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Scope of Political Geography | Hindi

Read this article to learn about the scope of political geography in Hindi language.

बीसवीं शताब्दी के पांचवें दशक के अन्त तक राजनीतिक भूगोल का विषय क्षेत्र चर्चा का एक प्रमुख विषय था क्योंकि 1933 के पश्चात् प्रतिस्थापित स्थानिक (कोरोलाजिकल) परिदृष्टि वाले राजनीतिक भूगोल की परिभाषा नकारात्मक परिभाषा थी- इसमें समय-समय पर आचरण सम्बन्धी निर्देश दिए जाते थे कि विषय के अध्ययन में किन बातों का अध्ययन सम्मिलित है और कौन से मुद्‌दे इसके दायरे के बाहर हैं ।

1958 में डग्लस जैक्सन द्वारा राजनीतिक भूगोल को राजनीति का स्थानिक परिदृष्टि से किए जाने जाने वाले अध्ययन के रूप में प्रस्तुत करने के पश्चात् विषय क्षेत्र सम्बन्धी विचार विमर्श अर्थहीन हो गया क्योंकि सभी स्तरों की राजनीति और उनके ऐसे सभी पक्ष जिनको भौगोलिक परिदृष्टि से विश्लेषित किया जा सकता हो तथा जो क्षेत्रीय आयाम से सम्बद्ध हों अब राजनीतिक भूगोल के अध्ययन क्षेत्र में समाहित हो गए ।

साठवें दशक के अन्त में कैस्परसन और सिंधी (1969) ने जैक्सन की परिभाषा को दूरत्वपरक नए मानव भूगोल की मान्यता के अनुरूप-ढालते हुए राजनीतिक भूगोल को राजनीति का दूरत्वपरक विश्लेषण बताया । जैक्सन की परिभाषा की तरह यह भी सब कुछ समाहित करने वाली सर्वसमावेशी परिभाषा थी ।

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विषय के पुनर्परिभाषण के इन प्रयासों के फलस्वरूप अब राजनीतिक भूगोल के विषय क्षेत्र का प्रश्न अन्तिम रूप से चर्चा के दायरे के बाहर हो गया । सीमित परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक भूगोल प्रधान रूप से राज्य-केन्द्रित अध्ययन है तथा क्रियाशील राजनीतिक-क्षेत्रीय संगठनात्मक इकाई के रूप में राज्य का विश्लेषणात्मक विवेचन इसके अध्ययन अनुशीलन का मुख्य विषय है ।

1950 में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण लेख में इसी तथ्य पर जोर देते हुए हार्टशोर्न ने राज्यों के स्वरूप के बारे में रैटजेल की परिकल्पना के प्रति ध्यान खींचते हुए राज्यों को विशिष्ट मानव समूहों और उनकी निवास भूमि के परस्पर गहन सम्बन्धों के आधार पर विकसित सोद्‌देण्य संघटनात्मक इकाइयां वताया ।

हार्टशोर्न के अनुसार हर राज्य का सर्वप्रमुख उद्‌देश्य राष्ट्रीय भूखण्ड के अंगों और उपांगों को एक समन्वित व्यवस्थात्मक इकाई में पिरोना है । इसके लिए हर राज्य देश के आन्तरिक राजनीतिक जीवन को नियंत्रित करने और नागरिकों को बाहरी राजनीतिक इकाइयो के प्रभाव से सुरक्षित रखने का प्रयास करता है ।

देश की अर्थव्यवस्था को संतुलित कर सम्पूर्ण देश को आत्मनिर्भरता के सूत्र में बांधना इस प्रयास का अनिवार्य अंग है । आधुनिक राज्य विश्व राजनीतिक समुदाय का सदस्य है अत: अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक राज्य प्रतिस्पर्धापूर्ण वातावरण में रहता है ।

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इसलिए नागरिकों में राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण भाव का विकास है जिससे कि आवश्यकता पडने पर वे देश की अस्मिता की सुरक्षा हेतु प्राण भी न्यौछावर करने के लिए तैयार हों । साथ ही यह भी आवश्यक है कि नागरिक राष्ट्रीय हित को स्थानीय हितों पर वरीयता दें जिससे कि पृथकतावादी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन न मिल सके ।

