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5 Main Sensory Organs | Zoology | Hindi

Read this article in Hindi to learn about the five main sensory organs found in human body. They are: 1. Skin 2. Eye 3. Ear 4. Nose 5. Tongue.

Sensory Organ # 1. त्वचा:

त्वचा शरीर को ढकती है तथा रक्षा कवच का कार्य करती है । इसमें बड़ी संख्या में रिसेप्टर होते हैं जो स्पर्श, दर्द व ताप को ग्रहण करने में सक्षम होते हैं । त्वचा का एक अन्य कार्य ताप का निर्धारण तथा कुछ हद तक उत्सर्जन भी है ।

त्वचा को दो भागों में बांटा गया है ऊपरी इपीडर्मिस तथा गहराई में स्थित डर्मिस । इपीडर्मिस में स्ट्रेटीफाइड इपीथीलियम आती है जो रक्त संचार रहित होती है । इसकी मोटाई शरीर के भिन्न भागों में अलग-अलग होती है ।

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तंतुओं व हाथ में यह सबसे अधिक मोटी होती है । इसकी दरारें जोड़ों के आसपास हाथों, उंगलियों, तलुओं में ज्यादा गहरी होती है तथा उनका प्रयोग उंगली की छाप के लिये किया जाता है । वेसलसेल लेयर (अंदर वाली) व प्रिकल सेल कोशिकाओं से बनी होती है जो लगातार बंट कर ऊपरी परतों का स्थान ले सकती है । इसी में इपीडर्मल मिलेनोब्लास्ट पाये जाते हैं जो मिलेनिन नामक पिगमेंट बनाते हैं । हार्नीजोन तीन पर्तों से बना होता है । स्टेटम ग्रेनुलोसा (आन्तरिक), स्ट्रेटेम ल्यूसिडम, (मध्य की) स्टेटम कार्नियम (बाहरी) ।

डर्मिस:

यह खिंचने वाली कड़ी परत है जिसमें इलास्टिक नलियां, संवेदी तंत्रिकीय सिरे, हेयर फालिकिल, इरेक्टर पाइलोरम, सीवेसियस एवं स्वेट ग्रन्थियां स्थित होती है ।

त्वचा के कार्य:

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बचाव (Protection)

संवेदना (Sensation)

सीवम का स्राव

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विटामिन-डी का निर्माण

उत्सर्जन (Excretion)

ताप निर्धारण (Temperature Regulation)

Sensory Organ # 2. आंख:

आंख देखने के लिए एक अंग है जो कपाल की आविंटल गुहा में स्थित होती है तथा चोट से बचाव के लिए बसा की परत से घिरी होती है । आख दूसरी क्रेनियल नर्व (आप्टिक नर्व) से सप्लाई होती है ।

आंख की रचना:

आईवाल तीन परतों से बना होता है । बाहरी फाइव्रस कोट (स्कीलीयरा व कार्निया), मध्य की वैसकुलर कोरोयड (सिलियेरी बाडी और आइरिस) तथा अन्दर की तंत्रिकीय पर्त । स्क्लीयरा सफेद मजबूत फाइब्रस टिश्यू से बनी होती है जिसमें कुप्त पीले इलास्टिक तंतु भी पाये जाते हैं । पीछे की तरफ आप्टिक नर्व स्क्लीयरा से गुजरती है तथा यह नर्व के ऊपर फाइव्रस सीय बनाती है जो कपाल की डयूरामैटर से जुड़ जाती है । आगे की ओर यह कार्निया से संबधित होती है ।

कार्निया साफ आर-पार दिखने वाली औख के सामने स्थित गोल रचना है । यह रक्त संचार रहित होती है । कोरोयड (मध्य परत) एक पतली पिगमेंट युक्त वैसकुलर भूरे रंग की परत है जो क्लीयरा की आन्तरिक सतह बनाती है । कोरोयड आगे की ओर सिलियरी बाडी से मिल जाती है ।

सिलियरी बाडी एक गोल रचना है जो कार्निया व क्कीयरा के संगम स्थान के पीछे स्थित होती है । सिलियरी बाडी व लेन्स के ससपेन्सरी लिगामेंट प्रकाश किरणो को रेटिना पर फोकस करने के लिए लेन्स की कानवेक्सेटी बदल सकते हैं ।

