्य राष्ट्रों के उपग्रह के रूप में नहीं ।

हमारा विचार यथासंभव गुटों की सत्ता की राजनीति से अलग रहने का है । एक-दूसरे के विरुद्ध संगठित इन गुटों ने अतीत में भी विश्व-युद्ध करवाए हैं और भविष्य में भी ये संसार को भयंकर विनाश की ओर ले जा सकते हैं ।

नेहरू के अनुसार गुटनिरपेक्षता का अर्थ ‘तटस्थता’ नहीं था । यह एक सकारात्मक विदेश नीति थी जिसका अर्थ था: शक्तिमूलक राजनीति से पृथक् रहना तथा सभी राज्यों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और सक्रिय अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, चाहे वे राष्ट्र गुटबद्ध हो या गुटनिरपेक्ष हो ।

नेहरू के शब्दों में “किसी एक शक्ति के साथ गुटबद्ध हो जाने का मतलब यह है कि हम अपना मत त्याग रहे हैं, उस नीति को भी छोड़ रहे हैं जिसका हम साधारणत: अनुसरण करते ।” उन्होंने कहा कि “संयुक्त राष्ट्र सघ में भारतीय प्रतिनिधियों को सरकार के अनुदेश ये थे कि वे प्रत्येक प्रश्न पर पहले भारत के हित की दृष्टि से विचार करें, और फिर उचित-अनुचित के आधार पर सोचें-विचारें, अर्थात् यदि भारत उससे प्रभावित न होता हो तो वे स्वभावत: उचित-अनुचित के पक्ष पर विचार करें केवल यह न सोचें कि उन्हें इस या उस शक्तिशाली राष्ट्र को प्रसन्न करने के लिए कुछ करन है या वोट देना है ।”

(5) भारत-चीन युद्ध:

जब भारत-चीन युद्ध शुरू हुआ तो देश के कई भागों में इस बात की माँग होने लगी कि असंलग्नता की नीति पूर्णतया असफल हो चुकी है और देश के हित में इसका जल्द-से-जल्द परित्याग होनार चाहिए ।

परंतु 20 अक्तूबर, 1962 को रेडियो से राष्ट्र के नाम संदेश देते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अपनी असंलग्नता की नीति का अनुसरण करता रहेगा । इसके बाद चीन तथा भारत का युद्ध जारी रहा तथा नेफा में भारतीय सेना की पराजय हुई ।

युद्ध की स्थिति अत्यंत गभीर हो गई और भारत की सुरक्षा अत्यधिक खतरे में पड़ गई । इस हालत में भारत सरकार ने पश्चिमी राष्ट्रों से सैनिक सहायता के लिए अपील की । अमेरिका और ब्रिटेन ने भारत को सहायता देने का निर्णय किया और इन देशों से बड़ी मात्रा में शस्त्रास्त्र भारत पहुँचाए गए ।

नेहरू मानते थे कि असंलग्नता की नीति को छोड्‌कर अमेरिकी गुट में शामिल हो जाने के फलस्वरूप भारत-चीन सीमा संघर्ष शीत-युद्ध का एक अंग बन जाता । नेहरू ने व्यवहारवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए निर्णय लिया कि भारत अपनी रक्षा के लिए सभी मित्र-राष्ट्रों से सहायता लेगा, लेकिन असंलग्नता की नीति का परित्याग नहीं करेगा ।

(6) गोआ पर अधिकार:

पंडित नेहरू के जीवनकाल में गोआ के प्रश्न पर भारत ने शक्ति का प्रयोग किया और पुर्तगाली अत्याचारों से गोआ को मुक्ति दिलाई । संक्षेप में, नेहरू की विदेश नीति की दो विशेषताएँ हैं: (क) विश्व-शांति की स्थापना के लिए प्रयत्न करना, और (ख) अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भारत के स्वतंत्र दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करना ।

(7) अफ्रेशियाई एकता:

नेहरू एशिया और अफ्रीका के नव-स्वतंत्र राष्ट्रों की एकता के प्रबल समर्थक थे । एशियाई राष्ट्रों की एकता बनाए रखने के लिए उनकी पहल पर मार्च 1947 में नई दिल्ली में एक एशियाई सम्मेलन का आयोजन किया गया ।

दूसरा सम्मेलन इंडोनेशिया के प्रश्न पर जनवरी 1949 में दिल्ली में आयोजित किया गया । नेहरू जी ने 1955 के बाण्डुंग सम्मेलन में भाग लिया और वे चाहते थे कि इस सम्मेलन के द्वारा एशियाई देशों के बीच सहयोग और मित्रता की भावना को और मजबूत किया जाए ।

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