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Quick Notes on Political Geography | Hindi

This article provides a note on political geography of the world in Hindi language.

राजनीतिक भूगोल का अध्ययन राजनीति और भूगोल दोनो से एक साथ सम्बद्ध है । राजनीति इसका विशेषण है तथा भूगोल इसकी संज्ञा और मूल पहचान । यही कारण है कि राजनीतिक भूगोल की मान्यता भौगोलिक अध्ययन की शाखा के रूप में हे ।

परन्तु राजनीतिक भूगोल के स्वरूप को समझने के लिए राजनीति और भूगोल दोनो का ज्ञान आवश्यक है । राजनीति मूलतया राजसत्ता की प्राप्ति ओर राज्य व्यवस्था के संचालन के लिए नीति निर्धारण और नीतियों के क्रियान्वयन पर केन्द्रित प्रक्रिया है ।

इसीलिए इसे “राज + नीति” कहते हैं । राजनीति सामाजिक संगठन की एक मूलभूत आवश्यकता है । सामाजिक संगठन के प्रारम्भ के साथ ही विभिन्न पारिवारिक और सामाजिक इकाइयों के पारस्परिक सम्बन्धों के शान्तिपूर्ण संचालन हेतु नियामक संस्था का निर्माण आवश्यक हो गया होगा ।

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यही राजनीति का प्रारंभ और राज्य की स्थापना की दिशा में लिया गया पहला कदम था । सभ्यता के विकास के साथ-साथ सामाजिक संगठन उत्तरोत्तर वृहत्तर आकार के होते गए । उनके प्रभावी संचालन के लिए केन्द्रीय सत्ता का स्वरूप उत्तरोत्तर जटिल ओर व्यापक होता गया ।

अर्थात् राजसत्ता की अधिकारिता, उसका नीति निर्धारण का अधिकार, व्यापक होता गया । अत: वर्तमान युग में राजसत्ता हमारे जीवन के सभी पक्षों से, जन्म से मृत्यु पर्यन्त, अनिवार्यत: जुड़ गई है । आज राजनीति बहुपक्षीय प्रक्रिया है और मानव जीवन का अपरिहार्य सत्य है ।

राजनीतिक सत्ता की व्यापकता पिछले पचास वर्षो में विशेष रूप से बड़ी है । द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् यूरोपीय उपनिवेशवाद की समाप्ति के साथ ही अफ्रीका, एशिया, और विश्व के अन्य भागो में सदियों से परतंत्र देश विदेशी शासन के चंगुल से मुक्त हो गए ।

इतिहास का यह उत्तर उपनिवेशवादी दौर व्यापक लोकतांत्रिक जागरण का दौर था, परिणामस्वरूप दुनिया के सभी भागों में व्यक्ति स्वातंत्र्य और स्वतंत्र मताधिकार नागरिकों के मौलिक अधिकार बन गए । बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में सरकारों का बनना और गिरना, उनकी सफलता और असफलता देश के नागरिकों के मत पर आश्रित हो गई । फलस्वरूप राज्य सरकारें देश के नागरिकों के दुख दर्द, उनकी आशाओं और आकांक्षाओं से सीधे तौर पर जुड़ गई ।

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यह सुनिश्चित करने के लिए कि अगले चुनाव में जनता शासक दल को पुन: सत्ता का अधिकार प्रदान करे, यह आवश्यक हो गया कि प्रशासन नागरिकों के दिन प्रतिदिन की समस्याओं के समाधान के प्रति जागरूक हो और सभी के लिए कुछ मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराए । इसीलिए लोकतांत्रिक सरकारें लोक कल्याण के कार्यों को प्रशासन में उच्च वरीयता देती हैं ।

वे कल्याणकारी (वेल्फेयर) सरकारें हैं । यही कारण है कि आज के युग में राजसत्ता का कार्य क्षेत्र इतना व्यापक हो गया है कि नागरिकों के जीवन के सभी पक्ष उससे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित हे । परिणामस्वरूप बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में राजनीतिशास्त्र सामाजिक अध्ययन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय बन गया है ।