हॉटशोर्न के विचारों के अनुरूप राज्य के राजनीतिक भौगोलिक अध्ययन का विषय क्षेत्र निरूपित करते हुए अमरीकी विद्वान पाउण्ड्स ने इसके अध्ययन के छह प्रमुख पक्षों की ओर ध्यान खींचा:

(1) राज्य और राष्ट्र के बीच भौगोलिक समरूपता । अर्थात् यह देखना कि राज्य की मूल भावना (स्टेट आइडिया) में आस्था रखने वारने सभी लोग देश की सीमाओं के अन्दर निवास करते हैं अथवा राष्ट्रीय समुदाय के कुछ लोग देश की सीमा के वाहर छूट गए हैं । साथ ही यह भी देखना आवश्यक है कि देश की मूल राष्ट्रीय भावना का विरोध करने वाले किन क्षेत्रों में निवास करते हैं ।

(2) देश के संसाधनों का आकलन । प्राप्त संसाधनों को विकसित करके ही राज्य के शासक लोगों की अपेक्षाओं तथा उनकी जीवन स्तर सम्बन्धी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं । इसके अन्तर्गत भौतिक संसाधनों (स्थिति, आमाप और आकृति) के अतिरिक्त मानव संसाधन (जनसंख्या की संरचना और उसकी गुणवत्ता), आर्थिक संसाधन और उनके विकास का स्तर और सम्भावनाएं, तथा औद्योगिक और तकनीकी विकास सम्मिलित हैं ।

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(3) राष्ट्र की जनसंख्या के भिन्न-भिन्न गुटों की परस्पर संसक्ति (कोहीज़न) अर्थात् राष्ट्रीय आदर्शों के प्रति नागरिकों के आस्था भाव का देश की एकता की दृष्टि से विश्लेषण ।

(4) अन्य देशों के साथ देश विशेष का आर्थिक और व्यापारिक सम्बन्ध, तथा

(5) देश के नागरिकों का राजनीतिक दर्शन । पचास के दशक के अन्त तक विश्व के अनेक क्षेत्रों में परतंत्र औपनिवेशिक इकाइयों का अस्तित्व था अत: पाउण्ड्स ने एक छठा

(6) मुद्‌दा देश के उपनिवेशीय सम्बन्धों के रुप में प्रस्तुत किया था । उपनिवेशवाद की समाप्ति के बाद अब इस विषय की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है ।

पाउण्ड्स की योजना के अनुसार राजनीतिक भूगोल का निरूपण चित्र 2.2 में प्रस्तुत है:

सत्तर के दशक के मध्य तक विश्व राजनीति मूलतया राज्यों द्वारा नियंत्रित (स्टेट डामिनेण्ट) प्रक्रिया थी तथा हर देश का राष्ट्रीय जीवन मुख्यतया देश के अन्दर घटित होने वाली सामाजिक ओर आर्थिक घटनाओं का परिणाम था । अन्तरराष्ट्रीय व्यापार भी मुख्यतया देशों के राष्ट्रीय निर्णयों पर निर्भर था ।

परन्तु भूमण्डलीकरण के वर्तमान दौर में इस स्थिति में दूरगामी परिवर्तन आ गए हैं । राज्यों की आत्मनिर्भरता और उनके स्वतंत्र निर्णय की क्षमता में आशातीत  ह्रास हुआ है । विश्व अर्थव्यवस्था के बढ़ते प्रभाव के परिप्रेक्ष्य में किसी भी राष्ट्रीय इकाई के राजनीतिक भूगोल के अध्ययन में विश्व-व्यवस्था जन्य प्रभावों का सम्यक विश्लेषण आवश्यक है ।

दूसरे शब्दों में किसी भी देश के राजनीतिक भूगोल का अध्ययन करते समय हटिशोर्न की क्रियात्मक परिदृष्टि और वालरस्टाइन की विश्व व्यवस्था परिदृष्टि का मेल आवश्यक है क्योंकि आज हमारा जीवन राष्ट्रीय राजनीति और विश्व व्यवस्था के प्रभावों के जटिल संगम का परिणाम ।

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