आइरिस एक पतली पिगमेंट युक्त परत है जो एकुअस हयूमर में कार्निया तथा लेन्स के बीच स्थित होती है । सर्कुलर तंतुओं के कान्द्रेक्सन में भूपिल (पुतली) सिकुड़ जाती है जबकि रेडियल तंतुओं के कान्ट्रेक्सन से पुतली फैल जाती है ।

रेटिना आख की सबसे अन्दर की परत है । यह कोरोयड की लाइनिंग बनाती है तथा आगे सिलियेरी बाडी तक स्थित होती है । इसमें तंत्रिका कोशिकायें व तंतु तथा इसकी कोरोयडल सतह पर राह व कोन स्थित होते हैं । राड व कोन अखि के वास्तविक प्रकाश के रिसेप्टर है तथा जब उन पर प्रकाश पड़ता है तो उनमें तरंगें बनती हैं जो आप्टिक नर्व द्वारा मस्तिष्क को पहुंचाती है ।

रेटिना के लगभग मध्य में पीले रंग का एक क्षेत्र होता है जो मैकुला (Macula) कहलाता है तथा मैकुला के केन्द्र में एक गड्‌ढा होता है जो फोविया कहलाता है । फोविया में केवल कोन पाये जाते हैं तथा यह बिन्दु विजन के लिये सबसे उपयुक्त है ।

फोविया पर प्रत्येक कोन एक वाइपोलर सेल से संबंधित होता है जबकि रेटिना की परिधि पर कई राड व कोन एक नर्व सेल से सिनैष्टक कनेक्सन बनाते हैं । मैकुला से मध्य की ओर आप्टिक डिस्क होती है जहां से तंत्रिका तंतु पीछे जाकर आप्टिक नर्व के केन्द्र से गुजरते हैं ।

आप्थेलिमक आर्टरी व वेन भी आप्टिक डिस्क से जाते हैं । इसमें कोई राड व कोन नहीं पाया जाता । अत: इसे अन्ध बिन्दु (Blind Spot) भी कहते हैं ।

आंख के चैम्बर:

एण्टीरियर चैम्बर कोरनिया के पीछे तथा आइरिस के आगे स्थित है जबकि पोस्टीरियर चैम्बर आइरिस के पीछे होता है । पोस्टीरियर चैम्बर में कैपलरियां एकुअस हयूमर का स्राव करती हैं जो पयूपिल से होकर एण्टीरियर चैम्बर में पहुंचता है जहां यह सिलियेरी शिरा में हेन होता है ।

विट्रियस बाडी जेली की तरह का पारदर्शी पदार्थ है जो आईबोल के पिछले 4/5 भाग में स्थित होता है । इसका दाब आईवाल का आकार बनाये रखता है तथा रेटिना और कोरोयड को एक साथ रखता है ।

आप्टिक नर्व:

प्रत्येक आप्टिक नर्व आप्टिक डिस्क से होकर आर्विटल कैवटी से निकलती है । आप्टिक फोरामेन से यह मिडल क्रेनियल फोसा रेटिना के टेम्पोरल साइड से नर्व तन्तक मस्तिष्क के उसी ओर जाते हैं । रेन्टिना के नेजल साइड से नर्व तन्तु आप्टिक कियंज्मा कास कर मस्तिष्क के विपरीत ओर जाते हैं में पहुंचती है । सेला टर्सिका के सामने दोनों आप्टिक नर्व आपस में जुड़कर आप्टिक कियेज्या बनाती हैं ।

प्रत्येक रेटिना के नाक की तरफ के तंत्रिका तंतु आप्टिक कियेज्या में क्रासकर दूसरे तरफ की आंख के टेम्पोरल तंतुओं से मिलते हैं । आप्टिक कियेज्मा के पश्चात् तंत्रिका तंतुओं को आप्टिक ट्रैक्ट कहते हैं जो सेरेबलकोर्टेक्स के विजुअल एरिया (आक्सीपिटल लोब) में समाप्त होते हैं ।

देखने में सहायक अंग:

आंख के अलावा कई अन्य सहायक अंग भी आख के उचित कार्य के लिए आवश्यक हैं । जैसे भौहें, पलकें, कन्नक्टाइवा लेक्राइमल एप्रेटस तथा औख की बाहरी पेशियां आदि ।

आंख की बाहरी पेशियां व उनके कार्य:

