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Role of PMO in Determining the India’s Foreign Policy

भारत की विदेश नीति के निर्धारण में प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिकाओं ।  “Role of PMO in Determining the India’s Foreign Policy” in Hindi Language!

विदेश नीति निर्माण में प्रधानमंत्री का बढता प्रभाव:

विदेश नीति निर्माण में प्रधानमंत्री की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है । भारत में स्वतंत्रता के बाद संसदात्मक लोकतांत्रिक प्रणाली अपनाई जाती है । लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत प्रधानमंत्री संसद के बहुमत दल का नेता होता है तो वह कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान भी होता है ।

इसी कारण से प्रधानमंत्री का कार्यालय विदेश नीति के निर्माण, निर्णय और संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । यह बात भी निश्चित है कि इन सारे कार्यों का सम्पादन प्रधानमंत्री का कार्यालय स्वयं अकेला नहीं कर लेता ।

सामान्यतया वैसे ही मामले प्रधानमंत्री के कार्यालय में महत्त्वपूर्ण रूप से निपटाए जाते हैं जिनका संबंध भारत की सुरक्षा, विदेश नीति के लक्ष्यों भारत के आर्थिक विकास आदि से होता है । प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू वैदेशिक मामले में बहुत ही दक्ष एवं वैदेशिक व्यवहारों से पूर्ण रूप से परिचित थे ।

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इसलिए विदेश विभाग को वे अपने ही अधीन रखते थे और अपने कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों से परामर्श लेकर अपनी वैदेशिक नीति का संचालन स्वयं करते थे, जिसके कारण उनके काल में प्रधानमंत्री का कार्यालय वैदेशिक नीतियों के निर्माण, निर्धारण एवं संचालन का केंद्रबिंदु बन गया ।

तब से प्रधानमंत्री का कार्यालय विदेश नीति के  संबंध में अग्रणी भूमिका निभाता रहा है । नेहरू जी की मृत्यु के बाद जब लालबहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने प्रधानमंत्री के सचिवालय का निर्माण किया ।

इसके अंतर्गत वे अपने समस्त कार्यों का संचालन करते थे, परंतु शास्त्री जी विदेश नीति के मामले में नेहरू की भाँति सक्षम, अनुभवी एवं पूर्ण योग्य नहीं थे । इसलिए उन्होंने सर्वप्रथम पूर्णकालिक विदेश मंत्री को नियुक्त किया परतु विदेश नीति के संबंध में उन्होंने अपने कार्यालय के पदाधिकारियों से व्यापक रूप में विचार-विमर्श करके भारत की विदेश नीति का संचालन किया ।

वे अपने काल के वरिष्ठ लोकसेवक एल.के.झा की योग्यता एवं अनुभव का अपनी विदेश नीति के संचालन में सहयोग लेते रहे । इसलिए उनके समय में भी प्रधानमंत्री का कार्यालय विदेश नीति के निर्माण निर्धारण एवं संचालन का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है ।

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लाल बहादुर शास्त्री के बाद जब श्रीमती इंदिरा गाँधी भारत की प्रधानमंत्री बनीं तो उनके समय मे भी प्रधानमंत्री का कार्यालय विदेश नीति के निर्माण एवं संचालन का केंद्रबिंदु रहा । श्रीमती इंदिरा गाँधी विदेश क्षेत्र में पूर्णरूपेण अनुभवी और कार्यों के सम्पादन में दृढ़ निश्चयी तथा गतिशील थीं ।

1967-70 तक तो उन्होंने विदेश विभाग अपने हाथ में ही रखा और विदेश विभाग का संचालन स्वयं करती रही । उसके बाद उन्होंने पूर्णकालिक विदेशमंत्री की नियुक्ति की फिर भी विदेश विभाग पर अपनी विशेष निगरानी रखती थीं । 1971 में जब उन्होंने सोवियत रूस के साथ मैत्री संधि की तो यह संधि उन्हीं के व्यक्तिगत पहल का परिणाम था ।

1971 में बंगलादेश की उत्पत्ति के लिए जब पोकिस्तान के साथ युद्ध हुआ तो उस युद्ध के विषय में विदेशी महाशक्तियों से बातचीत युद्ध की योजना तथा सैनिक कार्यवाही आदि के संबंध में उन्होने अपना व्यक्तिगत निर्णय लिया और उसी के आधार पर वैदेशिक नीति का संचालन किया ।

युद्ध के बाद शिमला समझौता में भी श्रीमती इंदिरा गाँधी के व्यक्तिगत विवेक और अनुभव का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा, क्योंकि समझौते से संबंधित बातचीत और समझौते के प्रारूप का निर्माण श्रीमती गाँधी के संकेत के आधार पर ही किया गया ।

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वे अपने प्रधानमंत्रित्व काल में अपने सचिवालय के प्रमुख अधिकारियों पी.एन हक्सर एवं डी.पी. धर से विचार-विमर्श करती थीं क्योंकि ये लोग ही उनके विश्वसनीय व्यक्ति थे । इन गतिविधियों से स्पष्ट होता है कि प्रधानमंत्री का कार्यालय श्रीमती गाँधी के समय में भी विदेश नीति के संचालन का केंद्र स्थल रहा ।

श्रीमती गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव गाँधी, वी.पी. सिंह और नरसिम्हा राव के समय में भी प्रधानमंत्री कार्यालय विदेश नीति के निर्माण एवं संचालन में महत्त्वपूर्ण योगदान देता रहा । जब नरसिम्हा राव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो उनके समय में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव बृजेश मिश्र की भूमिका विदेश नीति के संदर्भ में महत्चपूर्ण रही और प्रधानमंत्री का कार्यालय भी विदेश नीति के संचालन का मुख्य स्थल रहा ।

प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतर्गत एक मुख्य सचिव, अनेक संयुक्त सचिव तथा उपसचिव आदि होते हैं । इन लोगों के अतिरिक्त अन्य पदाधिकारी भी होते हैं, जो विविध कार्यों का सम्पादन अलग-अलग रूप में करते हैं ।

वर्णित तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संसदात्मक लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत प्रधानमंत्री कार्यालय वास्तविक कार्यपालिका के रूप में आतरिक और विदेश नीति के संचालन का हृदय स्थल होता है । इसलिए विदेश नीति के संचालन में प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण और व्यावहारिक होती है ।

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