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Neo-Colonialism and Neo-Imperialism | Hindi

Read this article to learn about the concept of neo-colonialism and neo-imperialism in Hindi language.

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ ही पुरानी उपनिवेशवादी व्यवस्था के लिए मृत्युनाद सुनाई देने लगा था तथा पचास के दशक में एक-एक कर प्राय सभी महत्वपूर्ण उपनिवेशीय इकाइयां स्वतंत्रता प्राप्त कर चुकी थीं ।

परन्तु उपनिवेशवादी दौर में स्थापित अर्थव्यवस्था के सूत्र इतने व्यापक थे और उनकी जड़ें स्थानीय अर्थव्यवस्था में इतनी गहराई तक धंसी  थीं कि राजनीतिक स्वतंत्रता आर्थिक स्वतंत्रता नहीं ला सकी । उपनिवेशों की उत्तराधिकारी नई प्रभुसत्ता सम्पन्न इकाइयों की अर्थव्यवस्था अभी भी पूर्ववत् सम्बद्ध उपनिवेशक देशों की अर्थव्यवस्था से जुड़ी रहीं ।

अत: इन नए राष्ट्रों की स्वतंत्रता सही अर्थो में केवल आशिक स्वतंत्रता थी । इसी अदृश्य परतंत्रतापूर्ण स्थिति को नव उपनिवेशवाद की संज्ञा दी गई है संक्षेप में इसका तात्पर्य उस स्थिति से है जिसके अन्तर्गत राजनीतिक स्वतंत्रता के होते हुए आर्थिक परतंत्रता प्राय यथावत् बनी रहती है, परिणामस्वरूप उपनिवेशक ओर उपनिवेशित राष्ट्रों के बीच आर्थिक स्तर पर शोषक-शोषित का सम्बन्ध पूर्ववत् बना रह जाता है ।

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फलस्वरूप पुरानी सांस्कृतिक परतंत्रता और आरोपित मूल्य बोध में भी निरंतरता बनी रहती है ।  ऐसा होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी क्योंकि उपनिवेशित विश्व के सभी क्षेत्रों में जीवन के सभी पक्षों में समकालीन वस्तुस्थिति पश्चिमी देशो की दासता के दौर में हुए ”विकास” का परिणाम थी ।

शिक्षा, संस्कृति, तकनीक, राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था तथा अर्थतंत्र सभी पश्चिम (विशेषकर उपनिवेशक देश) से आयातित ओर प्राय: पूर्णतया आरोपित थे । ऐसी स्थिति में स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व की घोषणा के साथ ही स्थिति में आमूल परिवर्तन करना संभव नहीं था ।

अत: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी कुछ अवधि तक यथास्थिति का बना रहना स्वाभाविक था । वास्तव में नए राजनायकों ओर सामाजिक चिन्तकों की सारी शिक्षा-दीक्षा, उनकी चेतना का विकास ओर उनके आर्थिक, सामाजिक ओर राजनैतिक आदर्श उपनिवेशक राज्य में प्रचलित संस्कारों के ही अनुरूप थे ।

परिणामस्वरुप इन देशों में ओर उनके पुराने उपनिवेशक राज्यों के सम्बन्धों में निरन्तरता का बना रहना सामान्य परिणति थी । आर्थिक विषयों में यह निरन्तरता, जो नव उपनिवेशवाद का मूल आधार थी, दोनों पक्षों की तात्कालिक विवशता थी ।

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यही कारण था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी ये सभी देश अपने उपनिवेशक देशों के मुद्रा क्षेत्रों (करेंसी जोन्स) के सदस्य वने रहे । यह बात ब्रिटेन और फ्रांस के पुराने उपनिवेशीय क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से सच थी । इसके परिणामस्वरूप पुरानी अन्तरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था तथा उसके अर्न्तगत निर्धारित आयात-नियति सम्बन्धी ”कोटा” प्रणाली यथावत चलती रही ।

इसीलिए इन भूतपूर्व उपनिवेशीय इकाइयों में कार्यरत अधिकांश औद्योगिक इकाइयां ओर वित्तीय संस्थाएं विदेशी पूंजी निवेशकों के स्वामित्व में बनी रहीं । वियतनाम ओर इण्डोनेशिया जैसे कुछ देश जहां स्वतंत्रता संग्राम में साम्यवादी प्ररेणा प्रधान थी और स्वतंत्रता हिंसात्मक संघर्ष से प्राप्त की गई थी, इसके अपवाद थे ।

पुरानी शोषणपूर्ण व्यवस्था को बनाए रखने मे संयुक्त राज्य अमरीका विशेष सहायक सिद्ध हुआ था । 1930 के दशक में कमरतोड आर्थिक गिरावट के बाद द्वितीय विश्व युद्ध का प्रारम्भ संयुक्त राज्य के लिए वरदान सिद्ध हुआ क्योंकि युद्ध के दौरान सैन्य साज सामान की आपूर्ति के लिए सहयोगी राज्यों ने उससे बड़ी मात्रा में खरीद प्रारम्भ कर दी थी । अमरीकी फैक्टरियां रात दिन काम करती रही थीं ।

