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Notes on the Nature of Politics | Hindi

This article provides a note on the nature of politics in Hindi language.

शास्त्रीय स्तर पर राजनीति का तात्पर्य मुख्यतया औपचारिक ओर नियमबद्ध राजनीति से है जिसमें संवैधानिक संरचना, राजनीतिक दलों का संगठन, चुनावी राजनीति, सरकारो का चयन, प्रशासनिक ढांचा, सक्षम प्रशासन हेतु निदेशक सिद्धान्तों का निर्धारण, राज्य के मूल सिद्धान्तों और उसकी मूल अवधारणा के प्रति नागरिकों का विश्वास दृढ़ करके देश में एकता का सूत्र बनाए रखना तथा पडोसियों और विश्व के अन्य राज्यों के साथ आर्थिक, सांस्कृतिक और अन्य प्रकार के सम्बन्धों का अध्ययन शामिल है ।

ध्यान से देखने पर प्रतीत होगा कि इन सभी राजनीतिक क्रियाकलापों का मूल उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना है । इसीलिए राजनीति को सत्ता केन्द्रित प्रक्रिया कहा जाता है । सत्ता क्या है ? यह अपने आप में एक जटिल प्रश्न है क्योंकि सत्ता का स्वरूप समय और स्थान सापेक्ष है ।

सांस्कृतिक और तकनीकी विकास जनित सामाजिक परिवर्तनों के साथ सत्ता का, अर्थ भी परिवर्तित होता रहता है क्योंकि राजनीतिक सत्ता और सामाजिक सचेतना परस्पर गहराई से जुड़े हैं । इस सन्दर्भ में फ्रांसीसी दार्शनिक फोकॉल्ट के विचार उल्लेखनीय हैं । सत्ता के स्वरूप की परिवर्तनशीलता की चर्चा करते हुए फोकॉल्ट ने लिखा है कि सत्ता का स्वरूप कैसा होगा यह सत्ता के अधिकार के क्रियान्वयन की पद्धति पर निर्भर है ।

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उदाहरणार्थ पूर्व-आधुनिक और सामन्ती युग में समाज में सत्ताधिकार के क्रियान्वयन में जन प्रदर्शन पर जोर था जिससे कि नागरिक सत्ता को चुनौती देने तथा राजसत्ता का आदर करने के अन्तर को अच्छी तरह समझा सकें ।

इसलिए आवश्यक था कि राजदण्ड और राजसत्कार दोनों ही समारोहपूर्वक सम्पन्न किए जाएं । यही कारण था कि फांसी के तख्ते चौराहों पर लगाये जाते थे । उत्तर-सामन्ती दौर में सामाजिक व्यवस्था उत्तरोत्तर अनुशासनबद्ध हो गई ।

यूरोपीय देशों में यह परिवर्तन अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में सम्पन्न हुआ तथा उन्नीसवी शताब्दी के अन्त तक अनुशासित समाज सामाजिक और राजनीतिक जीवन का प्रतिमान बन गया ।  अनुशासनबद्ध समाज में सामाजिक प्रबन्धन राज्य द्वारा निर्मित और राजसम्मत नियमों, उपनियमों, आचार और दण्ड संहिताओं के आधार पर होता है । कालान्तर में राजसत्ता द्वारा प्रकाशित व्यवहार संहिताएं नागरिकों के सामाजिक व्यवहार का आधार बन जाती है ।

इन्हें आत्मसात कर नागरिक अवचेतन रूप में अपने को अनुशासित रखने का अभ्यास डाल लेता हे । परिणामस्वरूप देश की जनता को राजसत्ता के महत्व का भान कराने के लिए नियमों के उल्लंघन की स्थिति में दंडादेश का क्रियान्वयन सार्वजनिक स्थानों पर करने की आवश्यकता नहीं रह जाती । उत्तरसामन्ती युग में प्रशासन व्यक्ति केन्द्रित न रहकर उत्तरोत्तर संस्था अर्थात् व्यवस्था केन्द्रित हो गया था ।

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फलस्वरूप विधिक संहिताओं का निर्माण सरल हो गया । ये संहिताएं नागरिक संचेतना का अभिन्न अंग बन गई तथा सामान्य जन मान्य और अमान्य आचरण में अन्तर करते हुए स्वयं अनुशासित हो गया ।

अनुशासित सामाजिक व्यवस्था में लोग देश की विधि के प्रति आस्थावान बन जाते हैं और व्यक्तिगत हितों के लिए त्याग नागरिक संहिता का अभिन्न अंग बन जाता है ।

