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Geography and International Relation | Hindi

Read this article to learn about the geography of world strategic vision and international relation in Hindi language.

आधुनिक राजनीति एक तीन स्तरीय प्रक्रिया है । पिछले अध्यायों में स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति की चर्चा की गई थी । इस अध्याय में हम अन्तरराष्ट्रीय स्तर की राजनीति के मुरन्य पक्षों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे । अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन राजनीतिक भूगोल की विरासत का एक महत्वपूर्ण अंग है ।

रैटज़ेल की संकल्पना के अनुसार राजनीतिक भूगोल राज्य केन्द्रित अध्ययन है । इस संकल्पना के अनुसार प्रत्येक राज्य किसी निश्चित भूखण्ड ओर उस पर निवास करने वाली मानव समष्टि के बीच दीर्घकालिक विकास प्रक्रिया के माध्यम से विकसित परस्पर अन्योन्याश्रयी पहचान पर आधारित एक विस्तारशील जैविक इकाई है ।

अत: भिन्न-भिन्न स्थानीय पहचानों का एक समग्र राष्ट्रीय पहचान में परिवर्तित होने की प्रक्रिया, देश के सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्र का एक समन्वित क्रियाशील इकाई के रूप में स्थापित करने सम्बन्धी समस्या और देश की आन्तरिक और अन्तरराष्ट्रीय राजनीति राजनीतिक भूगोल की रैट्रजेलियन संकल्पना के अनिवार्य अंग थे ।

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तत्कालीन यूरोपीय राज्यों की मूल पहचान एक विस्तारशील उपनिवेशक राज्य के रूप में थी तथा उपनिवेशवाद उनकी राष्ट्रीय समृद्धि का मूलाधार था । अत: व्यावहारिक स्तर पर रैट्‌ज़ेल युगीन राजनीतिक भूगोल राज्यों की विस्तारशील प्रवृत्ति और तज्जनित अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों (अर्थात् अन्तरराष्ट्रीय संघर्षों) के अध्ययन पर केन्द्रित हो गया ।

यह बात राजनीतिक भूगोल में मैकिंडर के योगदान से भली प्रकार स्पष्ट है । उत्तर कोलम्बस युग में मनुष्य की क्षेत्रीय और राजनीतिक अवचेतनाएं उत्तरोत्तर वृहत्तर होती गई थी ओर उन्नीसवी सदी में सम्पूर्ण पृथ्वी यूरोपीय राजनीतिक चेतना का अभिन्न अंग बन गई थी । परिणामस्वरूप आधुनिक राज्य एक विश्वव्यापी समष्टि का सदस्य बन गया ।

आज राज्यों की राजनीतिक पहचान उनके परस्पर सम्बन्धों और अन्तरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा उन्हें प्राप्त मान्यता से अनिवार्यत जुड़ी है । बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ये सम्बन्ध जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित करने लगे थे और भूमण्डलीकरण के वर्तमान दौर में राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय के बीच विभेद करना उत्तरोत्तर कठिन होता गया है ।

परन्तु द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले तक यह स्थिति गुणात्मक स्तर पर सर्वथा भिन्न थी । उत्तरोत्तर बढ़ते अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों के बावजूद अभी राष्ट्रीय राजनीतिक इकाइयों की स्वायत्त सत्ता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगे थे ।

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राष्ट्रीय सीमाएं राष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रित थीं तथा वे पूरी तरह सुरक्षित और प्रभावी विभाजक रेखाओं के रूप में विद्यमान थीं । साथ ही उपनिवेशवादी व्यवस्था के परिणामस्वरूप प्राय सम्पूर्ण अफ्रीका और एशिया महाद्वीप राजनीतिक रूप में परतंत्र थे । अत: विश्व समाज यथार्थत कुछ थोड़ी सी परस्पर प्रतिस्पर्धी राजनीतिक शक्तियों का समुदाय मात्र था ।

यही कारण था कि रैटज़ेल के जमाने से लेकर करीब 1950 तक राजनीतिक भूगोल अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न शक्तिशाली राज्यों (”महान” शक्तियों) के प्रभाव क्षेत्रों के विश्लेषण, पूर्वी यूरोप में जर्मन साम्राज्य के राजनीतिक प्रभाव वाले क्षेत्रों में बढ़ती हुई राष्ट्रीय चेतना और प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् शान्तिवार्ता की शर्तो के अनुसार भाषाई आधरि पर निर्मित नई राष्ट्रीय इकाइयों के अस्तित्व  में आने के बाद के राजनीतिक मानचित्र के विश्लेषण पर केन्द्रित रहा ।

