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Economic Revolution in Political Geography | Hindi

Read this article to learn about the economic revolution in political geography in Hindi language.

साठ और सत्तर के दशक में राजनीतिक भूगोल में स्थानिक (एरियल) वर्णनात्मक अध्ययन पद्धति के स्थान पर अन्तरक्षेत्रीय प्रवाहों और संबन्धों पर केन्द्रित मात्रात्मक अध्ययन विधि और व्यवहारवादी तथा व्यवस्थात्मक परिदृष्टियों के प्रवेश से विषय को नई स्फूर्ति मिली ।

अनेक विद्वानों ने इसे नए प्रभात के रूप में देखा । परन्तु शीघ्र ही इस नए दोर की उपलब्धियों और चुटियों का आकलन करने पर विद्वानों का प्रारम्भिक उत्साह धीमा पड़ गया । निकट से देखने पर आभास हुआ कि मात्रात्मक और दूरत्वपरक क्षेत्रीय अध्ययन मुख्य रूप से सतही अध्ययन था क्योंकि वह वस्तुस्थिति के सतही लक्षणों के विश्लेषण तक ही सीमित था ।

सतह के नीचे स्थित मूलभूत सामाजिक ऐतिहासिक कारणों के मूल्यांकन ओर समाज के दु:ख दर्द को समझने और उन्हें सुलझाने में वह पूर्णतया असफल था । व्यवस्थावादी और व्यवहारवादी परिदृष्टियों के अन्तर्गत शोधकर्ता बहुधा संतुलित घटनाक्रमों के अध्ययन में प्रवृत्त थे ।

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अत: सामाजिक ओर राजनीतिक जीवन के प्रतिदिन के संघर्ष से सम्बन्धित मुद्‌दे उनकी दृष्टि से सर्वथा ओझल थे । हमारे दैनिक जीवन में पग-पग पर संघर्ष और रोजी रोटी की लडाई है । अत: यहां किसी प्रकार के संतुलन के दर्शन का प्रयास वास्तविकता से पलायन का मार्ग था ।

जीवन का यह संघर्ष व्यवस्थावादी संतुलनकारी परिदृष्टि और सांख्यकीय विश्लेषण की पहुंच से परे था । इन बातों के प्रकट होने के साथ ही सामाजिक विज्ञानों में व्यवस्थावादी और व्यवहारवादी अध्ययन तथा मात्रात्मक विश्लेषण पद्धति से मोह भंग प्रारम्भ हो गया ।

कालांतर में मोह भंग की यह लहर मानव भूगोल और उसके रास्ते राजनीतिक भूगोल तक पहुंच गई । राजनीतिक भूगोल में इसका प्रवेश अस्सी के दशक के प्रारम्भ में हुआ । व्यवस्थात्मक परिदृष्टि से प्रेरित व्यवहारवादी और मात्रात्मक तथा विश्लेषणात्मक अध्ययन अब यथास्थितिवादी और सामाजिक आवश्यकताओं और आदर्शों के प्रति सर्वथा उदासीन अध्ययन प्रतीत होने लगा ।

यही कारण था कि अस्सी के दशक में राजनीतिक भूगोल में अध्ययन किए जाने वाले विषय की सामाजिक प्रासंगिकता पर जोर दिया जाने लगा तथा समाज के निर्धन ओर सुविधाहीन वर्गों की समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित करने की मांग बड़ी । मानव भूगोल की अन्य शाखाओं में यह परिवर्तन सत्तर के दशक के प्रारम्भ में ही आ गया था ।

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इस नई परिदृष्टि के अधीन लोकतांत्रिक ओर पूंजीवादी व्यवस्था वाले देशों में सरकारी नीतियों के निर्धारण और कार्यान्वयन में समाज के पिछड़े और मूल सुविधाओं से अपेक्षाकृत वंचित जनसमूह पर उनके प्रभाव का आकलन अध्ययन-अनुशीलन का प्रमुख मुद्‌दा बन गया ।