(क) सुपीरियर रेक्टस – आंख को ऊपर की तरफ घुमाना

(ख) इन्फीरियर रेक्टस – आंख को नीचे की तरफ घुमाना

(ग) मीडियल रेक्टस – आंख को अन्दर की ओर घुमाना

(घ) लैदल रेक्टस – आंख को बाहर की ओर घुमाना

(ड) इन्फीरियर ओवलीक – आंख को ऊपर तथा बाहर की ओर घुमाना है

(च) सुपीरियर ओवलीक – आंख को नीचे तथा बाहर घुमाना है इन पेशियों के क, ख, ग, तथा ड आकुलोमोटर नर्व से तथा च, व, ध पेशियाँ क्रमश: ट्रोक्लियर और एवहुसेन्स से सप्लाई होती हैं ।

दृष्टि की कार्यविधि:

रेटिना पर पड़ने वाला प्रकाश तरंगे पैदा करता है जो मस्तिष्क के आक्सीपिटल कार्टेक्स में विजुअल इमेज बनाती है । आख घूमकर देखी जानी वाली वस्तु को देखने की फील्ड में ले सकती है । प्रकाश को रेटिना पर फोकस कार्निया तथा लेन्स द्वारा किया जाता है ।

रेटिना की फोकसिंग क्षमता स्थिर होती है परन्तु लेन्स की क्षमता देखी जाने वाली वस्तु की आख से दूरी के आधार पर परिवर्तित की जा सकती है । आंख की कर्न्वजेन्स के साथ लेन्स ज्यादा उत्तल (Convex) हो जाता है तथा प्यूपिल का व्यास घट जाता है । इस सम्पूर्ण क्रिया को एकोमोडेसन कहते हैं, जो पास की वस्तुओं को देखने के लिए आवश्यक है ।

बाइनाकुलर दृष्टि:

दोनों आंखें एक ही दिशा में एक साथ घूमती हैं जिससे इमेज प्रत्येक आंख की रेटिना के किसी भाग पर बनती है । यह दोनों आंखों की बाह्‌य पेशियों द्वारा होता है ।

रेटिना के कार्य:

रेटिना आंख का प्रकाश सेन्सटिव भाग है । विजन दो प्रकार की फोटोपिक विजन (सामान्य प्रकाश में) तथा स्कोटोपिक विजन (धुंधली या कम प्रकाश में) होती है जो रंग का आभास कोन द्वारा तथा राड द्वारा कम प्रकाश में देखने की क्षमता प्रदान करती है ।

Sensory Organ # 3. कान:

यह सुनने का अंग है जो टेम्पोरल अस्थि में स्थित होता है । इससे संबंधित रचनाओं में सेमीसर्कुलर कैनाल होती है जो संतुलन व पास्वर बनाये रखती है । कान व सेमीसर्कुलर कैनाल, वेस्टीवुलो काक्लियर नर्व द्वारा सप्लाई होती हैं । (आठवीं क्रेनियल नर्व) कान को बाहरी, मध्य तथा आन्तरिक कान में बांटा जा सकता है ।

जैसा कि चित्र 3.89 में दिखाया गया है । बाहय कान के अन्तर्गत पिन्ना या आरिकिल तथा इक्सटरनल एकास्टिक मीटस आता है जो चार से.मी. लम्बा तथा ”S” के आकार की नली है । यह पिन्ना से टिम्पैनिक मेम्ब्रेन तक होती है । टिम्पैनिक मेम्ब्रेन या इयर ड्रम एक अण्डाकार मेम्ब्रेन है जो इक्सटरनल एकास्टिक मीटस की फ्लोर से लगभग 55 अंश का कोण बनाती है ।

 

मध्य कान में तीन हड्डियां या ओसिकिल होती हैं । जो आपस में जुड़कर एक चेन बनाती हैं जिससे टिम्पैनिक मेम्ब्रेन से उत्पन्न तरंगें आन्तरिक कान में पहुंचती है । मध्य कान कंठ से युसटेचियन नली या आडिटरी नली द्वारा जुड़ा होता है ।

मध्य कान एक संकरे बक्से के आकार की तरह होता है । जिसमें छत, फर्श, अग्र, पीछे तथा बगल की दीवारें होती हैं । मध्य कान आन्तरिक कान के वेस्टीव्यूल से ओवलविन्डो द्वारा जुड़ा होता है जो स्टेप्स की फुटप्लेट से ढकी रहती है ।