परिणामस्वरूप देश से बेरोजगारी समाप्त हो गई तथा व्यापारियो ओर उद्योगपतियों ने अधिकाधिक लाभ कमाया । विश्व युद्ध की समाप्ति के वाद आर्थिक सम्पतता का यह स्रोत अकस्मात सूखता सा लगा अत: संयुक्त राज्य के राजनेता भविष्य के बारे में चिन्तित हो उठे ।

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जैसा कि देश के तत्कालीन विदेश मन्त्री कार्डेल हुल (1944) ने कहा था, युद्ध की समाप्ति के साथ ही संयुक्त राज्य की अनेक इस्पात उत्पादक इकाइयां, अन्य ओद्योगिक संस्थान ओर कृषि उत्पादक युद्ध के दौरान आपूर्ति के लिए निरन्तर बढ़ती मांग से वंचित हो जाएंगे अत: उन्हें बाजार के नए स्रोतों की आवश्यकता होगी ।

अत: देश की आर्थिक सम्पन्नता के लिए संयुक्त राज्य के लिए मुक्त अन्तरराष्ट्रीय व्यापार का मार्ग प्रशस्त करना आवश्यक होगा । प्रारम्भ में मुक्त व्यापार के अवसर पूर्ववत्र बनाए रखने के लिए पुरानी अन्तरराष्ट्रीय व्यापार पद्धति और नए राष्ट्रों के व्यापार सम्बंधों को सीमारहित बनाए रखना आवश्यक समझा गया ।

परन्तु दूरगामी उद्‌देश्यों को पूरा करने के लिए देश के नीति निर्धारकों ने अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मुद्रा संचार को नियंत्रित करने के उपाय ढूंढने शुरू कर दिए । 1944 में संयुक्त राज्य के वर्चस्व में अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना इस दिशा में उठाया गया पहला महत्वपूर्ण कदम था ।

यह मुद्रा कोष उत्तरोतर विश्व की सबसे बड़ी अधिराष्ट्रीय प्रशासनिक इकाई बन गई है ! जैसा कि इस व्यवस्था के आलोचकों ने रेखांकित किया है, केवल संयुक्त राज्य की सैनिक व्यवस्था अपनी सहायक सेनाओं की सम्मिलित शक्ति के आधार पर विश्व स्तर पर अपने साम्राज्यवादी प्रभाव की दृष्टि से अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की बराबरी का दावा कर सकता है ।

अमरीकी सेना और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष दोनों के उद्‌देश्य ओर कार्य प्रणाली परस्पर परिपूरक है क्योंकि अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा आरोपित अन्तरराष्ट्रीय अनुशासन के परिणामस्वरूप विश्व स्तर पर अन्तरराष्ट्रीय (मुख्यतया अमरीकी) पूंजी के लिए निवेश का मार्ग सुरक्षित हो गया है और फलस्वरूप सैनिक हस्तक्षेप अनावश्यक हो गया है ।

मुद्रा संचार के नियंत्रण की दिशा में की गई इसी शुरुआत के सहारे धीरे-धीरे नव उपानेवेशवाद, नव साम्राज्यवाद में परिवर्तित हो गया तथा संयुक्त राज्य अमरीका, जिसकी अन्तरराष्ट्रीय क्षेत्रीय उपनिवेशवाद की स्थापना में प्राय कोई भूमिका नहीं थी, विश्व की सबसे बड़ी नव साम्राज्यवादी शक्ति बन गया ।

नव साम्राज्यवाद का अर्थ ऐसी अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था से है जिसमें विश्व के विकसित और अविकसित देश विश्वव्यापी आर्थिक व्यवस्था के असमान परन्तु परस्पर परिपूरक अंग हैं, तथा जिसके अन्तर्गत अविकसित राष्ट्रीय आर्थिक इकाइयों का विकसित अर्थतंत्र वाले पूंजीवादी राष्ट्र निरन्तर आर्थिक शोषण करते हैं ।

सीमारहित मुक्त अन्तरराष्ट्रीय व्यापार नव साम्राज्यवादी व्यवस्था का मूलाधार है । द्वितीय विश्व युद्ध के बाद परतंत्र राष्ट्रीय इकाइयों की स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात मुक्त व्यापार की सम्भावनाओं पर प्रश्न चिह्न लग गया था क्योंकि युद्धोत्तर काल में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति के परस्पर प्रतिद्वन्दी पूंजीवादी ओर साम्यवादी खेमों मे बंट जाने के बाद पश्चिमी देशों (विशेषकर उनके नए नायक संयुक्त राज्य अमरीका) को नवोदित राष्ट्रों में साम्यवादी प्रभाव के प्रसार का संकट दिखाई देने लगा था जिसका अर्थ था कि वे देश में लगी विदेशी पूंजी का राष्ट्रीयकरण कर विदेशी पूंजी निवेश की सम्भावनाएं समाप्त कर सकते थे ।