इसीलिए सामाजिक अध्ययन की इस नई परिदृष्टि को राजनैतिक अर्थशास्त्रीय परिदृष्टि (पोलिटिकल इकॉनामी परस्पेक्टिव) की संज्ञा दी गई । इस नई चिन्तन धारा को राजनीतिक अर्थशास्त्रीय परिदृष्टि कहा गया (इस पुस्तक में हम इसे अर्थनीतिक परिदृष्टि कहेंगे) क्योंकि जहां एक ओर यह अर्थशास्त्र की भांति धन के उत्पादन, वितरण और उपभोग में दक्षता का पक्षधर हैं तो वहीं दूसरी ओर राजनीतिशास्त्र की तरह जीवन के विभिन्न पक्षों (विशेषकर आर्थिक पक्षों) के प्रशासन, नीति निर्धारण, और कार्यान्वयन मेंनैतिक प्रश्नों, अर्थात् न्याय-अन्याय, सही-गलत, और उचित-अनुचित के विभेद पर ध्यान केन्द्रित करता है तथा इस बात का भी ध्यान केन्द्रित करता है कि राज्य प्रशासन द्वारा प्रदत्त सार्वजनिक सेवाएं सभी वर्गों और सभी प्रकार की बस्तियों में रहने वालों के बीच न्यायोचित रूप मे आबटित है अथवा नहीं ।

सत्तर के दशक के अन्तिम चरण में राजनीतिक भूगोल में अर्थनीतिक परिदृष्टि के समावेश की दिशा में प्रयत्न शुरू हो गए थे । अमरीकी राजनीतिशास्त्री हरोल्ड लासवेल (1936) ने काफी पहले राजनीतिशास्त्र को समाज में ”कौन, क्या और क्यों पाता है” पर केन्द्रित अध्ययन बताया था ।

राजनीतिशास्त्र की इस परिभाषा से प्रेरणा लेकर अनेक विद्वानों ने राजनीतिक भूगोल को ”कोन, क्या, कहां और क्यों पाता है” पर केन्द्रित अध्ययन के रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया । इस सन्दर्भ में ”कौन” से तात्पर्य उस वर्ग अथवा समूह से है जिसका राजनीतिक-सामाजिक जीवन अध्ययन का विषय है । (ध्यातव्य है कि आधुनिक राजनीतिक-आर्थिक (अर्थनीतिक) अध्ययन पद्धति कार्ल मार्क्स की साम्यवादी विचारधारा से प्रेरित है जिसके अनुसार समाज का हर व्यक्ति समाज के परस्पर प्रतिस्पर्धी (आर्थिक आधार पर विभाजित) वर्गो में से एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है ।)

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”क्या” से तात्पर्य उन सार्वजनिक गुणों (अथवा दोषों) से है जिनसे कोई वर्ग समूह प्रभावित है । ”कहां” से तात्पर्य है कि किसी भी समूह को प्राप्त होने वाले सार्वजनिक गुण और दोष (पब्लिक गुड्‌स एण्ड बैड्‌स) उनके निवास स्थान की स्थिति पर निर्भर है ।

(सिविल लाइन्स के निवासियों को नगर निगम द्वारा दी जाने वाली सार्वजनिक सुविधाएं अपेक्षाकृत प्रचुर मात्रा में तथा उत्तम दर्जे की होती हैं परन्तु निर्धन लोगों की बस्तियों में अपर्याप्त मात्रा में तथा निम्न कोटि की ।) ”कैसे” का सम्बन्ध उन आर्थिक और सामाजिक प्रक्रियाओं से है जिनके कारण समाज में व्याप्त असमानताएं उत्पन्न हुई हैं ।

इस नई परिदृष्टि के प्रवेश के साथ ही राजनीतिक भूगोल का विद्यार्थी समाज निर्माण में सक्रिय भागीदार बन गया । पूर्वगामी दौर की क्षेत्रीय परिदृष्टि के युग से यह बहुत बड़ा गुणात्मक परिवर्तन था । अभी तक राजनीतिक भूगोल का विद्यार्थी मूल्य निरपेक्ष शोध धमी था जो कि शुद्ध विज्ञानों के शोधकर्ताओं की भांति अपना उत्तरदायित्व वस्तुस्थिति के विश्लेषण तक ही सीमित मानता था ।

