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Forms of Imperialistic Rule | Hindi

Read this article to learn about the forms of imperialistic rule across the world in Hindi language.

सामान्यतया साम्राज्यवादी शासन के दो रूप थे । एक प्रत्यक्ष शासन ओर दूसरा अप्रत्यक्ष शासन । फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, हालैण्ड और वेल्जियम आदि के साम्राज्यवादी शासन में अनेक विभिन्नताओं के होते हुए समानता का एक सूत्र विद्यमान था ।

इन देशों की नीति अपने अधिकृत क्षेत्रों का स्थानीय शासन सीधे अपने नियंत्रण में रखने की थी अतएव उसमें स्थानीय नागरिकों की कोई भूमिका नहीं थी । इसी कारण इसे प्रत्यक्ष शासन कहा गया है । इसके विपरीत ब्रिटेन की साम्राज्यवादी शासन नीति के अन्तर्गत यद्यपि शासन नियंत्रण पूरी तरह सीधे ब्रिटेन के हाथ में था परन्तु शासकीय कार्य में स्थानीय जातीय नेताओं ओर ऐतिहासिक शासकों की भागीदारी बनी हुई थी, भले ही यह भागीदारी प्रतीक मात्र थी ।

अफ्रीका में इस प्रकार की शासकीय व्यवस्था के प्रमुख पक्षधर 1900 में नाइजीरिया के गवर्नर-जनरल रहे लार्ड लूगार्ड थे । उनके अनुसार इस शासन पद्धति का मुख्य लाभ यह था कि स्थानीय सामाजिक व्यवस्था में निरन्तरता बनी रहती है और साथ ही शासन में भागीदारी के माध्यम से स्थानीय नेता आधुनिक शासन व्यवस्था से परिचित होते रहते है ।

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नीति निर्धारकों के विचार में ”अपनी सारी कमियों के बावजूद स्थानीय अफ्रीकी नेता अनुभवहीन युवा ओर बहुधा दिशाहीन अंग्रेज प्रशासकों की अपेक्षा जनता के हितों की सुरक्षा में अधिक सक्षम हें” । परन्तु ऊपर उदारवादी प्रतीत होने वाला यह तर्क केवल उन्हीं अफ्रीकी उपनिवेशों के लिए उपयुक्त समझा गया जहां यूरोपीय मूल के अधिवासियों का अस्तित्व नहीं था । यह नीति श्वेत लोगों के निवास वाले क्षेत्रों उदाहरणार्थ, दक्षिण अफ्रीका, रोडेसिया तथा केन्या के पहाडी भागों के लिए लागू नहीं थी ।

यद्यपि तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट है कि अप्रत्यक्ष शासन वाले उपनिवेशों की स्थिति प्रत्यक्ष शासन व्यवस्था वाले उपनिवेशों की अपेक्षा बेहतर थी, परन्तु इस नीति के पीछे जिस उदारवाद का आभास होता था वह जनहित के उद्‌देश्य से प्रेरित न होकर साम्राज्यवादी हितों से प्रेरित था ।

स्थानीय नेताओं को शासन से जोड़ने का स्पष्ट लाभ यह था कि इस प्रकार स्थानीय जनता पहले की तरह ही छोटी-छोटी ओर परस्पर प्रतिस्पर्धापूर्ण इकाइयों मे बंटी रहेगी, अत: देश में सम्पूर्ण उपनिवेशीय इकाई के स्तर पर अखंड राष्ट्रीय भावना का संचार नहीं हो सकेगा क्योंकि प्रत्येक जातीय इकाई अपने को अन्य जातीय इकाइयों से अलग समझती रहेगी ।

इसीलिए स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् इन देशों में राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय एकता की स्थापना एक विकट समस्या बनी हुई है । इस प्रकार की नीति का अनुसरण करके व्रिटिश शासन ने भारत के उपजाऊ मैदानी ओर तटीय क्षेत्रों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लेने के पश्चात् बाकी अपेक्षाकृत कम महत्व के क्षेत्रों को स्थानीय राजाओं के नेतृत्व में अप्रत्यक्ष शासन व्यवस्था में छोड़ दिया था ।

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ये राजशाही प्रदेश सामन्तवादी द्वीपों की भांति लम्बे अरसे तक आधुनिक विकास, राजनीतिक चेतना और वैज्ञानिक शिक्षा से वंचित रह गए थे । कांग्रेस के नेतृत्व में स्वतंत्रता आन्दोलन भी उनमें अधिक प्रभावी नहीं हो सका था ।

इस प्रकार के अप्रत्यक्ष शासन का ही परिणाम है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इतने अधिक समय तक ये क्षेत्र अपेक्षाकृत अविकसित बने रहे । इस व्यवस्था के माध्यम से देश की राजनीतिक चेतना को विभाजित रखने में साम्राज्यवादी प्रशासक काफी सीमा तक सफल रहे थे ।

