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Responsibilities of the Radiographer | Radiology | Hindi

Read this article to learn about the various responsibilities of the radiographer in Hindi language.

जांच सम्बन्धी उत्तरदायित्व:

रोजमर्रा का कार्य करने हेतु रेडियाग्राफरों को जांच विधियों, बीमारियों, रोगी की आरम्भिक सेवा आदि का ज्ञान आवश्यक है जिससे वे रोगी को बिना हानि पहुचाये अपना कार्य ठीक तरह से कर सकें । साथ ही रेडियोग्राफर को विभाग में रोगी को उचित वातावरण भी प्रदान करना चाहिए । रेडियोग्राफर को, समझदार, खुशमिजाज तथा मरीजों से संवेदना रखने वाला होना चाहिए ।

रेडियोग्राफर द्वारा रोगी को ठीक-ठीक पहले नाम से श्री, श्रीमती या कुमारी लगाकर बुलाया जाना चाहिए । रेडियोग्राफर को रोगी से आ रही बदबू या दिखने में बुरा होने पर अधिक ध्यान नहीं देना चाहिए । इन सबको उसे हंसते हुए सहना चाहिए ।

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रोगी के लिए रेडियोग्राफर का अच्छा दिखना (स्वच्छ तथा अच्छे कपड़े पहने हुये) बहुत महत्वपूर्ण है । महिला रेडियोग्राफर को लम्बे नाखून रखने तथा गहने पहनने से बचना चाहिए । क्योंकि रोगी की सेवा में इससे खरोंच पड़ सकती हैं ।

रेडियोग्राफरों को जांच के समय आपस में या रोगी से लम्बी बातचीत नहीं करनी चाहिए । रेडियोग्राफर को रोगी की हालत के बारे में या जांच के नतीजे के बारे में बताने से बचना चाहिए, बल्कि उसे उसके चिकित्सक या एक्स-रे विशेषज्ञ से परामर्श लेने को कहना चाहिए ।

लापरवाही (नेग्लीजेन्स):

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जब रेडियोग्राफर कोई ऐसी जांच कर रहा हो, जो रोगी की जान के लिए खतरनाक हो तो उसे यह जांच बहुत सावधानीपूर्वक करनी चाहिए ।

इस प्रकार के उदाहरण:

i. रेडियोग्राफर को रोगी को किसी चोट से बचाने के लिए घूमने वाली एक्स-रे टेबल को बहुत सावधानी से चलाना या बन्द करना चाहिए । रोगियों को बिना सहारे के टेबल से नहीं उतरने देना चाहिए ।

ii. उसे इन्द्रावीनस यूरोग्राम के लिए प्रयोग होने वाले रसायन की जांच करनी चाहिए ।

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iii. रडियोग्राफरों का यह कर्तव्य है कि जांच के लिए एक्सपोजर करने के पूर्व मशीन की पूरी जांच कर लें, और यह जांच सभी चीजों की तथा विस्तृत होनी चाहिए जैसे हैण्डग्रिप, सुल्डर पीशों, कोनों वा डायफ्रामों आदि की जांच ।

iv. ऐच्छिक निर्देश को न पढ़ पाना भी नेग्लीजेन्स माना जायेगा । जैसे गर्भवती स्त्री के उदर को लेड एप्रेन से ढकना ।

v. रोगी को मिलने वाला रेडियेशन कम से कम रखना चाहिए ऐसा न करना भी नेग्लीजेन्स के अंतर्गत आता है ।

नेग्लीजेन्स के लिए उत्तरदायित्व:

जब रेडियोग्राफर की नेग्लीजेन्स से रोगी को हानि पहुंचती है तो प्राय: रोगी काम देने वाली संस्था (अस्पताल) से मुआवजे की मांग करता है । फिर भी कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है कि अस्पताल इस हानि की पूर्ति अपने कर्मचारी (रेडियोग्राफर) से नहीं करवाये ।

रोगी बच्चा:

बच्चे की जांच के समय रेडियोग्राफर को बच्चे की मन: स्थिति समझनी चाहिए । उन्हें गलत ढंग से उठा-पटक, तीव्र ध्वनि के सामने या अकेले नहीं छोड़ना चाहिए । बच्चे को कोई उसका मन पसन्द खिलौना देना लाभदायक हो सकता है ।

नैतिक उत्तरदायित्व:

कोड आफ कन्डक्ट में दो प्रमुख बातें हैं: प्रथम रोगी की सूचना गोपनीय रखनी चाहिए तथा दूसरी रोगी को कम से कम विकिरण लगने देना चाहिए ।

कानूनी उत्तरदायित्व:

प्रोफेशनल कान्फीडेन्स का टूटना | Loss of Professional Confidence:

सामान्य जांच के दौरान रोगी की केस सीट से मिली किसी सूचना को गोपनीय रखना चाहिए । इसे किसी प्रकार की सूचना, जांच के नतीजे की सूचना या कोई अन्य सूचना रोगी से जांच के दौरान प्राप्त की गयी हो, किसी अन्य को देना प्रोफेशनल दुर्व्यवहार माना जायेगा, बल्कि रेडियोग्राफर को केवल रोगी के चिकित्सक या रेडियोलॉजिस्ट से रोगी की हालत के बारे में खुलकर बात करनी चाहिए । ये बातें किसी अन्य मरीज से या अस्पताल के बाहर नहीं करनी चाहिए । यह और अधिक आवश्यक हो जाता है, जब रोगी जान-पहचान वाला हो ।

किसी दुर्घटना के रोगी की जांच विधि:

1. रोगी की देखभाल ।

2. दुर्घटना की सूचना ।

3. दुर्घटना को रिकार्ड करना ।

रोगी की देखभाल सबसे पहले तथा सबसे अधिक आवश्यक है । फिर भी दुर्घटना की रिपोर्टिग व रिकार्डिंग भी आवश्यक है तथा इमानदारी पूर्वक की जानी चाहिए । ऐसा न करना कानून के खिलाफ होगा ।

रेडियोग्राफर और अस्पताल:

रेडियोग्राफर को रोगी की सेवा में अन्य लोगों को होने वाली परेशानियों से परिचित होना चाहिए । रेडियोलॉजी विभाग का निर्माण तथा देखरेख इस बात को ध्यान में रखते हुये तथा रेडियोग्राफर को उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानकर किया जाता है ।

भिन्न जांचों को इस प्रकार निर्धारित किया जाना चाहिए जिससे रोगी की कम से कम समय इन्तजार करना पड़े । रेडियोग्राफर को माध्यान्ह भोजन के समय वार्ड में मोबाइल यूनिट पर यदि कार्य अति आवश्यक न हो तो नहीं करना चाहिए । साथ ही नर्स को अधिक बीमार रोगी रेडियोलॉजी विभाग में जब बहुत अधिक भीड़ हो तब एपोइंटमेंट समय से बहुत पहले नहीं भेजना चाहिए । इसके लिए अन्य विभागों से उचित सामरस्य आवश्यक है ।

सामान्य रोगी की देखभाल:

रेडियोग्राफर को हर रोगी को एक अलग किस्म का समझना चाहिए न कि, की जाने वाली एक अन्य जांच । अन्य लोगों को जांच के बारे में नहीं बताना चाहिए ।

रोगी की सुरक्षा:

जांच के दौरान कन्ट्रास्ट व विकिरण से रोगी की रक्षा का इन्तजाम करना चाहिए । इसके लिए सामान्य योजना, विभाग का कार्यभार, स्टाफ, रोगियों के इन्तजार के समय तथा स्थान, स्वच्छता, प्रकाश की व्यवस्था, फर्श की कवरिंग, सुरक्षित गलियारे, पहचान चिन्हों आदि की व्यवस्था अति आवश्यक है ।

जांच की आरम्भिक आवश्यकता:

रोगी, एक्स-रे विभाग निम्न तीन तरीकों से पहुंचता है:

1. ह्‌वील चेयर पर ।

2. स्ट्रेचर पर ।

3. बिस्तर पर ।

रेडियोग्राफर को रोगियों की सेवा के साथ अपना भी ध्यान रखना चाहिए । खासकर मेरूदण्ड की । रोगी को उठाते समय घुटने तथा कूल्हे मोड़कर स्पाइन (मेरुदण्ड) सीधा रखना चाहिए । साथ ही अपना आधार दोनों पैरों को अलग कर आगे या अगल बगल झुक सकता है ।

रोगी को ह्‌वील चेयर में ले जाना:

यदि रोगी खड़े होने की स्थिति में हो तो रेडियोग्राफर को स्वयं हूवीत चेयर के पैरों वाले सिरे को एक्स-रे टेबल की ओर रखते हुये टेबल के पास लाना चाहिए । रेडियोग्राफर को अपना पैर ह्‌वील चेयर के ब्रेक की तरह प्रयोग करना चाहिए तथा रोगी को खड़े होने में हाथ से सहारा देना चाहिए । रेडियोग्राफर को यह ध्यान रखना चाहिए कि रोगी फुट-रेस्ट पर खड़ा न हो ।

यदि रोगी खड़ा न हो सकता हो तो उसे चेयर कुर्सी से निम्न दो विधियों से उठाना चाहिए:

1. आस्ट्रेलियन विधि या सुल्डर लिफ्ट

2. आर्थोडाक्स लिफ्ट ।

आस्ट्रेलियन लिफ्ट:

यह उन रोगियों के लिए नहीं है जिनके कन्धे या सीने में दर्द हो । ह्‌वील चेयर को टेबल के पास रखना चाहिए । दो रेडियोग्राफरों को रोगी के दोनों तरफ एक-दूसरे की ओर मुंह करके खड़ा होना चाहिए । अब प्रत्येक रेडियोग्राफर की एक-एक बांह (आर्म) रोगी की एक्सिला में रखकर उसकी जंघा को उठाना चाहिए, जबकि रेडियोग्राफरों का दूसरा हाथ एक-दूसरे से पकड़कर रोगी की पीठ को सहारा देना चाहिए । रोगी की जंघा पर हद्य रखकर उठाने की अपेक्षा घुटना पकड़कर उठाने से बचना चाहिए ।

आर्थोडाक्स विधि:

यदि रोगी अपना वजन कन्धों पर न ले सके तो इस विधि का प्रयोग करते हैं । यहां बाहों को रोगी की बगल में न रखकर रोगी की बाहों को सीने की ओर जोड़ देते हैं । शेष विधि आस्ट्रेलियन विधि के समान ही है ।

स्ट्रेचर पर रोगी:

यदि रोगी अच्छी तरह से चाहे तो स्ट्रेचर को एक्स-रे टेबल से सटाकर लगाने के बाद वह सरक कर टेबल पर आ सकता है, पर इस कार्य के लिए स्ट्रेचर की ऊंचाई व टेबल की ऊंचाई समान होनी चाहिए । यदि रोगी ऐसा कर सकने में असमर्थ हो तो उसे सहारा देकर टेबल पर लिटाना चाहिए ।

रोगी को चादर सहित उठाकर एक्स-रे टेबल पर लिटाया जा सकता है । यदि स्ट्रेचर और टेबल एक ही ऊंचाई के हैं । या फिर रोगी को तीन रेडियोग्राफरों द्वारा जो अपनी बाहें रोगी के कन्धे, सीने व पैर के नीचे डालकर उसे उठाते हैं रोगी व बगल ऊपरी बांह पर तथा सीने पर उठाना चाहिए न कि हाथों और निचली बांह पर । रोगी को उठाने के लिए स्ट्रेचर या तो टेबल के सामानान्तर होता है या 90 डिग्री के कोण पर ।

रेडियोग्राफर द्वारा रोगी को किसी तरफ घुमाने से पहले पता कर लेना चाहिए कि शरीर का कोई भाग छूने पर दर्द तो नहीं करता है । उसे रेडियोलुसेन्ट मैट्रैस टेबल पर बिछाने को दी जा सकती है । कुछ विशेष ट्राली या टेबल रोगियों को ले जाने के लिए एक्सीडेन्ट या इन्नरी विभाग द्वारा भी बनायी गयी है ।

निश्चेतना में रोगी:

कई जांचों में रोगी को निश्चेतना भी देनी पड़ सकती है । अत: ऐसे रोगी से कैसे व्यवहार करें यह रेडियोग्राफर को अच्छी तरह पता होना चाहिए । किसी भी दवा के प्रभाव से सोये व्यक्ति को किसी भी समय एक्स-रे विभाग में अकेला नहीं छोड़ना चाहिए, जब तक वह बिस्तर पर न हो ।

इस सम्बन्ध में रेडियोग्राफर के निम्न कर्तव्य है:

1. रोगी की पहचान की जांच करें ।

2. नर्स से रोगी के बारे में जानकारी प्राप्त करें कि क्या रोगी जांच के लिए तैयार किया गया है और यदि डेन्चर लगाता है तो निकाल दें ।

3. बहुत अधिक बातचीत व शोर न करें, जिससे रोगी में निश्चेतना पैदा करने में कोई बाधा हो ।

4. रोगी को सांत्वना दें ।

5. रेडियोग्राफर को बेचैन रोगी से लड़ना-झगड़ना नहीं चाहिए ।

6. इन्द्रावीनस इन्जेक्शन में सहायता करें ।

7. किसी दवा, उपकरण के चलाने में यदि आवश्यकता हो तो निश्चेतना विशेषज्ञ की मदद करें ।

8. रोगी के वाइटल या रक्तचाप लेने में या रक्त देने की दर को निश्चेतना विशेषज्ञ के आदेशानुसार ठीक करें ।

9. यह निश्चित करे कि बेहोश रोगी के हाथ-पैर टेबल पर उसके शरीर के नीचे तो नहीं दब गये है ।

10. देखें की उसके सांस का रास्ता साफ है तथा जीभ सांस के रास्ते में पीछे की ओर तो नहीं गिर रही है ।

11. यदि रोगी पीठ के दल लेटा हो तो देखें कि निचला जबड़ा नीचे खिंचा हुआ है या नहीं । यदि उल्टी की सम्भावना हो तो सिर एक तरफ पुमा दे तथा टेबल का सिर वाला सिरा भी थोड़ा नीचा किया जा सकता है ।

12. साइनोसिस के लिए हमेशा रोगी के शरीर का रग देखते रहना चाहिए जो सबसे पहले कानों, नाक व नाखूनो के आधार पर परिवर्तित (नीला) होता है ।

