ADVERTISEMENTS:

Theory of Alternating Current | Physics | Hindi

Read this article to learn about the theory of alternating current in Hindi language.

एक ऐसी कुंडली की कल्पना कीजिए जो एक चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत एक अक्ष के चारों और अपने ही समतल पर घूमी है । जब इसका समतल चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत होता है तब कुंडली से संबद्ध फ्लक्स अधिकतम होता है । इसलिए जब कुंडली घूमती है तब इससे संबद्ध क्तक्स में लगातार परिवर्तन होता रहता है जिससे प्रेरित विद्यूत वाहक बल उत्पन्न होता है ।

मान लीजिए चुम्बकीय क्षेत्र B है, कुंडली में फेरों की संख्या N है, उसके पृष्ठ का क्षेत्रफल A है तथा इसका कोणीय वेग W है । शुरू की अवस्था में जब कुंडली चुम्बकीय क्षेत्र के लंबवत है अर्थात k = o पर q = o, तब कुंडली से संबद्ध फ्लक्स q = NBAI जब कुंडली q कोण घूम जाती है, उस समय

यह समीकरण विद्यूतवाहक बल में समय के साथ होने वाले परिवर्तन को बताता है । यही सिद्धांत डायनमो तथा प्रत्यावर्ती धारा जनित्र में प्रयोग होता है ।

ADVERTISEMENTS:

प्रत्यावर्ती धारा जनित्र:

यह जनित्र यात्रिका ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है । यह फैराडे के विद्द्युतत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धातों पर आधारित है । जब एक कुंडली को चुम्बकीय क्षेत्र के लंबवत एक अक्ष धुमाया जाता है तो विद्द्युत वाहक बल उत्पन्न होता है जिसकी दिशा फलेमिंग के नियम से निश्चित होती है ।

संरचना:

ADVERTISEMENTS:

इसके चार मुख्य भाग होते हैं ।

1. तीव्र क्षेत्र का चुम्बक ल8 (चित्र 4.15): यह एक स्थायी चुंबक अथवा बेलनाकार ध्रुवीय खंडों वाला विद्युत चुंबक होता है ।

2. आर्मेचर कंडली: यह प्रतिरोधित तांबे की तार की कई फेरों की कुंडली होती है जो मृदु लोहे के कोर पर बांधी जाती है । आर्मेचर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा के लंबवत अक्ष पर घूम सकता है ।

3. सर्पो वलय: आर्मेचर के दोनों सिरे पीतल के सर्वो वलयों S1, व S2 से जुड़े रहते हैं । यह वलय कुंडली के साथ घूमते हैं तथा ब्रुश B1 व B2 इन वलयों को छूते हैं ।

ADVERTISEMENTS:



4. ब्रुश: B1 व B2 दो कार्बन की छड़ें हैं जो ब्रुश कहलाती हैं व सर्पी वलयों को छूती रहती है । ब्रुश स्थिर रहते हैं और सर्पोवलय घूमते रहते हैं । बुश तारों L1 व L2 से जुड़े रहते हैं जहां पर लोड लगा कर धारा ग्रहण की जा सकती है ।

कार्य प्रणाली:

जब आर्मेचर चुंबक के ध्रुवीय खंडों के बीच घूमता है तब प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है । विद्युत धारा की दिशा फलेमिंग के दायें हाथ के नियम से निश्चित होती है जो बाहरी परिपथ मे लोड बत्व) में से प्रवाहित होती है ।

ब्रुश B1 तथा B2 के बीच उत्पन्न विद्युत वाहक बल प्रत्यावर्ती होता है । जब आर्मेचर घूमता है तो आधे चक्र में ब्रुश B1 से धारा प्रवाहित होती है तथा बाकी के आधे चक्र में उल्टी दिशा में B2 से प्रवाहित होती है । इसी प्रकार यह क्रिया जारी रहती है ।

इस प्रकार E = EO Sin/Wt जहां EO = BANW

B.A.N. तथा W को बढ़ाकर विद्युत वाहक बल को बढ़ाया जा सकता है । यदि लोड का प्रतिरोध R हो तो I = E/R = EO/R Sin Wt = IO Sin Wt जहां IO = EO/R

E तथा I में ज्यावक्रीय ढंग से परिवर्तन होता रस्ता है ।

दिष्ट धारा जनित्र अथवा डायनमो:

दिष्ट धारा जनित्र में सर्पोवलयों के स्थान पर विभक्त वलयों का प्रयोग होता है जिससे बाहरी परिपथ में केवल एक ही दिशा में धारा प्रवाहित होती है । अधिकतर प्रत्यावर्ती धारा जनित्र का उपयोग होता है ।

ट्रांसफार्मर:

ट्रांसफार्मर वह उपकरण है जो प्रत्यावर्ती विद्युत वाहक बल को उच्च वोल्टता से कम वोल्टता में तथा कम वोल्टता से उच्च वोल्टता में परिवर्तित कर सकता है । इन्हें क्रमश: अपचायी तथा उध्वायी ट्रांसफार्मर कहा जाता है ।

ट्रांसफार्मर निम्न प्रकार के होते हैं:

1. खुली कोर

2. बंद कोर

3. स्वत: ट्रांसफार्मर

शक्ति-हानी:

ट्रांसफार्मर में शक्ति-हानि के निम्न कारण हो सकते हैं:

i. कुंडली में प्रयुक्त तांबे की तारों में विधुतधारा बहने के कारण I2 R शक्ति खर्च होती है । मोटी तारों का प्रयोग कर के इस हानि को कम किया जा सकता है ।

ii. कोर के चुंबकन और अचुंकन चक्र में से गुजरने के कारण शक्ति खर्च होती है । विशेष प्रकार के लोहे का उपयोग करने से यह हानि कम की जा सकती है ।

iii. भंवर धाराओं के कारण भी शक्ति की हानि होती है । पटलित कोर के प्रयोग से यह हानि कम हो जाती है ।

iv. फ्लक्स के रिसाव के कारण भी कुछ शक्ति की हानि होती है । परन्तु यह काफी कम होती है ।

उच्च-वोल्टता केबल:

विद्युत शक्ति को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने के लिए मोटी तारों का उपयोग होता है । पहले तांबे की तारें प्रयोग की जाती थीं परन्तु आजकल कम घनत्व के कारण एल्यूमिनियम का प्रयोग होने लगा है ।