भूगोल मूलत: पृथ्वी के क्षेत्रीय स्वरूप, उसके वातावरण ओर संसाधनों, उस पर निवास करने वाली जनसंख्या के क्षेत्रीय वितरण और पारिस्थितिकीय समायोजन, तथा उनकी क्षेत्रीय विभिन्नताओं और अन्तरक्षेत्रीय सम्बन्धों, अर्थात् परस्पर आदान-प्रदान से उत्पन्न प्रवाहों, इत्यादि के अध्ययन पर केन्द्रित है । संक्षेप में भूगोल पृथ्वी का मानव पर्यावास के रूप में क्षेत्रीय अध्ययन है । भौगोलिक अध्ययन मूलत-क्षेत्रीय और स्थानिक अध्ययन है ।

भूगोल के अध्ययन के दो पक्ष हैं:

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(1) पृथ्वी (और उसके क्षेत्रीय प्रभागों) का एक समन्वित भौतिक इकाई के रूप में निरूपण और विश्लेषण, तथा

(2) पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों मे निवास करने वाली सामाजिक इकाइयो का पारिस्थितिकीय अध्ययन । इस आधार पर भौगोलिक अध्ययन दो प्रमुख शाखाओं में विभक्त है ।

एक को भौतिक भूगोल की संज्ञा दी गई हे तथा दूसरी को मानव अथवा सामाजिक भूगोल की । पृथ्वी के भौतिक स्वरूप पर केन्द्रित होने के कारण भौतिक भूगोल प्राकृतिक वातावरण (जिसमें सजीव ओर निर्जीव दोनों प्रकार के तत्व निहित हैं) के क्षेत्रीय अध्ययन पर केन्द्रित है ।

अत: भौतिक और प्राणि विज्ञानों की विभिन्न शाखाएं इसके ज्ञानार्जन के मुख्य स्रोत हें परन्तु इसके अध्ययन का प्रमुख उद्‌देश्य भिन्न-भिन्न प्रकार के प्राकृतिक और जैविक तत्वों का गहन अध्ययन न होकर पृथ्वी तल पर विभिन्न क्षेत्रों में मानव जीवन के विकास की सम्भावनाओं और सीमाओं से सम्बन्धित ज्ञान अर्जित करना है ।

दूसरी ओर मानव भूगोल पृथ्वी के विभिन्न भागों में सामाजिक संगठन के विभिन्न पक्षों का क्षेत्रीय वातावरण के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करता है । अत: विषय के मानव केन्द्रित अध्ययन होते हुए भी मानव भूगोल के अध्येता की दृष्टि अनिवार्यतया परिस्थिति और स्थान (क्षेत्र) पर केन्द्रित रहती है ।

मानव भूगोल अन्य सामाजिक विज्ञानों की भांति मानव संगठन के अध्ययन पर केन्द्रित है परन्तु इसकी अध्ययन की पद्धति उनसे सर्वथा भिन्न है । मानव अथवा सामाजिक संगठन के चार प्रमुख आयाम है: आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, तथा क्षेत्रीय (स्पेशियल) ।

आर्थिक आयाम अर्थशास्त्रीय अध्ययन का विशिष्ट क्षेत्र है, राजनीतिक आयाम राजनीतिशास्त्र और तत्सम्बन्धी विज्ञानों का तथा सामाजिक आयाम समाजशास्त्र, नृविज्ञान, सामाजिक मनोविज्ञान ओर सम्बद्ध व्यवहारवादी विज्ञानों का विशिष्ट क्षेत्र है । क्षेत्रीय और स्थानिक आयाम भौगोलिक अध्ययन का विशेष क्षेत्र हैं ।

वैचारिक स्तर पर प्रथम तीन आयाम एक दूसरे से समानान्तर स्थिति वाले प्रतीत होते हैं और विद्वत् समाज में वे इसी रूप में मान्य हैं यद्यपि एक ही सामाजिक इकाई के विभिन्न आयामों के अध्ययन पर केन्द्रित होने के फलस्वरूप इन समाज विज्ञानों के अध्ययन क्षेत्र एक दूसरे का अधिछादन करते हैं और वे परस्पर अपरिहार्य सम्बन्ध में जड़े हैं ।

