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How to Diagnose the Diseases of Digestive System? | Zoology | Hindi

Read this article to learn how to diagnose the diseases of human digestive system in Hindi language.

पाचन नली:

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पाचन नली की जांच में फ्लोरोस्कोपी तथा रेडियोग्राफी दोनों का प्रयोग किया जाता है । फ्लोरोस्कोपी द्वारा अत: की गति, म्यूकोसा की स्थिति तथा आगे की जांच को निर्धारित किया जाता है । रेडियोग्राफी फिल्मों के स्थायी रिकार्ड के लिए किया जाता हे ।

कान्ट्रास्ट माध्यम:

चूंकि भोजन नली में कोई प्राकृतिक कान्ट्रास्ट नहीं होता है अत: किसी कान्ट्रास्ट माध्यम की आवश्यकता होती है । इस उद्‌देश्य से बेरियम सल्फेट का प्रयोग किया जाता है ।

ग्रास नली:

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इसकी जांच को बेरियम स्वालो कहते हैं । इसमें पूरे इसोफेगस की जांच गैस्ट्रोइसोफेजियल जन्कशन तक की जाती है । इसे प्राय: डिस्पेपसिया, इसौफेजियल वेरीसीज, माइट्रल वाल्व की बीमारियों तथा सीने की ट्यूमर में किया जाता है ।

जब कान्ट्रास्ट के मिडियास्टिनम प्यूरल या पेरिटोनियल कैवेटी में जाने की संभावना हो तब इसे नहीं करना चाहिए । यह जांच सिंगल कान्ट्रास्ट (केवल एक माध्यम का प्रयोग कर) या डबल कान्ट्रास्ट (बेरियम + गैस का प्रयोग कर) हो सकती है । जांच के लिए रोगी को तैयार करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है ।

विधि:

सिंगल कान्ट्रास्ट जांच के लिए संभव हो तो रोगी के खड़ा कर स्क्रीनिंग करते हैं । रोगी को एक ग्लास में बेरियम (100 प्रतिशत w/v) देकर उससे जब कहा जाये तब पीने को कहते हैं । निगलने की क्रिया को विकिरण विशेषज्ञ बड़ी सावधानी पूर्वक देखता है ।

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डबल कान्ट्रास्ट जांच के लिए गैस पैदा करने वाले पदार्थ को बेरियम ( 250 % w/v) के ठीक पहले देते हैं । इसके ठीक बाद स्पाट फिल्म एन्टीरोपोस्टीरियर, ओबलीक व लैट्रल स्थिति में ले लेते हैं (चित्र 11.7) । अच्छी तरह की गयी जांच के लिए यह आवश्यक है कि पूरी ग्रासनली बेरियम से भरी हुई दिखायी जाये ।

इसोफेजियल वेरीसीस के लिए गाढ़ा बेरियम चम्मच की सहायता से रोगी के मुंह में रखते हैं तथा रोगी से बेरियम निगलने के लिए कहते हैं, फिल्में तब लेते हैं, जब बेरियम ग्रासनली से गुजर कर म्बूकोसा के ऊपर एक पतली परत बना लेता है । प्राय: वात्सल्वा मेनोव्योर करते समय स्पाट फिल्में ली जाती हैं ।

बेरयिम मील:

इसे अपर जी आई सीरीज जांच भी कही जाती है । इसके अंतर्गत आमाशय एवं डियोडिनम की जांच डियोडिनोजेज नल जन्कशन तक करते हैं । यह जांच एसिड पेप्टिक रोग, क्रोनिक रक्त स्त्राव, हाइटस हर्निया और आमाशय कैंसर रोगों के निदान में करते हैं ।

