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Bad Habits Found in Individuals during Adolescence

Read this article in Hindi language to learn about the five major bad habits found in individuals during adolescence. They are: 1.  Drinking Alcohol 2. Smoking 3. Drugs 4. Related to Sex 5. Handling Stress and Peer Pressure.

बुरी आदतें या नशे की आदतें:

किशोर इस अवस्था अत्यन्त भावुक हैं । इनमें से कई तो अपने परिवार व मित्रों की थोड़ी सी भी उपेक्षा को वे काफी गम्भीरता से लेते हैं तथा कई किशोर अपने मित्रों के दबाब में आकर नशीली दवाईयों, मदिरा, धूम्रपान आदि का सेवन करने लगते हैं ।

बुरी आदतों में मुख्यतया शराब पीना, तम्बाकूयुक्त दवाईयाँ (गुटका), कोकीन, हॉरोइन्स (Heroines) तथा अन्य क्लब दवाईयों (Club drugs) के सेवन का प्रचलन आजकल अत्यधिक होता जा रहा है । इन सभी पदार्थों से विषाक्त पदार्थ शरीर में प्रवेश करते हैं । शरीर इन विषाक्त पदार्थों को एक सीमा तक ही सहन करने की क्षमता रखता है उसके पश्चात् शरीर में अनेकों विकार उत्पन्न होने लगते हैं ।

(1) शराब या एल्कोहल (Drinking Alcohol):

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आजकल किशोर व किशोरियों में शराब पीने का एक फैशन हो गया है जोकि छोटी-सी आयु से शुरू हो जाता है । अधिकतर उच्च वर्ग के बच्चों में इसकी आदत अधिक देखी जाती है । धीरे-धीरे मध्यम वर्ग व गरीबों में भी इसका उपयोग हो रहा है, पैसा न होने की स्थिति में वे अपराध करने से भी नहीं चूकते । बुरी आदतों के कारण आजकल किशोर वर्ग अपराधी बनता जा रहा है; जैसे: चोरी, डकैती, मार-धाड़ करना, चेन खींचने की घटना आदि अपने चरम सीमा पर हैं ।

शराब का प्रभाव (Effects of Alcohols):

i. एल्कोहल में एक रासायनिक पदार्थ होता है जो कि कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के मिलने से बनता है ।

ii. शुरू-शुरू में किशोर मित्र मंडली की संगत शराब का प्रयोग एक उत्तेजक पदार्थ के रूप में करता है ।

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iii. धीरे-धीरे वे इसकी अधिक मात्रा का सेवन करने का अभ्यस्त होता जाता है ।

iv. एल्कोहल शरीर को ऊर्जा और गर्मी प्रदान करता है ।

v. यह शरीर द्वारा शीघ्र ही शोषित हो जाता है ।

vi. शराब पीने के पन्द्रह मिनट बाद यह रक्त में मिल जाता है ।

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vii. आमाशय में पहुँच कर उसकी श्लैष्मिक कला को लाल कर देता है तथा रक्त कोशिकाओं में प्रवाहित हो जाता है ।

viii. इससे शीघ्र ही ऊर्जा उत्पन्न हो जाती है तथा व्यक्ति को भूख लगने लगती है ।

ix. रक्त में एल्कोहल के पहुँचते ही हृदय उत्तेजित हो जाता है ।

x. एल्कोहल मस्तिष्क को उत्तेजित कर देता है तथा विचार शक्ति को बढ़ा देता है ।

xi. जिससे व्यक्ति अधिक कार्य कर सकता है ।

xii. कई बार अधिक मात्रा में शराब सेवन से विचार-शक्ति कमजोर हो जाती है ।

xiii. आवाज लड़खड़ाने लगती है, चलने में कठिनाई मालूम होती है और मनुष्य मूर्च्छित होकर गिर जाता है ।

xiv. शराब के अधिक सेवन से यकृत व हृदय बढ़ जाता है ।

xv. आमाशय तथा आमाशय की भीतरी दीवार मोटी होकर विकृत हो जाती है, जिससे पाचक रस कम निकलता है ।

xvi. खाना ठीक प्रकार से नहीं पच पाता ।

xvii. अधिक मात्रा व समय से शराब का सेवन करने से माँसपेशियों पर नियन्त्रण नहीं रहता है, पैर लड़खड़ाने लगते हैं, व्यक्ति को चलने में कठिनाई होती है तथा वह मूर्च्छित होकर गिर जाता है ।

xviii. शराब का अधिक मात्रा में सेवन करने से मुँह, गले आमाशय, पक्वाशय, फुफ़्फ़्स व यकृत में कैन्सर होने का डर रहता है ।