13. यदि रोगी सांस लेना बन्द कर दें तो उसे कृत्रिम श्बाक्ष विधि से सांस दें ।

14. मेडिकल सहायता मांगे यदि आवश्यकता हो । पर ऐसा करते समय रोगी को अकेला न छोड़ें ।

एक्स-रे विभाग की सफाई:

1. रोगी को छूने के पश्चात तथा नये रोगी को छूने से पूर्व हाथों को धोना चाहिए ।

2. रोगी की हाइजीन दुरुस्त रहनी चाहिए । इसके लिए उसे स्वच्छ गाउन पहनने के लिए, स्वच्छ बर्तन, बेडपैन, यूरेनल, पीने का मग आदि देने चाहिए ।

3. रेडियोलूसेन्ट मैट्रस धोकर, साफ कर तथा पोलीथीन की सीट में रखनी चाहिए ।

4. सामान्य तौलिया की अपेक्षा डिस्पोजल तौलिया का इस्तेमाल करना चाहिए ।

5. एक्स-रे टेबल की सतह की सफाई (सिर तथा साइनस जांच के पूर्व अवश्य) करें तथा इरेक्ट वकी स्टैण्ड की सफाई क्रास इन्फेक्शन बचाने के लिए 70 प्रतिशित मेथिलेटेड स्प्रिट से करें ।

एक्सरे विभाग में दवायें:

इन्हें तीन वर्गों में बांटा जा सकता है:

1. जो रोगी की जांच के लिए तैयार करने में प्रयोग की जाती हैं जैसे एपिरियेन्ट, सपोजीटरी, सिडेटिव-पेथिडीन और ल्यूमिनाल, स्थानीय निश्चेतक व दर्द निवारक दवायें जैसे एस्पिरिन, पैरासिटामोल ।

2. एक्स-रे जांच में प्रयोग होने वाले कान्ट्रास्ट माध्यम ।

3. रोगी के रिसासिटेशन में प्रयोग होने वाली ।

क. एड्रेनेलिन (1/1000) रक्तचाप तथा कार्डियक आउटपुट बढ़ाने के लिए ।

ख. एनालेप्ट्रिक दवायें (स्पाइनोफाइलिन, मिथाक्सामीन) ।

ग. दवायें जो हृदय की उत्तेजना कम करती हैं: (एण्टीएरिदमेटिक) जैसे 20 प्रतिशत लिग्नोकेन या प्रोपैनालाल ।

घ. दवायें जो एलर्जिक क्रियायें कम करती हैं । जैसे हाइड्रोकार्टिसोन व प्रोमेथाजीन ।

ड. इन्द्रावीनस निश्चेतक, डायजेपाम ।

च. इन्जेक्श्न के लिए स्टेराइल डिस्टिल्ड वाटर ।

छ. एण्टीकोआगुलेन्ट जैसे हिपेरिन और इसका एण्टीडोज प्रोटामीन सल्फेट ।

ज. सोडियम कार्बोनेट, मेटावोलिक एसिडोसिस के इलाज हेतु । आपातकालीन दवा के बक्से में उपरोक्त दवायें होनी चाहिए ।

रोगी की तैयारी:

सामान्य उदर की तैयारी:

प्राय: रोगी के प्लेन एक्स-रे एवडोमेन के लिए, डार्सोलम्बर स्पाइन के एक्स-रे के लिए, कोलिस्टोग्राफ हेतु व यूरोग्राफी हेतु इसकी आवश्यकता होती है । इसका उद्देश्य भोजन नली में उपस्थित मल व गैस को हटाना     है ।

यह निम्न प्रकार से की जाती है:

1. परगेटिव का प्रयोग ।

2. इनीमा का प्रयोग ।

3. इन्टेस्टीन की गैस को रोक कर ।

परगेटिव:

तीन वर्गो में बांटे जा सकते हैं:

क. इरीटेन्ट परगेटिव ।

ख. लुबरीकेन्ट परगेटिव ।

ग. बल्क परगेटिव ।

इरीटेन्ट परगेटिव:

बिसाकोडिलू (डलकोलैक्स) आतों को म्यूक्स मेम्ब्रेन के सम्पर्क में आकर इसकी पेरिस्टैलसिस बढ़ा देती है । म्युकोसा में स्थित नर्व इण्डिंग पर उत्तेजक का कार्य करती है । दवा की मात्रा जांच के दिन के पहली वाली शाम को दो गोली (10 मि॰ ग्राम) है ।

सेन्ना व केस्कारा:

वेजीटेबल परगेटिव है । यह आटोनामिक नर्वप्लेक्सस, जो पेशियों के बीच स्थित होता है, को उत्तेजित कर कार्य करते हैं । सेन्ना यू॰के॰ में एक्स-प्रेय के नाम से मिलती है । कैस्टर आयल छोटी आंत में टूटकर एक आयली अम्ल बनाता है जिससे द्रव का शोषण आंत में कम हो जाता है । जिससे पैरीस्टैलसिस भी बढ़ जाती है । इसकी सामान्य मात्रा में 5-15 मिलि॰ है । इसका प्रयोग एपेन्डिक्स में सूजन होने पर, फोड़े की संभावना या आंत में रुकावट की संभावना होने पर नहीं करना चाहिए ।

लुबरीकेन्ट परगेटिव:

इसकी कार्यविधि भी मल को मुलायम करने की है । इनमें मुख्य द्रव पैराफिन का 15-30 मिलि॰ की मात्रा में प्रयोग है । इसका प्रयोग एण्टीकोआगुलेन्ट ले रहे रोगियों में नहीं करना चाहिए । अन्य दवा डायाकोटिल सोडियम सल्फोसक्सीनेट है जो मल को इसका सतह तनाव को कम करके लुब्रीकेट करती है ।

बल्क परगेटिव:

ये आंत में स्थित पदार्थों का आयतन बढ़ाकर कार्य करते हैं । या तो पानी सोखकर जैसे इसवगोल या आस्मोसिस विधि द्वारा जैसे मैग्नीशियम सत्केट (5-12 ग्राम) । परगेशन लगभग 1-3 घण्टे में होता है यदि लगभग 150-200 मिलि॰ पानी के साथ लिया जाये ।

इनीमा का प्रयोग:

जब जांच विशेष रूप से कोलन के लिए हो तब प्राय: इनीमा देते हैं । इनीमा ठीक तरह से यदि न दिया जाये तो यह केवल रेक्टम से ही वापस आ जाता है ।

अत: हाई कोलोनिक वाश आउट देना चाहिए ।

सोपवाटर, ग्लिसरीन, ओलिव आयल इनीमा भिन्न प्रकार के इनीमा हैं जो प्रयोग किये जाते हैं । इधर सोडियम फास्फेट युक्त इनीमा मे प्रयोग का उल्लेख भी किया गया है ।

परगेटिव निम्न स्थितियों में नहीं देने चाहिए:

1. कोलोस्टमी के रोगियों में ।

2. लम्बे समय से रहने वाले दस्त के रोगियों में ।

3. हिर्सप्रसंग रोग के रोगियों में ।

कुछ रोगियों को जांच के पूर्व तैयार करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है जैसे अल्सरेटिव कोलाइटिस के रोगियों में, मेगाकोलन के रोगियों में या एक्यूटइन्टससेप्सन के रोगियों में ।

आंत की गैस की रोकथाम:

कभी-कभी मल की उपेक्षा अधिक नुकसानदायक होती है । इसके कारण ‘क’ भोजन में स्टार्च युक्त पदार्थ या फली व सब्जीयों वाला भोजन ।

ख. इफरवेसेन्ट पेय पदार्थ (ग) बिस्तर पर लेटे रहने से ।

गैस कम करने हेतु:

1. फ्लेट्‌स ट्‌यूब का प्रयोग करें ।

2. चारकोल टेबलेट या बिस्किट का प्रयोग सोते समय ।

3. लगभग आधा घण्टे पहले पिट्‌यटेरिन का हाइपोडरमिक इंजेक्श्न देकर ।

जांच के एक दिन पहले से रोगी को कम फाइबर वाले भोजन का सेवन करना चाहिए, हरी सब्जियां, सीरियल होलमील ब्रेड आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए । पिछले 48 घण्टों में रोगी को कम से कम चार पिन्ट द्रव, कम फाइवर वाला भोजन जैसे अण्डे, मछली, चिकेन, सूप ब्रेड, मक्खन, फल और दूध लेना चाहिए ।

हल्का नाश्ता लिया जा सकता है यदि जांच सबेरे होनी हो, यदि अपरान्ह में होनी हो तो नाश्ता न करके हल्का दोपहर का भोजन देना चाहिए । जांच के पहली वाली शाम से केवल द्रव जैसे सूप, ब्लैक काफी, या चाय जिसमें क्रीम या दूध न पड़ा हो, देना चाहिए । फलों का कोई पेय न दें पर जेली खाने को दी जा सकती है ।

मधुमेह के रोगी की तैयारी:

रोगी से यह पता करना चाहिए कि क्या वह इन्सुलिन ले रहा है । यदि नहीं तो वह थोड़े समय के लिए भोजन लेना बन्द कर सकता है । उससे सुबह का नाश्ता न करने को कहकर उसकी जांच सर्वप्रथम तथा सुबह ही करनी चाहिए ।