अत: इन उत्तर उपनिवेशीय स्वतंत्र इकाइयों का उनके पूर्व उपनिवेशक देशों के साथ आर्थिक सम्बन्ध बनाए रखना विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमरीका की आर्थिक ओर विदेश नीति का एक प्रमुख उददेश्य बन गया । इसके बिना उसकी मुक्त व्यापार पर केन्द्रित अन्तरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना का स्वप्न पूरा नहीं हो सकता था ।

इस साम्राज्यवादी उद्‌देश्य को पूरा करने और नवोदित राष्ट्रीय इकाइयों को साम्यवादी प्रभाव से दूर रखने के उद्‌देश्य से संयुक्त राज्य अमरीका के नीति निर्धारकों ने विकासशील देशों को पूंजीवादी अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था से बांधे रखने के लिए उन्हें ”विकास” कार्यो के लिए ”सहायता अनुदान” देने की प्रणाली का प्रारम्भ किया ।

यद्यपि इस शुरूआत को विकसित देशों द्वारा विकासशील और अविकसित देशों के प्रति मानवीय करुणा से प्रेरित कदम के रूप में प्रस्तुत किया गया इस योजना  का वास्तविक उददेश्य विकसित देशों का आर्थिक-व्यापारिक स्वार्थ साधन था ।

गरीब देशों को दिए जाने वाले इस अनुदान (वास्तव में ऋण) का बहुत बड़ा भाग सैन्य सामान के रूप में था जिससे दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद सैन्य सामान निर्माण करने वाली इकाइयों का काम ठप न हो सके ओर उन्हें नया और सुरक्षित बाजार प्राप्त हो जाए ।

उदाहरण के लिए 1953 से 1965 के बीच कोरिया को दी गई कुल सहायता का 39 प्रतिशत तथा ताइवान को दिए गए अनुदान का 65 प्रतिशत सैन्य उपकरणों के रूप में था । इस प्रकार की सहायता के फलस्वरूप सहायता प्राप्त करने वाले देशों की आर्थिक विपन्नता में कोई सुधार नहीं आया तथा उन्हें निरन्तर अधिकाधिक सहायता अनुदान की आवश्यकता बनी रही ।

कालान्तर में स्थिति ऐसी हो गई कि सहायता प्राप्त करने वाले देशों को प्रति वर्ष प्राप्त होने वाली राशि का आधा या अधिक भाग सहायता देने वाले देशों को ऋण वापसी की किश्त के रूप में भुगतान करना पड़ता है । इस तथाकथित सहायता अनुदान के माध्यम से पश्चिमी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने विकासशील देशों की आर्थिक स्वतंत्रता प्राय: समाप्त कर दी है ।

मोटे तौर पर अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था को इस प्रकार से ढालने का प्रयास हुआ हे कि विकासशील देश स्थायी रूप से विकसित देशों के लिए कच्चे माल के उत्पादन ओर सस्ते श्रम के स्रोत बने रहें और उनका औद्योगिक विकास अवरुद्ध रहे ।

इस उद्‌देश्य से आयात-नियति का कोटा सुनिश्चित कर दिया गया है जिसे विकासशील देश बहुधा घाटा सह कर भी पूरा करने को विवश हैं । इस व्यवस्था में निहित सवसे बड़ी त्रासदी यह है कि पचास के दशक से ही अन्तरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल के मूल्य उत्तरोत्तर घटते गए हैं और दूसरी ओर मिलों में तैयार सामानो के मूल्य उत्तरोत्तर बढ़ते गए हैं ।

फलस्वरूप विकासशील देशों की आमदनी में निरन्तर कमी आई है और आयातित सामानों पर व्यय में वृद्धि होती गई है । यही कारण है कि विकसित ओर विकासशील देशों के जीवन स्तर का अन्तर निरन्तर बढ़ता गया है । यहां विदेशी सहायता का एक अन्य पक्ष भी ध्यान देने योग्य हे ।

आर्थिक सहायता अनुदान का एक बड़ा भाग राजमार्गो आदि जेसी आधारभूत सुविधाओं के निर्माण के लिए दिया जाता है जिससे अनुदान प्राप्त देश में बाजार व्यवस्था को बढ़ावा मिले तथा उसकी सम्पूर्ण अर्यव्यवस्था को पूंजीवादी विश्व व्यापार व्यवस्था से जोड़ कर उसकी आर्थिक निर्भरता को बढ़ाया जा सके । किसी भी देश को आर्थिक भूमण्डलीकरण की जकड़ में लेने के लिए यह एक अनिवार्य शर्त है । दूर संचार माध्यमों का भी इस प्रकिया की सफलता में बहुत बड़ा योगदान है ।

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