सामाजिक वस्तुस्थिति में निहित न्याय-अन्याय उसके विचार-विमर्श के दायरे के बाहर थे । इसीलिए पूर्वगामी मानव भौगोलिक अध्ययन को यथास्थितिवादी कहा गया । 1980 के दशक के नए राजनीतिक भूगोल के विद्यार्थी के अध्ययन का प्रमुख उद्‌देश्य समाज की विसंगतियों को समझना, ओर उनके कारणों को रेखांकित कर उनके समाधान का मार्ग प्रशस्त करना हो गया ।

क्षैतिज वितरण का निरूपण और व्याख्या अभी भी भौगोलिक अध्ययन पद्धति का मूलाधार था परन्तु सामाजिक न्याय अब इसका आधारभूत निदेशक सिद्धान्त बन गया । सार्वजनिक सुविधाओं के क्षैतिज वितरण में सामाजिक न्याय की दृष्टि से विसंगतियों का निरुपण और अपेक्षाकृत अधिक न्यायसंगत क्षेत्रीय वितरण के लिए मार्ग दर्शन अब राजनीतिक भूगोल के अध्ययन के मूल विषय के रूप में स्थापित हो गया ।

आठवें दशक में राजनीतिक भूगोल की अर्थनीतिक परिदृष्टि में सामाजिक वितरण अध्ययन का केन्द्रीय विषय बन गया था । चूंकि सामाजिक वितरण का प्रकार, उसका स्वरूप, उसका औचित्य अथवा अनौचित्य, उसमें निहित न्याय-अन्याय सम्बन्धी मुद्‌दे मूल रूप से केन्द्रीय प्रभुसत्ता की नीतियों पर निर्भर हैं इसलिए अर्थनीतिक परिदृष्टि के सम्यक प्रयोग के लिए सत्ता के स्वरूप तथा राज्य की प्रकृति का ज्ञान आवश्यक हो गया ।

इसी कारण इस दशक में राज्य की प्रकृति और उसके उद्‌देश्य बौद्धिक विमर्श के प्रमुख विषय के रूप में प्रस्तुत हुए । इसके सम्यक् ज्ञान के बिना शासन का स्वरूप तथा प्रशासकीय क्रियाकलाप के तौर तरीकों को समझना सम्भव नही था ।

मोटे तौर पर राज्य की संरचना और स्वरूप के बारे में दो भिन्न-भिन्न विचारधाराएं हैं । एक नव-क्लासिकी (अर्थात् सार्वजनिक चुनाव अथवा पब्लिक च्वायस) विचारधारा जो एडम स्मिथ की अबध अर्थव्यवस्था (लैसेफेयर इकॉनोमी) को मानते हुए आर्थिक क्षेत्र में पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता की पक्षधर थी ।

इस विचारधारा के अनुसार व्यक्तिगत उपयोगिता के आधार पर अबध आर्थिक व्यवहार के माध्यम से दी जाने वाली सरकारी सहायता से सामाजिक व्यवस्था में स्थायित्व लाया जा सकता है । आर्थिक प्रगति की दौड़ में पीछे रह गए वर्गों को राजकीय सहायता के माध्यम से न्यूनतम जीवन स्तर प्राप्त कराना इस अवधारणा की आधारभूत नीतिगत मान्यता हैं ।

दूसरी विचारधारा वामपंथी विचारधारा है जिसका मूल स्रोत कार्ल मार्क्स का साहित्य है । इसके अनुसार एडम स्मिथ के विचारों के अनुरूप पूंजीवादी राजव्यवस्था के क्रियान्वयन से सामाजिक स्थायित्व के बदले सामाजिक विसंगतियां उत्पन्न होती हैं ।

