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Equipments Used in Dark Room | Radiology | Hindi

Read this article in Hindi to learn about the various types of equipments used in dark room.

डार्क रूम का सूखा किनारा (ड्राई साइड):

इसके अन्तर्गत लोडिंग बेन्च, कैसेटों के लिए जगह, फिल्म रखने का डिब्बा, सुरक्षित फिल्मों की जगह, फिल्म हैंगरों के टांगने के ब्रेकेट व बेकार पेपरों की डलिया आदि प्रमुख हैं ।

लोडिंग बेंच की लम्बाई उपलब्ध स्थान तथा कार्य पर निर्भर करती है । वेन्च की सतह लाइनोलियम या फार्माइका की तथा रंग इस प्रकार चुनते हैं जो सेफलाइट में अलग से दिख सके ।  वेन्च में ही एक स्ताट एक किनारे बना देते है, जिससे वेस्ट पेपर गिराया जा सके ।

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भिन्न आकार के कैसेटों को इकट्‌ठा करने हेतु अलग-अलग व्यवस्था होनी चाहिए तथा उन्हें इनकी मोटाई से ज्यादा गहराई में नहीं डालना चाहिए । इसी प्रकार फिल्म बिन में भी हर आकार की फिल्म की अलग जगह होनी चाहिए । रिजर्व फिल्मों को लेड की चादर युक्त अलमारी में रखना चाहिए । फिल्म हैंगरों को लोडिंग बेज्य के ऊपर स्थित हैंगरों में रखना चाहिए जो हर आकार के हैंगर के लिए अलग होना चाहिए ।

डार्क रूम का गीला किनारा वेट साइड:

प्रोसेसिंग सल्यूशन सूखे पाउडर या द्रव रूप में मिलते हैं जिनमें उपयुक्त मात्रा में पानी मिलाकर उन्हें तैयार किया जा सकता है । उन्हें ठीक से मिलाने के लिए दो स्टियररों की आवश्यकता होती है । एक फिक्सर के लिए तथा दूसरा डेवलेपर के लिए ।

थर्मामीटर का प्रयोग सल्युशन का ताप मापने तथा उपयुक्त ताप का पानी मिलाने हेतु किया जाता है । वेटसाइड का मुख्य उपकरण प्रासेसिंग टैंक है । साधारण प्रकार के टैंक में तीन खाने हाते हैं । इनमें से एक सिरे पर स्थित कम्पार्टमेंट को डेवलेपिंग तथा दूसरे सिरे को फिक्सिंग के लिए प्रयोग करते हैं ।

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मध्य वाले का प्रयोग रिन्स तथा वास करने हेतु प्रयोग किया जाता है तथा इसे रनिंग वाटर से जुड़ा होना चाहिए । यदि विभाग का कार्य अधिक हो तो दोनों कम्पार्टमेंट अलग-अलग होने चाहिए । करोजन से बचने तथा सारे कम्पार्टमेन्ट का ताप गली से बराबर करने के लिए टैंक स्टेनलेस स्टील व उचित एलाग मिलाकर बनाते हैं ।

इससे अच्छी व्यवस्था एक बड़ा स्टेनलेस फेंक, जो दो भागों में बंटा होता है तथा मास्टर टैंक कहलाता है, का प्रयोग करते है । इनमें से एक में दो इर्न्सट टैंक रख दिये जाते है जिनमें से पहला डेवलेपिश व दूसरा फिक्सिंग के लिए प्रयोग करते हैं ।

इन दोनों के बीच स्थिति पानी रित्रित तथा ताप नियंत्रण में मदद करता है फिक्सिंग टैक का आयतन डेवलपिंग टैंक की अपेक्षा दुगुना होना चाहिए, क्योंकि फिक्सिंग में डेवलपिंग की अपेक्षा लगभग दो गुना समय लगता है ।

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मास्टर टैंक का दूसरा कम्पार्टमेंट वासिंग के काम आता है । इसका आयतन फिक्सिंग टैंक की अपेक्षा दो गुना होना चाहिए क्योंकि वासिंग में लगने वाले समय फिक्सिंग समय का लगभग दो गुना होता है । इन्सर्टों का आयतन पहले से ही ठीक से माप लेना चाहिए । यदि सल्यूशन टैंक के ऊपरी सिरे से 2.5 सेमी॰ नीचे हो तो:

सभी पाइप टैंक के पीछे स्थित होने चीहिए । रिन्सिंग व वाशिंग टैंक में पानी नीचे तली से आना चाहिए तथा ऊपर से बहकर बाहर जाना चाहिए । गर्म करने वाले एलीमेन्ट धर्मोस्टेटिकली नियन्त्रित होने चाहिए तथा ताप थर्मामीटर द्वारा देखते रहना चाहिए । कई विधियां फिल्मों को सुखाने में मदद करती है । स्टेनलेस स्टील या इनैमेल के कैबिनेट युक्त हायर जिनमें हीटिंग एलीमेंट व पंखा लगा होता है, भी उपलब्ध

है ।

फिल्म की रचना:

