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The Process of Political Geography | Hindi

Read this article to learn about the development in the process of political geography in Hindi language.

राजनीतिक भूगोल के विकास के गत एक सौ वर्षों की ऐतिहासिक समीक्षा से स्पष्ट है कि राजनीतिक भूगोल की केन्द्रीय अवधारणा में आए संकल्पनात्मक परिवर्तनों के कारण विषय की अध्ययन पद्धति में परिवर्तन होना स्वाभाविक प्रक्रिया थी । इस परिवर्तन के इतिहास की संक्षिप्त व्याख्या नीचे प्रस्तुत है ।

1930 के दशक के पूर्व राजनीतिक भूगोल के अध्ययन में रैटज़ेल द्वारा प्रतिपादित अवधारणा और उसके अध्ययन की पारिस्थितिकीय पद्धति इस विषय के अध्ययन में सर्वमान्य थी रैटज़ेल की विचार और कार्य पद्धति से मोह भंग 1933 के बाद जर्मनी में नाजी सत्ता की स्थापना और देश के नए शासकों और हाउशोफ़र के भूराजनीति संस्थान के बीच बढ़ती निकटता से पश्चिमी राज्यों के लिए सम्भावित खतरों की आशंका के बाद ही हुआ ।

अब राजनीतिक भूगोल के लिए रैटज़ेल की अवधारणा से हट कर एक सर्वथा नई अवधारणा और अध्ययन पद्धति के विकास की आवश्यकता प्रतीत हुई । परिणामस्वरूप अब राज्य को जीवन्त क्रियाशील और विस्तारवादी राजनीतिक-क्षेत्रीय इकाई के स्थान पर मात्र एक विशिष्ट प्रकार के क्षेत्र के रूप में देखा जाने लगा, एक ऐसा क्षेत्र जिसकी पहचान उसके राजनीतिक संगठन में निहित है अत: उसकी सीमाएं राजनीतिक प्रभाव के क्षेत्रीय विस्तार के परिसीमन द्वारा निर्धारित हैं ।

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चूंकि रिचथोफन और हेट्‌नर की मान्यता के अनुसार भूगोल क्षेत्रों का अध्ययन था अत: राजनीतिक भूगोल के विद्यार्थी अब राज्य को राजनीतिक सीमाओं द्वारा परिसीमित क्षेत्र के रूप में देखने लगे । अत: राज्यों के क्षेत्रपरक अध्ययन के लिए उसी प्रकार की अध्ययन पद्धति का प्रचलन हुआ जो कि अन्य प्रकार के क्षेत्रों के भौगोलिक विश्लेषण में प्रयोग की जा रही थीं । अपने एक बहुचर्चित लेख में हटिशोर्न (1935) ने एक ऐसी ही अध्ययन पद्धति का प्रतिपादन किया जिसे उन्होंने आकारिकीय (मार्फोलाजिकल) पद्धति का नाम दिया ।

इस पद्धति के प्रतिपादन के पीछे यह आधारभूत मान्यता थी कि राज्य एक  ”भौगोलिक वस्तु” (जिओग्राफिक आब्जेक्ट) है । आकारिकीय अध्ययन पद्धति के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करते हुए हार्टशोर्न ने बताया कि इस अध्ययन पद्धति का सर्वप्रमुख औचित्य इस बात में निहित है कि यह प्रारम्भ से ही राजनीतिक भूगोल के अध्ययन के केन्द्रीय विषय, अर्थात् राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का पुक भौगोलिक परिघटना (फेनामेनन) के रूप में विश्लेषण करता है ।

इसके अन्तर्गत राज्य मात्र एक क्षेत्रीय इकाई मानते हुए उसकी क्षेत्रीय संरचना, उसकी सीमा, राजधानी, प्रशासनिक क्षेत्रों और संसाधन वितरण का निरूपण और वर्णन किया जाता था । अत: इस अध्ययन पद्धति की उपयोगिता सीमित थी ।

पन्द्रह वर्ष बाद प्रकाशित अपने एक लेख में हार्टशोर्न (1950) ने स्वीकार किया कि:

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एक भूखण्ड और उसके निवासियों की संगठनात्मक इकाई के रूप में राज्य एक वास्तविक परिघटना है परन्तु वह किसी पर्वत की तरह मात्र एक वस्तु नहीं है । अत: आकारिक अध्ययन वहीं तक उपयोगी है जहां तक देश की आकारिक संरचना राज्य की क्रियाशीलता को प्रभावित करती है ।

इस संदर्भ में रैटज़ेल की जैविक संकल्पना और 1933 के बाद प्रतिपादित राज्य की संकल्पना के बीच आधारभूत अन्तर का स्पष्टीकरण आवश्यक हैं । रैटज़ेल की परिकल्पना में राज्य के भौगोलिक क्षेत्र सम्बन्धी अवधारणा के दो पक्ष थे । एक देश की अपनी भूमि जिस पर वहां के निवासी रहते हैं तथा दूसरा भूमण्डलीय क्षेत्र जो तत्कालीन मान्यता के अनुसार प्रत्येक राज्य को उसकी सामरिक शक्ति के अनुसार प्रभुत्व-विस्तार के लिए उपलब्ध था ।

अत: राजनीतिक भूगोल के इन दो भिन्न-भिन्न स्तरों के अध्ययन हेतु अलग-अलग, परन्तु परस्पर सम्बद्ध, अध्ययन पद्धतियों की आवश्यकता थी । प्रथम, राष्ट्रीय भूक्षेत्र में समग्रता स्थापित करने से सम्बद्ध अध्ययन हेतु तथा द्वितीय, अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव प्रसार और उपनिवेशों की स्थापना की समस्या के सन्दर्भ में ।

रैटज़ेल की राष्ट्र सम्बन्धी अवधारणा देश के अन्दर क्षेत्रीय और राष्ट्रीय समग्रता सम्बन्धी अध्ययन का आधार बनी तथा उसकी राज्य की विस्तारवादी प्रवृत्ति सम्बन्धी परिकल्पना (तथा बाद में उससे सम्बद्ध मैकिंडर की हृदय स्थल परिकल्पना) अन्तरराष्ट्रीय स्तर की राजनीति के अध्ययन का निदेशक सिद्धान्त बनी । दोनों ही अध्ययन विधियां मुक्तांत (ओपन एण्डेड) विधियां थीं जिनके माध्यम से विद्यार्थी राज्यों के अलग-अलग उदाहरणों के अध्ययन में सामान्य नियमों का दर्शन कर सकता था ।

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इसके विपरीत राज्य की क्षेत्रीय परिकल्पना मे प्रत्येक राज्य को अनूठी क्षेत्रीय इकाई के रूप में देखा जाने लगा । परिणामस्वरूप राजनीतिक भूगोल के अध्ययन में सामान्य नियमों की खोज समाप्त हो गई और राजनीतिक भूगोल क्षेत्रीय वितरण पर केन्द्रित वर्णन मात्र रह गया अत: राजनीतिक भूगोल में सैद्धान्तिक विकास का मार्ग अवरुद्ध हो गया ।

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