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Diseases of Excretory System | Zoology | Hindi

Read this article in Hindi to learn about the various instruments used for diagnosing the diseases of excretory system.

1. इक्सक्रीटरी या इन्द्रावीनस यूरोग्राफी:

यह मूत्र संस्थान के रोगों के निदान में प्रयोग होने वाली सबसे प्रमुख जांच है । जांच के पहले रोगी की तैयारी करनी आवश्यक है । रोगी को जांच के एक दो दिन पहले से कम रेसे फाइबर वाला भोजन, हल्का, शाम का भोजन तथा रात्रि दस बजे के बाद से कुछ नहीं खाना होता है ।

इसके अतिरिक्त गैस सोखने वाली दो-दो गोलियां (चार कोल) दिन में तीन बार तथा जांच के पूर्व वाली रात लस्लेटिव की गोलियां (डलकोलेक्स) देनी होती है जिससे आते, गैस तथा मल से साफ हो जाये तथा जांच में कोई बाधा न हो । मरीज के शरीर में पानी की कमी नहीं होनी चाहिए, खासकर बच्चों व मधुमेह के रोगियों में ।

स्थितियां जिनमें जांच करनी चाहिए (इन्डीकेशन):

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1. आब्सट्रक्टिव यूरोपैथी जैसे पथरी की संभावना होने पर ।

2. गुर्दे में होने वाली जन्म जात गड़बड़ियां ।

3. रक्तचाप की जांच ।

4. गुर्दे से निकलने वाली किसी ट्‌यूमर की संभावना होने पर ।

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5. उदर में चोट तथा पेशाब में खून आना ।

6. गुर्दे के कार्य का पता लगाने में ।

स्थितियां जहा जांच नहीं करनी चाहिए (कन्ट्रा-इन्डीकेशन):

1. आयोडीन सेन्सिटिविटी या पहले दवाई से रियेक्सन होने की स्थिति में ।

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2. गर्भावस्था में ।

3. हृदय या गुर्दे के खराब होने की स्थिति में ।

4. मल्टीपल माईलोमा ।

प्रारम्भिक फिल्म:

प्रारम्भिक फिल्म रोगी को पीठ के बल (सुपाइन) लिटाकर 16 ”x 20” आकार की फिल्म पर करते हैं जिससे दोनों डायफ्राम तथा नीचे सिम्फासिस प्यूविस का निचला भाग आ रहा हो । लम्बे मरीजों में 14 ”x 17” की फिल्म व कैसेट भी प्रयोग किया जा सकता है ।

मूत्राशय वाले भाग की फिल्म अलग से 8 ”x 10” आकार की फिल्म पर ली जा सकती है । फिल्म लेते समय रोगी से सांस रोकने को कहते हैं । प्लेन फिल्म या स्काउट फिल्म (चित्र 11.1) में गुर्दे की स्थिति पथरी तथा गुर्दे के आकर आदि की जानकारी देता है तथा साथ ही रोगी की जांच के लिये (मल तथा गैस दूर करने हेतु) की गयी तैयारी के बारे में पता लगता है । एक्स किरण तकनीशियन आगे की फिल्मों के लिये एक्सपोजर फैक्टर निर्धारित कर सकता है । जननांगों को गोनेडल सील्ड द्वारा ढककर रेडियेशन से बचाना चाहिए ।

तकनीक:

कान्ट्रास्ट माध्यम शिरा में या तो एक साथ (बोलस) या इन्फ्युजन के रूप में अधिक समय में देते हैं । रोगी को इन्जेक्शन के समय किसी अनचाहे दुष्प्रभाव के लिए देखते रहना चाहिए । इन्जैक्शन से पूर्व बाइण्डर द्वारा उदर दाव लगा देना चाहिये जिससे पेल्वीकैलीसियल तन्त्र व ऊपरी यूरेटर अच्छी तरह दिख सके ।

कान्ट्रास्ट मरीज को लगाने के पहले ही तकनीशियन को अगली फिल्म की तेयारी कर लेनी चाहिए । कैसेट जिसमें समय, तारीख तथा दांया या बांया भाग अंकित हो, कि पट्‌टी नियमत: दायीं ओर लगाकर बकी ट्रे में लगा देते हैं ।

