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Polynomous Strategic Vision after 1950 | Hindi

Read this article to learn about the changing international environment polynomous strategic vision after 1950 in Hindi language.

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1950 के वाद पुराने उपनिवेशों के स्वतंत्र राष्ट्रों के रूप में स्थापित होने के साथ ही अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में आमूल परिवर्तन आ गया । दो पृथक-पृथक शक्ति ध्रुवों के उदय होने के उपरान्त भी अब स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर विश्व को दो पूरी तरह प्रतिस्पर्धा गुटों में बांट कर देखना सम्भव नहीं रहा ।

नवोदित राष्ट्रीय इकाइयां इस गटबाजी के अंग नही बनना चाहती थीं । अत: भारत, मिश्र और यूगोस्लाविया जैसे राज्यों ने नवोदित और विकासशील राज्यों का अन्तरराष्ट्रीय गुटबाजी से सर्वथा दूर एक तटस्थ मंच का प्रारम्भ किया । यह मंच विश्व शान्ति तथा दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच समान दूरी बनाए रखने का पक्षधर था । मंच के सदस्य अपने स्थानीय और क्षेत्रीय हितों के अनुरूप अलग-अलग निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र थे ।

साठ के दशक का प्रारम्भ होते-होते यह स्पष्ट होने लगा था कि साम्यवादी देशों की (विशेषकर रूस और चीन के संदर्भ में) सैद्धांतिक एकता व्यावहारिक स्तर पर सम्भव नहीं थी (ईस्ट तथा स्पेट, 1961) । अन्तरराष्ट्रीय राजनीति के अध्येता यह अनुभव करने लगे थे कि विश्व युद्ध के तुरंत बाद द्विध्रुवीय अन्तररष्ट्रिाय राजनीति का उदय तात्कालिक घटनाओं की परिणति थी अत: स्थिति सामान्य होते ही अपेक्षाकृत अधिक स्थायी तथा विभिन्न देशों की क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अधिक अनुरूप नई राजनीतिक संरचनाओं की स्थापना सम्भावित थी ।

अन्तरराष्ट्रीय राजनीति के इसी उभरते हुए भूदृश्य को ध्यान में रखते हुए अमरीकी भूगोलविद् एसबी कोहेन ने एक नई सामरिक संकल्पना प्रस्तुत की (कोहेन, 1964) । इस संकल्पना के अनुसार राजनीतिक दृष्टि से विश्व को दो प्रकार के क्षेत्रों में बांटा रना सकता है, एक भूसामरिक तथा दूसरा भूराजनीतिक । भूसामरिक आधार पर लेखक ने दो प्रधान क्षेत्रों तथा एक गोण क्षेत्र की परिकल्पना की ।

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दो प्रधान क्षेत्र थे:

(1) व्यापार पर निर्भर समुद्र तटीय देश, तथा

(2) यूरेशिया के महाद्वीपीय देश । तीसरा तथा गौण क्षेत्र था

(3) हिंद महासागर से घिरा दक्षिण एशियाई पठार ।

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इसमें इस क्षेत्र के भूतपूर्व ब्रिटिश कामनवेल्थ के देश शामिल थे । समुद्र तटीय वर्ग में उत्तरी अमरीका और कैरिबियन क्षेत्र, समुद्र तटीय यूरोप और दक्षिणी अमरीका, सहारा के दक्षिण स्थित अफ्रीका महाद्वीप के देश तथा महाद्वीपीय तट से अलग स्थित एशियाई देश और ओशेनिया शामिल थे ।

महाद्वीपीय यूरेशिया में हृदय स्थल और पूर्वी यूरोप, तथा एशिया के  पूर्वी देश सम्मिलित थे । दोनो प्रधान भूसामरिक क्षेत्रों के बीच कोहेन ने दक्षिण-पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्वी एशियाई क्षेत्र के रूप में दो अलग-अलग दबाव क्षेत्रों (शैटरबेल्ट्स) की परिकल्पना की ।

दस वर्ष बाद प्रकाशित अपनी पुस्तक के दूसरे संस्करण में कोहेन (1973) ने रेखांकित किया कि द्विध्रुवीय अन्तरराष्ट्रीय राजनीति के बावजूद अनुभव के स्तर पर विश्व राजनीति उत्तरोत्तर एक बहुनाभीय प्रक्रिया बन गई थी ।

कोहेन के अनुसार सत्तर के दशक में चार प्रमुख नाभि क्षेत्र थे:

(1) संयुक्त राज्य अमरीका,

(2) समूह तटीय यूरोप,

(3) सोवियत संघ, और

(4) चीन लेखक के विचार में विश्व राजनीति की बहुनाभीय संरचना विश्व राजनीति को स्थायित्व प्रदान करने की दृष्टि से द्विध्रुवीय संरचना की अपेक्षा अधिक उपयुक्त थी ।

1990 में सोवियत संघ के विघटन तथा वारसा संधि की समाप्ति के पश्चात् द्विध्रुवीय विश्व राजनीति समाप्त हो गई । इसके साथ ही मैकिंडर के 1904 के लेख के साथ प्रारम्भ हुई अस्सी वर्षो से चली आ रही चिन्तन धारा का भी अन्त हो गया ।

परिणामस्वरूप वहुनाभीय राजनीति विश्व राजनीति का वर्तमान यथार्थ है । इस बदले हुए अन्तरराष्ट्रीय परिवेश को ध्यान में रखते हुए कोहेन (1991) ने अपनी सामरिक संकल्पना को शीत युद्ध के बाद की स्थिति के अनुरूप संशोधित कर पुन: प्रस्तुत किया ।

