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Development of Political Geography after 1960 | Hindi

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साठ के दशक के पूर्वाद्ध तक हार्टशोर्न और जोन्स की अध्ययन विधियां राजनीतिक भूगोल के अध्ययन में प्रमुख दिशा निदेशक बनी रहीं । इस बीच शेष मानव भूगोल अनेक वैचारिक परिवर्तनों के दौर से गुजर चुका था ।

मात्रात्मक क्रान्ति के प्रभाव में भूगोल के अध्ययन का केन्द्र क्षेत्रों के वर्णन और निरूपण से हट कर दूरत्वपरक सामाजिक सम्बन्धों के अध्ययन की ओर प्रवृत्त हो चुका था । साथ ही मानव भूगोल वर्णनात्मक के स्थान पर अधिकाधिक रूप में विश्लेषणात्मक वैज्ञानिक अध्ययन बन गया था ।

सिद्धान्त प्रतिपादन उत्तर मात्रात्मक क्रान्ति के दौर में मानव भूगोल का प्रमुख उद्‌देश्य हो गया था । ऐसे में स्वाभाविक था कि ये वैचारिक हलचलें राजनीतिक भूगोल के विद्यार्थियों को भी उद्वेलित करें । अत: नई पीढी एक ऐसी अध्ययन पद्धति की खोज में थी जिसके माध्यम से सिद्धान्तपरक अध्ययन के लिए मार्ग प्रशस्त हो सके ।

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इन पंक्तियों का लेखक उन दिनों संघीय शासन व्यवस्था के सिद्धान्तपरक तुलनात्मक अध्ययन में लगा था । अध्ययन का उद्‌देश्य संघीय प्रशासनिक व्यवस्था के उद्‌भव और उसके स्थायित्व के सिद्धान्तों की खोज करना था ।

अध्ययन पद्धति की खोज का परिणाम नीदरलैण्ड जर्नल ऑफ इकोनोमिक एण्ड सोशल जिओग्राफी में एक लघु लेख के रूप में प्रकाशित हुआ ।  लेखक ने इसे व्युत्पत्ति प्रकार्य अध्ययन पद्धति (जेनेटिक-फंक्शनल एप्रोच) की संज्ञा दी । इस पद्धति की मूल अवधारणा इस प्रकार है ।

 व्युत्पत्ति प्रकार्य अध्ययन पद्धति:

राजनीतिक भूगोल के अध्ययन में सिद्धान्तपरक अध्ययन का विरोध करने वाले विचारकों की मान्यता थी कि भौगोलिक क्षेत्र (विशेषकर राजनीतिक प्रकार के भौगोलिक क्षेत्र) अनूठी क्षेत्रीय इकाइयां हैं वे वर्ग प्रतिनिधि नहीं हैं, अत: उनके सम्बन्ध में साधारणीकरण सम्भव नहीं है ।

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मात्रात्मक क्रांति के बाद के मानव भूगोल के विचारकों, विशेषकर बंगे (1966) ने क्षेत्रों के अनूठेपन की धारणा को पूरी तरह नकार दिया । इसके साथ ही राजनीतिक भौगोलिक क्षेत्रों के अनूठेपन को लेकर चली आ रही भ्रान्ति समाप्त हो जानी चाहिए थी, परन्तु राजनीतिक भूगोल के मानव भूगोल की मुख्य धारा से कटा होने के कारण ऐसा नहीं हो सका ।

मानव भूगोल की उस समय प्रचलित मान्यता के अनुसार संसार में प्रत्येक व्यक्ति दूसरों से भिन्न है परन्तु समकालीन विद्वत समाज की सर्वप्रमुख पहचान इस बात में निहित है कि आज विद्यार्थी अपने अनुभव के दायरे में वस्तुओं को उनके सामान्य लक्षणों के आधार पर देखता है न कि उनके आपसी विभेदों के आधार पर ।

इसीलिए राजनीति के विद्यार्थी अब राज्यों को विशेष प्रकार की व्यवस्थाओं के उदाहरण के रूप में देखने लगे थे  । संक्षेप में सिद्धान्तपरक अध्ययन के लिए आवश्यक था कि अध्ययन किए जाने वाले विषय (अर्थात् राज्य) को एक वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत कर उसके सामान्य लक्षणों के बारे में आधारभूत सिद्धान्तों के प्रतिपादन का प्रयास किया जाए ।  व्युत्पत्ति प्रकार्य पद्धति में इसी उद्‌देश्य की प्राप्ति का प्रयास किया गया ।

राज्यों को उनकी प्रशासनिक व्यवस्था के आधार पर दो प्रकार के वर्गो में विभक्त किया गया, परिसंघीय व्यवस्था वाले तथा ऐकिक व्यवस्था वाले राज्य । लेखक का उद्‌देश्य परिसंघीय व्यवस्था की व्युत्पत्ति और उसके स्थायित्व के भूगोल का सिद्धान्तपरक अध्ययन करना था अत: परिसंघीय व्यवस्था के उदाहरण के माध्यम से ही अध्ययन पद्धति का स्वरूप दर्शाया गया ।

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सिद्धान्तपरक अध्ययन के लिए तूलनात्मक पद्धति आवश्यक है, तथा तुलना केवल समानधर्मी इकाइयों के बीच ही की जा सकती है । अत: अध्ययन प्रारम्भ करने के पहले अध्ययन की जाने वाली इकाइयों की सामान्य पहचान वाले तत्वों को रेखांकित करना आवश्यक था ।

अध्ययन की जाने वाली समस्या के सन्दर्भ में ये पक्ष इस प्रकार थे:

(1) परिसंघीय व्यवस्था की व्युत्पत्ति के लिए आवश्यक और पर्याप्त कारक क्या है, तथा

(2) परिसंघीय व्यवस्था की स्थापना के पश्चात् उसकी सफलता, निरन्तरता और स्थायित्व किन बातों पर निर्भर है । यह जानने के लिए आवश्यक था कि भिन्न-भिन्न परिसंघीय व्यवस्था वाले राज्यों में इस व्यवस्था के उद्‌भव और उद्‌भव के उपरान्त उसके स्थायित्व अथवा उसकी विफलता का सिद्धान्तपरक दृष्टि से तुलनात्मक अध्ययन और विश्लेषण किया जाए ।

परिसंघ व्यवस्था न्यूनाधिक रूप से स्वतंत्र, या स्वायत्त, अथवा परस्पर अलग-अलग क्षेत्रीय पहचान वाली इकाइयो के एक जुट होने की प्रक्रिया का परिणाम है, अत: इसकी स्तुत्पत्ति का आधार इसमें सम्मिलित होने वाली इकाइयों की विशिष्ट प्रकार की मनोवैज्ञानिक रुझान में निहित होता है ।

इस मन: स्थिति की आधारभूत विशेषता यह है कि सम्बद्ध इकाइयां अपने पृथकृ-पृथक् स्थानीय हितों की रक्षा के लिए सम्बद्ध प्रशासनिक मामलों में स्वतंत्र निर्णय का अधिकार अपने पास बनाए रखना चाहती हैं । परन्तु साथ ही सभी इकाइयां इस बात पर भी सहमत हैं कि कुछ ज्वलन्त समस्याओं के समाधान के लिए उनका एक जुट होना आवश्यक है । इन दो परस्पर विरोधी उद्‌देश्यों की पूर्ति के लिए इकाइयों में परस्पर मोल-तोल (बारगेन) के द्वारा समझौता होता हैं ।

समझौते की शर्तों के अनुसार सम्बद्ध इकाइयों को एक ओर संवेधानिक स्वायत्तता मिलती है तो दूसरी ओर सम्पूर्ण देश (अर्थात् सम्बद्ध क्षेत्रीय समष्टि) एक केन्द्रीकृत और पूरी तरह से क्रियाशील इकाई के रूप में स्थापित हो जाता है ।

संघात्मक व्यवस्था वाले अलग-अलग देशों के सविस्तार तुलनात्मक विश्लेषण के आधार पर शोधकर्ता उन तत्वों को पहचानने का प्रयास करता है जिनके कारण क्षेत्रीय इकाइयां स्वनिर्णय के अधिकार को प्राप्त किए बिना संघ में प्रवेश करने के लिए तेयार नहीं हो सकती तथा साथ ही यह भी ज्ञात करने का प्रयास करता है कि वे कौन से तत्व हैं जिनके कारण ये अलग-अलग इकाइयां पूर्ण स्वतंत्रता के दावे को त्याग कर एक केन्द्रीय सत्ता का अभिन्न अंग बनने के लिए प्रस्तुत हो जाती हैं ।

समस्या के सर्वांगीण तुलनात्मक विश्लेषण के आधार पर हम स्थानीय पहचान और अन्तरक्षेत्रीय एकता के तत्वों के सम्भावित सम्मिश्रणों के स्वरूप को निर्धारित करते हुए परिसंघीय व्यवस्था की व्युत्पत्ति के बारे में सामान्य सिद्धान्त प्रतिपादित कर सकते हैं ।

इस तुलनात्मक अध्ययन पद्धति द्वारा परिसंघीय राज्यों की क्रियात्मकता के विश्लेषण के आधार पर हम यह ज्ञात कर सकते हैं कि किन कारणों से कुछ परिसंघीय व्यवस्थाएं सफल होती हैं तो कुछ विफल, कुछ स्थायी तो अन्य अस्थायी ।

संक्षेप में व्युत्पत्ति-प्रकार्य अध्ययन पद्धति नीचे दिए गए तीन प्रश्नों (अथवा उनके अन्य किसी सम्मिश्रण) के उत्तर खोजने के प्रयास पर केन्द्रित है:

1. अध्ययन की जाने वाली संघटनात्मक के सामान्य संरचनात्मक तत्व क्या हैं ?

2. इस प्रकार की अन्य संगठनात्मक इकाइयों के अध्ययन से प्राप्त किन विशेषताओं का इसमें दर्शन हो रहा है ?  यदि इसमें उनसे भिन्न विशेषताएं दिखाई दे रही है तो इसके कारण क्या हैं ?

3. उपर्युक्त दो प्रश्नों के उत्तर के आधार पर तीसरा प्रश्न उठता है कि निर्दिष्ट संरचनात्मक प्रारूप के आधार पर कौन सी प्रक्रियाएं उदभूत होती हैं ?

अर्थात् यदि संरचनात्मक व्यवस्था के प्रारूप में कोई अन्तर उत्पन्न होता है तो उसके परिणाम सामान्य परिणाम (अथवा व्यवहार प्रारूप) से किस प्रकार भिन्न होंगे ? आधारभूत मान्यताओं की दृष्टि से यह पद्धति बहुत सीमा तक समाजशास्त्रीय अध्ययन के ”संरचनात्मक-क्रियात्मक विश्लेषण”  के समरूप थी ।

संघात्मक व्यवस्था की व्यत्पत्ति और उसके स्थायित्व में निहित सामान्य सिद्धांतों की खोज पर केन्द्रित अपने अध्ययन में लेखक  ने इसी पद्धति का प्रयोग किया था ।  विद्वत समाज में इस अध्ययन के परिणामों के व्यापक स्वागत से सिद्ध होता है कि यह अध्ययन पद्धति व्यावहारिक स्तर पर फलदायक रही है ।

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