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Revised “Midland Basin” Concept 1943 | Hindi

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1943 में संशोधित “मिड्‌लैण्ड बैसिन” संकल्पना:

1939 के पूर्व हृदय स्थल संकल्पना की चर्चा में मैकिंडर का सारा ध्यान पुराने विश्व के इतिहास तथा भूगोल तक ही सीमित था । बीसवीं सदी के द्वितीय चतुर्थाश के प्रारम्भिक वर्षों में मैकिंडर को धीरे-धीरे यह प्रतीत होने लगा था कि व्यावहारिक स्तर पश्चिमी यूरोप और पूर्वी उत्तरी अमरीका आपस में राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप में इतने निकट से जुड़े है कि वे एक ही अविभाज्य बृहत समुदाय के अंग बन गए हैं ।

मेकिंडर के शब्दों में, संयुक्त राज्य अमरीका के प्रभूत वर्षा प्राप्त करने वाले क्षेत्र और उसकी सारी कोयला खानें पूर्वी हिस्से में स्थित हैं जबकि यूरोप में इनका केन्द्रीकरण पश्चिमी भाग में है । अत: पश्चिमी यूरोप ओर पूर्वी संयुक्त राज्य अमरीका एक दूसरे के परिपूरक हैं तथा दोनों उत्तरोत्तर एक ही समुदाय के दो संतुलित अंग बन गए ।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मन विरोधी और परस्पर सहयोगी शक्तियों के युद्ध प्रयासों में संयुक्त्त राज्य द्वारा निर्णायक भूमिका निभाने के कारण इस संकल्पना को और बल मिला । पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य के बीच बिछे समुद्रों और वायुमार्गो के घने जाल से दोनों क्षेत्रों के परस्पर सम्बन्ध उत्तरोत्तर अन्योन्याश्रयी हो गए थे । द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद विश्व राजनीति का दृश्य पटल सर्वथा परिवर्तित हो गया ।

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ब्रिटेन की घटती हुई राजनीतिक शक्ति के साथ ही ब्रिटेन तथा संयुक्त राज्य एक ही राजनीतिक शक्ति समूह के परस्पर पूरक अंश बन गए । अत उत्तरी अटलाण्टिक सागर के दोनों तटों पर स्थित देश अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर एक ही सहयोगी समुदाय के अभिन्न अंग बन गए ।

परिणामस्वरूप उत्तरी अटलाण्टिक एक समुद्र मात्र न रह कर व्यावहारिक स्तर पर घने समुद्री और वायुमार्गों के जाल वाली घाटी (मिड्‌लैण्ड बेसिन) वन गया था, जिसके माध्यम से संयुक्त राज्य और पश्चिमी यूरोप एक संयुक्त आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो गए ।

इस संयुक्त क्षेत्र के सम्मिलित संसाधन विश्व के किसी भी अन्य देश अथवा गट की तुलना में वहुत अधिक थे, अत द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की विश्व राजनीति में इस गुट की भूमिका निर्णायक हो गई । दूसरे शब्दों में, मध्य और पूर्वी यूरोप के क्रमश पश्चिम और पूर्व में अब दो पृथक-पृथक अपराजेय शक्तियों का अस्तित्व हो गया । द्वितीय विश्व युद्ध के दोरान सोवियत संघ और पश्चिमी देशों के बीच उत्पन्न हुआ सहयोग ही जर्मनी की पराजय का मुख्य कारण था ।

मैकिंडर का विश्वास था कि यह सहयोग भविष्य में भी बना रहेगा, इसलिए ओर भी कि इन दोनों शक्ति सम्पन्न क्षेत्रों के बीच स्थित प्रकृति प्रवृत अवरोधों के अस्तित्व के कारण उनमें परस्पर सम्बन्ध के अवसर वहुत सीमित थे । परिणामस्वरूप दोनों में आपसी वैमनस्य की सम्भावनाएं सीमित थीं ।

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इन अवरोधों में सहारा, अरब, तिब्बत तथा मंगोलियाई मरुस्थलों के अतिरिक्त जन शून्य लीना प्रदेश (पूर्वी साइबेरिया) अलास्का, और आर्कटिक सागर से होते हुए पश्चिमी अमरीकी मरुभूमि प्रदेश शामिल थे । परन्तु विश्व युद्ध के बाद के 40 वर्षों के तीखे शीतयुद्ध से स्पष्ट है, मैकिंडर की आशा चरितार्थ नहीं हो पाई ।

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