रोगी को एक्स-रे विभाग में खाली पेट जांच के लिए आने को कहते हैं, तथा उसे जांच में लगने वाले समय के बारे में भी बता देते हैं । सिंगल कान्ट्रास्ट (चित्र 11-9 (क)) जांच में बेरियम रोगी को खड़ा करके देते हैं, जबकि बहुत अधिक कमजोर रोगी में उसे (रिकम्बेन्ट स्थिति) पीठ को सहारा देकर पिलाते हैं । लगभग दो-तीन हत्ने बेरियम देकर न्दूकोसा को ऊपर से दाब देकर कम्प्रेशन फिल्में ले लेते हैं ।

इसके पश्चात रोगी को शेष बेरियम भी दे देते हैं । (कुल 300 मि.ली.) जिससे पूरा आमाशय भर जाता है, तथा डियोडिनम की जांच की जा सके । रेडियोलाजिस्ट आमाशय के आकार प्रकार, स्थिति तथा पेरिस्टैलसिस से होने वाले इसके परिवर्तनों को सावधानी पूर्वक नोट करता है तथा डियोडिनल कत्व को भरते तथा खाली होते हुए भी देखते हैं ।

कोई निश्चित नियम फिल्मों को संख्या के लिए निर्धारित नहीं हैं । यह प्राय: अस्पताल व रेडियोलोजिस्ट पर निर्भर करता है जैसे प्राय: आमाशय को तीन-चार फिल्में सुपाइन, प्रोन प्रोन ओबलीक तथा इरेक्ट स्थितियों में ले लेते हैं ।

डियोडिनल बल्व को स्पाट फिल्में पेप्टिक अल्सर के रोगियों में भरी तथा खाली स्थिति में लेनी आवश्यक है । अन्त में डियोडिनल लूप की फिल्में कम से कम दो स्थितियों में लेनी आवश्यक हैं । इस विधि में मरीज को आवश्यकतानुसार कई परिवर्तन किये जा सकते हैं । जैसे हाइटस हर्निया, के रोगियों में रोगी को प्रोन स्थिति में लिटा कर उसके उदर के नीचे एक तकिया रखकर दाब देते हुये फिल्में लेते हैं ।

डबल कान्ट्रास्ट विधि:

इस विधि द्वारा सिंगल कान्ट्रास्ट की अपेक्षा अधिक छोटे घावों को पता लगाना तथा म्यूकोसा की जांच संभव है (चित्र 11.9 (ख)) । रोगी को खड़ा करके उसको गैस बनाने वाला पाउडर (गैट्रोविजन) पानी या बेरियम की मदद से निगलने को देते हैं । इसके पश्चात रोगी को थोड़ी मात्रा में गाढ़ा बेरियम देकर उसे लिटाकर गोल-गोल कई चक्कर काटने को कहते हैं ।

इस क्रिया से आमाशय तन जाता है तथा बेरियम म्यूकोसा पर अच्छी तरह से एक पतली परत बना लेता है । सारी क्रिया फ्तोरोस्कोपी द्वारा देखते हुये करते हैं तथा उपयुक्त फिल्में लेते रहते हैं जो प्राय: सिंगल कान्दास्ट जैसी स्थितियों में ही होती है ।

हाइपोटोनिक डियोडिनोग्राफी:

यह डियोडिनल लूप की रिलेक्सड स्थिति में की जाने वाली जांच है जब इसमें कोई पेरिस्टैलसिस नहीं होती है । यह क्रिया एण्टीकोलोनरजिक दवा जैसे बस्कोपान या प्रोक्येनथीन का इन्जेक्शन देकर की जाती है । इसे ट्‌यूब डालकर या बिना ट्‌यूब डाले भी की जा सकती है ।

बिना ट्‌यूब विधि में प्रोवैन्थीन का इन्ट्रावीनस इंजेक्शन देकर डियोडिनम को पैरालाइज कर देते हैं तथा एटोनिक स्थिति में डियोडिनम को कान्ट्रास्ट से दो-तीन गुना डिसटेन्ड कराकर इसकी फिल्में ले ली जाती हैं । डियोडिनम पैन्क्रियाज की आउटलाइन में आये किसी बदलाव को दिखा सकता है । प्राय: स्पाट फिल्में सुपाइन, स्टीरोपोस्टीरियर और ओबलीक स्थितियों में लेते हैं । इस विधि की जगह आजकल कम्पयूटेड टोमोग्राफी का प्रयोग किया जाता हे ।