उसे विभाग छोड़ने से पूर्व उपयुक्त भोजन ले लेना चाहिए । इस बारे में रेडियोग्राफर को अवश्य पता कर लेना चाहिए । जो रोगी इन्सुलिन ले रहे हों उन्हें सावधान कर देना चाहिए कि यदि भोजन न लें तो इन्सुलिन भी न लें । विभाग छोड़ने से पहले रेडियोग्राफर को यह तसल्ली कर लेनी चाहिए कि रोगी भोजन व इन्सुलिन ले ले ।

नवजात बच्चे (इन्फैन्ट) की तैयारी:

मां बच्चे को सामान्य भोजन या दूध सवेरे छ: बजे दे सकती है पर एक्स-रे जांच हो जाने तक उसे दूध नहीं देना चाहिए । कभी-कभी बेरियम के घोल बच्चे की फीड में मिलाकर प्रयोग कर सकते हैं पर दूध में उपस्थित बसा बेरियम का फ्लाकुलेशन करवा सकती है । सामान्यतया बच्चे की 10 बजे की फीड के स्थान पर बोतल से ही बेरियम का घोल देकर जांच कर ली जानी चाहिए ।

मोबाइल एक्स-रे सेट पर कार्य:

उपकरण मंगाने से पूर्व रेडियोग्राफर का कर्तव्य है कि वह रोगी को देखकर उसे जांच के बारे में समझा दे । इससे निश्चित ही रोगी को बिना असुविधा के जांच संभव हो सकेगी । रोगी को जांच के समय पर्दों या क्यूविकल में रखना चाहिए । उपकरण को बड़ी सावधानी पूर्वक वार्ड में पहुंचाना चाहिए । दुर्घटनाओं की संभावना मोबाइल यूनिट में स्थिर उपकरण की अपेक्षा अधिक होती है ।

आक्सीजन थैरेपी ले रहा रोगी:

ऑक्सीजन ले रहे रोगी के आस पास कोई ऐसा उपकरण खतरनाक हो सकता है जो बिजली से चलता हो, तथा स्पार्क कर सकता हो । अत: एक्स-रे करते समय आक्सीजन सप्लाई बन्द कर डिसकनेक्ट कर दी जानी चाहिए ।

एक्स-रे सेट से सम्बन्धित सभी आक्सीजन सप्लाई बन्द करने से पहले तैयार कर ली जानी चाहिए जिससे यह कम से कम समय में हो सके । यदि रोगी को आक्सीजन नाक में स्थित कैथेटर द्वारा दी जा रही हो तो सप्लाई बन्द कर दी जानी चाहिए ।

कैथेटर अपने स्थान पर रह सकते हैं, पर यदि सप्लाई मास्क द्वारा हो तो सप्लाई बन्द कर मास्क भी हटा देना चाहिए । यदि टेन्ट द्वारा हो तो रोगी को जांच के समय सप्लाई बन्द कर टेन्ट से बाहर निकालें । बाद में कुछ समय के लिए रोगी को अधिक आक्सीजन दी जा सकती है । रेडियोग्राफर को वार्ड के स्टाफ को तुरन्त सूचित कर देना चाहिए कि एक्स-रे किया जा चुका है तथा आक्सीजन की सप्लाई पुन: शुरू की जा सकती है ।

रोगी जो इन्ट्रावीनस इन्फ्यूजन या द्रव ले रहा हो:

रेडियोग्राफर की कोई जिम्मेदारी नहीं है कि वह द्रव इन्फ्यूजन की दर निर्धारित करे पर उसे कुछ सावधानियां रखनी चाहिए । जैसे रोगी को करवट दिलाते समय नीडल निकालनी चाहिए तथा ट्‌यूब किन्क नहीं होनी चाहिए ।

रेडियोग्राफर को यह भी निश्चित करना चाहिए कि ड्रीप चलती रहे । यदि नीडल हटने या बहाव रुकने की संभावना हो तो तुंरत वार्ड में सूचित करे । रेडियोग्राफर को देखना चाहिए कि एक्स-रे ट्‌यूब बोतल से न टकराये, तथा ट्‌यूब पर कोई खिंचाव न पड़े ।

ट्रेकियास्टमी ट्‌यूब के साथ रोगी:

1. रेडियोग्राफर को पता होना चाहिए कि रोगी 24-48 घण्टे के थोड़े समय के लिए बोलने में असमर्थ हो सकता है ।

2. ट्रेकियास्टमी ट्‌यूब का बाहरी सिरा असावधानी से नहीं निकालना चाहिए ।

3. यदि ट्रेकियास्टमी ट्‌यूब बाहर आ गयी हो तो तुंरत वार्ड स्टाफ को सूचित करे, इसे पुन: लगवायें, नहीं तो रोगी को सांस लेने में परेशानी हो सकती है । यह ट्रेकियास्टमी होने के 24-48 घण्टे के अन्दर होने की अधिक सम्भावना रहती है ।