(2) धूम्रपान (Smoking):

आजकल किशोर व किशोरियों में सिगरेट पीना भी अधिक देखा जा रहा है । शुरू-शुरू में मित्र मंडली के दबाब या पिता को देखकर बच्चे एक-दो कस लगा लेते हैं जोकि धीरे-धीरे आदत में परिवर्तित हो जाता है ।

धूम्रपान का प्रभाव (Effects of Smoking):

सिगरेट में हजार प्रकार के रासायनिक पदार्थ पाये जाते हैं । ये पदार्थ-शरीर पर विषैला प्रभाव डालते हैं । सिगरेट में उपस्थित निकोटिन (Nicotine) कई रोग का कारण बनता है ।  सिगरेट के अधिक सेवन करने से हृदय रोग या हृदय घात होता है । इसके सेवन से पेप्टिक अल्सर (आमाशय व आँतों में घाव) हो जाता है । यकृत व फुफ्फुस (Lungs) में कैन्सर होने का डर रहता है ।

धूम्रपान बंद करने का प्रभाव (Effects of Stopping Smoking):

ये निम्न प्रकार हैं:

i. घबराहट, भूख लगना,

ii. नींद न आना, निराशा या

iii. कुंठा, मृत्यु आदि ।

(3) नशीली दवाईयाँ (Drugs):

ये दवाईयों दो प्रकार से ली जाती हैं:

(i) खायी जाती हैं (eaten),

(ii) धूम्रपान की जाती है ।

नशीली दवाईयों का प्रभाव (Effects of Drugs):

इन दवाईयाँ में मुख्य रूप से कोकीन और हीरोइन नामक विषाक्त पदार्थ होते हैं । शुरू-शुरू में इसके सेवन से व्यक्ति चिन्ताओं से मुक्त महसूस करता है तथा आस-पास के वातावरण से दूर हो जाता है ।

ऐसे व्यक्ति को लगता है कि उसने संसार में सब कुछ प्राप्त कर लिया है तथा अपने आपको आकाश में उड़ता हुआ महसूस करता है । इसमें उपस्थित कोकीन विषाक्त पदार्थ-हृदय, मस्तिष्क, वृक्क तथा फुफ्फुस पर अपना बुरा प्रभाव डालता है । हीरोइन से वमन, पेट में दर्द, दस्त, घबराहट (confusion), अधिक पसीना आना । नशीली दवाईयों का अत्यधिक मात्रा में सेवन करने से मृत्यु जाती है ।

(4) यौन सम्बन्धी (Related to Sex):

किशोरावस्था के अंत तक किशोर यौन रूप से परिपक्व और वैवाहिक जीवन के लिये तैयार हो जाता है । इस समय किशोरों को यौन-ज्ञान के प्रति रुझान अत्यंत स्वाभाविक व सामान्य है । उनके शरीर में यौन हारमोनों के स्त्रावित होने से गौण यौन लक्षणों का विकास होता है ।

अत: किशोरों को यौन विकास के विषय में शिक्षित करने व इन परिवर्तनों में संतुलन या सामंजस्य बैठाने की अत्यंत आवश्यकता है । इस समय जैसी भी प्रवृत्ति व विचारधारा वे इस विषय में बनायेंगे उसी पर आगे चलकर उनका यौन जीवन आधारित होगा । इन यौन प्रवृत्तियों को अपनाने में माता-पिता व स्कूल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं । यह शिक्षा ”प्रजनन स्वास्थ्य” के लिये शिक्षा कहलाती है ।

यौन शिक्षा में सरकार की भूमिका (Government’s Role):

