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A Good Hindi Story of the Highway (For Class 4 Kids) | Hindi | Stories

Here is a good Hindi story on the ‘Highway’ especially written for class 4 kids.

मैं एक राजमार्ग हूँ और सृष्टि के सभी अन्य घटकों की तरह मेरा भी कर्तव्य कर्म पहले से ही निर्धारित है । वस्तुत: देश के आर्थिक विकास का आधार स्तंभ हूँ मैं । जैसे मेरा शरीर विशाल है, वैसे ही मेरी जिम्मेदारी भी विशाल है ।

भारत मेरी कर्मभूमि है । लंबे इतिहास का एक मूक साक्षी हूँ मैं । जब मैं एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में जाता हूँ तो अलग-अलग प्रदेशों की विभिन्नता के साथ परिचित होता हूँ । अति विस्मय के साथ महसूस करता हूँ कि इस देश के राज्यों की संस्कृतियाँ भिन्न-भिन्न होने के बावजूद इनमें अभिन्न रूप से एकात्म भाव विद्‌यमान है । तब मुझे ऐसा लगता है कि मैं अपने आप में पूर्ण हूँ । मुझमें कोई कमी नही है । संपूर्णता का एक मूर्त विग्रह हूँ, मैं ।

सभी को एक प्रांत से दूसरे प्रांत तक सही-सलामत पहुँचाना ही मेरी प्राथमिकता है । इस देश की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रगति का सतत साक्षी हूँ मैं । प्रगति एवं शांति का भी आधार स्तंभ हूँ मैं । अपनी गोद में मैं आप सभी को शिशुओं की तरह धारण करता हूँ । आप सभी का बाधारहित यातायात हूँ ।

आप लोगों की निःसंगता मुझे कभी-कभी खिन्न कर देती है । आप लोग शायद सोचते होंगे कि मैं संवेदनशील नहीं हूँ लेकिन यह सच नहीं है । क्या आप लोगों ने कभी एक पल के लिए भी मेरा हमदर्द बनने की कोशिश की है ? और क्या कभी मेरी जरूरत की ओर ध्यान दिया है ? जिंदगी में हर किसी की कोई-न-कोई अभिलाषा होती है ।

मेरी अभिलाषा है आप सभी को आपकी मंजिल तक सही-सलामत पहुँचाना । आपकी जरूरतें मेरे लिए प्रमुख हैं । इसलिए मेरी अपनी सभी आवश्यकताएँ गौण है । मुझे अफसोस है । अरे रे ! आप लोग इतनी छोटी बात समझते क्यों नहीं ? आप कैसे भूल जाते हैं कि रिश्ते-नाते तभी बन पाते है जब दोनों की बराबर की भागीदारी हो । अन्यथा ये रिश्ते-नाते ज्यादा देर तक टिक नहीं पाते हैं ।

मैं, प्रगति और सातत्य का प्रतीक हूँ । सहिष्णुता, सेवा आदि मेरे रोम-रोम में बसे है । मैं स्वयं एक संपूर्ण इतिहास हूँ । कई युगों के उत्थान-पतन का मूक दर्शक हूँ मैं । मेरा कई बार निर्माण और पुनर्निर्माण हुआ है परंतु अनादि काल से मेरा अस्तित्व किसी-न-किसी रूप में अवश्य रहा है । इसलिए मैं अक्षय हूँ, आप मुझे नित्य का अंश भी कह सकते है ।

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मेरा तन-मन भी बच्चों की तरह पुलकित होता है । जब आप में से ही कोई मुझे प्यार करता है, तो मेरा मन खुशी से झूम उठता है और मैं आप सभी से अपनापन महसूस करने लगता हूँ । आप सभी अलग-अलग स्थानों से और भिन्न-भिन्न मार्गों से अपनी यात्रा की शुरुआत करते हो लेकिन नदी जैसे अपनी जलराशि समुद्र में मिला देती है ऐसे ही हे पथिको !  मैं भी आपको आपकी मंजिल तक पहुँचा देता हूँ ।

मेरे मन में एक ही उद्देश्य होता है कि आप अपनी मंजिल पर बिना किसी बाधा के पहुँच जाएँ । दोनों तरफ पंक्तिबद्ध रूप से दंडायमान वृक्ष समूह मेरे सुख-दुख के साथी है । धूप-बारिश सहन करके वे पहाड़ों जैसे स्थिर रहकर अपनी शाखा-प्रशाखा का विस्तार कर अपनी स्निग्ध छाया से मुझे आच्छादित कर रखते हैं ।

आप शायद यह सवाल कर सकते है कि मेरा सामाजिक योगदान कहाँ तक है । उसके जवाब में मैं एक छोटी-सी कहानी का उल्लेख करना चाहूँगा । एक था सिंह । एक दिन की बात है, शिकारी के जाल में फँस जाते हैं सिंह महाराज । उधर चूहा किसी कारण से सिंह महाराज का कृतज्ञ था । अब उसकी एहसान चुकाने की बारी आई ।

चूहा कूद पड़ा । उसने अपने तीक्षण दाँतों से शिकारी के जाल को छिन्न-भिन्न कर दिया । सिंह महाराज आसानी से शिकारी के जाल से बाहर आए और उन्होंने अपने प्राण बचा लिए । इसी प्रकार मैं भी यातायात को सुगम बनाकर देश की प्रगति में योगदान देता हूँ ।

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पथ कभी खत्म नहीं होता, लेकिन पथिक कीं मंजिल आती रहती है और उसकी यात्रा पूरी होती रहती है । दिन समाप्त होते ही निशा घेर लेती है तो मैं आत्म-विश्लेषण में जुट जाता हूँ । निशा का आवरण गहन से गहनतम होने लगता है और मेरा विशालकाय शरीर और हृदय इस नीरवता में अकेलापन महसूस करता है ।

मेरे दोनों तरफ जलते हुए पथदीप मुझे माला जैसे लगते हैं । तभी मैं सोचता हूँ कि हम इतने सारे साथियों और परिजनों से घिरे होते हुए भी एक दूसरे से अलग क्यों है । मुझे ऐसा लगता है कि जैसे हम रात्रि के सितारों जैसा स्वतंत्र अस्तित्व रखना चाहते हैं । सभी सितारे उज्वल हैं ।

लेकिन उषा काल के आगमन मात्र से ही वह धीरे-धीरे दृष्टि से बाहर हो जाते हैं और पलभर में ऐसा प्रतीत होता है कि कभी वे अस्तित्व में थे ही नहीं । मैं, त्याग और सहिष्णुता की प्रतिमा हूँ और चहुँमुखी विकास का मूर्त विस्तार हूँ मैं । सतत सेवा और त्याग मेरा धर्म है । कर्मफल में आसक्ति न होने के कारण मेरा विस्तार आकाश की तरह है ।

मुझ पर से एक के बाद एक पथिक गुजरता रहता है । आदि काल से यह नियम रहा है और भविष्य में भी इसमें कोई परिवर्तन होनेवाला नहीं है । क्या पता कि चलते-चलते न जाने मेरी आपसे कब मुलाकात हो जाए क्योंकि मैं राजमार्ग हूँ ना !

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