रेडियोग्राफिक फिल्म क्ए मुख्य रूप से दो भाग होते हैं: बेस व इमल्सन (चित्र 7.1) । अधिकतर फिल्मों में दोनों तरफ इमल्सन की कोटिंग होती है । अत: डबल एमल्सन फिल्म कहलाती है ।

 

इमल्सन व बेस के मध्य पतली परत एडहेसिव या चिपकने वाली परत होती है जो इमब्सन व बेस की समरूप से चिपकने में मदद करती है । इमल्सन के ऊपर एक रक्षक परत जिलेटिन की होती है । इसे सुपरकोटिंग कहते हैं ।

यह फिल्म को दाब, खरोचों तथा डेवलपिंग व फिक्सिंग के दौरान असावधानी पूर्वक काम करने पर भी फिल्म को हानि से बचाती है । फिल्म सीट की मोटाई 200-300 माइक्रो मीटर होती है (लगभग 0.25 मिमी॰) । डबल कोटिंग फिल्में कम एक्सपोजर में अच्छी डेन्सिटी व कन्ट्रास्ट प्रदान करती है । यह फिल्मों को मुड़ने से भी रोकता है ।

1. बेस:

यह फिल्म का आधार है जिस पर इमल्सन चढ़ाया जाता है । यह मुड़ने वाला तथा न टूटने वाला होता है । इसका आकार, प्रकार प्रोसेसिंग के दौरान निश्चित रहता है । अत: इमेज डिसटार्शन या खराब नहीं होती    है । रेडियोग्राफिक फिल्म के इस गुण को ”डाइमेन्शनल स्टेविलिटी” कहते हैं । बेस इनर्ट होता है ।

अत: इमल्सन का सेन्सिटोमेट्रिक गुण प्रभावित नहीं होता है । बेस समान लूसेन्सी वाला तथा निर्माण के दौरान प्राय: फिल्म को हल्का नीला टिन देने के लिए रंग मिला देते हैं । इस नीले टिन से आख पर कम जोर पड़ता है तथा रेडियोलाजिस्ट को थकान का कम अनुभव होता है । बेस दो प्रकार के होते हैं सेलुलोज ट्राइएसीटेट और पालीएस्टर ।

पालीएस्टर अधिक मजबूत तथा लम्बे समय तक टिकने वाला होता है । तथा इसकी डायमेन्सनल स्टेविलिटी भी उच्च होती है । पालीएस्टर बेस पतला होता है । 160 माइक्रोमीटर । जबकि ट्राइएसीटेट बेस 180 माइक्रोमीटर मोटा होता है । पर उतना ही मजबूत होता है । पालीएस्टर बेस कपड़ों में प्रयोग होने वाले पालीएस्टर फाइबर से ही बनता है ।

2. इमल्शन:

यह एक्स-रे फिल्म का वह भाग है जिस पर प्रकाश व एक्स-रे फोटान कार्य कर इमारमेशन ट्रान्सफर करते हैं । इमल्सन जिलेटिन व सिल्वर हैलाइड के क्रिस्टलों का सम्मिश्रण होता है । इसके अतिरिक्त अन्य रासायनिक सेन्सिटाइजर, वेटिंग ऐजेन्ट, एन्टीकोगुलेन्ट तथा हार्डनर भी मिलाये जाते हैं ।

जो फिल्मों को अच्छी गुणवत्ता प्रदान करते हैं । इमल्शन साफ होना चाहिए जिससे प्रकाश आसानी से जा सके तथा प्रोसेसिंग रसायन भी आसानी से सिल्वर हेलाइड क्रिस्टलों तक समान रूप से पहुंच सके । इमल्सन सिल्वर हेलाइड क्रिस्टलों को उनके स्थान पर स्थिर रखता है ।

सिल्वर हेलाइड क्रिस्टल इमल्सन का एक्टिव भाग है । इमल्सन में स्थित सिल्वर हेलाइड का लगभग 95 प्रतिशत सिल्वर ब्रोमाइड होता है तथा शेष सिल्वर आयोडाइड । सिल्वर हेलाइड क्रिस्टलों का निर्माण मेटेलिक सिल्वर को नाइट्रिक अम्ल में मिलाने पर सिल्वर नाइट्रेट बनता है ।

प्रकाश के लिए सेन्सिटिव सिल्वर ब्रोमाइड क्रिस्टल सिल्वर नाइट्रेट व पोटिशियम ब्रोमाइड में मिलाने पर बनते हैं । यह सम्पूर्ण क्रिया अन्धेरे में नियंत्रित, दाब, ताप व भिन्न तत्वों को मिलाने पर जिलेटिन की उपस्थिति में होती है ।

जब ब्रोमाइड आयनों पर एक्सपोजर होता है तो ब्रोमाइड आयनों से इलेक्ट्रान निकल कर सेन्सिटिव केन्द्र की ओर जाता है, जिससे केन्द्र ऋण आवेशयुक्त हो जाते हैं । सिल्वर ब्रोमाइड का एक अन्य गुण यह भी है कि इसमें कई धनावेश युक्त सिल्वर क्रिस्टल अपनी सामान्य स्थिति छोड़कर फ्री सिल्वर आयन के रूप में होते है, जो ऋणावेश युक्त सेन्सिटिविटी केन्द्र की ओर खिंचकर उनका आवेश न्यूट्रेलाइज कर देते हैं तथा स्वयं मेटेलिक सिल्वर के रूप में इकट्‌ठे हो जाते हैं ।