इसके विपरीत क्षेत्रीय और स्थानिक आयाम अन्य तीनो उघयामों में गुथा हुआ है क्योंकि आर्थिक, सामाजिक, या राजनीतिक प्रक्रियाएं और क्रियाकलाप अनिवार्यतया पृथ्वी की सतह पर (अर्थात् क्षेत्रीय आयाम) घटित होते हें जो कि स्वयं भूगोल के अध्ययन का मूल विषय है ।

परिणामस्वरूप मानव भूगोल प्रकृति से ही अंत:शास्त्रीय अध्ययन है । सामाजिक संगठन के तीन भिन्न-भिन्न आयामों के आधार पर मानव भूगोल का अध्ययन तीन प्रमुख शाखाओं में विभक्त है । ये हैं आर्थिक, सामाजिक, और राजनीतिक भूगोल ।

इनमें से प्रत्येक का सम्बद्ध सामाजिक विज्ञान से समीप का सम्बन्ध है क्योंकि वे एक ही प्रकार के क्रियाकलापों और घटनाओं के अध्ययन पर केन्द्रित हैं । उदाहरणार्थ राजनीतिशास्त्र की भांति राजनीतिक भूगोल भी समाज के राजनीतिक संगठन से सम्बद्ध समस्याओं और घटनाक्रमों के अध्ययन पर केन्द्रित है ।

परन्तु जहां राजनीतिशास्त्र सत्ता की लड़ाई, नीतिगत मुद्‌दों और राजव्यवस्था के संचालन हेतु नीति निर्धारण के सैद्धान्तिक पक्षों के अध्ययन पर केन्द्रित है वहीं राजनीतिक भूगोल राजनीति की क्षेत्रीयता, अर्थात् राजनीतिक प्रक्रिया और राजनीतिक संगठन की स्थानिकता और उनकी क्षेत्र मूलकता पर केन्द्रित अध्ययन है ।

राजनीति की यही स्थानिक और क्षेत्रीय पहचान भिन्न-भिन्न देशों की राजनीतिक चेतना और उनकी राजनीति को विशिष्टता प्रदान करती हैं । यह दोनो विषय मूलतया एक ही प्रकार की समस्याओं के विश्लेषण और उनसे सम्बद्ध मुददों का समाधान खोजने के प्रयत्न हैं अत दोनों परस्पर पूरक अध्ययन हैं ।

इस दृष्टि से राजनीतिक भूगोल के  विद्यार्थी के लिए आवश्यक है कि वह अपने अध्ययन के विषय पर राजनीतिशास्त्र में की गई वैचारिक प्रगति और तत्सम्बन्धी विमर्श से पूरी तरह परिचित हो । इसके अभाव में उसका अध्ययन यथार्थपरक नहीं होगा ओर वह सम्बद्ध ज्ञान के विकास मे अगली ईंट नहीं बन सकेगा ।

राजनीति और भूगोल के उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते हैं कि मोटे तौर पर राजनीति विभिन्न क्षेत्रों और विभिन्न युगों में सामाजिक संगठन की दिशा में किए गए प्रयासों का कारण और परिणाम है । कारण इसलिए कि प्रत्येक संगठनात्मक निर्णय राजनीतिक निर्णय होता है, और परिणाम इसलिए कि संगठनात्मक निर्णय के क्रियान्वयन से उत्पन्न परिणाम भविष्य की राजनीति को दिशा प्रदान करते हैं ।

राजनीति और राजनीतिक, इकाइयां अपने राष्ट्रीय भौगोलिक क्षेत्र से अन्योन्याश्रयी सम्बन्ध में जुड़े हैं । वास्तव में राजनीतिक सत्ता के विकास का मूलभूत उद्‌देश्य देश के अन्दर निवास करने वाले विभिन्न समुदायो तथा उनके पृथक्-पृथक् निवास क्षेत्रों के आपसी सम्बन्धों को अनुशासनबद्ध कर देश की सम्पूर्ण मानव भौगोलिक इकाई को समग्रता प्रदान करना था ।