इससे लागत में कमी आती है । आजकल अतिचालक केबल पर अनुसं धान हो रहा है जिसमें बिना किसी शक्ति हानि के ऊर्जा स्थानांतरण संभव हो सकेगा । जमीन के अंदर प्रतिरोधित केबल भी प्रयोग किये जाते हैं ।

दिष्टीकरण-एक्स-रे उपकरण में:

प्रत्यावर्ती धारा के आधे चक्र में धारा धनात्मक तथा आधे-चक्र में ऋणात्मक होती है । जब ऐसी धारा एक्सरे नलिका में प्रयोग की जाती है तो फिलामेंट गर्म हो कर इलेक्ट्रान उत्सर्जित करता है । आधे चक्र में जब टारगेट धनात्मक रहता है तब इलेक्ट्रान उसकी तरफ आकर्षित होकर, एक्स किरणें उत्पन्न करते हैं ।

परन्तु बाकी के आधे चक्र में धारा उल्टी दिशा में प्रवाहित होने के कारण फिलामेंट तथा कांच को नलिका को क्षति पहुंच सकती है । अत: इस प्रकार का प्रबंध किया जाता है कि धारा के दोनों आधे चक्रों में टार्गेट धनात्मक रहे । इसको धारा का दिष्टीकरण कहते हैं ।

दिष्टीकरण की विधि:

1. स्वत:

दिष्टीकरण यह सबसे सरल विधि है जिसमें उच्चवोल्टता के टर्मिनल सीधे एक्सरे नलिका के टर्मिनल से जोड़े जाते हैं । जब तक टार्गेट ठंडा रहता है, नलिका धारा को ऋणात्मक दशा में, नलिका में धारा प्रवाहित नहीं हो पाती ।

पहले आधेचक्र में जब फिलामेंट ऋणात्मक तथा टार्गेट धनात्मक होता है, फिलामेंट से निकले इलेक्ट्रान टार्गेट द्वारा आकर्षित होते हैं और नलिका में से धारा प्रवाहित होती है ।

आधे चक्र में फिलामेंट धनात्मक तथा टार्गेट गर्म हो जाता है तब इलेक्ट्रान प्रवाहित नहीं हो सकते । परन्तु जब टार्गेट गर्म हो जाता है तो उसमे से निकले इलेक्टान फिलामेंट की ओर प्रवाहित होकर नलिका को क्षति पहुंचा सकते हैं ।

अत: आवश्यक है कि टार्गेट को गर्म न होने दिया जाय । इसके कारण स्वत: दिष्टीकृत एक्सरे नलिका में धारा प्रवाहित करने की एक सीमा होती है ।

इस प्रकार कै परिपथ के मुख्य भाग निम्न हैं:

1. (i) प्रत्यावर्ती धारा स्रोत

(ii) फिलामेंट धारा के नियंत्रण के लिए धारा नियंत्रक

(iii) फिलामेंट धारा के मापन के लिए एमीटर

(iv) फिलामेंट को गर्म करने के लिए आवश्यक विद्युतधारा प्रदान करने के लिए अपचायी ट्रांसफार्मर

2. (i) प्रत्यावर्ती धारा स्रोत

(ii) लाइन वोल्टता नियंत्रक

(iii) लाइन वोल्टता मापन के लिए वोल्टमीटर,

(iv) त्वरण वोल्टता के नियंत्रण के लिए स्वत: ट्रांसफार्मर

(v) स्वत: ट्रांसफार्मर नियंत्रक

(vi) एक्सरे उद्यादन को शुरू और बंद करने के लिए बटन

(vii) नलिका धारा मापन के लिए मिली एमीटर

2. यांत्रिक दिष्टीकरण:

इसमें एक तुल्यकालिक मोटर की घूमती डिस्क पर लगी संग्राहक प्लेटों, से जुड़ी प्रतिरोधित छड़ का प्रयोग होता है जिसपर प्रतिरोधी पदार्थ को एक डिस्क लगी होती है और वह टर्मिनल के पास से गुजरती है । इस विधि का प्रयोग बहुत कम होता है ।

3. अर्थ तरंग दिष्टीकरण:

इस विधि में संधारित्रों के साथ एक वाल्व (चित्र 4.19) या दो वाल्वों (चित्र 4.20) का प्रयोग होता है । जब दो वाल्वों का प्रयोग किया जाता है तो फिलामेंट कभी धनात्मक नहीं बनता । इसमें प्रत्यावर्ती धारा चक्र का केवल धनात्मक भाग प्रवाहित होता है जबकि ऋणात्मक भाग को रोक दिया जाता है । संधारित्रीं के विसर्जन के कारण वोल्टता दुगनी हो जाती है ।

4. पूर्ण तरंग दिष्टिकरण (चित्र 4.21):

एक्सरे नलिका तथा उच्च वोल्टता ट्रांसफार्मर के टर्मिनल के बीच एक सेतु परिपथ में 4 वाल्व लगाकर पूर्ण तरंग दिष्टिकरण प्राप्त किया जा सकता है ।

5. तीन कला दिष्टिकरण:

अधिक शक्तिशाली एक्सरे उपकरण 3 कला स्रोत के साथ 6 वाल्व लगाकर चलाए जाते हैं जो सामान्य उपकरणों की अपेक्षा बेहतर सिद्ध होते हैं ।

चूंकि लोड को तीन कलाओं में विभाजित किया जा सकता है, इसलिए 3 कला वाली विद्द्युत धारा 1 कला की अपेक्षा अधिक शक्ति प्रदान कर सकती है । तीन कला वाली विद्द्युत धारा वास्तव में तीन ऐसी प्रत्यावर्ती धाराओं से बनी होती है जिनमें चक्र के तीसरे भाग के बराबर कलांतर होता है ।

एक्स किरण पुंज के अभिलक्षण:

एक्स किरण पुंज के मुख्यत: दो अभिलक्षण हैं:

1. एक्स किरणों की तीव्रता (डोज)

2. एक्स किरणों की गुणवत्ता (वर्णक्रमात्मक ऊर्जा वितरण) उपचार एवं निदान हेतु प्रयुक्त एक्स किरण डोज, किरणों की तीव्रता तथा उद्‌मासन की अवधि पर निर्भर करती है । उद्‌भासन दर प्राय: रोजन प्रति मिनट से दर्शायी जाती है जिसका अर्थ है आयनीकरण के कारण लगभग 1012 युग्मों का बनना ।