अर्थात् विभिन्न वर्गों के बीच आर्थिक दूरी उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है जिससे सामाजिक अन्याय को बढ़ावा मिलता है । इसलिए इस विचारधारा के अनुयायी राजतंत्र में समाज के आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े मजदूरों ओर किसानों के विशाल समूह की भागीदारी ओर उनके हितों के अनुरूप नीति निर्धारण के पक्षधर हैं ।

जहां नव-क्लासिकी विचारधारा व्यक्तिगत अधिकारों की स्वतंत्रता पर बल देती है, वहीं वामपंथी अर्थनीतिक परिदृष्टि, सामूहिक अधिकारों और वर्गहित की पक्षधर डुऐं । इसके अनुसार वर्गहित समाजहित से पहले आता है ओर व्यक्तिगत हित और व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा राजनीतिक प्रशासनिक प्रक्रिया के अपेक्षाकृत गौण मुद्‌दे हैं ।

अत: इस विचारधारा के अनुसार केन्द्रीय प्रभुसत्ता का सर्वप्रमुख दायित्व राजतंत्र के अन्तर्गत सम्पूर्ण समाज के हितों की सुरक्षा है । ऐसी नीतियां बनाना और उनको कार्यान्वित करना है जो बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय हों, तथा ऐसी व्यवस्था देना है कि समाज के हर तबके को सामान्य सुख सुविधा प्राप्त हो सके ।

इस परिदृष्टि के अनुसार नीति निर्धारण का निदेशक सिद्धान्त ऐसी सुविधाओं को जन-जन तक पहुंचाना है जिनका प्रबन्ध निजी प्रयासों द्वारा सम्भव नहीं है क्योंकि उनके संचालन में लाभ प्राप्ति के अवसर प्राय: अनुपस्थित हैं अत: इस क्षेत्र में निजी पूंजी आकृष्ट नहीं हो सकती । सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध और अस्सी के दशक के पूर्वार्द्ध में इन दोनों विचारधाराओं में परस्पर प्रतिस्पर्धा सी चल रही थी । परिणामस्वरूप विचार विमर्श का स्वर द्वन्द्वात्मक था ।

वामपंथी विचारक नव-क्लासिकी मान्यता वाले अध्ययन को यथास्थितिवादी अर्थात समाज में व्याप्त असमानताओं को बनाए रखने की नीति के पक्षधर कह कर उसकी आलोचना करते थे, तो दूसरी ओर नव-क्लासिकी परिदृष्टि वाले शोधकर्ता वामपंथी और सामाजिक पुनर्निर्माण के पक्षधर चिन्तकों को अव्यवहारिक और ख्याली पुलाव बनाने वालों की संज्ञा देते रहे ।

अस्सी के दशक का उत्तरार्द्ध आते-आते इस वैचारिक रस्साकसी में काफी उतार आया । दोनों पक्ष एक दूसरे की परिदृष्टि के परिपूरक पक्षों को मान्यता देने लगे । यद्यपि अधिकांश शोध कार्य अभी भी नव-क्लासिकी परिदृष्टि से सम्पन्न किया जाता रहा और अध्ययन मुख्यतया मानव कल्याण (ह्युमन वेल्फेयर) के विभिन्न पक्षों पर केन्द्रित था परन्तु शोधकर्मी अब सामाजिक असमानताओं और विसंगतियों के कारकों पर अधिक ध्यान देने लगे थे ।

परिणामस्वरूप सामाजिक असमानताओं के विश्लेषण ओर उनके कारणों के निरूपण में मार्क्स के विचार पद्धति को उत्तरोत्तर अधिक सम्मान दिया जाने लगा । इस संदर्भ में यह बताना आवश्यक हे कि मानव भूगोल को समाज में मानव की दशा (कंडीशन ऑफ मैन इन सोसाइटी) पर केन्द्रित अध्ययन के रूप में स्थापित करने की दिशा में ब्रिटिश भूगोलवेत्ता डैविड स्मिथ (1977) की पुस्तक  ह्यूमन जिओग्राफी: ए वेल्फेयर एप्रोच ने प्रमुख भूमिका निभाई ।

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