सामाजिक विकास के प्रारम्भ में भी विभिन्न समुदायों के बीच क्षेत्रीय संसाधनों से सम्बन्धित विवाद्यक तथा क्षेत्रीय अधिकार सम्बन्धी परस्पर प्रतिस्पर्धी दावे, सामाजिक कलह के मुख्य कारण थे । इन सामाजिक द्वन्द्वों का न्यायपूर्ण समाधान राजसत्ता का प्रमुख कर्तव्य है ।

समाज में किसको क्या, कहां तथा कैसे प्राप्त होना चाहिए इसका निर्णय और विनियमन, अर्थात् सामाजिक मूल्यों के अनुरूप और राज्यक्षेत्र राज्य के संसाधनों, राजकीय सेवाओं आदि का विभिन्न समुदायों क्षेत्रों के बीच न्यायसंगत वितरण राज्य व्यवस्था का प्राथमिक उत्तरदायित्व हैं ।

उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट है कि संस्थागत लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया के तीन आधार हैं राष्ट्र की जनसंख्या, देश का क्षेत्रीय प्रसार अर्थात् उसका भौगोलिक क्षेत्र, और राज्य (अर्थात् राजसत्ता) । वास्तव में संस्थागत राजनीति की सम्पूर्ण प्रक्रिया इन तीन तत्वों के सतत् क्रियाशील अन्तरसम्बन्धों पर निर्भर है ।

राजनीतिक भूगोल इन्हीं, अन्तरसम्बन्धों का निरूपण करता है । प्रत्येक राष्ट्रीय समुदाय किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाले नागरिकों की समष्टि है जो अनेक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और भौतिक कारणों से परस्पर एकात्मकता का अनुभव करते हैं ।

इस सामूहिक राष्ट्रीय पहचान का एक प्रमुख आधार जन्मभूमि अर्थात् राष्ट्र की भूमि के प्रति नागरिकों की आस्था और प्रेम है । वास्तव में राष्ट्रीय चेतना मूलरूप से एक स्थानिक अवधारणा है मातृभूमि के प्रति असीम प्रेम उसकी विशेषता है ।

इस प्रेम का आधार अमूर्त और भौतिक दोनों ही प्रकार का है । अमूर्त इसलिए कि राष्ट्र का इतिहास मूलतया उसके भौगोलिक क्षेत्र की मानवीय पहचान का इतिहास है । दीर्घकालीन अथक प्रयास के परिणामस्वरूप ही एक भौगोलिक क्षेत्र जीवन्त मानवीय इकाई का रूप धारण करता है, तथा राष्ट्र के सभी महत्वपूर्ण प्रतीक राष्ट्र की इसी स्थानिक पहचान पर आधारित हैं ।

साथ ही मातृभूमि प्रेम का आधार भौतिक भी है क्योंकि भूमि ही राष्ट्रीय विकास के नाना प्रकार के संसाधनों का प्राथमिक स्रोत हैं । मां के दूध की तरह इसके पोषक तत्व राष्ट्र के रग-रग में व्याप्त हैं । राष्ट्रीय समुदाय के विभिन्न वर्गों और गुटों के बीच क्षेत्रीय संसाधनों के वितरण के लिए सदा ही प्रतिस्पर्धापूर्ण स्थिति बनी रहती है ।

लोगों की आवश्यकताओं, आकांक्षाओं और उनके परस्पर विरोधी दावों का समाधान तथा देश के क्षेत्रीय संसाधनों का उनके बीच न्यायसंगत आवंटन एक शाश्वत समस्या है । परन्तु इन सवके होते हुए भी राज्य सम्पूर्ण राष्ट्र की सम्मिलित शक्ति का प्रतीक है । इसी शक्ति के आधार पर कोई राज्य पड़ोसी और अन्य वाहरी राज्यों से अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध स्थापित करता है ।

विश्व में  कुछ वर्षों का राजनीतिक इतिहास मुख्यतया अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों का इतिहास रहा है । अत: प्रत्येक देश की राजनीति आंशिक रूप से आन्तरिक स्थितियों और अंशतया अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों के सम्मिलित प्रभाव का परिणाम है ।