कन्ट्रास्ट देने के उपरान्त फिल्में निश्चित समय के उपरान्त लेते हैं । प्राय: एक मिनट की फिल्म नेफ्रोग्राम की तथा पाँच मिनट की फिल्म कलेक्टिंग तन्त्र के लिए लेते हैं । फिल्म लेने के तुरन्त बाद उसको प्रोसेस कर तथा देख कर आगे की जाने वाली फिल्मों के बारे में निर्धारित करते हैं ।

15 मिनट पर उदरदाब हटाकर 12 ”x 15” की फिल्म यूरेटरों को देखने के लिए करते हैं । प्रोन फिल्म पेल्वीयूरेटेरिक जन्कशन व हाइड्रोनेफ्रोसिस की स्थिति में यूरेटर देखने के लिए करते हैं । उदर दाब हटाने के पश्चात लगभग पूरा यूरेटर तथा मूत्राशय देखा जा सकता है ।

उदर दाब चोट लगने, हाल में हुई शल्यक्रिया, एक्यूट यूरेटेरिक कोलिभ, ऐवोरटिक एन्यूरिज्म व रीनल फेल्योर की स्थिति में नहीं लगाना चाहिए । आखिरी यूरोग्राम लेने के तुरंत बाद रोगी खा-पी सकता है । लगभग आधे घन्टे या 45 मिनट बाद भरे हुए मूत्राशय की एक फिल्म तथा तत्पश्चात पेशाब करवाने के बाद एक पोस्टमिक्चयूरीशन फिल्म लेते हैं । इस फिल्म से पुरुष रोगियों में बड़ी हुई प्रोस्टेट या छोटे ट्‌यूमर की वजह से बचे हुये मूत्र की मात्रा पता चलती है ।

परिवर्तन:

सामान्य विधि के अलावा कई परिर्वतन करने पड़ सकते हैं जैसे रेडियो ओपेसिटी की स्थिति दर्शाने हेतु, ओबलीक स्थिति में फिल्म तथा रीनल फेल्योर में अधिक मात्रा में कान्ट्रास्ट (हाईडोज) देकर देर की फिल्में (डिलेड फिल्म) लेनी पड़ती है । अल्ट्रासाउंड द्वारा प्री रीनल, पोस्टरीनल या आव्सट्रक्टिव रीनल फेल्योर के बारे में बताया जा सकता है ।

उच्च रक्तचाप:

प्रत्येक गुर्दे द्वारा कान्दास्ट निकाले जाने की दर पता करने के लिए पहले पांच-छह मिनट तक कई जल्दी-जल्दी (रेपिड सीकवेन्स) फिल्में ली जाती हैं ।

डिलेड इक्सक्रीसन:

इस स्थिति में कई फिल्में चौबीस घण्टे तक लेते हैं ।

इक्टोपिक गुर्दे:

यदि पांच मिनट की फिल्म में गुर्दे रीनल एरिया में नहीं दिखाई देते हैं तो पूरे उदर की एन्टिरोपोस्टीरियर फिल्म लेनी चाहिए ।

मूत्राशय की गड़बड़ियां:

मूत्राशय के ट्‌यूमरों व डाइवर्टिकुला आदि पता करने के लिए ओबलीक स्थिति में फिल्मों की आवश्यता होती है ।

2. नेफ्रोटोमोग्राफी:

इसका प्रयोग नेफ्रोग्राम या पाइलोग्राम में पूर्ण सूचना न मिलने पर, गुर्दे की आउटलाइन की अधिक सूचना प्राप्त करने में व किसी गुर्दे के किसी ट्‌यूमर का पता लगाने में किया जाता है । अधिक मात्रा में कन्ट्रास्ट देकर जल्दी-जल्दी दो तीन सेमी. पर टोमोग्राम लेते हैं (चित्र 11.4) । इन्फ्यूजन टोमोग्राफी व कान्दास्ट बोलस में न देकर धीरे-धीरे इन्फ्यूजन में दिया जाता है ।

