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Emotional and Affective Changes during Adolescence | Home Science

Read this article in Hindi language to learn about the emotional and affective changes during adolescence.

संवेग (Emotion):

संवेग एक प्रकार की भावात्मक क्रिया है जिससे मनुष्य का मानसिक शारीरिक सन्तुलन पूर्णरूप से बिगड़ जाता है । संवेग से अर्थ है: ‘हिला देना’ या ‘उत्तेजित कर देना’ । वास्तव में संवेग वह मनोवैज्ञानिक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति का सामान्य सन्तुलन बिगड़ जाता है ।

इसलिए संवेगात्मक स्थिति में मनुष्य वह सभी कार्य कर सकता है जो सामान्य अवस्था में नहीं कर पाता है । इसके विपरीत कभी-कभी प्रबल संवेगावस्था में व्यक्ति स्तम्भित हो जाता है तथा उसकी सामान्य क्रियाएं भी रुक जाती हैं; उदाहरणस्वरूप अधिक शोक या प्रसन्नता की अवस्था में व्यक्ति की कुछ समय के लिये सभी क्रियाओं का रुक जाना ।

किशोरावस्था को तूफान तथा तनावों की अवस्था भी कहा जाता है । किशोरावस्था की पहचान ही संवेगात्मक परिवर्तन से होती है । मनोवैज्ञानिक कुल्टन के अनुसार, समायोजन की समस्याओं के कारण किशोरों में तनाव, चिन्ता आदि उत्पन्न होती हैं ।

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हरलॉक के अनुसार, तूफान तथा तनाव की अवस्था से हर किशोर नहीं गुजरता है । यह तथ्य सत्य है कि संवेगात्मक अस्थिरता प्रत्येक किशोर में पायी जाती है । गैलेस के अनुसार, ”किशोरों के संवेग प्राय: तीव्र, अनियन्त्रित अभिव्यक्ति वाले और विवेक शून्य तो होते हैं, लेकिन उनके संवेगात्मक व्यवहार में प्राय: प्रतिवर्ष उत्तरोत्तर सुधार होता जाता है; उदाहरणस्वरूप: ”चौदह वर्ष वाले किशोर प्राय: चिड़चिड़े होते हैं । एक वर्ष के बाद किशोर भावों पर नियन्त्रण करने योग्य हो जाता है और फिर उदास भी होने लगता है ।”

लगभग सभी किशोर प्रतिबंधों के प्रति विद्रोह के दौर से गुजरते हैं जैसे: क्रोध से आग बबूला होना, मूड में तीव्रता से परिवर्तन इस स्तर पर सामान्य बातें हैं । इस अवस्था में किशोरों को महसूस होता है कि मानो वह संवेगों व भावों के उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहे हैं, एक पल के लिये वे सकारात्मक महसूस करते हैं और दूसरे ही पल में वे उदास हो जाते हैं, किसी-किसी दिन वह परिपक्व वयस्क के रूप में व्यवहार करता है तो अगले ही दिन वह बच्चों की तरह व्यवहार करने लगता है ।

हम सब यह जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में विशिष्ट होता है और तनाव के प्रति क्रिया करने का उसका माध्यम भिन्न होता है परन्तु तनावपूर्ण स्थितियों के प्रति सकारात्मक तथा स्वस्थ माध्यमों से प्रतिक्रिया करने पर नकारात्मक भावों को कम करने में सहायता मिलती है ।

अत: क्रोध को कम करने व तनावपूर्ण स्थिति से सकारात्मक रूप से निपटने के लिये निम्न उपाय करने चाहिये:

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i. सर्वप्रथम अपने क्रोध संकेतों को पहचानने की कोशिश करनी चाहिए तथा यह स्वीकार करना चाहिए कि आप क्रोध में हैं ।

ii. अपने क्रोध को कम करने के लिये अपना ध्यान कहीं और केन्द्रित करना चाहिए तथा कुछ सकारात्मक प्रयास करने चाहिये ।

iii. क्रोध कम करने के लिये किशोर कोई भी विधि काम में ला सकते हैं ।

iv. यदि किशोर किसी बात से अत्यधिक अप्रसन्न की स्थिति में है तथा स्वयं उसको नियंत्रित करने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं तो उन्हें अपने परिवार के सदस्यों या मित्रों से सहायता लेने में किसी प्रकार से हिचकिचाना नहीं चाहिए ।

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v. किशोर को यह नहीं सोचना चाहिए कि किसी की मदद लेना उनकी कमजोरी है । इससे बल्कि यह ज्ञात होता है कि किशोर में अच्छी दृढ़ता है तथा उसको आन्तरिक संसाधन की अच्छी समझ है ।

vi. यदि दो मित्रों में किसी कारणवश आपस में लड़ाई हो जाती है तो उनको परिस्थिति का विश्लेषण करना, उसके कारण को समझना तथा भविष्य में ऐसी परिस्थिति दुबारा न आने के लिये उचित कदम उठाने चाहिये ।

नीचे दिये गये विकल्पों में से एक या दो विकल्पों को चयनित करके देखना चाहिए कि कौन-सा विकल्प क्रोध कम करने में सर्वोत्तम है:

i. मन पसंद गाना सुनें

ii. उस बात को छोड़ दें

iii. अच्छी यादें सोचें

iv. लम्बी-लम्बी साँस लें

v. दस तक गिनती गिनें

vi. शारीरिक श्रम करने वाली क्रियाएँ करें

vii. किसी विश्वास पात्र व्यक्ति से बात करें ।


स्वःअवधारण (Self Development):

अत: यह स्पष्ट होता है कि किशोरों के व्यक्तिगत विकास के लिये सकारात्मक स्व:धारण का निर्माण अत्यन्त आवश्यक है । स्व:धारण से तात्पर्य है: अपनी शक्तियों व कमजोरियों का अवलोकन करने की विधि ।

जब किशोर अपनी कमजोरियों का अवलोकन करता है तो उसकी स्व:अवधारण कम होती है । इसके साथ-साथ यदि वह अपनी शक्तियों व गुणों को देखते हैं और उसमें सुधार करने का प्रयास करते हैं तो उनकी स्व: अवधारणा उच्च हो जाती है ।

स्वाभिमान:

स्वाभिमान से तात्पर्य है: अपनी क्षमताओं का अपने आप अवलोकन करना । यदि किशोर का स्वाभिमान उच्च है तो उसको अपनी क्षमताओं पर अधिक विश्वास होगा । सकारात्मक स्व:अवधारण के परिणामस्वरूप ही उच्च स्वाभिमान होता है । जब कोई किशोर अपनी क्षमताओं पर विश्वास करना आरम्भ कर देता है तथा उन्हें अपनी परिसम्पत्ति के रूप में स्वीकार कर लेता है तो उसका स्वाभिमान अधिक हो जाता है । अत: किशोरावस्था के समय सकारात्मक स्व:अवधारण का निर्माण अत्यन्त आवश्यक व महत्वपूर्ण है ।

स्वयं को बेहतर ढंग से समझने व सकारात्मक स्वाभिमान के विकास के लिए किशोरों को अपने लिये कुछ मापदंड बनाकर उनका आकलन करना चाहिए । साथ ही अपने माता-पिता से भी इसी मापदंड पर अपना (किशोर) आकलन करवाना चाहिए ।

किशोरों के लिए कुछ मापदंड निम्न प्रकार हैं:

किशोर उपरोक्त मापदंडों के बिन्दुओं से सकारात्मक स्वाभिमान निर्माण कर सकता है अर्थात् ये बिन्दु सहायक होते हैं । इसमें माता-पिता की सहायता भी महत्वपूर्ण है जिसके द्वारा किशोर अपनी कमजोरियों को ज्ञात कर सकता है और उनमें सुधार ला सकता है ।

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