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Contribution of Ratzel to Political Geography | Hindi

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राजनीतिक भूगोल के वैज्ञानिक अध्ययन के जन्मदाता होने के वावजूद रैटज़ेल का योगदान सदा ही विवाद का विषय वना रहा । इस विवाद का एक प्रमुख कारण यह था कि रैटज़ेल एक उर्वर लेखक थे और साथ ही वे राजनीतिक भूगोल के अध्ययन में एक सर्वथा नवीन अवधारणा के प्रवर्तक थे ।

ऐसे में उनके लेखों में स्थान-स्थान पर अतिरेकपूर्ण भाषा का प्रयोग होना स्वाभाविक था । राज्यों ओर प्राकृतिक जीवों के बीच व्यवहार सादृश्य सम्बन्धी विवाद ऐसी ही अतिरेकपूर्ण भाषा का परिणाम था । दूसरा प्रमुख कारण यह था कि रैटज़ेल द्वारा प्रतिपादित पारिस्थितिकीय अध्ययन की मूलभूत मान्यताएं डार्विन की विकासवादी अवधारणा से प्रभावित थीं, तथा उनकी मान्यता के अनुसार मानव भूगोल मानव समष्टियों और पृथ्वी पर व्याप्त भौतिक परिस्थितियों के अन्तरसम्बन्धों के विश्लेषण पर केन्द्रित विषय था ।

अत: विद्वानों को रेटजेल के अनेक वक्तव्य नियतिवादी धारणा से ओत-प्रोत प्रतीत हुए । परन्तु डिकिन्सन (1969) के अनुसार जहां एक ओर अमरीकी विद्वान विलियम मॉरिस डैविस (1903) का ”भूगोल का स्वरूप” (स्कीम ऑफ जिओग्राफी) शीर्षक लेख प्रमुखतया मनुष्य और वातावरण के अन्तरसम्बन्धो का नियतिवादी विश्लेषण था वहीं दूसरी ओर रैटज़ेल द्वारा प्रतिपादित मानव भूगोल मानव समूहों और उनके क्रिया-कलापों के क्षेत्रीय वितरण में भौतिक और अभौतिक तत्वों के सहपरिवर्तन (कोवेरियन्स) के विश्लेषण पर केन्द्रित था ।

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रैटज़ेल की यह केन्द्रीय मान्यता थी कि पृथ्वी पर सांस्कृतिक तत्वों का वितरण बहुधा पूर्वगामी जनसंख्या स्थानांतरण और उनसे उत्पन्न ऐतिहासिक ओर सांस्कृतिक प्रभावों के परिणाम हैं । अत: रैटज़ेल को घोर नियतिवादी की संज्ञा देना उचित नहीं है ।

रैटज़ेल के अनुसार पृथ्वी पर मनुष्य का जीवन और उसके विकास की प्रक्रिया तीन प्रमुख तत्वों पर निर्भर है । प्रथम, परिस्थिति अर्थात् उसके पर्यावास की अन्य समूहों के पर्यावासों के सम्बन्ध में सापेक्षिक स्थिति । द्वितीय, स्थान अर्थात् वह विशिष्ट भूखण्ड जिस पर मानव पर्यावास स्थित है तथा जिससे वह समूह जीविकोपार्जन के संसाधन प्राप्त करता है ।

तृतीय, राजनीतिक सीमाएं जो पड़ोसी मानव समष्टियों द्वारा क्षेत्र प्रसार की निरन्तर प्रक्रिया से उत्पन्न क्षेत्रीय संतुलन के परिणाम हैं । इस संतुलन के बिगड़ते ही सम्बद्ध सीमाएं स्थानच्युत हो जाती हैं तथा पड़ोसी राज्यों के प्रभाव क्षेत्र का पुनर्सीमांकन आवश्यक हो जाता है ।

अनेक विद्वानों को आपत्ति है कि प्राणिविज्ञान में प्रचलित सामान्य सिद्धान्तों के प्रतिपादन की पद्धति के प्रभाव में रैटज़ेल ने राजनीतिक क्षेत्र में भी सार्वभौम नियमों के प्रतिपादन का प्रयास किया जो एक त्रुटिपूर्ण कदम था ।

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मानव व्यवहार प्राकृतिक इकाइयों की भांति सभी समय और सभी स्थान पर एक समान नही होता । मानव व्यवहार स्थान और समय सापेक्ष है । अत: मानवीय व्यवहार के क्षेत्र में प्रतिपादित नियमो में सार्वभौमिकता की खोज निरर्थक है ।

इस सन्दर्भ में ध्यातव्य है कि अपने एंथ्रोपोजिओग्राफी (मानव भूगोल) नामक ग्रंथ (1882) में रैटज़ेल ने स्पष्ट किया था कि:

यदि वैज्ञानिक अध्ययन का  मुख्य उद्‌देश्य सार्वभौम नियमों की खोज है तो उस अर्थ में मानव भूगोल एक विज्ञान नहीं है । पर विज्ञान सम्बन्धी यह अवधारणा दोषपूर्ण है ।

क्या सांख्यकीय विज्ञान उसी प्रकार की अनिश्चयता का अध्ययन नहीं करता जैसा की हम भूगोल में करते हैं ? तो क्या सांख्यिकी द्वारा प्रतिपादित सम्भावनात्मक नियम वैज्ञानिक नियम नहीं है ? सांख्यिकी की भांति भूगोल भी सम्भावनात्मक नियमों का प्रतिपादन कर सकता है ।

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परन्तु यह बात सही है कि अध्ययन हेतु एक ही प्रकार के उदाहरणों की सीमित संख्या में उपलब्धता के परिणामस्वरूप काल में प्रतिपादित नियमों की विश्वसनीयता अपेक्षाकृत कम होती है ।

रैटज़ेल के उपर्युक्त कथन से स्पष्ट मानव भूगोल के क्षेत्र में नियम प्रदिपादन की। चर्चा करते समय लेखक का तात्पर्य सार्वभौम सत्यता वाले वैज्ञानिक नियमों से न होकर सम्भावनात्मक नियमों के प्रतिपादन से था । इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती ।

राजनीतिक भूगोल के क्षेत्र में रैटज़ेल का सबसे महत्वपूर्ण योगदान इस बात में निहित हैं कि राज्य की जैविकीय परिकल्पना के माध्यम से उन्होंने राजनीतिक भूगोल के अध्ययन को एक नई वैज्ञानिक परिदृष्टि प्रदान की ।

उसकी पारिस्थितिकीय अध्ययन पद्धति ने राजनीतिक भूगोल को तर्क संगतता और अनुशासनबद्धता प्रदान की । रैटज़ेल के पहले राज्यों का भौगोलिक अध्ययन उनके क्षेत्रीय वर्णन तक ही सीमित था ।

परिणामस्वरूप उन्नीसवीं सदी के अन्त तक राजनीतिक भूगोल प्रादेशिक भूगोल का एक गौण पक्ष मात्र था । रैटज़ेल की रचनाओं के प्रभाव में कुछ ही वर्षो में राजनीतिक भूगोल मानव भूगोल का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया था ।

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