मूलतया यह “तोडो और राज करो” की व्यापक ब्रिटिश नीति का अंग था । इसी नीति के अन्तर्गत ब्रिटिश सरकार ने अपने उपनिवेशों के गवर्नरों को निर्देश दिए थे कि जहां कहीं सम्भव हो स्थानीय सांस्कृतिक, धार्मिक ओर अन्य जातीय विभिन्नताओं को मान्यता और सुरक्षा प्रदान करना चाहिए जिससे विभित वर्गों का स्थानीय असंतोष एक सम्मिलित आन्दोलन का रूप न ले सके । इसी उद्‌देश्य से भारतीय जनगणना आयोगों ने धर्म और जाति के आधार पर जनगणना के आंकड़े एकत्र करना प्रारम्भ किया तथा इन आंकड़े का प्रशासनिक कार्यो में प्रयोग होने लगा ।

परिणामस्वरुप स्थानीय स्तर पर जात-पांत के विभेदों के बावजूद जो लोग एक परस्पर निर्भर समन्वित नागरिक समाज के रूप में युगों से साथ-साथ सौहार्द्रपूर्ण जीवन यापन कर रहे थे वे ब्रिटिश शासन की विभाजक नीति के प्रभाव में सरकारी सहायता आदि के लिए परस्पर प्रतिस्पर्धाशील जातीय इकाइयों में बंट गए ।

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भारत, श्रीलंका और मलेशिया तथा फीजी में धार्मिक आधार पर वैमनस्य का बीजारोपण इसी नीति का परिणाम था । हिन्दुओं में जाति के आधार पर जनगणना का उद्‌देश्य उनकी धर्म के आधार पर जाग्रत राष्ट्रीय एकता की चेतना को अशक्त करना था ।

दलित ओर जनजातियों गुटों की अलग सूची प्रकाशित करने के पीछे उन्हें हिन्दू धर्म की परिधि में बाहर रखना था । इन जातियों के सदस्यों का बाद में बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म स्वीकार करना इसी कूट चाल का परिणाम था । प्रत्यक्ष साम्राज्यवादी प्रशासन का सबसे प्रमुख उदाहरण फ्रांस था । फ्रांस की तत्कालीन आवश्यकताएं ब्रिटेन से सर्वथा भिन्न थीं ।

1870-1871 में प्रशा से पराजित होने के बाद यूरोपीय शक्ति संतुलन में फ्रांस की स्थिति अत्यधिक निर्बल हो गई थी क्योंकि अब सम्पूर्ण जर्मनभाषी क्षेत्र के प्रशा के नेतृत्व में संगठित हो जाने से जर्मनी की सामरिक ओर औद्योगिक शक्ति में बहुत वृद्धि हुई थी ।

ऐसे में फ्रांस के लिए आवश्यक हो गया कि वह अपने विदेशी साम्राज्यवादी इकाइयों को अपने सीधे नियंत्रण में रख कर उनके संसाधनों को फ्रांस की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करे । अत: साम्राज्यवादी प्रशासन को फ्रांसीसी सरकार द्वारा नियुक्त प्रतिनिधियों और अधिकारियों के सीधे नियंत्रण में रखा गया । परन्तु फ्रांस का स्वतंत्रता, समानता और  बन्धुत्व का मूल आदर्श उसकी साम्राज्यवादी इकाइयों के प्रशासन में भी समान रूप से प्रभावी था ।

परिणामस्वरूप फ्रांसीसी उपनिवेशों में जाति और रंग आदि के आधार पर विभेद नहीं किए जाते थे । मोटे तौर पर प्रत्यक्ष प्रशासन की नीति का उद्‌देश्य समुद्र पार के इन उपनिवेशों में फ्रांसीसी संस्कृति और भाषा के नए क्षेत्र स्थापित करना था जो पूर्णतया फ्रांस के अंग बन जाएं ।

फ्रांस की यह नीति अपेक्षाकृत कम उनत संस्कृति वाले प्रदेशों (जैसे पश्चिमी अफ्रीका तथा वेस्ट इण्डीज में) पर्याप्त सफल हुई, परन्तु उत्तरी अफ्रीकी प्रदेशों (जहां इस्लामी संस्कृति का पयप्ति विकास हुआ था) तथा पूर्वी एशियाई देशों (जैसे कम्बोडिया, लाओस तथा इण्डो-चाइना) जहां पुरानी बौद्ध संस्कृति का बोलबाला था, इसको लागू करने में अनेक कठिनाइयां उपस्थित हुई ।

प्रत्यक्ष साम्राज्यवादी प्रशासन के अन्य प्रमुख उदाहरण पुर्तगाल और हालैण्ड (नीदरलैण्ड) थे । परन्तु फ्रांस के विपरीत पुर्तगाली ओर डच साम्राज्यवादी प्रशासन स्थानीय जनता के जनतांत्रिक अधिकारों का आदर नहीं करते थे ओर स्थानीय विकास प्रशासन की वरीयता नहीं थी । अत: इन दोनों देशों के उपनिवेशों में प्रशासन अत्यधिक क्रूर था । यही कारण था कि इन दोनों के उपनिवेशों में स्वतंत्रता संग्राम इतना हिंसापूर्ण रहा ।

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