बेरियम मील फालोथ्रू जांच:

इस विघि द्वारा डियोडिनल फ्लेक्सर से इलियोसीकल वाल्व तक छोटी आंत की जांच करते हैं । प्राय: रोस्कोपी तथा ओवरकाउच का प्रयोग होता है । इसे (मालएवजार्पसन) भोजन अवशोषण की खराबियों, आत का क्षयरोग तथा बच्चों में सबएक्यूट ओबस्ट्रक्शन का कारण (मालरोटेशन का पता करने में करते हैं) ।

रोगी से खाली पेट एक्स-रे विभाग जांच के लिए आने को कहते हैं क्योंकि जांच में पूरा एक दिन लग सकता है । अत: उसे अपने साथ दोपहर का भोजन भी लाने को कहते हैं । प्रयोग होने वाले बेरियम की मात्रा तथा प्रकार एक्स किरण विशेषज्ञय पर निर्भर करता है ।

बेरियम पीकर रोगी प्रोन या दांयीं करवट लेट जाता है । इसका उद्‌देश्य छोटी आंत में बेरियम के कान्टीनियसकालम (एक साथ) पहुंचाना होता है । पहली फिल्म बेरियम पिलाने के 15 मिनट पश्चात करते हैं उसके बाद प्राय: 15-30 मिनट के अन्तर पर फिल्में लेते हैं ।

प्रत्येक फिल्म रेडियोलोजिस्ट कोई गड़बड़ी होने पर उसकी स्पाट फिल्म ली जाती है । जब बेरियम इलियोसीकल जन्कशन पर पहुंच जाता है तो कम्प्रेशन फिल्में फ्लोरोस्कोपी द्वारा प्राप्त करते हैं । अच्छी जांच के लिए पूरी आंत प्रत्येक फिल्म में आनी चाहिए । शुरू की फिल्मों में आमाशय तथा डियोडिनम आना चाहिए । समय फिल्मों पर अंकित होना चाहिए तथा अन्त की फिल्मों में इलियोसीकल जन्कशन तथा सीकम अच्छी तरह दिखना चाहिए ।

छोटी आंत का एनिमा या एन्टेरोक्लाइसिस:

इस जांच में कान्ट्रास्ट माध्यम सीधे डियोडिनम के बाद की छोटी आत में डालते हैं । इसमें सामान्य बेरियम जांच में होने वाली कमियां नहीं होती हैं जैसे पूरी आंत के सभी भागों को एक साथ देखा जा सकता      है । रोगी को एक्स-रे विभाग खाली पेट आने को कहते हैं ।

फ्लोरोस्कोपी में देखते हुये गाइडवायर युक्ता ट्‌यूब को डियोहुनल फ्लेक्सर तक पहुंचा देते हें । फिर 110% w/v भाप गाढ़े पर का 200 मि.ली. बेरियम माइक्रोवार के घोल को 350 मि.ली. पानी में मिलाकर ट्‌यूब द्वारा अन्दर डाल देते हैं जिसके ठीक बाद 500-1000 मि.ली. स्वच्छ पानी ट्‌यूब द्वारा 100 मि.ली. प्रति मिनट की दर से डालते हैं ।

जब बेरियम डाला जा रहा होता है, रेडियोलोजिस्ट उसकी गति को फ्लोरोस्कोपी में ध्यानपूर्वक देखता रहता है तथा उपयुक्त समय पर फिल्में लेता रहता है । कुछ रोगियों में जब बेरियम सीकम तक पहुंच जाता है तो हवा भी छोटी आंत में डाली जाती है ।

बेरियम एनीमा:

बड़ी आंत की जांच सिंगल कान्दास्ट या डबल कान्ट्रास्ट विधि द्वारा की जा सकती है । सिंगल कान्ट्रास्ट में केवल बेरियम का घोल तथा डबल कान्ट्रास्ट में बेरियम व हवा का प्रयोग करते हैं (चित्र 11.12) । यह जांच मुख्य रूप से गुदा से होने वाले रक्त स्वाव, कोलाइटिस और बड़ी आत के ओवस्ट्रक्शन की सम्भावना वाले रोगियों में की जाती है ।

मरीज की जांच के पहले पेट की तैयारी अत्यन्त आवश्यक है । कोलन या बड़ी आंत को मल तथा गैस रहित होनी चाहिए । इसके लिए भिन्न विधियां प्रयोग की जाती हैं । मरीज का सहयोग जांच के लिए आवश्यक है ।

रोगी को जांच से पहले निम्न बातों के लिए सावधान करते हैं:

1. एनलस्फिन्कटर को मजबूती से बन्द रखने को कहते हैं, जिससे बेरियम का घोल वापस न आ सकें ।

2. उदर की पेशियों को ढीले रखने के लिए ।

3. मुंह से गहरी सांस लेने के लिए कहते हैं । रोगी को सारे कपड़े उतार कर गाउन पहना देते हैं । जांच के कमरे के साथ गुसलखाने का होना आवश्यक है ।

विधि:

थोड़ी मात्रा में बेरियम (15 प्रतिशत w/v) यह देखने के लिए डालते हें कि ट्‌यूब में कोई अवरोध तो नहीं है । रोगी को घुटने मोड़कर करवट लेने को कहते हैं । एनीमा ट्‌यूब के सिरे पर जेली लगाकर सावधानीपूर्वक रोगी के रेक्टम में डालते हैं तथा इसे क्लोप्लास्ट से स्थिर भी कर सकते हें । अब रोगी से पीठ के बल लेटने को कहते हैं तथा फ्तोरोस्कोपी में देखते हुये धीरे-धीरे बेरियम छोड़ते हैं ।

कोलम को भरने के लिए रोगी को पहले बायीं तथा बाद में दायीं करवट लिटाते हैं । फिल्में एच्छिक स्थान के अनुसार ली जाती हैं । फिर भी प्राय: एण्टोरोपोस्टीरियर और सैटल स्पाट फिल्में पूरे कोलन की लेते     हैं । अन्त में 14 ”x 17” की एक फिल्म एण्टीरोपोस्टीरियर पोजेक्सन में ले लेते हैं ।  उसके पश्चात रोगी से टायलेट जाकर अधिक से अधिक बेरियम निकालने को कहते हैं । उसके पश्चात एक पोस्ट इवेकुयेसन फिल्म कोलन की म्यूकोसा के लिए ले लेते हैं ।

डबल कान्ट्रास्ट बेरियम एनीमा:

यह कोलन में हवा डालकर किया जाता है जो मरीज जब टायलेट हो आता है उसके बाद डालते हैं या 300 मि.ली. हाइडेन्सिटी बेरियम (100% w/v) के साथ ही डालते हैं । (चित्र 11.12 ग) । उचित फिल्में फ्लोरोस्कोपी में देखकर ले लेते हैं तथा मरीज से टायलेट जाकर हवा तथा बेरियम निकालने को बोलते हैं ।

इन्सटेन्ट बेरियम एनीमा:

यह विधि सबसे पहले यंग द्वारा सन 1963 में अपनायी गयी थी । यह अल्सरेटिव कोलाइटिस के रोगियों में पेट को बिना किसी तैयारी के सीधे की जाती है । इससे कोलाइटिस की गम्भीरता तथा प्रकार के बारे में पता चलता है । इसे टाक्सिक मेगाकोलन में, परफोरेशन की सम्भावना होने पर तथा अल्सरेटिव कोलाइटिस के साथ कैंसर होने की स्थिति में इस जांच को नहीं करते हैं । अत: इस जांच के पहले प्लेन एक्स-रे करना आवश्यक है ।

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