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My Favorite Book in Hindi Language

मेरी प्रिय पुस्तक । Article on My Favorite Book in Hindi Language!

संसार में अनगिनत पुस्तकें हैं सभी को पढ़ना एक दुसाध्य कार्य हैं किन्तु वह सभी पुस्तकें जो मैंने अब तक पढ़ी हैं उनमें मुझे ‘महाभारत’ सबसे अधिक पसन्द आयी ।  ‘महाभारत’ एक गहन महत्त्वपूर्ण महाकाव्य है एवं भारतीय साहित्य क्षेत्र में इसका एक विशेष स्थान है । यह मूलता महर्षि वेद व्यास द्वारा सस्कृत में रचित एक काव्य रचना है ।

भारतीय साहित्य के कोष में महाभारत का विशेष योगदान है । इसमें महान आदर्शों एवं सिद्धान्तों का सामजस्य है । इसने बहुत से लोगों को प्रभावित किया । इसका कथन बहुत रुचिकर एवं शिक्षाप्रद है ।  इसमें भारत के दुर्दान्त दिनों का चित्र प्रतिबिम्बित है । इसकी विषय वस्तु कुछ इस तरह है । पांडु एवं धृतराष्ट्र दो राजकुमार थे ।

उनकी राजधानी हस्तिनापुर थी । धृतराष्ट्र जन्मान्ध थे वह भाइयों में बड़े थे ।  पांडु राजा बने किन्तु एक साधु के अभिशाप के कारण मृत्यु को प्राप्त हुये । पाडु की मृत्यु के पश्चात् धृतराष्ट्र उसके पुत्रों के अभिभावक बने । दुर्योधन एवं दुशासन दोनों कुप्रवृत्ति के थे उन्हें कौरव कहा जाता था ।

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अर्जुन, नकुल, सहदेव, भीम एवं युधिष्ठर यह पाँचों पाडु के पुत्र थे एवं हर क्षेत्र में कौरवों से बेहतर माने जाते थे । इस तरह कौरवों एवं पांडवों में आपस में द्वेष फैल गया । कौरवों ने पांडवों को मारने की पूरी कोशिश की किन्तु पांडव अपनी बुद्धिमानी एवं वीरता के कारण बचते रहे ।

कुटिल शकुनि मामा के द्वारा प्रेरित होकर दुर्योधन एवं उसके भाइयों ने एक योजना बनायी । युधिष्ठर एवं उसे भाइयों को जुआ खेलने के लिये आमन्त्रित किया गया । हारने वाले के लिये एक अनर्थकारी घात का नियोजन किया गया । इसके अनुसार हारने वाले को बारह वर्ष के वनवास एवं अन्तिम एक वर्ष के लिये अज्ञातवास पर जाना होगा ।

अगर इस अज्ञातवास में उन्हें पहचान लिया गया तो उन्हें पुन: बारह वर्ष बनवास पर जाना होगा । युधिष्ठर इस योजना से सहमत हो गया । किन्तु शकुनि की कुटिल चालों के अधीन वह हार गया ।  और उसे अपनी पत्नी द्रोपदी एवं चारों भाइयों के साथ वन में जाना पड़ा ।

वनवास के समाप्त होने पर उन्होंने दुर्योधन से पाँच  गांव भूमि की माग की किन्तु उसने सुई के बराबर भूमि देने से भी इंकार कर दिया । पांडवों को युद्ध द्वारा भूमि प्राप्त करने को कहा गया । पांडवों एवं कौरवों के मध्य युद्ध छिड़ गया । जहाँ पांडव अपने सचरित्र एवं पवित्रता के लिये प्रसिद्ध थे वहीं अर्जुन एवं भीम की वीरता एवं शौर्य के कारण भी ।

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कृष्ण भगवान उनके-सारथी बने ।  कौरवों एवं पांडवों के मध्य युद्ध कुरुक्षेत्र में अठारह दिन तक लड़ा गया । महान राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ एवं सोलह कला सम्पूर्ण कृष्ण के नेतृत्व में पांडवों ने युद्ध में विजय प्राप्त की । युधिष्टर हस्तिनापुर के सम्राट बने ।  किन्तु युद्ध के कारण फैले विषाद एवं विध्वंस के कारण उन्हें वैराग्य हो गया ।

वह अपनी पत्नी एवं भाईयों के साथ हिमालय पर जाने लगे किन्तु युधिष्ठर के अतिरिक्त सभी को प्राणों से हाथ धोना पड़ा । युधिष्ठर एवं अनका धर्म स्वर्ग तक पहुँचने में सफल हुये । पूर्ण कथा में मानव आदर्शों एवं विपथर्य का लेखा-जोखा है । बुराई पर अच्छाई की विजय का विवरण है ।

भगवान कृष्ण का नेतृत्व एवं अर्जुन को दिया गया उनका उपदेश ‘गीता’ के रूप में हमारे हिन्दु धर्म एवं संस्कृति का एक हिस्सा है ।  आज भी हिन्दुओं द्वारा महाभारत का पाठ श्रद्धा से किया जाता है । भारत में पुस्तकालओं की शोभा बढ़ाने की ही नहीं अपितु घर में अध्ययन-कक्ष की भी एक निधि है ‘महाभारत’ ।

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