यह क्रिया तब तक चलती रहती है जब तक सभी सेन्सिटिविटी सेन्टर पूर्णत: न्यूद्रेलाइज नहीं हो जाते हैं । इस प्रकर बनी हुई इमेज को “लेटेंट” या “इनविजिविल इमेज” कहते हैं । डेवलपर के संपर्क में आकर डेवलपिंग यहीं से आरंभ होती है ।

रेडियोग्राफी के लिए इमल्शन में दो गुण होने आवश्यक हैं:

क. स्पीड या सेन्सिटिबिटी:

यह इमल्शन की प्रकाश तथा एक्स-रे से प्रतिक्रिया की क्षमता है । इम्लशन को फास्ट या हाई स्पीड वाला तब कहते हैं, जब यह कम एक्सपोजर पर ही फिल्म को उपयुक्त डेन्सिटी प्रदान करने में समर्थ हो । सामान्य फिल्में फास्ट होती हैं ।

ख. लैटीट्‌यूड:

यह इमल्शन की रेडियोग्राफिक इमेज को कान्ट्रास्ट के लम्बे स्केल दा सफेद से लेकर काले तक टोन्स की लम्बी रेंज को दिखाने की मित है इसके अतिरिक्त लैटीट्‌यूड किसी तकनीक में मार्जिन आफ इरर प्रदन करने की क्षमता भी है । इमल्शन का लैटीट्‌यूड अधिक होना चहिए जिससे एक्सपोजर में होने वाली गड़बड़ियों का इमेज पर अधिक प्रभाव न पड़े ।

कैसेट:

यह एक कड़ा होल्डर होता है जो सीन व फिल्म को रखने के काम आता है । इसका सामने की व ट्‌यूब की तरफ रहने वाली सतह पतली, मजबूत व कम परमाणु मार वाले पदार्थ जैसे प्लास्टिक या कार्ड बोर्ड की बनी होनी चाहिए । आगे के कवर में अन्दर फ्रन्ट कीन व पिछले कवर के अन्दर की ओर बैक स्कीन स्थित होती है ।

रेडियोग्राफिक फिल्म इन दोनो स्क्रीनों के बीच लोड की जाती है । आजकल कैसेट में दोनों स्कीनें बिल्कुल समान होती हैं । स्क्रीन तथा कैसेट कवर के बीच कोई दबाने वाली चीज जैसे रबड़ या फेल्ट रखा जाता है, जिससे कैसेट बन्द करने पर फिल्म दोनों कीनों को सम्पर्क में अच्छी तरह से रह सके ।

पिछला कवर भारी धातु का बना होता है जिससे बैकस्कैटर कम से कम हो । फिल्म स्क्रीन काम्बिनेशन से निकलने वाली एक्स-रे फोटो इलेक्ट्रिक विधि द्वारा पिछले कवर द्वारा सोख ली जाती है जो कम परमाणु नम्बर की अपेक्षा अधिक परमाणु नम्बर वाली धातु के साथ अधिक होता है । कभी-कभी कैसेट के हिन्ज व होल्ड डाउन क्लैम्प भी फिल्म पर इमेज बनाते हैं । यह बैक स्केटर के कारण होता है तथा केवल उच्च किलोवोल्ट रेडियोग्राफी में होता है, जब एक्स-रे किरण पुंज काफी पेनेट्रेटिंग हो ।

इन्टेन्सीफाइंग स्क्रीन:

इन्टेन्सीफाइंग स्क्रीन एक्स-रे किरण पुंज की ऊर्जा को दृश्य प्रकाश में परिवर्तित करने की एक विधि है । यह प्रकाश रेडियोग्राफिक फिल्म से क्रिया कर लेटेस्ट इमेज बनाता है । इन्टेंसीफाइंग स्क्रीन पर पड़ने वाली एक्स किरणों का लगभग 35 प्रतिशत भाग स्क्रीन से क्रिया करता है ।

लेकिन रोगी के शरीर से निकलने वाली कुल एक्स-रे का कुल 3.6 प्रतिशत भाग ही लेटेन्ट इमेज के निर्माण में भाग लेता है । कुल रेडियेशन का एक प्रतिशत भाग फ्रन्ट स्क्रीन द्वारा, एक प्रतिशत प्रत्येक इमल्शन की परत में तथा 0.6 प्रतिशत रेडियेशन बैक इन्टेंसीफाइंग स्क्रीन द्वारा सोखा जाता है । इस प्रकार की प्रत्येक क्रिया में बहुत से दृश्य प्रकाश फोटानों का निर्माण होता है । इन्टेंसीफाइंग स्क्रीन इस तक पहुंचने वाले विकिरण के लिए एम्पलीफायर का कार्य करती है ।