इसे डोजमापी, उद्‌मासन मापी या रोजन मापी उपकरण द्वारा मापा जा सकता है । एक्स किरणों की तीव्रता नलिका में प्रयुक्त धारा के समानुपाती होती है । उनकी गुणवत्ता या वैधन या कठोरता नलिका के इलेक्ट्रोडों के बीच लगाये गये विभव से निर्धारित होती है ।

एक्स-रे डोज़ मापने की विधि:

किसी भी स्रोत जैसे विसर्जन नलिका द्वारा उत्सर्जित विकिरण कुछ दूरी पर रखे बेरियम प्तेटिनोसायनाइड क्रिस्टल में प्रतिदीप्ति पैदा करता है ।

डोज़ मापने की कुछ विधियां निम्न है:

1. प्रकाशीय विधि:

यह विधि एक प्रतिदीप्ति शील पर्दे की सहायता से विकिरण की उपस्थिति का पता लगाने के लिए उपयुक्त है ।

2. फोटोग्राफी विधि:

बहुत कम मात्रा की एक्स किरणें फोटोग्राफिक फिल्म को काला कर देती हैं । इस विधि से कम मात्रा की एक्स किरणों का मापन किया जा सकता है ।

3. रासायनिक विधि:

कुछ पदार्थो में एक्स किरणों के उद्‌भासन से किरणों की मात्रा के अनुसार रंग परिवर्तन होता है ।

4. कैलोरीमीटर विधि:

इसमें विकिरण को उष्मा में परिवर्तित करके कैलोरीमीटर द्वारा मापा जाता है ।

5. जैविक विधि:

एक्स किरणों के कारण मनुष्य की त्वचा में परिवर्तन होते हैं । 300-400 रोजन पर कुछ घंटों बाद सतह पर लाली आ जाती है तो कुछ दिनों बाद एक रंगीन बिंदु के रूप में परिवर्तित हो जाती है । 600 रोजन पर कुछ घंटों में काफी लाली आ जाती है । कुछ दिनों बाद यह गायब हो जाती है अथवा अधिक लाल हो जाती है । दो हफ्तों के विकिरण के बाद यह अधिकतम होती है और 4 हफ्ते बाद गायब हो जाती है ।

6 हफ्ते के बाद वर्णकता दिखाई देती है जो वर्षो तक बनी रहती है । इस त्वचा प्रक्रिया द्वारा पहले एक्सरे मात्रा मापी जाती है । इसे एकांक त्वचा डोज (USD) या त्वचा एरिथीमा डोज (SED) कुछ कहते हैं । इससे अधिक मात्रा स्थायी घाव बना सकती है ।

एक्स किरणें गैसों या हवा का आयनीकरण कर सकती हैं । आयनी करण किरणों की मात्रा पर निर्भर करता है । अस्थि कार्टिलेज, मस्तिष्क तथा वसा हवा के समान नहीं है और इन पर एक्स किरणों का प्रभाव घनत्व के अतिरिक्त, विकिरणों, तरंग दैर्ध्यता पर निर्भर करता है ।

संधारित्र तथा धारिता:

संधारित्र वह युक्ति है जो आवेश संग्रह करती है । इस युक्ति से चालक की धारिता बढ़ जाती है । कल्पना कीजिए कि दो चालक A तथा B कुछ दूरी पर रखे हुए हैं । चालक A पर धनात्मक आवेश +q तथा B पर ऋणात्मक आवेश +q है । यह आवेश चालकों की सतह पर होंगे ।

यदि उनका विभव क्रमश: V1 तथा V2 है तो विभवांतर = V1 – V2 आवेश की मात्रा तथा विभव का अनुपात संघारित्र की धारिता कहलाता है । धारिता का मात्रांक फैराड है । 1 फैराड = 1 कूलांब / 1 वोल्ट व्यवहारिक रूप में छोटे मात्रांक माइक्रोफैराड का प्रयोग होता है ।

1 माइक्रो फैराड = 10-6 फैराड, 1 पीको फैराड = 10-12 फैराड

संधारित्र की भौतिक सार्थकता: किसी संधारित्र की धारिता स्थिर रहती हैं यदि आवेश दुगना कर दिया जाय तो विभवांतर भी दुगना हो जायेगा । धारिता दोनों चालकों के आकार, आमाप तथा उनके बीच की दूरी पर निर्भर करती है ।

समांतर प्लेट संधारित्र:

यह दो समांतर प्लेटों से बना होता है जिसके बीच में डाइलेक्ट्रिक पदार्थ होता है । यदि प्लेट का क्षेत्रफल तथा उनके बीच की दूरी d हो तो धारिता = EA/d जहां

E = डाइलेक्ट्रिक का निरपेक्ष पेरावैद्युतांक

E = KEo जहां K डाइलेक्ट्रिक स्थिरांक

तथा Eo = 8.85 x 10-12

गोलाकार धारित्र:

यह दो समकेंद्री गोलों A तथा B से बनता है । एक वियुक्त गोलाकार चालक की धारिता = 4 π r1 r2/r2 r1

यदि कई धारित्र सीरीज में लगाये जायें तो कुल धारित्रा इस प्रकार होती है 1/c =

1/c1 + 1/c2 + 1/C3 +…..

यदि उन्हें समांतर परिचय में जोड़ा जाये तो

C = C1 + C2 + C3 +…….

दोनों ही दशाओं में कुल ऊर्जा इस प्रकार होती है

E = E1 + E2 + E3 +…….

जब प्लेटों के बीच माइका, तेल, कागज आदि पदार्थ लगाये जाते हैं तो संघारित्र की धारिता बढ़ जाती है । अत: यह बिना अधिक विभवांतर के अधिक आवेश संग्रह कर सकता है । यह माध्यम डाइलेक्ट्रिक कहलाते हैं । यह प्रतिरोधी होते हैं । किसी डाइलेक्ट्रिक माध्यम की उपस्थिति में धारिता तथा हवा में धारिता के अनुपात को माध्यम का डाइलेक्ट्रिक स्थिरांक कहा जाता है ।

ध्रुवीय अणुओं वाले डाई इलेक्ट्रिक पदार्थो स्थिरांक तापमान बढ़ने पर कम हो जाता है । प्रकृति में भी पृथ्वी के गोले तथा लगभग 58 किलोमीटर ऊपर स्टेटोस्यीयर से बने गोले द्वारा संघारित्र बनता है जिसमें तड़ित विद्युत आदि के कारण आवेश होता है । यही आवेश पूखी पर एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है तथा पृथ्वी में विद्युत प्रवाह का कारण है ।