उपयुक्त टोमोग्राम के लिए:

1. पूरा गुर्दा फिल्म में आना चाहिए ।

2. तथा टोमोग्राम की स्थिति (लेबल) पता चलनी चाहिए ।

इसे सामान्य पाइलोग्राफी के साथ भी कान्ट्रास्ट लगाने के दस मिनट पश्चात टेबल टॉप से 9-12 से.मी. पर फिल्म लेकर किया जा सकता है । इस समय नेफ्रोग्राम की मात्रा कम व पाईलोग्राम में मात्रा अधिक होती है ।

3. रेट्रोग्रेड पाइलोग्राफी:

जब इन्द्रावीनस यूरोग्राफी से मूत्र संस्थान ठीक से नहीं दिखायी पड़ता है तो उल्टी दिशा से यूरेटरों में कैथेटरों द्वारा कान्ट्रास्ट डालकर यूरेटर तथा पेल्वीकेलेसियल तन्त्र देखा जा सकता है । यह जांच यूरोलोजिस्ट के साथ मिलकर पूरी स्वच्छता के साथ करना चाहिए । मरीज को पीठ के बल लिटाकर सिस्टोस्कोप की मदद से कैथेटर यूरेटरों में यूरिथा द्वारा डाल दिया जाता है ।

कैथेटर की यूरेटर में इमेज इन्टेसीफायर में देखकर आगे बढ़ा सकते हैं । कैथेटर को पेल्वीकैलेसियल तन्त्र में पहुंचा कर प्रत्येक गुर्दे से मूत्र जांच के लिए एकत्रित किया जा सकता है । इसके पश्चात आठ-दस मि.ली. 60 प्रतिशत यूरोग्राफिन कानट्रास्ट प्रत्येक गुर्दे में डालकर फिल्में लेते हैं । प्रारम्भिक फिल्म 12 ”x 15” की लेते है, जो कैथेटर की स्थिति, पाइलोग्राम व यूरेटरोग्राम को दर्शाते हैं ।

प्रत्येक फिल्म 12 ”x 15” आकार पर लेते हैं जिससे पूरे यूरेटर और पेल्वीकैलेसियल तन्त्र आ सकें । ये फिल्म प्रोसेस कर तुरंत विकिरण विशेषज्ञ तथा ओलोजिस्ट द्वारा देखी जाती है । प्राय: दांयें या बायें, ओबलीक फिल्मों की भी आवश्यकता पड़ती है । जब फ्लोरोस्कोपी उपलब्ध नहीं होती है तो सामान्य ओवर काउच फिल्म लेते हैं । शेष जांच विधि समान ही रहती है ।

4. एण्टीग्रेड पाइलोग्राफी:

जब इन्द्रावीनस यूरोग्राफी तथा रेट्रोग्रेड पाइलोग्राफी मनचाही सूचना नहीं दे पाती है तब एण्टीग्रेड पाइलोग्राफी की आवश्यकता होती है । पेल्वी पूरेटरिक आव्सट्रक्शन को दिखाने में भी यह उपयुक्त है और इस स्थिति में जहां यूरेटर प्राय: शल्यक्रिया द्वारा इलियम या सिगमोयड कोलन से जुड़े होते हैं, रिट्राग्रेड पाइलोग्राफी सभव नहीं है ।

मरीज को प्रोन या पेट के बल लिटाकर थोड़े से भाग को सुन्न करने के बाद अल्ट्रासाउण्ड द्वारा देखते हुए एक धातु का निशान जो प्राय: मध्य क्तेविकुलर लाइन मे बारहवीं पसली से एक-दो से.मी. नीचे होता है, लगाकर रीनल पेलिवस में कान्ट्रास्ट डालकर फिल्में ले लेते हैं ।

5. मिक्यूरेटिंग सिस्टोग्राफी और सिस्टोयूरिथ्रोग्राफी:

यह जांच प्राय: यूरिथ्रा के लिए किसी बाधा या स्ट्रेस इन्कन्टिनेन्स तथा वेसिकोयूरेटरिक रिफलक्स को पता करने हेतु की जाती है, परन्तु  यूरिथ्रा या मूत्राशय के एक्यूट इनफैक्शन की स्थिति में इसे नहीं किया जाता है ।

रोगी की तैयारी:

जांच के ठीक पहले रोगी से पेशाब करने को कहते हैं । कैथेटर वाले रोगियों में कैथेटर खोलकर मूत्राशय खाली कर देते हें ।

कान्ट्रास्ट माध्यम:

12 प्रतिशत w/v गाढ़ेपन का सोडियम आयोडाइड सलूशन जो कीटाणु रहित या स्टिराइल होता है, प्रयोग में लाते हैं । कान्ट्रास्ट देने के पूर्व मूत्राशय वाले भाग की एक फिल्म करके देख लेते हैं ।

विधि:

मूत्राशय में कीटाणु रहित विधि से एक कैथेटर डालकर कान्ट्रास्ट डाल देते है, जो ड्रिप इन्फयुजन द्वारा हिगिन्सन सिरिन्न द्वारा किया जा सकता है । जब मूत्राशय कान्ट्रास्ट से भर जाता है, कैथेटर निकालकर पूरे मूत्राशय

की एक फिल्म कर लेते हैं (एन्टीरोपोस्टीरियर पोजीशन में) रोगी को ओबलीक स्थिति में लिटाकर एक्सरे तकनीशियन फिल्म कर लेने की पूरी तैयारी करता है, फिर रोगी से पेशाब करने को कहते हैं तथा जैसे ही रोगी ऐसा करता है, फिल्म ले लेते हैं ।

फिल्म का आकार जांच पर निर्भर है जैसे कि बेसिकोयूरेटरिक रिफलेक्स देखने के लिए बड़ी फिल्म प्रयोग करते हैं जिससे यूरेटर दिखा सके । यदि यूरिया देखनी है तो छोटी फिल्म पर मूत्राशय व यूरिया की फिल्म ले लेते हैं । प्राय: दांयीं व बांयीं ओवलीक फिल्म में लेते है ।

जिससे यरिया पूरी लम्बाई में दिख सके । इन फिल्मों को देखने के पश्चात मरीज की पेशाब करने के बाद की एक फिल्म ले लेते हैं जिससे बचे हुये (रेजिडुअल) मूत्र की मात्रा का पता चल सके । बच्चों व स्ट्रेस इनकन्टिनेन्स के रोगियों में इस विधि में कुछ परिवर्तन किये जाते हैं ।

6. रिटोग्रेड यूरिथ्रोग्राफी:

यह जांच पुरुष यूरिया के स्ट्रिक्चर, डाइवर्टिकुला तथा फाल पैसेज पता करने के लिए की जाती है ।

कन्ट्रास्ट:

60 प्रतिशत यूरोग्राफिन या सोडियम आयोडाइड यूरिथ्रा व मूत्राशय की एक प्रारम्भिक फिल्म ले लेते हैं फिर रोगी को ओबलीक स्थिति में लिटाकर कान्ट्रास्ट को यूरिथ्रा सिरिंज या ब्राउनी क्लैम्प के नोजल द्वारा यूरिया के छिद्र में डालते हैं । यूरिया में कान्दास्ट डालते समय एक्सरे लेते हैं । इस जांच को दूसरी ओवलीक स्थिति में पुन: करके फिल्म ले लेते हें । कई अन्य जांचे भी एक्सरे विभाग में की जाती हैं ।

जैसे परक्यूटेनियस नेफ्रास्टामी व परक्यूटेनियस रीनल पन्कचर आदि । इन्हें फ्लोरोस्कोपी द्वारा सीधे गुर्दे में कान्ट्रास्ट डाल कर करते हैं । अल्ट्रासाउण्ड ने अब फ्लोरोस्कोपी की जगह ले ली है । क्योंकि रीनल पेरेनकाइमा व पेल्वीकैलशियल तन्त्र को अल्ट्रासाउण्ड द्वारा आसानी से देखा जा सकता है ।

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