यौन शिक्षा को एक पाठ्‌यक्रम में रखने की कोशिश निरन्तर भारत सरकार द्वारा की जा रही है । यौन शिक्षा को आवश्यक शिक्षा के रूप में लिया जाना चाहिये । सर्वप्रथम यौन शिक्षा पाठ्‌यक्रम में शारीरिक संरचना, स्वास्थ्य यौन सम्बन्धी ज्ञान रखना चाहिए । परिवार नियोजन के अनेकों कार्यक्रम भारत सरकार चला रही है जिसमें यौन शिक्षा को भी सम्मिलित किया जा सकता है ।

(5) हम उम्र तनाव और दबाब को संभालना (Handling Stress and Peer Pressure):

किशोरावस्था मुख्यतया 14-16 वर्ष की आयु में बच्चे अपने माता-पिता से अधिक महत्व अपने हम उम्रों को देते हैं इसमें परिवार के किशोर या मित्रगण होते हैं । परन्तु आजकल आधुनिकीकरण के कारण तथा पारिवारिक परिवेश के परिवर्तन में संयुक्त परिवार (जिसमें दादा-दादी, चाचा-चाची तथा अन्य भाई बहन) टूट रहे हैं तथा एकांकी परिवारों में वृद्धि हो रही है ।

इन कारणों से हम उम्र मित्रों की भूमिका अधिक हो जाती है । अधिकांशतया देखा जाता है कि एकांकी परिवारों में किशोरों से उनकी समस्याओं पर बातचीत करने वाला कोई नहीं होता क्योंकि अधिकांश माता-पिता दोनों ही जीविकोपार्जन में व्यस्त रहते हैं तथा घर पर कोई अन्य सदस्य नहीं होता है ।

अत: बचपन से ही हम-उम्रों का अत्यधिक प्रभाव बच्चों पर पड़ता है तथा किशोरावस्था में हम उम्रों की भूमिका वही रहती है । इसका अर्थ है कि किशोरावस्था में किशोर हम उम्रों से अधिक मेल-जोल बढ़ाते हैं । वे उम्र के अनुसार कौशल व रुचि विकसित करते हैं जो कि अच्छी व बुरी दोनों प्रकार की आदतों में परिवर्तित होती है । किशोर अपनी समस्याओं व भावनाओं की चर्चा भी अपने मित्रों से करते हैं ।

समवर्ती समूह से तात्पर्य (Meaning of Peer Group):

समवर्ती समूह को समान आयु, क्षमता व योग्यता, पृष्ठभूमि या सामाजिक स्थिति के व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है । जैसाकि ऊपर बताया गया है कि किशोर अपने समवर्ती वर्ग को अत्यधिक महत्व प्रदान करता है ।

उसके मित्रों के विचार उसके लिए अपने विचारों से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं । ऐसा इसलिये होता है क्योंकि वे सभी समान प्रकार के अनुभवों से गुजर रहे होते हैं इसलिए वे एक-दूसरे को अपने समान महसूस करते हैं ।

समवर्ती दबाव (Peer Pressure):

किशोरावस्था में किशोर पर अपने मित्रों का दबाव बना रहता है । वे मित्रों में स्वयं को बलिष्ठ प्रदर्शित करने के लिये उनके दबाव में आकर मदिरापान, धूम्रपान व नशीली दवाईयों का सेवन करने लगते हैं । किशोर इस समय अत्यंत संवेदनशीलता के दौर से गुजरते हैं तथा अपने मित्रों की जरा-सी भी उपेक्षा को गम्भीरता से लेते हैं ।

कई किशोर अपने मित्र समूह से दोस्ती करने में सक्षम नहीं हो पाते है । वे माता-पिता पर भी विश्वास नहीं करते । ऐसी स्थिति में वे स्वयं को अकेला महसूस करते हैं और सोचते हैं कि उन्हें कोई प्यार नहीं करता है ।

ऐसी स्थिति में वे दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिये या कई बार सच में गलत या आत्मघाती प्रवृत्ति अपना लेते हैं तथा अपना जीवन समाप्त कर देना चाहते हैं । लड़कियाँ गलत रास्ते पर भी जा सकती हैं जिसका गम्भीर दुष्परिणाम होता है । यह दबाब दो प्रकार का हो सकता है: सकारात्मक समवर्ती दबाब, नकारात्मक समवर्ती दबाब ।