तापायनिक उत्सर्जन:

कूलम्ब, निर्गत डायोड, एनोड वोल्ट के साथ ट्‌यूब में परिवर्तन इत्यादि ।

मुक्त इलेक्ट्रान:

धातुओं के परमाणुओं की सबसे बाहरी कक्षा के इलेक्ट्रान संयोजकता इलेक्ट्रान या मुक्त इलेक्ट्रान कहलाते हैं । यह एक परमाणु से बंधे नहीं होते तथा इलेक्ट्रान गैस के रूप में रहते हैं ।

किसी धातु का कार्य फलन या देहरी ऊर्जा वह कम से कम ऊर्जा है जो 0 डिग्री केल्पिन पर इलेक्ट्रान के लिए विभव रोध को पार करने के लिए आवश्यक है । यह इलेक्ट्रान वोल्ट में मापी जाता है ।

इलेक्ट्रान उत्सर्जन:

किसी पदार्थ, मुख्यत: धातुओं की सतह से इलेक्ट्रानों का निकलना इलेक्ट्रान उत्सर्जन कहलाता है ।

तापायनिक उत्सर्जन:

तापायनिक उत्सर्जन के लिए ऊर्जा बाहर से ऊष्मा के रूप में दी जाती है । जब घात्वीय कैथोड (उत्सजर्क) को विद्युत धारा प्रवाहित करके गर्म किया जाता है तो उसका तापमान बढ़ता है तथा मुक्त इलेक्ट्रानों की ऊर्जा कार्य-फलन से अधिक हो जाती है जिसके कारण विभव रोध को पार करके इलेक्ट्रान सतह से बाहर आ जाते हैं । यह इलेक्ट्रान तापीय इलेक्ट्रान तथा यह उत्सर्जन तापायनिक उत्सर्जन कहलाता है क्योंकि यह ऊष्मा के कारण होता है ।

प्रकाश-विद्यूतीय उत्सर्जन:

प्रकाश विद्युतीय उत्सर्जन में बाड्‌य ऊर्जा प्रकाश के रूप में दी जाती है । जब दृश्य प्रकाश, अवरक्त, पराबैंगनी विकिरण या एक्स किरणों के रूप में विद्युत चुम्बकीय विकिरण किसी प्रकाश संवेदी पदार्थ की सतह पर पड़ता है तो इस विकिरण की ऊर्जा मुका इलेक्ट्रान ग्रहण कर लेते हैं । जब उनकी ऊर्जा काफी हो जाती है तो वह सतह से बाहर निकल आते हैं । यह इलेक्ट्रान प्रकाशीय इलेक्ट्रान कहलाते हैं ।

निर्वात डायोड:

यह कांच की एक ट्‌यूब होती है जिसमें निर्वात होता है । इसमें दो इलेक्ट्रोड होते हैं । यह सब से सरल इलेक्ट्रानिक युक्ति है जिसका आविष्कार फलेमिंग ने 1940 में किया था । दो इलेक्ट्रोड कैथोड तथा एनोड कहलाते हैं ।

कैथोड इलेक्ट्रान उत्सर्जित करता है तथा एनोड उन्हें ग्रहण करता है । एनोड बहुधा निकिल, मोलिबिडीनम या लोहे का बना होता है और कैथोड के चारों ओर लगा रहता है । कैथोड प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में गर्म किया जा सकता है ।

प्रत्यक्ष विधि में टंगस्टन के तार से बने कैथोड में वोल्ट बैटरी की सहायता से धारा प्रवाहित की जाती है । परोक्ष विधि में कैथोड निकेल के खोखले बेलन के आकार का होता है जिसकी बाहरी सतह पर बेरियम आक्साइड का लेप लगा होता है ।

इस बेलन के अंदर अक्ष पर टंगस्टन का फिलोमेंट होता है जिसे गर्म करने के लिए उसको वियुत धारा प्रवाहित की जाती है । इस प्रकार कैथोड परोक्ष विधि से गर्म किया जाता है । एनोड प्लेट पिन से जुड़ी होती है और फिलामेंट के दोनों सिरे ट्‌यूब के बाहर निकले दो पिनों से जुढ़े होते हैं ।

डयोड की कार्य विधि:

जब डायोड का कैथोड गर्म किया जाता है तो उसमें से इलेक्ट्रान निकलते हैं जो कैथोड और प्लेट के बीच के स्थान में जमा होते हैं । जब प्लेट पर कोई विभव नहीं लगाया जाता तो इलेक्ट्रानों पर कोई आकर्षण बल नहीं लगता ।

इलेक्ट्रान, कैथोड के पास एक बादल के रूप में जमा होते हैं जिसे अंतराकाशी आवेश कहते हैं । यह आवेश प्रतिकर्षण के कारण कैथोड से और अधिक इलेक्ट्रान निकलने से रोकता है । जब एनोड प्लेट को धनात्मक विभव पर रखा जाता है तो कुछ इलेक्ट्रान आकर्षण बल के कारण निर्वात में से होकर एनोड तक पहुंचने लगते हैं तथा प्लेट धारा बहने लगती है । प्लेट का विभव बढ़ाने पर अधिक इलेक्ट्रान प्रवाहित होने लगते हैं ।

विभव और अधिक होने पर कैथोड से उत्सर्जित सभी इलेक्टान प्लेट तक पहुंचने लगते है । इससे अधिक विभव लगाने पर प्लेट धारा में कोई वृद्धि नहीं होती । यह अधिकतम धारा संतृप्ति धारा कहलाती है । कैथोड धारा को बढ़ा कर यह धारा बढ़ाई जा सकती है । चित्र 4.22 डायोड की क्रिया विधि समझाने के लिए व्यवस्था चित्र दिया गया है । प्लेट P तथा कैथोड K के बीच में उच्च वोल्टता बैटरी (HT) लगाई जाती है । जिससे एनोड, कैथोड की अपेक्षा धनात्मक रहता है ।

फिलामेंट में कम वोल्टता बैटरी (LT) लगा कर उसे गर्म किया जाता है और बाहरी परिपथ में विधुत धारा बहने लगती है जो प्लेट से कैथोड की तरफ होती है ।

इस प्रकार डायोड में निम्न स्थितियां होती हैं:

1. प्लेट धारा तभी बहती है जब प्लेट विभव धनात्मक होता है । जब कैथोड की अपेक्षा प्लेट ऋणात्मक होती है तब कोई धारा प्रवाहित नहीं हो सकती । इस प्रकार डायोड एक वाल्व की तरह कार्य करता है ।

2. बाहरी परिपथ में विद्युत धारा प्लेट से कैथोड की ओर प्रवाहित होती है जबकि इलेक्ट्रान कैथोड से प्लेट की ओर जाते हैं ।

डायोड का उपयोग प्रत्यावर्ती धारा को दिष्ट धारा बनाने में हो सकता है । निर्गम धारा में थोड़ा प्रत्यावर्ती धारा का रिपल होता है जिसे फिल्टर परिपथ लगाकर दूर किया जा सकता है ।

फिल्टर परिपथ कई प्रकार के होते हैं:

1. L सेक्शन फिल्टर

2. सीरीज प्रेरक फिल्टर

3. शंट संधारित्र फिल्टर

एनोड वोल्टता तथा प्लेट धारा का संबंध:

प्लेट धारा Ia तथा प्लेट वोल्टता Va का संबंध चित्र 4.23 में दिखाया गया है । यह वक्र डायोड के अभिलाक्षणिक वक्र कहलाते हैं ।

प्लेट की धारा नियंत्रक की सहायता से वांछित विभव दिया जाता है । प्लेट धारा मिलीएमीटर द्वारा तथा प्लेट विभव वोल्ट मीटर द्वारा मापा जाता है । Va तथा Ia के परिवर्तन का ग्राफ चित्र 4.23 में कैथोड के तीन तापमानों के लिए दिखाया गया है ।

ग्राफ से स्पष्ट है कि कम प्लेट वोल्टता पर प्लेट धारा पर फिलामेंट तापमान का कोई प्रभाव नही पड़ता क्योंकि प्लेट द्वारा आकर्षित होने के लिए काफी इलेक्ट्रान कम तापमान पर भी उपलब्ध रहते हैं । इस धारा को अंतराकाशी आवेश सीमित धारा कहते हैं । जब प्लेट वोल्टता में धीरे-धीरे वृद्धि की जाती है तो अधिक इलेक्ट्रान आकर्षित होने लगते हैं और अंतराकांशी आवेश का प्रभाव कम होने लगता है ।

प्लेट वोल्टता और बढ़ने पर प्लेट धारा अधिकतम मान ग्रहण कर लेती है ओर वोल्टता को और बढ़ने पर उसमें कोई वृद्धि नहीं होती । इसे संतृप्ति धारा कहते हैं । विभिन्न तापमानों के लिए यह ग्राफ बनाए जा सकते हैं । अंतराकाशी आवेश सीमित धारा की सीमाओं में जेट धारा तथा वोल्टता का संबंध इस प्रकार होता है । Ia = K Va 3/2

डायोड का दिष्टकारी के रूप में प्रयोग:

प्रत्यावर्ती धारा को दिष्ट धारा में परिवर्तन करना दिष्टीकराग कहलाता है तथा इसमें प्रयुक्त उपकरण को दिष्टकारी कहा जाता है । कोई भी वह उपकरण जो धारा को केवल एक दिशा में प्रवाहित होने दे, दिष्टकारी का कार्य कर सकता है ।

इसीलिये डायोड इस कार्य में सक्षम है । डायोड अर्धचक्र दिष्टकारी है । प्रत्यावर्ती धारा E = Eo Sinwt जिसे दिष्ट बनाना हे, ट्रांसफार्मर की प्राथमिक कुंडली में लगायी जाती है । द्वितीयक कुंडली का एक सिरा प्लेट से और दूसरा सिरा एक लोड से होकर कैथोड से जोड़ा जाता है ।

प्रत्यावर्ती वोल्टता के प्रत्येक धनात्मक अर्धचक्र में प्लेट धनात्मक रहती है और डायोड में से धारा प्रवाहित होती है । प्लेट धारा लोड में से बहती है और इस प्रकार इस आधे चक्र में निर्गम धारा प्राप्त होती है । बाकी आधे चक्र में धारा नहीं बह सकती अत: कोई निर्गम धारा नहीं मिलती ।

इस प्रकार लोड ”R” के सिरों पर निर्गम वोल्टता हर चक्र के केवल आधे भाग में मिलती है, जब प्लेट, कैथोड की अपेक्षा धनात्मक विभव पर होती है । इसलिए इस व्यवस्था को अर्धतरंग दिष्टकारी कहा जाता है । चित्र 4.24 (अ) व (इ) में निवेशी प्रत्यावर्ती धारा तथा निर्गत धारा दिखाई गई है ।

पूर्ण तरंग दिष्टकारी के रूप में डायोड का उपयोग:

दो डायोड वाल्व का उपयोग करके पूर्ण तरंग दिष्टकारी बनाया जा सकता है जिसकी व्यवस्था चित्र 4.25 (अ) तथा (ब) में दिखाई गई है । प्रत्यावर्ती धारा स्त्रोत ट्रांसफार्मर T की प्राथमिक कुंडली से जोड़ा जाता है । द्वितीयक कुंडली को बिंदु O पर टेप किया जाता है । लोड R को ट्रांसफार्मर के मध्यवर्ती टर्मिनल व कैथोड के उमयी बिंदु के बीच लगाया जाता है ।

पहले आधे चक्र में डायोड A की प्लेट P1 धनात्मक रहती है तथा धारा उस डायोड में से प्रवाहित होती है । दूसरे आधे चक्र में दूसरे डायोड B की प्लेट P2 धनात्मक होती है तथा धारा उसमें से प्रवाहित होती है । पूरे चक्र   में  एक ही दिशा दो स्पंदनों के रूप में निर्गम धारा प्राप्त होती है । प्रकाश तीव्रता, गुणवत्ता, अदृश्य वर्णक्रम, रैखिक वर्णक्म, विद्युत चुंबकीय विकिरण, तरंग सिद्धांत, क्वाटा, विद्युतचुंबकीय विकिरण के गुण, धर्म, रेडियोएक्टिवता ।

प्रकाश:

प्रकाश विकिरण ऊर्जा है जिसके कारण हम वस्तुओं को देख सकते हैं ।

प्रकाश की प्रकृति एवं गुणवत्ता:

प्रकाश की प्रकृति एवं गुणवत्ता की व्याख्या करने के लिए कई सिद्धात प्रस्तुत किये गये हैं परन्तु अब तक कोई ऐसा सर्वमान्य सिद्धांत नहीं है जो प्रकाश से संबंधित सभी ज्ञात परिघटनाओं की व्याख्या कर सके । इस प्रकार प्रकाश की प्रकृति अभी भी हमारे लिए रहस्य बनी हुई है ।

1. कणिका सिद्धांत:

इस सिद्धांत के अनुसार प्रकाश सूक्ष्म भारहीन कणिकाओं का बना हुआ है जो प्रकाश स्रोत में से तीव्र गति से निकलते हैं । यह सिद्धांत प्रकाश के रेखिक संचरण की व्याख्या तो कर सकता है परन्तु व्यतिकरण, विवर्तन तथा धुवण को नहीं समझा सकता ।

2. हाइगेन का तरंग सिद्धांत:

1678 में प्रतिपादित इस सिद्धांत के अनुसार प्रकाश एक आवर्ती विक्षोभ के कारण उत्पन्न होता है जो स्रोत से चारों ओर एक काल्पनिक माध्यम ईथर में चलता है । इस सिद्धांत द्वारा रैखिक संचरण, परावर्तन, व्यतिकरण तथा ध्रुवण की व्याख्या की जा सकी । इस सिद्धांत की मुख्य कमजोरी माध्यम ईथर की कल्पना थी । हाइगेन के अनुसार प्रकाश अनुदैर्ध्य तरंग के रूप में होता है ।

इस सिद्धांत की दो अभिधारणाएं निम्न हैं:

1. तरंगाग्र का प्रत्येक बिंदु नये विक्षोभ का स्रोत है जिसे द्वितीयक तरंग कहा जाता है । द्वितीयक तरंग मूल तरंग की गति से चलती है, अगर माध्यम वही रहे ।

2. किसी भी समय पर नयी तरंगाग्र की स्थिति एवं आकार उस क्षण पर द्वितीयक तरंग के एनवेलनप (अर्थात स्पर्शीय सतह) द्वारा दिखाया जाता है । तरंगाग्र किसी क्षण पर तरंग में एक ही कला के विक्षोभ का आकार एवं अभाव दिखाता है । इस सिद्धांत में यह कमी है कि यह तरंगाग्र के बांये और दांये भाग की व्याख्या नहीं करता तथा ईथर की कल्पना करता है ।

3. विद्द्युत चुंबकीय सिद्धांत: मैक्सवेल द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत के अनुसार प्रकाश, यांत्रिक तरंग न होकर  विद्युत चुंबकीय तरंग है । इस विद्युत चुंबकीय तरग में विधुत व चुंबकीय क्षेत्र एक दूसरे के लंबवत होते हैं तथा दोनों ही संचरण की दिशा के लंबवत होते हैं । इस सिद्धात में ईथर की उपस्थिति की आवश्यकता नहीं है । इस सिद्धांत से प्रकाश  विद्युत प्रभाव की व्याख्या नहीं की जा सकी । प्रकाश अनुप्रस्थ तरंगों के रूप में है तथा इसकी गति 3×108 मीटर/सेकंड है ।

4. क्वांटम सिद्धांत: 1901 में प्लैंक ने विकिरण का क्वांटम सिद्धांत प्रतिपादित किया । इसके अनुसार कोई भी स्रोत ऊर्जा के बंडलों के रूप में विकिरण उत्सर्जित करता है जिन्हें क्वांटा या फोटान कहा जाता है । इस सिद्धात की सहायता से आइंसटीन ने प्रकाश विद्युत प्रभाव की व्याख्या की, परन्तु इससे व्यतिकरण, विवर्तन तथा सुवण की व्याख्या नहीं की जा सकती ।

प्रकाश की दोहरी प्रकृति:

ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकाश में तरंग और कण दोनो के ही गुण हैं । प्रकाश विद्युत प्रभाव तथा समागन प्रभाव आदि को फोटान या क्वांटा की सहायता से समझा जा सकता है  जब कि व्यतिकरण, विवर्तन व ध्रुवण को समझाने के लिए प्रकाश के तरंगीय गुणों की सहायता आवश्यक है ।

प्रकाश तीव्रता:

प्रकाश की वह मात्रा, जो स्रोत के लंबवत एकक दूरी पर रखे एकक क्षेत्र पर प्रति सेकंड पड़ती है, प्रकाश तीब्रता कहलाती है । इसका मात्रांक कैडेला है । कैडेला उस स्रोत की प्रकाश तीब्रता है जो 2042 केल्विन तापमान पर एक कृष्णिका (ब्लैक बाडी) की एक वर्ग सेंटीमीटर सतह द्वारा उत्सर्जित विकिरण के 1/60 भाग के बराबर विकिरण उत्सर्जित करता है ।

अदृष्य वर्णक्रम:

विद्युत चुंबकीय वर्ण क्रम में से दृश्य प्रकाश (4000-7700 एंगस्ट्राम) को निकाल देने पर शेष भाग अदृश्य वर्णक्रम कहलाता है । इसमें गामा किरणें एक्स किरणें, पराध्यनिक किरणे, अवरक्त, किरणें तथा रेडियो तरंगे शामिल हैं ।

विद्द्युत चुंबकीय वर्णक्रम:

अवरक्त किरणें, दृश्य प्रकाश आदि वियुत चुंबकीय किरणें एक बड़े विधुत चुंबकीय वर्णक्रम का ही एक भाग है । यह सारा विद्युत चुंबकीय विकिरण हुत परिवर्तनशील वियुत और चुंबकीय क्षेत्र से बनता है और 3×108 मीटर/सेकंड की गति से चलता है ।

यह विकिरण, मुक्त आकाश में प्रतिलोम वर्गीय नियम का पालन करते हैं । किसी पदार्थ में से गुजरने पर इनमें क्षीणन होता है तथा कुछ अपने मूलपथ से विचलित हो कर नयी दिशा में चलते हैं । यह सरल रेखा में चलते है तथा इनके द्वारा क्वांटा में ऊर्जा स्थनांतरण होता है ।

कठोर किरणों द्वारा अधिक तथा मृदुकिरणों द्वारा कम ऊर्जा स्थानांतरित होती है । एक एक्स किरण पुंज एकवर्णीय न होकर सतत वर्णक्रम का होता है और उसमें अनेक तरंग दैर्ध्य की तरंगें होती हैं । सतत वर्णक्रम का एक उदाहरण इंद्रधनुष है जिसमें गहरे लाल से लेकर गहरे बैंगनी रंग तक के सतत बैंड होते हैं ।

