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Circulatory System in Humans | Zoology | Hindi

Read this article in Hindi to learn about circulatory system in humans and its functions.

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रक्त (रूधिर):

रक्त शरीर का परिवहन तन्त्र है । शरीर में संचरित होने बाला रक्त, आक्सीजन को फेफड़ों से, भोजन को पाचन तन्त्र से, शरीर के काम न आने वाले पदार्थो जैसे कार्बन डाइ आक्साइड को कोशिकाओं से, हारमोनों को अन्तस्त्रावी ग्रन्थियों से तथा पैदा की गई गर्मी को शरीर के ठन्डे भागों में ले जाने का कार्य करता है ।

रक्त का रंग इसमें उपस्थित कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा पर निर्भर करता है । जैसे धमनी में पाया जाने वाला रक्त लाल रंग का तथा शिरा में पाया जाने वाला रक्त नीले रंग का होता है । रक्त तरल प्लाज्मा तथा बहुत सारी रक्त कणिकाओं से मिलकर बना होता है ।

रक्त कणिकायें तीन प्रकार की होती हैं:

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1. लाल रक्त कणिकायें

2. श्वेत रक्त कणिकायें

3. प्लेटलेट या थ्रोम्बोसाइट

प्लाज्या, कुल रक्त का 55 प्रतिशत भाग तथा रक्त कणिकायें 45 प्रतिशत भाग बनाती हैं । एक सामान्य वयस्क व्यक्ति में लगभग पांच लीटर रक्त होता है । पुरुष के शरीर के कुल वजन का लगभग 60 प्रतिशत पानी होता है तथा महिलाओं में यह पचास प्रतिशत होता है । यह अन्तर दोनों के शरीर में पाई जाने वाली बसा की मात्रा में होने वाले अन्तर के कारण है ।

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शरीर में पाया जाने वाला पूरा पानी दो भागों में बंटा होता है:

1. अन्त: कोशीय द्रव्य = कोशिकाओं के अन्दर पाया जाने वाला द्रव्य (शरीर के कुल भार का 70 प्रतिशत)

2. बर्हिकोशीय द्रव्य = (शरीर के मार का 30 प्रतिशत)

(A) इन्टरस्टीसियल द्रव्य = कोशिकाओं के आसपास पाया जाने वाला द्रव्य (कुल शरीर के भाग का 20 प्रतिशत)

(B) प्लाज्या = कुल शरीर के भाग का (10 प्रतिशत)  व

ट्रांससेलुलर द्रव्य = साइनोवियल द्रव्य मूत्र

पाचक रस

स्पाईनल द्रव्य

शरीर में पानी की मात्रा का संतुलन, गुर्दे द्वारा शरीर से निकाले गये पानी की मात्रा पर निर्भर करता है, जो पिट्‌यूटरी ग्रन्थि के पिछले भाग से निकले हारमोन एण्टीडाइयूरेटिक हारमोन से नियन्त्रित होता है ।

प्लाज्मा:

यह पीले रंग का हल्का क्षारीय द्रव्य होता है, जो निम्न पदार्थो से बना होता है:

पानी: 90 प्रतिशत

प्रोटीन: एल्बुमिन व ग्लोबुलिन

अकार्बनिक रसायन: सोडियम क्लोराइड, सोडियम कार्बोनेट, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस सल्फेट एवं आयरन, इन्हें प्लाज्या इलेक्ट्रोलाइट कहते हैं ।

खाद्य पदार्थ: ग्लूकोज, एमीनो एसिड, वसा, एवं विटामिन

शरीर के लिए व्यर्थ पदार्थ: यूरिया, यूरिक एसिड व क्रियेटिनिन फाइव्रिनोजन, प्रोथ्राम्बिन, हारमोन इन्जाइम आदि ।

प्लाज्मा प्रोटीन के अणुओं का आकार बड़ा होने की वजह से रक्त की नलियों से बाहर नहीं जा पाते हैं । अत: प्रोटीन आसमोटिक दाब पैदा करने व द्रव्य को संचार तन्त्र में बाहर जाने से रोकने में सहायक हैं । कैपिलरी के धमनी वाले सिरे पर वैसकुलर कम्पार्टमैन्ट का हाइड्रोस्टेटिक प्रेसर इतना होता है जिससे द्रव्य इन्टरस्टीसियल स्पेस में जा सके, परशिरा वाले सिरे पर प्लाज्या प्रोटीन का आसमोटिक प्रेसर वैसकुलर हाइड्रोस्टेटिक प्रेसर से अधिक होता है । अत: लगभग सारा द्रव्य वैसकुलर कम्पार्टमैन्ट में वापस लौट आता है ।