इनटेंसीफाइंग स्क्रीन के प्रयोग से रोगी को कम विकिरण मिलता है तथा रेडियोग्राफिक कन्ट्रास्ट भी अच्छा होता है । इन्टेंसीफाइंग स्क्रीन फिल्म की साइज की आती हैं । अधिकतर स्क्रीनों में चार परतें होती हैं ।

i. प्रोटेक्टिव कोटिंग:

यह पारदर्शी परत 15-25 माइक्रो मीटर मोटी तथा एक्स-रे फिल्म के सबसे पास स्थित होती है । यह स्क्रीन की खरोचों आदि से रक्षा करती है । यह स्टेटिक विद्द्युत का निर्माण होने से रोकती है व फास्फर को बिना हानि पहुंचाये सफाई भी की जा सकती है ।

ii. फास्कर:

यह एक्स-रे इन्टेंसीफाइंग स्क्रीन की ऐक्टिव परत है जो एक्स-रे पड़ने पर प्रकाश निकालती है । इसकी मोटाई स्क्रीन के प्रकार पर निर्भर करती है जो 150-300 माइक्रोमी॰ होती है । सामान्य फास्फर पालिमर मैट्रिक्स में युक्त क्रिस्टेलाइन कैल्सियम टंगस्टेट होता है । रेयर अर्थ फास्कर का प्रयोग फास्ट स्क्रीनों में किया जाता है । फास्कर में निम्न गुण होने चाहिए ।

a. यह अधिक परमाणु संख्या वाला होना चाहिए जिससे एक्स-रे से क्रिया की संभावना अधिक हो ।

b. यह प्रति एक्स-रे से क्रिया के फलस्वरूप अधिक प्रकाश निकालने वाला होना चाहिए ।

c. निकलने वाला प्रकाश उचित तरंग दैर्ध्य (रंग) का होना चाहिए जिससे यह एक्स-रे फिल्म की सेन्सिटिविटी के अनुरूप हो ।

d. प्राय: फास्कर चमकते हैं, पर उत्तेजित करने के पश्चात प्रकाश का लगातार निकलना कम से कम होना चाहिए । वर्षो से चार पदार्थो को फास्कर की तरह प्रयोग किया जा रहा है:

a. कैल्सियम टंगस्टेट

b. जिंक सल्फाइड

c. बेरियम लेड सल्फेट

d. रेयर अर्थ- गैडोलिनियम, लैन्थेनम व यीद्रियम

iii. रिफेलेक्टिव परत:

फास्कर तथा बेस के बीच रिफलेक्टिव परत होती है जो लगभग 25 माइक्रो मी॰ मोटी मैग्नीशियम आक्साइड या टाइटेनियम डाई आक्साइड र्क बनी होती हैं । जब एक्स-रे फास्कर से क्रिया करता है तो सभी दिशाओं में प्रकाश निकलता है ।

आधे से कम प्रकाश फिल्म की दिशा में निकलता है । रिफलेक्टिव परत अन्य दिशाओं में जाने वाले प्रकाश को फिल्म की ओर पुन: परावर्तित करता है । अत: यह इन्टेंसीफाइंग स्क्रीन की क्षमता बढ़ाती है ।

iv. बेस:

चित्र 7.3 और 7.4 फिल्म से सबसे दूर स्थित परत होती है जो एक मिमी॰ मोटी तथा फास्फर परत को सहारा देती है । यह अच्छे कार्डबोर्ड, पालीऐस्टर या धातु की बनी होती है । बेस को रासायनिक रूप से निष्क्रिय, मुड़ सकने वाला, मिलावट रहित व नमी रोधी होना चाहिए ।

स्क्रीन स्पीड:

स्क्रीन को फास्ट तब कहा जाता है जब छोटा एक्स-रे एक्स्पोजर ही एक्स-रे फिल्म को उपयुक्त ब्लैकनिंग प्रदान करता है । इन्टेंसीफिकेशन फैक्टर बिना स्क्रीन के व स्क्रीन के साथ फिल्म को समान डेन्सिटि प्रदान करने में लगने वाले एक्सपोजरों का अनुपात है ।

इन्टेसीफिकेशन फैक्टर किसी स्क्रीन पेयर के लिए हमेशा एक से अधिक होता है । सामान्य स्क्रीन 70 किलोवोल्ट पर पांच स्पीडों में उपलब्ध है ।

स्क्रीन की स्पीड आन्तरिक तथा बाहय दो फैक्टरों पर निर्भर है:

A. इन्ट्रीन्जिक फैक्टर:

i. फास्फर की रचना:

कैल्सियम टंगस्टेट एक्स-रे को अच्छी तरह प्रकाश में परिवर्तित करता है । रेयर अर्थ स्क्रीन यह कार्य इससे भी अधिक अच्छी तरह करते हैं ।

ii. फास्फर की मोटाई:

किसी फास्कर की एक्टिव परत की मोटाई जितनी अधिक होती है उसकी स्पीड भी उतनी ही अधिक होती है पर एक सीमा से अधिक मोटाई बढ़ाने पर इन्टेसीफिकेशन फैक्टर पर उल्टा प्रभाव पड़ता है ।

iii. क्रिस्टल का आकर:

जितना बड़ा क्रिस्टल होगा, उसकी स्पीड उतनी ही अधिक होगी ।

iv. रिफलेक्टिव परत:

परत स्क्रीन स्पीड बढ़ाती है, पर रिजोल्यूशन कम करती है ।

B. इक्सट्रिन्जिक फैक्टर:

i. तापमान:

कमरे का ताप बढ़ने के साथ  स्क्रीन स्पीड घटती जाती है पर फिल्म स्पीड बढ़ती जाती है । ये दोनों पड़ने वाले कुल प्रभाव में कोई परिवर्तन नहीं होने देते हैं । अत: ताप करेक्शन की सामान्य स्थिति में आवश्यकता नहीं पड़ती है । उच्च ताप पर ला बढ़ाना पड़ता हे ।

ii. किलोवोल्टेज:

किलोवोल्टेज बढ़ाने पर स्पीड भी बढ़ती है ।

रिजोल्यूशन:

यद्यपि स्क्रीन का प्रयोग बहुत अधिक होता है पर उनके साथ हुई फिल्मों का रिजोल्यूशन बिना स्क्रीन के एक्सपोज की फिल्मों की अपेक्षा खराब होता है । जब एक्स-रे स्क्रीन से क्रिया करता है तो इससे निकलने वाला प्रकाश फिल्म के इमल्शन के बड़े भाग को एक्टिवेट कर देता है, जबकि सीधे एक्स-रे द्वारा यह एक्टिवेशन बहुत ही कम इमल्शन का होता है ।

अत: स्क्रीन से निकलने वाले प्रकाश के कारण रिजोल्युशन कम हो जाता हैं । प्राय: वे स्थितियां जो इन्टेंसीफिकेशन फैक्टर बढ़ाती हैं, रिजोल्युशन कम करती हैं । अत: उच्चस्पीड युक्त फिल्म का रिजोन्सान निम्न कोटि का होता है और इमेज अनसार्प होती है ।

उच्च इन्टेंन्सीफिकेशन फैक्टर की अन्य हानियों में: 

i. माटलिंग:

यह डेन्सिटी में होने वाला असमान फर्क है । यह फ्लोरेसेंट रसायनों की असमान कोटिंग के कारण होता है । ज्यादा रसायन होने पर ज्यादा डेन्सिटी होती है ।

ii. रेसीप्रोसिटी के नियम का अनुपयुक्त होना:

किसी ऐच्छिक डेन्सिटी के लिए इन्टेन्सिटी एक्सपोजर समय के रेसीप्रोकल होती है । इसे रेसीप्रोसिटी का नियम कहते हैं ।

इन्टेसिंटी 1/समय

1 x T = c

यह नियम तब तक अनुपयुक्त नहीं होता है । यदि एक्स-रे सीधे लेटेस्ट इमेज बनाने में भाग लें । जहां स्क्रीनों का प्रयोग किया जाता है, वहां लेटेस्ट इमेज का निर्माण स्कीन से निकले हुई नीले प्रकाश से होता है अत: यह नियम लागू नहीं हो पाता है । यह नियम बहुत अधिक तथा बहुत कम एक्सपोजर समय रखने पर अधिक अनुपयुक्त हो जाता है ।

रख-रखाव ब उपयोग:

प्राय: इमेज अनसार्प होती है, क्योंकि

i. स्क्रीन की उचित माउन्टिंग न होने से अर्थात कीन व फिल्म के बीच जगह होने पर ।

ii. कैसेट के मुड़ने तथा टूटने से ।

iii. कैसेट की बकलिंग ।

स्क्रीन पर धूल, ग्रीज तथा खरोचें भी प्रकाश को फिल्म तक पहुंचने से रोकती हैं, जिनसे आर्टिफैक्ट भी पैदा होते हैं । अत: स्क्रीनों की सावधानी पूर्वक सफाई तथा रख-रखाव आवश्यक है ।

ल्यूमिनेसेन्स:

कोई भी पदार्थ जो किसी बाहरी उद्‌दीपन के बदले प्रकाश निकालता है ल्यूमिनेसेन्ट पदार्थ या फास्फर कहलाता है, तथा इस प्रकार निकला दृश्य प्रकाश ल्यूमिनेसेन्स कहलाता है । जब किसी ल्यूमिनेसंट पदार्थ को उत्तेजित किया जाता है तो उसके बाहरी कक्षा के इलेक्ट्रान उत्तेजित ऊर्जा लेबल तक उठा दिये जाते हैं ।

इससे बाहरी इलेक्ट्रान कक्षा में एक होल या गड्‌ढा बन जाता है जो परमाणु के लिए अस्थिर स्थिति पैदा कर देता है । यह गड्‌ढा तब भरता है जब उत्तेजित इलेक्ट्रान पुन: अपनी स्थिति में लौटता है तथा इस क्रिया में वह ली गयी ऊर्जा दष्य प्रकाश के रूप में निकालता है ।