अनुशासनबद्ध समाज की इस परिकल्पना की मूल-भूत मान्यता है कि राजसत्ता के प्रति आदर का भाव जन-जन की चेतना से उदभूत होकर केशिका क्रिया (कैपिलरी एक्शन) द्वारा धीरे-धीरे सम्पूर्ण व्यवस्था को अनुशासित कर देता है ।

इस संकल्पना को केशिका किया संकल्पना के नाम से जाना जाता है । इस संकल्पना के अनुसार आधुनिक राज्य व्यवस्था सत्ता भय पर आधारित हे क्योंकि नागरिक व्यवहार की अनुशासनबद्धता के पीछे सत्ता की सर्वव्यापकता और उसके द्वारा उत्पन्न भय है ।

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अत: राजनीति एक सोद्‌देश्य प्रक्रिया है जिसके कुछ निश्चित आधार और सीमाएं हैं । इसका स्वरूप भिन्न-भिन्न स्थानों या देशों तथा ऐतिहासिक विकास के भिन्न-भिन्न चरणों में एक दूसरे से भिन्न होता है । राजनीति समाज सापेक्ष प्रक्रिया है तथा समाज का स्वरूप, स्थान ओर समय के साथ परिवर्तनशील है । भिन्न-भिन्न देशों तथा एक ही देश में भिन्न-भिन्न युगों में सामाजिक संचेतना का स्तर, उसका मूल्यबोध, और उसकी समस्याएं सर्वथा भिन्न होती हैं । इसलिए राजनीति का स्वरूप भी तदनुरूप बदलता रहता है ।

दूसरी ध्यान देने योग्य बात यह है कि राजनीतिक प्रक्रिया साधन ओर विमर्श सापेक्ष है । समय के साथ साधन सम्पन्नता में ह्रास अथवा वृद्धि एक सामान्य घटना है । साधन सम्पन्नता में आए इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय समस्याओं के स्वरूप और सामाजिक मूल्य बोध में परिवर्तन एक शाश्वत प्रक्रिया है ।

इन परिवर्तनों के फलस्वरूप देश के सामाजिक चिन्तन ओर राजनीतिक विमर्श का स्वरूप भी परिवर्तित होता रहता है । उदाहरणार्थ इतिहास के किसी अन्य चरण की अपेक्षा आज समाज में महिलाओ और शिशुओं की समस्याओं को अधिक महत्व मिल रहा है ।

इसी प्रकार इतिहास के किसी भी दौर में पर्यावरण सुरक्षा के प्रश्न पर इतनी चर्चा नहीं हुई थी । तीसरी महत्वपूर्ण बात है कि आधुनिक राजव्यवस्था एक लोकतांत्रिक तथा जनकेन्द्रित व्यवस्था है ।

अत: प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्ण जीवन बिताने के लिए न्यूनतम सुविधाओं का उपबंध करना और समाज के विभिन्न वर्गो तथा देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के बीच सामाजिक और आर्थिक विषमताओं का निवारण राज्य प्रशासन का एक प्रमुख उद्‌देश्य है ।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते हें कि:

(1) आधुनिक राजनीति जनता की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं पर केन्द्रित प्रक्रिया है तथा यही आकांक्षाएं और आवश्यकताएं राजनीतिक विमर्श को स्वरूप देती हैं । इस चिंतन का एक प्रमुख मुद्‌दा समाज के विभिन्न वर्गो और  व्यक्तियों को परस्पर प्रतिस्पर्धी आकांक्षाओं के बीच सर्वमान्य समाधान ढूंढना हे ।

(2) यह समाधान अनिवार्यतया अधूरा होता हे क्योंकि समझौते के आधार पर किया गया निर्णय सभी पक्षों को संतुष्ट नहीं कर सकता । साथ ही कालान्तर में सामाजिक स्थितियां बदलती हैं और परिणामस्वरूप नई समस्याएं उभरती हैं जिनके समाधान के लिए नए सिरे से प्रयास होता है, नई नीतियां निर्मित होती हैं जिनका क्रियान्वयन पुन: कुछ लोगों को संतुष्ट तो कुछ लोगों को असंतुष्ट कर देता है । अत: वर्गहित पर आधारित सामाजिक संघर्ष ओर समाधान की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है ।