बचा हुआ द्रव्य लिम्फ तंत्र द्वारा इकट्‌ठा किया जाता है । गुर्दे के कुछ रोगों में मूत्र में काफी प्रोटीन चला जाता है, फलस्वरूप रक्त का आस्मोटिक प्रेसर गिर जाता है और द्रव्य इन्टर सेलुलर टिश्यूस्पेस में इकट्‌ठा हो जाता है जिससे शरीर में सूजन आ जाती है । इस प्रकार प्लाज्या प्रोटीन बफर का काम करती है तथा रक्त का PH (अम्ल व क्षार का सन्तुलन) निश्चित रखने में मदद करती है । प्लाज्मा प्रोटीन के ग्लोबुलिन वाले भाग में एन्टीबाडी पाये जाते हैं, जो इन्फेक्शन से लड़ने में शरीर की मदद करते हैं ।

रक्त ग्रुप:

यदि रक्त की हानि शरीर से अधिक मात्रा में हो जाये तो रोगी को बाहर से रक्त देना पड़ सकता है और यदि यह रक्त उसी वर्ग का न हुआ तो रक्त का थक्का बन जाता है । थक्का बनने की इस क्रिया ने ही ब्लड ग्रुप को जन्म दिया । चार मुख्य रक्त वर्ग हैं: A, B, AB व O ।

रक्त जमने की किया एक वर्ग की लाल रक्त कणिकाओं में पाये जाने वाले एग्लुटिनोजेन व दूसरे वर्ग की प्लाज्मा में पाये जाने वाली एग्लुटिनिन की प्रतिक्रिया स्वरूप होती है । इनका विवरण इस प्रकार से है: तालिका 3.1 

 

चूंकि रक्त वर्ग ए-बी की प्लाज्मा में कोई एग्लूटिनिन नही पाया जाता, अत: इस वर्ग के व्यक्ति को अन्य किसी भी ग्रुप के व्यक्ति का रक्त दिया जा सकता है । (यूनिवर्सल रेसिपियन्ट), जबकि रक्त वर्ग ओ में कोई एग्लुटिनोजेन नहीं पाया जाता है । (यूनिवर्सल डोनर) अत: इस वर्ग का व्यक्ति अन्य किसी वर्ग के व्यक्ति को अपना रक्त दे सकता हैं । इस प्रकार रक्त तीर के निशान की दिशा में दिया जा सकता है ।

सन् 1940 में एक अन्य रक्त वर्ग सिस्टम जिससे रीसस सिस्टम कहते है, खोजा गया । ए बी ओ वर्ग से भिन्न इनमें कोई पहले से बना रीसस एग्लुटिनिन या एण्टी-डी नहीं पाया जाता है । फिर भी रीसस निगेटिव व्यक्ति एण्टी डी का निर्माण रीसस पाजीटिव व्यक्ति का खून चढ़ाये जाने के उपरान्त कर सकता है । रीसस और ए  बी ओ प्रमुख रक्त वर्ग है । पर कुछ अन्य जैसे एम, एन, केल, लूथर और डफी आदि भी हैं, जो कभी-कभी  ख़ुन चढ़ाने के बाद प्रतिक्रिया कर सकते हैं ।

रूधिर का थक्का बनना:

जब कभी रक्त नलिका में चोट लगने की वजह से रक्त बाहर निकलता है तो रक्त को और अधिक बहने से रोकने के लिए यह जमकर थक्का बना लेता है । यह एक जटिल क्रिया है । यह क्रिया भिन्न स्टेप्स, जिसे कास्केड तन्त्र कहते हैं, में पूरी होती है ।

यह एक चेन रिऐक्शन है जो रक्त नलिका की टूटी हुई इण्डोथीलियम से प्लेटलेट की क्रिया से शुरू होती है । यह तीन चरणों में पूरी होने वाली क्रिया है ।

प्रथम चरण : थ्रोम्बोप्लासिटन का निर्माण

द्धितीय चरण : प्रोथ्राम्बिन का थ्राम्बिन में कैल्शियम आयन की उपस्थिति में थ्राम्बोप्लास्टिन द्वारा बदलना ।

तृतीय चरण: थ्राम्बिन द्वारा फाइब्रिनोजन का फाइब्रिन में परिवर्तन ।

इस जमने की  क्रिया को पूरी होने के लिए 13 ब्लाटिंग फैक्टरों की जरूरत पड़ती है । इनमें से आठवें फैक्टर (एण्टीहीमोफीलिक ग्लोबिन) की अनुपस्थित से हीमोफीलिया नामक रोग हो जाता है । यह सैक्सलिंकड बीमारी है जिसमें औरतें ट्रान्समिटर का काम करती हैं, जबकि रोग पुरुषो में ही होता है ।

थ्राम्बोसिस एवं फाइब्रिनोलिसिस:

सामान्यतया रक्त, रक्तनलिकाओं में नहीं जमता है पर कुछ परिस्थितयों में यह जम भी जाता है । जिसे थ्राम्बोसिस कहते हैं । रक्त नलिकाओं में एक प्राकृतिक तन्त्र पाया जाता है जो इस क्रिया का विरोध करता है । प्लाज्मिनोजेन प्लाज्मिन में परिवर्तित होकर न घुलने वाले फाइब्रिन को नष्ट कर देता है (फाइब्रिनोलिसिस) । सामान्य व्यक्ति में ये व्यवस्थित रूप से कार्य करते है ।

अस्थिमज्जा का रोपण:

आजकल रोगयुक्त मज्जा को उपयुक्त डोनर की स्वस्थ मज्जा द्वारा बदला जा सकता है ।

इलैक्ट्रो कार्डियोग्राफी (ई॰सी॰जी॰):

एस॰ए॰ नोड से पैदा होने वाली प्रत्येक इम्पल्स कन्डक्टिंग सिस्टम से होती हुई हृदय पेशियों में कुछ यान्त्रिक व विद्युतीय परिवर्तन करती है । इन विद्युतीय बदलावों के शरीर की सतह पर इलैक्ट्रोडों को रखकर रिर्काड किया जा सकता है ।

इलैक्ट्रोड दो प्रकार के होते हैं:

1. यूनीपोलर व

2. बाइपोलर इलैक्ट्रोड ।

इनकी स्थिति बदलकर हृदय के भिन्न भागों से इम्पल्स जाने की सूचना प्राप्त कर सकते हैं । सामान्य ई॰सी॰जी॰ को चित्र 3.5 में दिखाया गया है । ई॰सी॰जी॰ के भिन्न पीकों में “पी” वेव जो इम्पल्स के आट्रिया से जाने को दिखाता है, क्यू॰आर॰एस॰ काम्लैक्स, इम्पल्स का वेन्ट्रिकिलो में जाना दिखाता है ।

इलैक्ट्रोकार्डियोग्राफी से हृदय के विभिन्न रोगों के निदान में काफी सहायता मिलती है । जैसे आट्रियल फिब्रलेसन, जिसमें आट्रिया तेजी से धड़कते हैं, जो ई॰सी॰जी॰ में अधिक संख्या में तथा एमप्लीट्‌यूड में छोटी असामान्य इम्पल्सों के रूप में व्यक्त होता है ।

कार्डियक आउटपुट:

प्रत्येक सिस्टोली में वेन्द्रिकिल लगभग 70 मिली लीटर रक्त एवोरटा में भेजता है जिसे स्ट्रोक वोल्युम कहते हैं । सामान्य आराम की स्थिति में हृदय 70 बार प्रति मिनट धड़ककर लगभग पांच लीटर रक्त पम्प करता है जो कर्डियक आउटपुट कहलाता है ।

कार्डियक आउटपुट = स्ट्रोक वोल्यूम x हृदय गति

वे सभी कारण जो हृदय गति व स्ट्रोक वोल्युम को प्रभावित करते हैं । काडियक आउटपुट को भी प्रभावित करते हैं ।

स्ट्रोक वोल्यूम निम्न पर निर्भर हैं:

1. शिराओं द्वारा हृदय को लाये गये रक्त का आयतन ।

2. हृदय के संकुचित होने की ताकत जो वीनस रिटर्न के हिसाब से परिवर्तित होती है ।

इस सम्बन्ध को ‘फ्रैंक स्टर्लिग’ का नियम कहते हें । सिम्पैथेटिक स्टीमुलेशन होने पर भी हृदय के संकुचित होने की शक्ति बढ़ जाती है, जो एन्ड सिस्टोलिक वोल्यूम पर निर्भर करती है, जबकि हृदय गति एस॰ए॰ नोड पर निर्भर करती है ।

वेगस नर्व के स्टीमुलेट होने पर हृदय गति कम हो जाती  है तथा सिम्पैथेटिक तन्त्र के स्टीमुलेट होने पर गति बढ़ जाती हैं । कसरत करते समय हृदय गति व उसके संकुचित होने की शक्ति दोनों बढ़ जाते हैं । यह कसरत के दौरान बड़ी हुई शरीर की आक्सीजन की मांग को पूरा करने के लिए होता है । कार्डियक आउटपुट को डाइ डाइल्यूसन विधि से मापा जा सकता है ।

रक्त का आयतन:

यह 75-80 मि॰ली॰ प्रति किलो ग्राम शरीर के वजन का या सामान्य वयस्क में पांच लीटर होता है । द्रव की हानि मूत्र, पसीने, मल, तथा फेफड़ों द्वारा वाष्प के रूप में होती है । इस होने वाली पानी की कमी को प्यास द्वारा और अधिक पानी पीकर पूरा किया जाता है ।

इसके अतिरिक्त एक रास्ते से होने वाली हानि को दूसरे से होने वाली हानि को कम कर सन्तुलन कायम किया जाता है । उदाहरण के तौर पर अधिक पसीना आने पर मूत्र कम बनता है । सामान्यतया पानी की हानि को एण्टीडाइयूरेटिक हारमोन द्वारा रोका जाता है ।

शरीर में सोडियम को इकट्‌ठा रखना भी रक्त का आयतन संतुलित रखने में सहायता करता है और यह क्रिया रेनिन एन्जियोटेन्सिन एल्डोस्टेरान तन्त्र द्वारा की जाती है । अत: कोशिकाओं का रक्त संचार शरीर के कुल रक्त के आयतन, अर्टिरियल रक्तचाप, अर्टिरियोलो की स्थिति और रक्त के गाढ़ेपन (विस्कोसिटी) पर निर्भर है ।

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