वर्णक्रम में उपस्थित तरंग-दैर्ध्य पदार्थ पर निर्भर नहीं होता और केवल तापमान पर निर्भर होता है । इसके विपरित मर्करी व सोडियम लैंप एक निश्चित तरंग दैर्ध्य का विकिरण उत्पन्न करते हैं प्रत्येक पदार्थ का अपना लाक्षणिक रेखीय वर्णक्रम होता है ।

कुछ तरंगों की आकृति और तरंग दैर्ध्य नीचे दिये गये हैं:

गामा एक्स पराबैंगनी अवरक्त रेडियो किरणें किरणें किरणें तरंगें गामा किर्णे .01 से 1.4 A तक की तरंग दैधर्य की विद्युत चुंबकीय तरंगे हैं । इनकी खोज बेकेरल ने 1896 में की थी । इनकी वेधन क्षमता बहुत अधिक होती है ।

एक्स किरणें:

इनका तरंग दैर्ध्य 0.1 से 1000A तक होता है । इनकी वेधन क्षमता प्रकाश किरणों से अधिक होती है और यह मानव शरीर के ऊतकों से पार हो सकती हैं । परावबैंगनी किरणों का तरंगदैर्ध्य 100-3900Aतथा आवृत्ति 3 x 108 मेगाहर्ज के लगभग होती है ।

अवरक्त किरणें:

इनका तरंग दैर्ध्य हृदय प्रकाश से अधिक होता है । (7000-4000000A) गर्म पदार्थों से निकला विकिरण इसी प्रकार का होता है ।

माइक्रोवेव:

1 से॰मी॰ से 1 मीटर तरंग दैर्ध्य की तरंगें माइक्रावेव कहलाती हैं । यह एक केविटी में इलेक्ट्रानों के दोलन से उत्पन्न की जाती है ।

रैखिक वर्णक्रम:

यह वर्णक्रम मुक्त परमाणु की गैस अवस्था में प्राप्त किये जाते हैं । प्रत्येक तत्व का एक अमिलक्षणिक रेखिक वर्णक्रम होता है । इसमें चमकीली रेखाएं होती हैं जिनके बीच में काले अंतराल होते हैं । बुंसन ज्वालक में कुछ लवणों को गर्म करने पर वे परमाणुओं में विखंडित हो जाते हैं तथा उनके धात्विक तत्व रैखिक वर्णक्रम देते हैं । धातुओं को पहचानने के लिए फ्लेम परीक्षण में इसका उपयोग किया जाता है ।

रेखा अवशोषण वर्णक्रम:

जब गैसीय अवस्था में किसी तत्व में से सफेद प्रकाश गुजारा जाता है तो सतत वर्णक्रम में से कुछ विशेष रेखाएं अनुपस्थित होती हैं । इस वर्णक्रम को अवशोषण वर्णक्रम कहते हैं ।

यदि किसी उच्च तापक्रम स्रोत (बल्व) का सफेद प्रकाश सोडियम की वेपरस में से गुजारा जाय तो दो पीली रेखाएं D1 व D2 अनुपस्थित होती हैं । जब स्रोत बंद कर दिया जाता है तो सोडियम वेपरस वर्णक्रम वही दो रेखाएं दिखाता है जो अवशोषण वर्णक्रम में अनुपस्थित थी ।

सूर्य की सतह पर पाई जाने वाली वेपरस का रेखीय वर्णक्रम फाउन हाफर रेखाएं कहलाती है और इससे वहां उपस्थित तत्वों के बारे में जानकारी मिलती है । सूर्य में हीलियम की उपस्थिति का पता इसी प्रकार लगाया गया था जिसे बाद में पृथ्वी पर भी खोजा गया ।

विद्द्युत चुंबकीय विकिरण के क्वांटम गुणधर्म:

इस सिद्धांत के अनुसार विद्द्युत चुंबकीय विकिरण E = h ऊर्जा के क्वांटा से बना है जहां h = प्लांक स्थिरांक, V = आवृत्ति । प्रकाश में इन क्वांटा को फोटान कहा जाता है । प्रकाश विद्द्युत प्रभाव, रामन प्रभाव व कांपटन प्रभाव की व्याख्या केवल क्वांटा सिद्धात द्वारा ही संभव है ।

आंइसटीन ने प्रकाश विधुत प्रभाव की व्याख्या इसी सिद्धांत के अनुसार की थी । इसमें जब एक फोटान धातु की सतह पर अवशोषित होता है तब एक फोटोइलेक्ट्रान धातु की सतह से बाहर निकलता है । यदि फोटान कीऊर्जा इलेक्ट्रान के उत्सर्जन के लिये आवश्यक उर्जा से कम हो तो प्रकाश विद्युत प्रभाव नहीं पाया जाता ।

फोटोन की ऊर्जा hv दो क्रियायों में काम आती है:

1. इस ऊर्जा का कुछ भाग धातु की सतह से इलेक्ट्रान उत्सर्जित करने के काम आता है । इसके लिए आवश्यक लघुतम ऊर्जा कार्यफलन कहलाती है ।

2. बाकी की ऊर्जा निकले हुए फोटो इलैक्ट्रान को गतिज ऊर्जा प्रदान करती है । फोटोन ऊर्जा = कार्य फलन + फोटो इलेक्ट्रान की गतिज ऊर्जा hv = Q + ½ mv2

प्रकाश विद्युत प्रभाव में फोटान अपनी ऊर्जा का कुछ भाग फोटोइलेक्ट्रान को गतिज ऊर्जा के रूप में देता है । कांपटन प्रभाव में एक्स किरणे एक इलेक्ट्रान से टकरा कर किसी दूसरी दिशा में कम ऊर्जा के साथ चली जाती है जैसे कि बिलियर्ड की दो गेंदों में टकराव के समय होता है ।

इस प्रकार प्रकीर्णित फोटान की ऊर्जा मूल फोटान से कम होती है । जब एक वर्णीय एक्स किरण पुंज किसी प्रकीर्णन करने वाले पदार्थ (जैसे कार्बन पिंड) पर पड़ता है तो प्रकीर्णित एक्स किरणों का तरंग दैर्ध्य अधिक, तथा आवृत्ति व ऊर्जा मूल किरणों से कम होती है ।