विश्व राजनीतिक परिदृश्य को लेखक ने परस्पर अधिमान क्रम में भूसामरिक परिमण्डल (रेल्म्स), भूराजनीतिक क्षेत्रों (रीजन्स), राष्ट्रीय इकाइयों, तथा द्वार राज्य क्षेत्रों (गेटवे टेरीटरीज़) में विभक्त किया । यह अन्तिम श्रेणी उसके चिन्तन का एक नया पक्ष हैं (देखिए: चित्र 7.10) ।

अनुसार द्वार राज्य क्षेत्र वर्तमान में विभिन्न राष्ट्रीय इकाइयों के अंग हैं, परन्तु वे भिन्न-भिन्न पडोसी इकाइयों के बीच सम्पर्क के महत्वपूर्ण माध्यम हैं । द्वार क्षेत्र कालान्तर में स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व प्राप्त कर सकते हैं ।

लेखक के अनुसार द्वार क्षेत्र विश्व राजनीति को स्थायित्व प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं । कोहेन ने स्पष्ट किया कि द्वितीय स्तर की राजनीतिक शक्तियां सामान्यतया एक अथवा दूसरे भूसामरिक परिमण्डल के अन्तर्गत स्थित होते हैं ।

परन्तु तीन क्षेत्र इस नियम के अपवाद हैं:

(1) दक्षिण एशिया (जो एक पृथक भूराजनीतिक क्षेत्र बन गया है),

(2) दक्षिण पश्चिम एशिया (जो कि दो प्रधान परिमण्डलों के मध्य स्थित एक दबाव क्षेत्र है) ओर

(3) मध्य और पूर्वी यूरोप जो 1990 के बाद दोनों परिमण्डलों के बीच एक पारगम्य परिवर्तनशील क्षेत्र बन गया है यद्यपि सामरिक दृष्टि से इसका महत्व दोनों ही परिमण्डलों के लिए यथावत् विद्यमान है ।

सोवियत संघ के विघटन के बाद अनेक विचारकों ने संयुक्त राज्य अमरीका के एक छत्र अन्तरराष्ट्रीय प्रभुत्व पर जोर देते हुए रूसी क्षेत्र के महत्व को घटा कर प्रस्तुत करना प्रारम्भ कर दिया था । कोहेन इस विचारधारा से सहमत नहीं थे ।

लेखक के अनुसार यूरेशिया के विशाल महाद्वीपीय आन्तरिक प्रखण्ड और समुद्रतटीय पेटी के बीच का विभाजन पुराने विश्व के राजनीतिक इतिहास का शाश्वत सत्य हे । दोनों के साथ जुड़ा ”महाद्विपीयता” और ”सामुद्रिकता” सम्बन्धी विशेषण मात्र उनके भूदृश्य और उनकी जलवायवीय विभिन्नता का परिचायक न होकर उनके सांस्कृतिक तथा राजनीतिक दृष्टिकोण का भी परिचायक है ।

कोहेन के शब्दों में यह विशाल महाद्वीपीय परिमण्डल बाहर की दुनिया से अपेक्षाकृत सर्वथा अलग-थलग, अपने आप में ही लीन, तथा साथ ही अपने प्रतिपक्षी परिमण्डल से कच्चे माल की दृष्टि से अधिक संसाधन सम्पन्न है ।

इसके निवासी अपनी मिट्टी से अपेक्षाकृत अधिक निकट से जुड़े हैं । सोवियत संघ की समाप्ति के बाद भी रूस का विशाल क्षेत्र तथा उसके मित्र देश हृदय स्थत्न के केन्द्रीय सामरिक महत्व को निरन्तरता प्रदान करते रहेंगे क्योंकि अपने आकार, अपनी महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति तथा अपनी उन्नत सामरिक और औद्योगिक शक्ति के कारण वे विश्व राजनीति को निरन्तर प्रभावित करते रहेंगे ।

साथ ही वैचारिक और मूल्यबोध सम्बन्धी परस्परता के कारण इस क्षेत्र का प्रभाव किसी न किसी रूप में पूर्वी यूरोप में बना रहेगा । वारसा संधि के दीर्घकालीन अस्तित्व के दौर में स्थापित आवागमन, संचार और सामाजिक आर्थिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप दोनों क्षेत्रों में व्यावहारिक सम्बन्ध यथावत् कायम रहेंगे ।

अत: रूस भविष्य में विश्व राजनीति की एक महत्वपूर्ण इकाई बना रहेगा । कोहेन के अनुसार मैकिंडर तथा स्पाइकमैन की यह मूलभूत धारणा कि चीन मुख्यतया सामुद्रिक प्रवृत्ति वाला राज्य है (अर्थात् रूस की महाद्वीपीय मानसिकता से भिन्न है) सर्वथा भ्रामक है ।

वास्तव में चीन का विशाल जन समूह मिट्टी की उपज पर निर्भर है तथा उसकी अर्थव्यवस्था में अन्तरराष्ट्रीय व्यापार का स्थान अत्यन्त गौण हैं । यही कारण है कि विश्व बाजार के कुल आयात निर्यात व्यापार में चीन का हिस्सा मात्र 1.5 प्रतिशत है ।

”चीन की जनता का आत्मिक सम्बन्ध पर्वतों से है न कि समुद्र से । तथा रूस और चीन के बीच स्थित लम्बी अन्तरराष्ट्रीय सीमा दोनों के बीच परस्पर सम्पर्क बनाए रखती है । अत: उनके लिए एक दूसरे के अस्तित्व से निरपेक्ष बने रहना सम्भव नहीं है । आपसी सहयोग उनकी नियति है”  ।

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