मध्य कान काक्लिया से फेनेस्ट्रा काक्लिया (Cochlea) या राउण्ड विन्द्वो से जुडा रहता है । मध्य कर्ण की आसिकिल टिम्पैनिक मेम्ब्रेन से फेनेस्ट्रा वेस्टीबुलायी तक स्थित होती हैं । आन्तरिक कान बोनी व मेखेनस लैविरिन्थ से बना होता है । बोनी लैविरिन्थ वेस्टीव्यूल, काक्लिया और सेमीसरकुलर कैनाल से बना होता है ।

इन सभी में द्रव पाया जाता है जिसे पेरीलिन्य कहते हैं, इसमें ही मेम्ब्रेनस लैविरिन्थ स्थित होता है । काक्लिया घोंघे के कवच की (Snails Shell) की तरह होती है तथा वेस्टीव्यूल के आगे स्थित होती है । उत्पति के स्थान पर काक्लिय चौड़ी होती है तथा आगे बढ़ने पर यह पतली होती जाती है ।

सैक्यूल से निकल कर काकिलेयर डक्ट काक्लिया के अन्दर स्पाइरल के रूप में पड़ी होती है । इसके ऊपरी भाग खेला वेस्टीबुलायी (Scala Vestibuli) कहलाता है व निचला भाग स्केला टिम्पेनायी कहलाता है । डक्ट की आन्तरिक सतह पर आर्गन की कोर्टी (Organ of Corti) स्थित होता है जो सुनने का अंग है ।

यह वेस्टीबुलो कक्लियर नर्व के काक्तियर तंतुओं द्वारा सप्ताई होता है । सेमीसरकुलर कैनाल से तत्रिका तंतु पीट्रस टेम्पोरल वोन से क्रेनियल कैविटी में प्रवेश इन्टरनल एकास्टिक मीटस से करती हैं । मेम्ब्रेनस लैविरिन्थ में इण्डोलिम्फ उपस्थित होता है ।

सुनने की कार्य विधि:

कान ध्वनितरंगों को ग्रहण कर उन्हें सेरेब्रलकार्टेक्स के टेम्पोरल लोब में भेज देता है । बाह्‌य कान में पहुंचने वाली ध्वनि तरंगें टेम्पैनिक मेम्ब्रेन में कम्पन पैदा करती हैं । यह तरंगें आसिकिल द्वारा आगे बढ़कर पेरीलिम्फ के दाब में परिवर्तन करती हैं । यह दाव परिवर्तन आर्गन आफ कोर्टी नर्व इम्पल्स पैदा करने के लिए उत्तेजित करता है जो आठवीं नर्व से गुजरती है ।

सेमीसर्कुलर कैनाल के कार्य:

सेमीसर्कुलर कैनाल संतुलन तथा सिर की स्थिति के लिए आवश्यक है । ये संख्या में तीन होती है । जिसमें हेयर सेल युट्रिकिल, हैकल व पचुला में पाये जाते हैं । जो सिर की गति से उत्तेजित होकर आठवीं नर्व द्वारा सेरेवेलम की सूचना भेजते हैं ।

Sensory Organ # 4. नाक:

नाक में गंध के रिसेप्टर होते हैं, तथा यह आत्केक्टी नर्व द्वारा सप्लाई होती है । सामान्य श्वसन के दौरान आल्फैक्ट्री एरिया में केवल भिन्न दिशाओं में जाने वाली कुछ हवा ही पहुंचती है जहां आत्कैक्टी कोशिकायें स्थित होती हैं । स्वाद के अनुभव के लिए गन्ध की संवेदाना का होना आवश्यक है ।

Sensory Organ # 5. जिहवा (जीभ):

जीभ स्वाद को अनुभव करने बाला अंग है । जैसे चित्र 3.93 में दिखाया गया है जीभ का अगला 2/3 भाग फेसियल नर्व से तथा पिज्जा 1/3 भाग ग्लासो फेरेन्जियल नर्व से सप्लाई होता है । स्वाद के अलावा जीभ ताप, दर्द व स्पर्श की संवेदनायें भी ग्रहण करती है । चार, प्रमुख स्वाद मीठा, नमकीन, खट्टा तथा कड़वा है जो क्रमश: जीभ के अगले भाग, बगल तथा अगले भाग, पिछले भाग तथा नीचे के भाग द्वारा अनुभव किये जाते है ।

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