आयनी करण:

उदासीन गैस परमाणु का धनावेशित व ऋणावेशित कणों में विभाजन आयनीकरण कहलाता है ।

परमाणु संरचना, ऊर्जा स्तर तथा रेडियो एक्टिविता:

परमाणु संरचना:

रूदरफोर्ड, के प्रकीर्णन प्रयोगों के अनुसार परमाणु के केंद्र में एक भारी नाभिक होता है । नाभिक का आयाम परमाणु के आयाम की अपेक्षा बहुत कम होता है । नाभिक के चारों ओर नाभिक के अंदर धनावेशित प्रोटानों की संख्या के बराबर संख्या में इलेक्ट्रान होते हैं जो कई कक्षाओ मे चक्कर लगाते रहते हैं । इलेक्ट्रानों की कक्ष में गति के बारे में बोहर की परिकल्पनाएं इस प्रकार है ।

1. इलेक्ट्रान, नाभिक के चारों ओर क्वांटम सिद्धांत का पालन करते हुए निश्चित कक्षाओं के चक्कर लगाते हैं । इलेक्ट्रानो व नाभिक के बीच का आकर्षण बल इलेक्ट्रानों की वृत्तीय गति से उतपन्न अपने ही बल से संतुलित होता है ।

2. इलेक्ट्रान का कोणीय आधूर्ण h/2 का पूर्णानकी गुणक होता है ।

3. जब इलेक्ट्रान किसी बाहरी कक्षा से अंदर की कक्षा में जाता है तो परमाणु निश्चित ऊर्जा का फोटान उत्सर्जित करता है । किसी भी परमाणु में धनावेशित प्रोटानों की संख्या ऋणावेशित इलेक्ट्रानों की संख्या के बराबर होती है । जिससे परमाणु आवेशरहित होता है ।

प्रोटान व इलेक्ट्रान दोनों का आदेश समान 1.6 x 10-19 कूलांब होता है । प्रोटान का द्रव्यमान 1.6 726 x 10-27 कि॰ग्रा॰ अर्थात इलेक्ट्रान से 1836 गुना अधिक होता है । अत: परमाणु का द्रव्यमान मुख्यत: नामिक के खारण ही होता है ।

वाडविके ने 1932 में नामिक में उपस्थित एक अन्य कण न्यूट्रान की खोज की जो आवेशरहित होता है । इसका द्रव्यमान 1.6749 x कि॰ग्रा॰ होता है जो प्रोटान से थोड़ा ज्यादा है । प्रोटानों की संख्या Z तत्व की परमाण्विक संख्या दर्शाती है । नाभिक में न्यूट्रानों व प्रोटानों की कुल संख्या उसकी द्रव्यमान संख्या A कहलाती है ।

सभी तत्वों के नाभिकों का घनत्व समान होता है । (2.4 x 107 कि॰ग्रा॰ /मीटर3) आइसोटोप: वे परमाणु, जिनकी परमाण्विक संख्या Z समान परन्तु द्रव्यमान संख्या द्रव्यमान संख्या A, अलग होती है, आइसोटोप कहलाते हैं । जैसे हाइहोजन (1 प्रोटान) तथा ड्यूटीरियम (1 प्रोटान + न्यूट्रान)

समभारी (आइसोबार):

वे परमाणु जिनकी द्रव्यमान संख्या A समान किन्तु परमाण्विक संख्या Z अलग होती है, आइसोबार कहलाते हैं । जैसे आर्गन 18Ar40 तथा कैल्शियम ।

रेडियो एक्टिविता:

हेनरी बेकेरल ने सर्वप्रथम यह खोज की थी कि यूरेनियम लवण कुछ अदृश्य विकिरण उत्सर्जित करते हैं जो पदार्थ की पतली तहों से गुजर सकते हैं तथा फोटोग्राफी प्लेटों को काला कर देते हैं । दो वर्ष के पश्चात मैडम क्यूरी तथा पियरे क्यूरी ने यूरेनियम के अयस्क (विंचब्लैड) जो यूरेनियम की अपेक्षा लाखों गुना विकिरण उत्सर्जित करता था, इसमें से रेडियम को पृथक कर लिया ।

नाभिक के विघटन से स्वत: स्फूर्त विकिरण का उत्सर्जन रेडियोएक्टिविता कहलाता है ओर ऐसे पदार्थ रेडियोएक्टिव पदार्थ कहलाते हैं । रेडियोएक्टिविता अधिकतर भारी नानिकों मे पाई जाती है । भारी नाभिकों में प्रोटानों की संख्या अधिक होने के कारण आपसी प्रतिकर्षण बल अधिक होता है तथा बंधन ऊर्जा कम हो जाती है । तब नामिक अस्थिर हो जाता है । रेडियोएक्टिव पदार्थों से 3 प्रकार का विकिरण उत्सर्जित होता है ।

1. एक्सकण |

2. वीटा कण तथा |

3. गामा किरणें |

जब एक सीसे के बक्से में रखे रेडियोएक्टिव पदार्थ से उत्सर्जित विकिरण को एक बारीक छिद्र से निकाल कर उसे लंबवत चुबकीय क्षेत्र से गुजारकर फोटोग्राफिक प्लेट पर डाला जाता है तो हमें पता चलता है कि यह विकिरण तीन प्रकार की किरणों से बना है ।

अल्का, बीटा, गामा किरणें । अल्फा किरणें धनावेशित कण हैं जो हीलियम के नामिक जैसी हैं । बीटा किरणें इलेक्टान हैं तथा गामा किरणें  विद्युत चुंबकीय विकिरण हैं । चूंकि अल्फा व बीटा किरणे आवेशित हैं, वे चुंबकीय क्षेत्र से विक्षेपित होती हैं । वे फोटोग्राफिक प्लेट को काला करती हैं और आयनीकरण भी करती हैं ।

गामा किरणें बेरियम प्तेटिनोसायनाइड में प्रतिदीप्ति पैदा करती हैं । बीटा किरणें भी प्रतिदीप्ति पैदा करती हैं और उनकी वेधन क्षमता एक्स किरणों से अधिक होती है । एक्स किरणें भी आयनीकरण करती हैं । गामा किरणों की गति व वेधन क्षमता सबसे अधिक होती है ।

, , ,

Kata Mutiara Kata Kata Mutiara Kata Kata Lucu Kata Mutiara Makanan Sehat Resep Masakan Kata Motivasi obat perangsang wanita