इसी कारण ”राष्ट्र-राज्य और भूमि” का पारस्परिक राजनीतिक सम्बन्ध जहां ऐतिहासिक विकास प्रक्रिया की दृष्टि में राष्ट्र की मिट्टी से सीधे जुड़ा आत्मिक सम्बन्ध था, उत्तर-कोलम्बस युग के क्षेत्रीय उपनिवेशीय दौर में राज्यों के विकास का क्षेत्रीय आयाम भौतिक स्तर पर विश्वव्यापी हो गया ।

इसीलिए उपनिवेशव वादी दौर में यूरोपीय राज्य मूलतया प्रसारशील क्षेत्रीय राजनीतिक इकाइयों के रूप में स्थापित हो गए । जर्मन विद्वान रैटजैल (1844-1904) द्वारा 1896-1897 में प्रतिपादित आधुनिक राजनीतिक भूगोल मूल रूप से ”राष्ट्र, राज्य और क्षेत्र” के अन्तरसम्बधों के अध्ययन पर केन्द्रित विज्ञान था ।

कुछ वर्षों में भूगोल और राजनीतिशास्त्र दोनों की ही वैज्ञानिक मान्यताओं में वहुत परिवर्तन हुए हैं । साथ ही राजनीतिक भूगोल के इन तीन मूलभूत आधारों के अवधारणात्मक पक्षों के बारे में भी मान्यतायें बदली हैं परन्तु यह त्रिपक्षीय सम्बन्ध प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में निरन्तर राजनीतिक भूगोल के अध्ययन का विशिष्ट विषय बना रहा है । यही त्रिपक्षीय सम्बन्ध हमारे राजनीतिक मानचित्र का मूल आधार है ।

राजनीतिक भूगोल के अनेक विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि किसी भी समय हमारी राजनीति का वास्तविक रूप ऐतिहासिक विकास प्रक्रिया का परिणाम हैं । कालान्तर में इन तीन आधारिक तत्वों के पारम्परिक सम्बन्धों के संतुलन में आए बदलावों के परिणामस्वरूप परिवर्तन आते रहते हैं ।

यह एक शाश्वत प्रक्रिया है । अत: राजनीतिक भूगोल परिवर्तनशील राजनीतिक सम्बधों का क्षेत्रीय निरूपण और विश्लेषण है । मोटे तौर पर सम्पूर्ण राजनीतिक हल चल राष्ट्र, राज्य और भूमि के त्रिपक्षीय अन्तरसम्बन्ध से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सम्बद्ध है ।

सामाजिक मूल्य बोध में होने वाले परिवर्तनों के परिणामस्वरूप राष्ट्र बोध और राष्ट्रीय चेतना, नागरिक अधिकार बोध, और राजसत्ता की राष्ट्र की जनता के अपेक्षा वोध के प्रति उत्तरदायित्व वहन में सतत् परिवर्तन आते रहते हैं ।

इनके चलते समय-समय पर राष्ट्र राज्य के सामने नई मांगें रखता है जिनके समाधान हेतु नई नीतियों का निर्धारण होता है । इनके क्रियान्वयन के परिणामस्वरूप क्षेत्रीय भूदृश्यों में परिवर्तन आते हैं । संतोष और असंतोष की नई लहरें उत्पन्न होती हैं । यह घटनाचक्र सतत् चलता रहता है ।

अत: राजनीतिक भूगोल का अध्ययन क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत क्योंकि राजनीतिक प्रक्रिया स्वभाव से ही क्षेत्रपरक प्रक्रिया है जिसमें सम्बद्ध सामाजिक समूहों की स्थानिकता और क्षेत्रीयता (अर्थात् अन्तरक्षेत्रीय सम्बन्धों के प्रभाव) की भूमिका महत्वपूर्ण है ।

इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है कि उन्नीसवीं शताब्दी में ज्ञानार्जन की प्रक्रिया के विभिन्न क्रमबद्ध विज्ञानों में विभाजन के साथ ही इस भ्रांतिमूलक धारणा को बढावा मिला या कि क्रमबद्ध अध्ययन की प्रत्येक शाखा ज्ञान की ”स्वतंत्र” शाखा है ।