(3) यह वर्ग संघर्ष अनिवार्यत सत्ता का संघर्ष है । ऐसे संघर्ष में अन्तरवर्गीय साधन सम्पन्नता (जिसमें सत्ता की भागीदारी शामिल है) निर्णायक भूमिका निभाती है । साधन सम्पन्नता सम्बन्धी यही विषमता राष्ट्रीय राजनीति की धुरी है ।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में वर्ग संघर्ष सम्बन्धी साधन सम्पन्नता के दो रूप हैं, जनमत संसाधन और आर्थिक-सांस्कृतिक संसाधन । स्वतंत्र मतदान व्यवस्था के वर्तमान युग में जनसंख्या बाहुल्य अपने आप में एक संसाधन बन गया है ।

समाज में विपन्न लोगों की संख्या सम्पन्न समुदाय की अपेक्षा बहुत अधिक है अत: अन्य दृष्टियों से सर्वथा असमान वर्ग संघर्ष भी राजनीतिक स्तर पर जीवन्त हो उठता हैं और चमत्कार की सम्भावना सतत विद्यमान रहती है । फलस्वरूप राजनीति एक शाश्वत प्रक्रिया बन गई है ।

(4) समस्याओं के समाधान की खोज की इस प्रक्रिया में राजनीति उत्तरोत्तर संस्था प्रधान प्रक्रिया बन गई है । भिन्न-भिन्न प्रकार की समस्याओं के समाधान के लिए अलग-अलग संस्थाओं का निर्माण हुआ है । सामान्यतया ये संस्थाएं तात्कालिक समस्याओं के निराकरण हेतु बनाई जाती हैं परन्तु एक बार अस्तित्व में आ जाने के पश्चात्र अनेक लोगों के हित उनसे अनिवार्यत जुड़ जाते हैं ।

इसलिए उनका औचित्य समाप्त होने के बाद भी उन्हें समाप्त करना सम्भव नहीं होता क्योंकि वे स्वयं राजनीति का केन्द्र और उसका कारक बन जाती हैं । अतएव एक बार अस्तित्व में आने के बाद ये संस्थाएं शाश्वतता प्राप्त कर लेती हैं ।

(5) राष्ट्रीय स्तर की राजनीति मूलतया परस्पर प्रतिस्पर्धी समूहों के बीच अस्तित्व, सुरक्षा ओर सत्ता में भागीदारी का संघर्ष है । फलस्वरूप सत्ता के संघर्ष में लगे पृथक्-पृथक् गुटों की परस्पर पृथक् राजनीतिक पहचान बन जाती है ।

उनकी यह पहचान अंशतया आर्थिक, राजनीतिक और अन्य प्रकार के स्वार्थो पर आधारित होती है तथा अंशतया इस बात पर कि कौन कहा निवास करता है, अर्थात् नागरिकों की स्थानीय चेतना पर ।

नागरिकों की स्थानिकता मूलतया इन प्रश्नों के उत्तर से सम्बद्ध है कि राष्ट्रीय व्यवस्था में उनका क्या स्थान है ? वे कौन हैं तथा देश की समृद्धि में उनकी भागीदारी क्या है ? राजसत्ता प्रदत्त जनकल्याण सुविधाओं का कितना भाग उन्हें प्राप्त होता है ? इन परस्पर सम्बद्ध प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर की खोज ही सारी राजनीति का मूलाधार है ।

अत: राजनीतिक पहचान एक साथ ही सामाजिक भी है और क्षेत्रीय भी क्योंकि समाज में किसे क्या प्राप्त होता है यह बहुत सीमा तक इस तथ्य पर निर्भर है कि कोन कहां निवास करता है, गांव अथवा नगर में, मलिन बस्तियों या सिविल लाइन्स में । इसी प्रकार किसी का जीवन स्तर कैसा है यह अंशतया इस बात पर भी निर्भर है कि वह व्यक्ति किस प्रदेश का निवासी है, विहार का या महाराष्ट्र का ।

(6) लोकतांत्रिक राजनीति की सर्वव्यापकता और उसके संस्थाप्रधान स्वरूप के परिणामस्वरूप राज्य व्यवस्था के संचालन के लिए कर्मचारियों और अधिकारियों की बहुत वडी संख्या एक अपरिहार्य आवश्यकता बन गई है । अतएव आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था नौकरशाही (ब्यूरोक्रेटिक) व्यवस्था है । यही कारण है कि राजनीतिशास्त्र में नौकरशाही का अध्ययन एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है ।

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