अन्तरराष्ट्रीय सीमाएं तथा साम्राज्य स्थापना की समस्याएं और सम्भावनाएं इस अध्ययन के महत्वपूर्ण विषय थे । राजनीतिक इकाइयां मुख्यतया शक्ति संचयी संस्थाओं के रूप में निरूपित की जाती थीं । परिणामस्वरूप राजनीतिक भूगोल के अध्ययन में शक्ति संसाधनपरक और संरचनात्मक भौतिकवादी (स्ट्रक्चरलिस्टिक मैटीरियलिज्म) संकल्पना का प्राधान्य था ।

अत: अध्ययन में मानवीय अभिकरण (ह्यूमन एजेंसी) और राज्यों के वास्तविक प्रशासन तथा तत्सम्बन्धी प्रश्नों पर ध्यान नहीं दिया जाता था । संक्षेप में राजनीतिक भूगोल में राज्यों का विश्लेषण या तो उनके बाह्य राजनीतिक परिवेश के सन्दर्भ में किया जाता था या उनके प्राकृतिक परिवेशजन्य नियतिवादी प्रभाव के रूप में, क्योंकि उस समय प्रचलित मान्यता के अनुसार प्रत्येक राज्य अपरिवर्तनीय प्राकृतिक तत्वों के प्रभाव में प्रकृति द्वारा पूर्वनिर्धारित दिशा में बढ़ने के लिए बाध्य है ।

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संक्षेप में 1945 के पूर्व राष्ट्रीय स्तर पर कड़ाई से नियंत्रित अन्तरराज्यीय सीमाओं के अस्तित्व के कारण राज्यों के बीच सीमा पार का सम्बन्ध मात्र द्विपक्षीय सामरिक संघर्ष तक ही सीमित था । इस दृष्टि से द्वितीय विश्वयुद्ध अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों के अध्ययन में महत्वपूर्ण विभाजक सिद्ध हुआ ।

युद्धोपरान्त युग में अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों का स्वरूप तथा अन्तरराष्ट्रीय राजनीति का परिवेश सर्वथा परिवर्तित हो गया था । उपनिवेशवाद के अवसान के परिणामस्वरूप तथा कथित महान शक्तियां अब छोटे-छोटे राज्यों में परिवर्तित हो गई थीं । द्विध्रुवीय विश्व राजनीति के उदय के साथ ही स्थानीय युद्धों और सीमा विवादों की सम्भावनाएं कम हो गई ।

साथ ही अन्तरराष्ट्रीय राजनीति दो परस्पर खेमों में बंट गई । प्रत्येक खेमें की राष्ट्रीय इकाइयों के बीच बहुस्तरीय (आर्थिक सांस्कृतिक और अन्य) सम्बन्ध उत्तरोत्तर गहन होते गए । राज्यों के बीच इस उत्तरोत्तर बढ़ते आदान-प्रदान के परिणामस्वरूप अन्तरराष्ट्रीय समुदाय दिनानुदिन सही अर्थों मे एक ”समुदाय” (अर्थात् परस्पर निर्भर इकाइयों की समष्टि) के रूप में स्थापित हो गया ।

इन दो परस्पर सम्बद्ध प्रवृत्तियों (अर्थात् द्विध्रुवीय शीतयुद्ध, तथा भिन्न-भिन्न राष्ट्रीय इकाइयों के बीच बढ़ते आदान-प्रदान) के परिणामस्वरूप अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों के अध्ययन में दो भिन्न-भिन्न स्तरों का उदय हुआ । एक द्विध्रुवीय, परस्पर स्पर्धाशील और विरोधी राजनीतिक गुटों के बीच सामरिक संघर्ष की समस्याओं और सम्भावनाओं पर केन्द्रित अध्ययन, और दूसरा राष्ट्रों के बीच बढ़ते हुए बहुस्तरीय सम्बन्धों की राजनीति ।

यह दूसरा पक्ष राजनीतिक अध्ययन में एक सर्वथा नई दिशा थी । अन्तरराष्ट्रीय राजनीति के इस नए आयाम के अध्ययन के लिए एक नए प्रकार के राजनीति शास्त्र का विकास हुआ । इसके अध्ययन के मुख्य विषय थे राज्यों का विश्वव्यापी समाज (सोसायटी ऑफ स्टेट्‌स), उनकी परस्पर निर्भरता, तथा उनकी शासन प्रणालियों का विश्लेषण ।

पहले स्तर के अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों के अध्ययन की दिशा में मैकिंडर और स्पाइकमेन जैसे राजनीतिक भूगोल के विचारकों की कृतियों में महत्वपूर्ण दिशा निर्देश निहित थे, यद्यपि विश्वयुद्ध के बाद के दौर में इस प्रकार के अध्ययन में संरचनात्मक भौतिकवाद के स्थान पर मानव अभिकरण पर अधिक जोर दिया जाने लगा । पहले प्रकार के अध्ययन को हम राजनीतिक भूगोल की पुरानी विरासत की निरन्तर धारा के रूप में देख सकते हैं । परन्तु दूसरे स्तर का अध्ययन एक सर्वथा नई विधा थी ।

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