अत: विभिन्न क्रमबद्ध विज्ञान समानान्तर अस्तित्व वाले हैं । फलस्वरूप ज्ञानार्जन की प्रक्रिया खंडित हो गई और अंत शास्त्रीय (इण्टर डिासिप्लिनरी) अध्ययन के अवसर सीमित हो गए । यह सही है कि इतिहास और भूगोल क्रमश समय और क्षेत्र सम्बन्धी आयाम पर केन्द्रित हैं तथा सभी प्रकार की प्रक्रियाएं समय और क्षेत्र सापेक्ष हैं अत: इन दोनों विषयों के द्वार अंत शास्त्रीय अध्ययन के लिए खुले रह सकते थे ।

परन्तु वह विज्ञानमय युग था अत: क्रमबद्ध विज्ञानों की मान्यताऐं सामाजिक विज्ञानों को प्रभावित करने लगी थी । प्रत्येक सामाजिक विज्ञान अपने को प्राकृतिक विज्ञानों के अनुरूप ढ़ालने के प्रयास में रद्ध था । फलस्वरूप भूगोल में भी अवधारणात्मक स्तर पर क्षेत्रीय आयाम को विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं से मुक्त सर्वथा स्वायत्त अस्तित्व देने का प्रयास हुआ । परिणाम यह हुआ कि ”क्षेत्र” एक अवधारणात्मक पहचान न रह कर एक स्कूल ”विषय” के रूप में देखा जाने लगा ।

अत: रसायन, द्रव्य, प्राणि जीवन और शैल की भांति क्षेत्र भी एक स्वतंत्र विषय और अध्ययन की एक सर्वथा स्वतंत्र शाखा का आधार बन गया । फलस्वरूप भूगोल का अध्ययन विभिन्न प्रकार के क्षेत्रों का विश्लेषण मात्र बन कर रह गया ।

भौगोलिक क्षेत्र मानव समूहों के निवास क्षेत्र भी थे अत: मानव भूगोल इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जीवन शैली और उनके क्रियाकलाप पर स्थानजन्य प्रभावों का विश्लेषण बन गया । इस विश्लेषण में प्राकृतिक वातावरण के प्रभाव का निरूपण विशेष महत्वपूर्ण था । राजनीति सामाजिक क्रियाकलाप का एक प्रमुख पक्ष है अत: राज्यों का अध्ययन भी पारिस्थितिकीय पद्धति के अनुरूप होने लगा ।

परन्तु राजनीतिक भूगोल की पारिस्थितिकीय अवधारणा के अन्तर्गत राजनीतिशास्त्र और राजनीतिक भूगोल के बीच किसी संवाद की सम्भावना नहीं थी । परिणामस्वरूप रेटजेल की राजनीतिक भूगोल सम्बन्धी अवधारणा की सामाजिक विज्ञानों के विद्यार्थियों के बीच लोकप्रियता के बावजूद, राजनीतिक भूगोल सर्वथा भिन्न तथा राजनीतिशास्त्र के संवाद से प्राय अछूता अध्ययन क्षेत्र वना रहा ।

यही कारण था कि तत्कालीन राजनीतिशास्त्र की ‘नीतिमूलक’ (एथिकल) स्वरूप का रैट्‌ज़ेल के राजनीतिक भूगोल में कोई स्थान नहीं था । 1880-1920 का युग मानव मूल्यों और परिदुष्टियों में सर्वांगीण परिवर्तन का दौर या । अंग्रेजी में इसे “फिन डी सिएकल” कहते हैं ।

इस दौर में विभिन्न प्रकार की नई तकनीकों (टेलीफोन, बेतार का तार, एक्सरे, चलचित्र, साइकिल, मोटर गाड़ी और वायुयान) के प्रयोग में आने से मनुष्य और विभिन्न वस्तुओं के बीच के सम्बन्ध को देखने के तौर तरीके में आमूल परिवर्तन आ गया ।

अंत: करण धारा उपन्यास (स्ट्रीम ऑफ कांशसनेस नोबल) मनोविश्लेषण (साइको एनैलिसिस) सापेक्षिकता नियम (थियोरी ऑफ रिलेटिविटी) इसके सांस्कृतिक लक्षण थे । इनके परिणामस्वरूप पुरानी समस्याओं को नए ढंग से देखा जाने लगा ।