4. रोगी में होने वाली सांस की तकलीफ तथा साइनोसिस को देखना चाहिए तथा वार्ड के स्टाफ को तुरंत सूचना देना चाहिए । इनमें प्रमुख पैलर या साइनोसिस, बड़ी हुई असमान नाड़ी, सांस लेने के लिए बहुत मेहनत पड़ना जैसे- नथुने चौड़े कर सांस लेना, बेचैनी होना, बेहोश होना आदि ।

5. ट्रेकियास्टमी ट्‌यूब को अपने स्थान पर स्थिर रखने वाले टेपों को देखना बहुत आवश्यक है । यदि वे ढीले प्रतीत हों, तो इसकी सूचना वार्ड के स्टाफ को देनी चाहिए ।

ट्रेक्स्न पर रोगी:

इस प्रकार के रोगी के लिए रेडियोग्राफर को बिस्तर के नीचे तथा सिर की तरफ स्थित ब्लाकों को देखना चाहिए । इनका ध्यान न रखने पर किसी व्यक्ति द्वारा जो इसके बारे में जानता नही है, इन्हें खींच सकता है सिंलग्स, स्पिलन्टो से बुलडाग कपों द्वारा जुड़े रहते हैं । ये कुछ रेडियोग्राफिक सूचना छुपा सकते हैं । अत: एक्सपोजर के समय इसका ध्यान रखना चाहिए ।

मोबाइल इक्विपमेन्ट पर आपरेशन कक्ष में कार्य:

सदैव उद्‌देश्य यह होना चाहिए कि किसी सर्जिकल प्रोसीजर के बाद उत्तम फिल्में कम से कम समय में दी जा सकें ।

आपरेशन कक्ष में जाने से पहले रेडियोग्राफर को यह देख लेना चाहिए कि सारे उपकरण जिनकी आवश्यकता है, कक्ष में पहुंच गये हैं व कार्य करने की हालत में हैं । एक्स-रे उपकरण उचित पावर सप्लाई से जोड़ा गया है, तथा ठीक से कार्य कर रहा है ।

आपरेशन कक्ष में धमाके का खतरा:

निश्चेतक गैसों की वजह से जो आसानी से ज्वलनशील होती है, धमाके की संभावना बहुत बढ़ जाती है । चिंगारि गर्म सतहों, जैसे स्पाट लाइट बल्पों, बिजली के उपकरण आदि से उठ सकती है । यहां तक स्टैटिक विद्द्युत से भी चिंगारि उठ सकती है ।

कई एण्टीस्टेटिक विधियां प्रयोग की जाती हैं । कई आपरेशन कक्षों की फर्श वियुत को फर्श धीरे-धीरे चलने देती है तथा इसका लीकेज भी धीमे-धीमे होता है । स्टेचर ट्राली से कभी-कभी चेन लगी रहती है जौ स्टेटिक विद्युत को फर्श में सोखे जाने में मदद करती है ।

कभी-कभी ड्‌यूटी पर नियुक्त स्टाफ को नायलॉन के कपड़े पहनने से मना किया जाता है । कुछ स्ट्रेचरों की पहिया एण्टीस्टेटिक होती है । एक्स-रे उपकरण बहुत उच्च वोल्टेज पर कार्य करता है । अत: स्पार्क रहित नहीं किया जा सकता है । अत: ज्वलनशील निश्चेतक गैसों का प्रयोग उस सर्जरी में नहीं करनी चाहिए जिसमें रेडियोग्राफी की आवश्यकता हो ।

आपरेशन कक्ष में सर्जिकल एसेप्सिस:

मोबाइल एक्स-रे उपकरण कीटाणु ले जाने का एक साधन है जिसे पूर्णत: कीटाणु रहित करना मुश्किल है । यह उचित होता कि एक मोबाइल यूनिट सिर्फ आपरेशन कक्ष में ही रखी जाये, जिससे बाहर से उपकरण के साथ आने वाले इमेक्शन की सम्भावना न रहे ।

ट्‌यूब हेड व इमेज इन्टेन्सीफायर को एक स्वच्छ लाइनेन या पालीथीन कवर से ढक कर रखना चाहिए जिससे कोई धूल आदि न पड़े । कुछ आपरेशन कक्षों में स्थिर उच्च पावर एक्स-रे लगाये जाते हैं जिसमे ट्‌यूब छत से लगी होती है तथा किसी भी दिशा में ले जायी जा सकती है ।

एसेप्सिस के लिए जेनेरेटर व हाई वोल्टेज केबल दूसरे कमरे में रखे जाते हैं । रेडियोग्राफर को भी आपरेशन कक्ष के स्टाफ की तरह ही स्वच्छ गाउन, फेस मास्क तथा हेड कवर ही पहनना चाहिए । रेडियोग्राफर को स्टेराइल एरिया में स्वयं या उपकरण द्वारा किसी चीज को नहीं छूना चाहिए ।