निकले हुये प्रकाश की तरंग दैर्ध्य ल्यूमिनेसेंट पदार्थ तथा इलेक्ट्रान को उच्च ऊर्जा में उत्तेजन की मात्रा पर निर्भर करता है । ल्युमिनेसेंस दो प्रकार की होती हैं । एक जिसमें एक्स-रे फोटान पड़ने के 10-8 सैकेण्ड के अन्दर प्रकाश निकलता है जिसे फ्लोरेसेंस कहते हैं तथा दूसरा जिसमें प्रकाश एक्स-रे फोटान पड़ने के 10-8, सैकेण्ड बाद प्रकाश निकालता है जिसे फास्फोरेसेंस कहते हैं ।

एक्स-रे इन्टेसीफाइंग स्क्रीन मुख्य रूप से फ्लोरेसेंस पैदा करती है । फास्फोरेसेंस इन्टेसीफाइंग स्क्रीन में नगण्य होती है । और फ्लोरेसेन्ट स्क्रीन में अधिक होती है । फास्फोरेसेंस किसी इन्टेंसीफाइग कीन के लिए आफ्टर ग्लो, स्क्रीन ग्लो या स्क्रीन फाग कहलाती है । अत: यह बिल्कुल नहीं होना चाहिये ।

फ्लोरेसेन्ट स्क्रीन:

फ्लोरोस्कोपी में स्क्रीन द्वारा निकाले प्रकाश को एक्स-रे विशेषज्ञ द्वारा सीधे देखा जाता है तथा यह इससे संबंधित एक्स-रे स्वरूप को निरूपित करता है । स्क्रीन द्वारा निकले प्रकाश की इन्टेन्सिटी बहुत कम हो ती है अत: इसे देखना मुश्किल होता है । इस इन्हें-सिटी पर आख हरे प्रकाश के लिए सबसे अधिक संवेदनशील होती है । अत: फ्लोरेसेन्ट पदार्थ के रूप में जिंक कैडमियम सल्फाइड का प्रयोग किया जाता है ।

क्लोरेसेन्ट परत एक कार्ड बोर्ड पर माउंट रहती है । चित्र 7.5 कार्ड बोर्ड तथा जिंक सल्फाइड परत के मध्य सफेद मैग्नीशियम आक्साइड की रिफ्लेक्टिंग परत होती है जो अन्य दिशाओं में निकले प्रकाश को भी रेडियोलॉजिस्ट की दिशा में फेंकती है ।

 

रेडियालॉजिस्ट तथा फ्लोरेसेन्ट कीन के बीच एक लेड ग्लास की परत होती है जिसमें वजन के हिसाब से 60 प्रतिशत लैड होता है तथा दृश्य प्रकाश के लिए पारदर्शी होता है पर फ्लोरेसेन्ट स्क्रीन से होकर आने वाली सभी एक्स किरणों को सोख लेता है और एक्स-रे विशेषज्ञ की विकिरण से रक्षा करता है । फ्लोरेसेन्ट स्क्रीन की मोटाई थोड़ी सी (0.45 – 0.65 मि॰मी॰) इंटेसीफाइंग स्क्रीन की अपेक्षा अधिक होता है ।

मेनुअल प्रोसेसिंग:

डेवलेपमेंट:

इसका कार्य लेटेन्ट इमेज को विजिबुल इमेज में बदलना है ।

डेवलपिंग सल्यूशन:

इसका मुख्य कार्य एक्सपोज हो चुके सिल्वर हैलाइड क्रिस्टलों को मेटलिक सिल्वर में (बिना अन एक्सपोज्ड सिल्वर हैलाइड क्रिस्टलों को हानि पहुंचाये) बदलना है । इसके चार रासायनिक तत्व होते हैं ।

i. कार्बनिक रिड्यूसिंग एजेन्ट:

यह मीटाल व हाइड्रोक्वीनोन का मिक्सचर होता है । हाइड्रोक्वीनोन धीमी गति से कार्य करता है तथा फिल्म को काला सेड या कन्ट्रास्ट प्रदान करता है । मीटाल तेजी से कार्य करता है तथा ग्रे के हल्के सेडों को प्रभावित करता है । अत: अन्तिम डिटेल प्रदान करता है ।

ii. एक्टिवेटर:

सोडियमकार्बोनेट व सोडियम हाइड्राक्साइड ये इमल्शन को स्वेल (फुलाकर) करवाकर डेवलेपिंग एजेंटों का इमल्शन में पेनीद्रेशन आसान करते हैं तथा क्रिया के पश्चात मुक्त हुये पदार्थो को बाहर निकलने में मदद करता है । हाइड्रोक्वीनोन केवल क्षारीय माध्यम में कार्य करते हैं । (पी॰एच॰-10-11पर)

iii. रिस्ट्रेनर:

पोटेशियम ब्रोमाइड और पोटेशियम आयोडाइड पदार्थो को केवल उन सिल्वर हेलाइड क्रिस्टलों से कार्य करने देते हैं, जो एक्स-रे से एक्सपोज हो चुके हैं । बिना रिस्ट्रेनर के क्रिस्टल भी जो एक्सपोज नहीं हुये हैं, मेटलिक सिल्वर में रिडयूस हो जायेंगे । इससे अधिक फाग का निर्माण होगा, जिसे डेवलपमेंटल फाग कहते हैं ।

iv. प्रिजरवेटिव:

सोडियम सल्काइड-यह रिड्यूसिंग एजेन्टों को हवा द्वारा आक्सीकृत होने से रोकता है । अत: डेवलेपर का जीवन बढ़ाता है । हाइड्रोजन हवा से होने वाले आक्सीकरण के लिए बहुत संवेदनशील होता है । ऑक्सीकृत डेवलेपर भूरा रंग ग्रहण कर लेता है ।

डेवलपमेंट के कुछ प्रयोगिक तथ्य:

दो मुख्य फैक्टरों में:

(i) डेवलैपिंग सन्धान का ताप (ii) डेवलेप करने का कुल समय । डेवलपिंग का उपयुक्त ताप 20-22 सेन्टीग्रेड (68-72 डिग्री फारेनहाइट) होना चाहिए । ठन्डे डेवलपर के साथ (ताप 16 सेन्टीग्रेड के कम या 60 फारेनहाइट) हाइड्रोक्वीनोन की क्रियाशीलता बहुत कम हो जाती है जिससे रेडियोग्राफ में कान्दास्ट व डेन्सिटी बहुत कम हो जाती है ।

इमेज की गुणवत्ता ठण्डे डेवलेपर में भी डेवलपिंग समय बड़ा कर सुधारी जा सकती है । यदि डेवलपर बहुत अधिक गर्म है अर्थात 24 डिग्री से॰ग्र॰ से अधिक (75 फैरेनहाइट तो यह इमल्शन को नरम कर देता है तथा रासायनिक फाग बनाता है ।

नान स्क्रीन फिल्मों के साथ डेवलेपिंग समय लगभग 50 प्रतिशत बढ़ जाता है क्योंकि फिल्म में अधिक सिल्वर होता है । तथा मोटाई भी अधिक होती है । मैनुअल डेवलेपमेंट में 29 डिग्री से॰ग्रे॰ पर पांच मिनट डेवलेप करते हैं ।

एक्सपोजर में पांच किलोवोल्ट कम देकर तीन मिनट डेवलप करने की अपेक्षा पांच मिनट देने से अच्छा कन्दास्ट आता है । उपरोक्त आधार पर फिल्मों की प्रोसेंसिंग का आधार समयताप डेवलमेन्ट कहलाता है । बार-बार फिल्म को यह देखने के लिए डेवलपर से नहीं निकालना चाहिए की डेवलपमेंट पूर्ण हुआ या नहीं, क्योंकि इससे फागिंग हो जाती है ।

जब फिल्में डेवलपर में पड़ी होती हैं तो उन्हें हल्के-हल्के हर मिनट पर हिलाना चाहिए जिससे उनमें धारियां न पड़ें तथा अच्छी तरह डेवलप हो सकें । डेवलेपमेन्ट में ब्रोमाइड इमल्शन से निकल जाते हैं जो हिलाकर यदि निकाले न जायें वे डेवलेपमेन्ट की क्रिया से धीमा कर देंगे ।

रेप्लेनिसमेंट:

लगातार प्रयोग करने से डेवलपिंग सल्यूशन कमजोर पड़ जाता है तथा टैंक में इसका आयतन भी कम हो जाता है । अत: कम हुई शक्ति तथा आयतन को पूरा करने हेतु इसमें एक बिशेष सल्यूशन रेप्लेनिसर मिलाया जाता है जिससे रेडियोग्राफ की गुणवत्ता बनी रह सके तथा अधिक से अधिक फिल्में प्रोसेस हो सकें ।

रेप्लेनिसर सामान्य डेवलेप की अपेक्षा निम्न बातों में भिन्न होता है:

i. ब्रोमाइड नहीं होता है, क्योंकि यह फिल्म इमल्सन से निकल कर डेवलपर में इकट्‌ठा होता है ।

ii. हाइड्रोक्वीनोन, मीटाल तथा क्षार की मात्रा अधिक होती है क्योंकि लगातार प्रयोग से ये डेवलेपर में कम हो जाते हैं ।

रिन्सिंग:

डेवलेप करने के बाद फिल्म को रिन्सिंग बाथ में 30 सेकेण्ड के लिए सारे डेवलेपर को धोने के लिए डालते हैं । फिक्सर में डेवलेपर मिलने से इसकी क्षमता कम हो जाती है तथा फागिंग भी हो जाती है । एक अन्य उपयुक्त विधि डेवलप की गई फिल्म को अम्लीय रिन्स बाथ (एक गेलन पानी में 15 ग्राम ग्लेशयल एसिटिक एसिड मिलाकर) जिसमें 1-2 प्रतिशत एसिटिक अम्ल है, में फिक्सिंग के पहले डालना है । बिना उचित रिन्सिंग के फिक्सर अच्छी तरह कार्य नहीं कर पाता है तथा उसमे धारियां बन जाती हैं । आटोमेटिक प्रोसेसिंग में रिन्सिंग नहीं की जाती है ।

फिक्सेसन:

फिक्सेसन का उद्देश्य:

i. एक्सपोज न हुये तथा डेवलप न हुये सिल्वर हैलाइड को निकालना ।

ii. फिल्म इमेज को बनाये रखने में ।

iii. इमल्शन को कड़ा करने में ।

फिक्सिंग सल्यूशन के चार भाग होते हैं:

i. फिक्सिंग एजेन्ट:

हाइपो (पाउडर वाले फिक्सर में सोडियम थायोगस्केट तथा द्रव वाले फिक्सर में अमोनियम थायोसल्फेट)- यह फिल्म से एक्सपोज तथ डेवलप न हुये सिल्वर ब्रोमाइड तथा आयोडाइड क्रिस्टलों को निकालकर फिल्म को साफ करता है । तथा मेटलिक सिल्वर को डेवलप तथा एक्सपोज हुये भागों में छोड़ देता है । बिना फिक्स किये अनडेवलप्ड सिल्वर हेलाइड, रेडियोग्राफ को अंतिम रूप से काला कर देते हैं ।

ii. प्रिजर्वेटिव:

सोडियम सल्फाइड- यह फिक्सिंग एजेन्ट को खराब होने से बचाकर फिल्म को साफ करने में मदद करती है ।

iii. हार्डनर:

क्रोमएलम या पोटेशियम एलम- यह इमल्शन तथा जिलेटिन को कड़ा कर फिल्म को खरोचों से बचाता है ।

iv. अन्त:

रल्फ्यूरिक या एसिटिक अप्त- इसके दो उद्देश्य होते हैं । फिल्म में बचे हुये क्षार को न्यूदेलाइज करता है, व फिक्सर व हार्डनर के लिए उचित माध्यम प्रदान करता है ।

रैपिड फिक्सर:

इसमें अमोनियम क्लोराइड होता है जिससे फिक्सिंग समय आधा हो जाता है । फिक्सिंग समय फिक्सर की उग्र और प्रोसेस की गयी फिल्मों की संख्या पर निर्भर करता है । उपयुक्त फिक्सर में लगभग 1-4 मिनट फिल्म को साफ करने में लगते हैं, अर्थात सभी एक्सपोज न हुये सिल्वर हेलाइडों को निकालने में लगा समय पर क्लियरिंग समय से 2-3 गुना समय इमल्शन को कड़ा करने में लगता है ।

फिक्सर को इक्झास्टेड तब माना जाता है जब फिक्सिंग समय 10 मिनट से अधिक हो जाये । फिल्म को सफेद प्रकाश फिक्सिंग के समय नहीं लगना चाहिए । लम्बे समय तक फिक्सिंग नहीं करनी चाहिए । क्योंकि इससे हाइपो इमल्सन से इतनी अच्छी तरह जुड़ जाता है कि वाशिंग से भी नहीं निकल पाता है । अत: रेडियोग्राफ को ब्राउन डिस्कलरेशन देता है । लम्बे समय तक फिक्सेशन से इमेज की ब्लीचिंग भी हो जाती है ।

फिक्सिंग बाथ का उपयुक्त ताप 18-24 डिग्री से॰ग्रे॰ होता है । कम ताप पर रसायनों की क्रियाशीलता बहुत कम हो जाती है जबकि उच्च ताप पर इमल्शन मुलायम होकर आसानी से नष्ट होने वाला हो जाता है ।  समय-समय पर फिक्सर की भी रेप्लेनिसमेंट की आवश्यकता होती है ।

वाशिंग:

प्रोसेसिंग का अगला कदम बचे हुये फिल्म की सतह पर चिपके हाइपो को धोना है क्योंकि यह जमा काले सिल्वर को भूरे सिल्वर सल्फाइड में बदल देता है । वाशिंग के लए रनिंग पानी होना चाहिए तथा 20 डिग्री से॰ ग्रेड ताप पर लगभग 20 मिनट तक करनी चाहिए ।

फिक्सर न्यूट्रेलाइजर बाथ वाशिंग समय को काफी कम कर देता है । फिक्सर से निकालने के बाद फिल्मों को थोड़े समय के लिये रिस बाथ में डालने के पश्चात दो मिनट के लिए विशेष घोल में डालते हैं जो इमल्सन से फिक्सर निकालता है । अब वाशिंग पांच मिनट में ही हो जाती हे ।

सुखाना (ड्राइंग):

प्रोसेसिंग का अन्तिम कदम फिल्मों को सुखाना है । इसके लिए गर्म हवा से सुखाने वाले विशेष कैबिनेट आते हैं । सुखाने का ताप 35 डिग्री॰ से॰ग्रे॰ से अधिक नहीं होना चाहिए तथा फिल्म को धूल रहित जगह लटकाना चाहिए ।

आटोमेटिक प्रोसेसिंग:

आटोमेटिक प्रोसेसिंग के कई लाभ हैं:

i. इससे प्रासेसिंग समय बहुत कम, एक से डेढ़ मिनट में हो जाता ।

ii. गुणवत्ता बनाये रखता है, क्योंकि ताप का निर्धारण बहुत अच्छा होता है, तथा रेप्लेनिसमेंट भी उपयुक्त होता है ।

iii. रेडियोलॉजी विभाग की कार्यक्षमता बढ़ाता है ।

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