ऐसे में समय और स्थान दोनों का अर्थ बदल गया क्योंकि प्रत्येक वस्तु अब एक सापेक्ष इकाई बन गई । उसकी पहचान उसके आस पास की इकाइयों से जुड़ गई । अत: वस्तुओं और प्रक्रियाओं के परस्पर स्वतंत्र अस्तित्व सम्बन्धी अवधारणा निराधार प्रतीत लगी ।

फलस्वरूप समय और स्थान अब विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं और घटनाक्रमों के माध्यम के रूप में देखे जाने लगे । अत: समय को अवधि और स्थान को प्रदेश रूपी वस्तुनिष्ठ इकाइयों के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं रही । इस परिवर्तित वैचारिक वातावरण में विभिन्न विज्ञान ज्ञानार्जन को परस्पर सम्बद्ध शाखाओं के रूप में देखे जाने लगे ।

समाज विज्ञानों के अध्ययन में भी वैचारिक एकता के सूत्र ढूंढने और अध्ययन की विभिन्न शाखाओं में परस्पर ताल  मेल स्थापित कर अन शास्त्रीय अध्ययन की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला । इसके परिणामस्वरूप सामाजिक सम्बन्धों और प्रक्रियाओं के विश्लेषण में समय अर्थात् ऐतिहासिक परिदृष्टि को व्यापक मान्यता मिली । परिणामस्वरूप ऐतिहासिक भौतिकवाद (हिस्टारिकल मैटीरियलिज़्म) सामाजिक अध्ययन के क्षेत्र में सिद्धान्तपरक अध्ययन का मुख्य आधार बन गया ।

परन्तु दूसरी ओर स्थानिक आयाम सामाजिक अध्ययन में लम्बे अरसे तक प्राय अछूता और अस्वीकृत बना रहा  । यही कारण था कि बीसवीं सदी के छठे दशक के अन्त तक समाजशास्त्रीय अध्ययन मार्क्सवादी भौतिकवादी ऐतिहासिक चिन्तन के प्रभाव में इस मूलभूत यथार्थ की अनदेखी करता रहा कि सामाजिक सम्बन्ध एक साथ ही दो परस्पर सम्बद्ध आयामों में घटित होते हैं, एक समय और दूसरा स्थान ।

इनमें से किसी एक की अनदेखी करने से सामाजिक अध्ययन में समग्रता नही आ सकती क्योंकि ”स्थानिक इकाइयां ऐतिहासिक और प्राकृतिक तत्वों के सम्मिलित प्रभाव की परिणति हैं यद्यपि क्षेत्र निर्माण की प्रक्रिया मूलत: राजनीतिक प्रक्रिया है ।

सही अर्थो में स्थानिक इकाइयां राजनीति प्रेरित ओर आदर्श मूलक इकाइयां हैं । अत: सामाजिक अध्ययन की समग्रता के लिए ऐतिहासिक ओर क्षेत्रीय परिदृष्टियों का समामेलन आवश्यक है । द्वितीय विश्व युद्ध के पहले भूगोल में प्रचलित मान्यता के अनुसार क्षेत्र और समाज अलग-अलग इकाइयां थीं जो समय-समय पर एक दूसरे को प्रभावित करती थीं, परन्तु जिनको एक दूसरे से अलग करके स्वतंत्र रूप से समझा और निरूपित किया जा सकता था ।

बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में धीरे-धीरे क्षेत्र तथा समाज की परस्पर स्वतंत्रता अर्थात् उनके एक दूसरे से सर्वथा पृथक अस्तित्व की परिकल्पना भ्रांतिमूलक प्रतीत होने लगी । क्षेत्र उत्तरोत्तर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से सापेक्ष इकाई प्रतीत होने लगा क्योंकि समाजशास्त्री अब इस सत्य को पहचानने लगे थे कि सभी सामाजिक सम्बन्ध स्थान सापेक्ष सम्बन्ध हैं अत: क्षेत्रीयता उन्हें आधार और पहचान प्रदान करती है ।