सकारात्मक समवर्ती दबाव (Positive Peer Pressure):

इससे अच्छी सामाजिक छवि तथा आत्मविश्वास का विकास व निर्माण होता है । ये सम्बन्ध कठिन परिस्थितियों के दौरान सुरक्षा कवच का काम करते हैं । समवर्ती समूह वर्ग सकारात्मक आदर्श की भूमिका अदा कर सकता है । इसके साथ-साथ यह स्वस्थ व्यवहार को भी प्रोत्साहित कर सकता है ।

नकारात्मक समवर्ती दबाव (Negative Peer Pressure):

वे किशोर जो अपने मित्रों तथा परिवार से स्वयं को अलग तथा परित्यक्त महसूस करते हैं या जिन पर नकारात्मक समवर्ती दबाव रहता है-वे गैर सामाजिक गतिविधियों; जैसे: चोरी, गलत काम, गैंग में शामिल होना, धूम्रपान, मदिरा पान आदि में लिप्त हो जाते हैं ।

हस्तान्तरण (Handover):

किशोरावस्था में हम उस के दबाव को हस्तान्तरित करने में माता-पिता, बड़े भाई-बहन तथा अध्यापकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है ।

अभिभावक-माता-पिता की भूमिका (Role of Parents):

इस अवस्था में किशोर अपने परिवार से कुछ दूरी बनाने लगते हैं, वे अपने समवर्ती (Peer) वर्ग पर सर्वाधिक विश्वास करना प्रारम्भ कर देते हैं । वे प्राय: किसी भी बात की स्वीकृति के लिए अपने समवर्ती (Peer) वर्ग की ओर देखते हैं तथा उनकी स्वीकृति प्राप्त करने के लिये स्वयं के व्यवहार में परिवर्तन कर लेते हैं ।

इस अवस्था में अधिकांश किशोर एकान्त चाहते हैं । वे अपने परिवार के साथ कम समय व्यतीत करना चाहते हैं । वे अपने ऊपर किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध पसन्द नहीं करते हैं । माता-पिता को इस समय बच्चों से बातचीत व संवाद करने का अवसर प्रतिदिन निकालना चाहिए ।

इसका कारण यह है कि बच्चों को अपने समवर्ती समूह के दबाव से बचाने के लिये माता-पिता का समय व परामर्श की आवश्यकता सबसे अधिक प्रबल होती है । अत: स्पष्ट है कि माता-पिता व किशोरों के आपसी संवाद, व्यवहार के लिये कुछ प्रमुख मार्गदर्शी सिद्धान्तों को पुन: स्थापित करना अत्यन्त आवश्यक है ।

माता-पिता तथा किशोरों के बीच सुदृढ़ सम्बन्ध स्थापित करने के लिये निम्न उपाय सहायक हो सकते हैं:

i. किशोरों को अपनी सभी समस्याओं व भावनाओं को माता-पिता के साथ बाँटना चाहिए चाहे वह उनके समवर्ती समूह की हो या स्कूल कॉलेज की हो । दोनों को एक-दूसरे के विचार सुनने चाहिए तथा एक दूसरे को स्वास्थ्य सुझावों पर अपनी सहमति स्पष्ट व सम्मानजनक रूप से प्रस्तुत करनी चाहिए ।

ii. माता-पिता को अपने बड़े होते बच्चों से शिष्टाचारपूर्वक व्यवहार करना चाहिए व समय-समय पर उनके मित्रों को भी घर पर विशेष अवसर पर बुलाकर उनके साथ भी सम्पर्क व सम्बन्ध स्थापित करना चाहिये ।

इसी प्रकार बड़े भाई-बहन व अध्यापक की भूमिका भी समवर्ती समूह के दबाव को कम करने में सहायक होती है । ये लोग किशोर को उचित शिक्षा व ज्ञान देकर उसका मार्ग दर्शन कर सकते हैं तथा गलत रास्ते या समवर्ती वर्ग के नकारात्मक दबाव से रक्षा कर सकते हैं ।

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