आपरेशन कक्ष में एक स्थान से दूसरे स्थान की गति कम से कम होनी चाहिए जिससे  इन्फेक्शन फैलाने की संभावना कम से कम हो । रेडियोग्राफर द्वारा सर्जन को एक्स-रे दिखाते समय उससे तथा स्टेराइल एरिया से दूर रहना चाहिए ।

विकिरण सुरक्षा:

मोबाइल उपकरण द्वारा स्टाफ को अधिक विकिरण मिलने की सम्भावना रहती है, क्योंकि:

1. एक्सपोजर के समय रोगी को सहारे की आवश्यकता होती है ।

2. रेडियोग्राफर को एक्सपोजर सोर्स के बहुत पास खड़ा होना पड़ता है ।

3. किरणपुंज का पूरी तरह चाहे गये भाग तक सीमित रखना मुस्किल होता है ।

यदि आवश्यक हो तो स्टाफ को एक्सपोजर फील्ड से दाहर करके फिल्म लेनी चाहिए । रेडियोग्राफर को लेड एप्रेन पहनना चाहिए । रोगी को सहारा देने वाले स्टाफ या नर्स को भी लेड एप्रेन पहनना चाहिए ।

इन्फेक्सस रोगी:

यदि संभव हो तो ऐसे रोगी को एक्स-रे विभाग में न बुलाकर उसकी जांच मोबाइल एक्स-रे यूनिट द्वारा वार्ड में की जानी चाहिए । यदि ऐसा रोगी विभाग में आ ही जाता है तो उसे अन्य रोगियों से दूर रखते हुए जल्दी से जल्दी उसकी जांच कर ली जानी चाहिए । उसे विभाग में उस समय बुलाना चाहिए जब अन्य मरीजों की संख्या विल्कुल कम या न हो ।

रोगी के कमरे में आने से पूर्व एक्सपोजर की पूरी तैयारी कर ली जानी चाहिए । यदि कैसेट को वर्टिकल वकी पर या सीधे रोगी के स्पर्श में रखना हो तो इसके साथ डिस्पोजेबल कवरिंग का प्रयोग करना चाहिए । रेडियोग्राफर द्वारा रोगी को वापस भेजने से पूर्व फिल्मों की जाच कर ली जानी चाहिए ।

रेडियोग्राफर को मास्क, स्वच्छ गाउन, पहनना चाहिए तथा हाथों को धोने के बाद डिस्पोजेतुल तौलिये से पोंछना चाहिए । जो चीज भी रोगी के सम्पर्क में रही हो, जांच के याद एन्टीसेप्टिक सेन्सान से साफ करनी चाहिए तथा डिसपोजुबल तौलिये से पोंछना चाहिए ।

1. जय तक कोई इमरजेन्सी (आपातकालीन) न हो तव तक इन रोगियों के उदर, लम्बर स्पाइन व पेत्विक भागों की एक्स-रे जांच नही करनी चाहिए ।

2. दोबारा स्थ्यिएं करने से बचना चाहिए ।

3. फेफड़ों व दांतों की जांच के समय रेडियोग्राफर द्वारा गर्भवती महिला के पेटको लेड एप्रेन से ढक देना चाहिए ।

दस दिन का नियम (टेन डे रूल):

यह देखा गया है कि बच्चों के अंगों के निर्माण में होने वाली अधिकतर गड़बड़ियां पिछले मासिक से एक माह बाद से लेकर यदि 4-5 माह तक उसे कोई विकिरण मिले, तो जन्मजात मालफारमेशन की संभावना अधिकतम रहती है ।

अर्न्तराष्ट्रीय रेडियोलाजिकल प्रोटेक्शन कमीशन की रिपोर्ट न॰ 6  सन 1964 के अनुसार बच्चे पैदा करने वाली औरत मासिक के केवल दस दिन याद तक ही गर्भवती नहीं मानी जाती है तथा बहुत आवश्यक न हो तो सारे एक्स-रे इन्हीं प्रथम दस दिन में ही किये जाने चाहिए ।

गर्भवती औरतों की रेडियोग्राफी:

विकिरण का प्रभाव क्रोमोसोमों पर पड़ता हैं । चूंकि ये सीधे बच्चे की वृद्धि से जुड़े होते हैं अत: क्रोमोसोम में होने वाली गड़बड़ियां बच्चे में मालफारमेशन पैदा कर सकती हैं । ल्यूकीमिया द अन्य कैंसर उन बच्चों में अधिक होते हैं, जिनकी मां को गर्भावस्था में विकिरण मिला हो ।

पहले गर्भावस्था माह में विकिरण निषेचित अण्डे का इम्प्लान्टेशन नहीं हो पाता है, दूसरे महीने शरीर के कुछ अंगों में मालफारमेशन हो सकते हैं । तीसरे व चौथे महीने अग्रमस्तिष्क का ठीक से विकास न हो पाने से मेंटल रिर्टाडेशन की संभावना होती है ।

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