इस वैचारिक जागृति के फलस्वरूप वीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में मानव भूगोल और अन्य सामाजिक विज्ञानों के अध्ययन को एक ही केन्द्रीय सत्य को समझने की दिशा में प्रयत्नशील ज्ञान की परस्पर संबद्ध शाखाओं के रूप में देखा जाने लगा ।

इसलिए भूगोल अब सामाजिक प्रक्रियाओं पर क्षेत्रीय प्रभाव के अध्ययन के स्थान पर भिन्न-भिन्न स्थानीय डकाइयों में रहने वाले समाज के जीवन संघर्ष का अध्ययन बन गया । भूगोल अब सही अर्थो में एक सामाजिक विज्ञान बन गया, एक ऐसा सामाजिक विज्ञान जो सामाजिक संरचना के अध्ययन में क्षेत्रीयता और क्षेत्रीय संगठन (स्पेसियलटी एण्ड स्पेसियल आर्गनाइजेशन), स्थान मूलकता, भूदृश्य निर्माण, और समाज तथा उसके परिवेश के अन्योन्याश्रयी अस्तित्व पर ध्यान केन्द्रित करता है ।

यद्यपि उपर्युक्त अवधारणात्मक परिवर्तन पचास के दशक में ही प्रारंभ हो गए थे तथा मात्रात्मक क्रांति और दूरत्वपरक क्षेत्रीय विश्लेषणात्मक परिदृष्टि इसके स्पष्ट परिणाम थे, तथापि सामाजिक चिन्तन की मुख्य धारा से भूगोल के जुड़ने की प्रक्रिया और सामाजिक अध्ययन की शाखा के रूप में मानव भूगोल की पहचान बनने में कुछ देर लगी ।

यह प्रक्रिया साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में परिलक्षित होने लगी थी और सत्तर के दशक में यह पूरी तरह मुखर हो गई । आज का आधुनिक समाज स्पष्टतया राजनीति प्रेरित समाज हैं और जीवन के सभी पक्ष राजनीति से प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं, अत: स्वाभाविक रूप से इस चेतना के उदय के साथ ही राजनीतिक भूगोल के अध्ययन को पुनर्जीवन मिला ।

राज्यों को अब क्रियाशील इकाइयों के रूप में देखा जाने लगा   और इतिहास और भूगोल के बीच की दीवार धीरे-धीरे ढहने लगी । राजनीतिक भूगोल के अध्ययन की एक नई विधि जननिक क्रियात्मक पद्धति के नाम से प्रस्तुत हुई ।

साथ ही राजनीतिक व्यवस्थाओं के अध्ययन के लिए एक नया विधितंत्र प्रस्तावित हुआ ।  यद्यपि इसकी प्रगति की गति धीमी रही परन्तु धीरे-धीरे समग्र मानव भूगोल के साथ-साथ राजनीतिक भूगोल में भी यह बात सर्वमान्य हो गई कि भूगोल समाज केन्द्रित मनन चिन्तन में मात्र एक ”अतिरिक्त प्रभाव” नहीं है, और न ही यह एक परिदृष्टि मात्र है जिसे सुविधानुसार नकारा अथवा स्वीकारा जा सकता है ।

सम्पूर्ण राजनीतिक प्रक्रिया मूलत: क्षेत्रीयता-निहित, अर्थात् स्थानिक परिवेशजन्य प्रक्रिया है, अत: उसे उसी रूप में देखना आवश्यक है । प्रारंभ में इस विषय पर कुछ अनिश्चय पूर्ण वातावरण बना रहा, जैसा कि सत्तर के दशक में जनकल्याण उन्मुख मानव भूगोल पर कुछ वरिष्ठ विद्वानों की अस्वीकारात्मक प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है,  परन्तु अस्सी के दशक की शुरुआत होते-होते सभी शंकाएं समाप्त हो गई । आज का राजनीतिक भूगोल राजनीति की क्षेत्र मूलकता का समग्र अध्ययन है । राजनीति और भूगोल के बीच की दीवार ध्वस्त हो गई है ।

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