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Parts of the Human Body | Zoology | Hindi

Read this article to learn about various parts of the human body in Hindi language.

मानव शरीर की रचना का आधारअस्थियों का बना हुआ है, जिनके बीच में जहाँ तहाँ उपास्थियों (Cartilage) के टुकड़े लगे हुए हैं । ये सब अस्थियां और उपास्थियाँ मिलकर अस्थिकंकाल (skeleton) कहलाती हैं ।

मानव शरीर में ये अस्थियां पांच प्रकार की होती हैं:

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(1) दीर्घ अस्थियां (Long bones):

ये आकार में लम्बी होती हैं व इनके दोनों सिरे फैले होते हैं, प्राय: ये हाथ-पांव की अस्थियाँ होती हैं ।

(2) लघु अस्थियां (Short bones):

जैसा कि इनका नाम है, काफी तरह के आकर प्रकार की होती हैं और हाथ-पांव के शुरू के हिस्सों में होती हैं । (अंगुलास्थियां व अन्य चित्र 1-1)

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(3) सपाट या चपटी अस्थियां (Flat bones):

जहाँ अस्थिकंकाल में नीचे की कोमल संरचनाओं की सुरक्षा या पेशियों के लगने के लिए विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती है वहाँ अस्थि चपटी होकर पट्‌टिकाओं या प्लेटों का रूप ले लेती है, जैसे कपाल में या स्कंध फलक में ।

(4) कुछ अस्थियों के असम पृष्ठों पर कहीं उभार है, कहीं गढ़ढ़े हैं, कहीं कोई प्रबंध निकला हुआ है इसलिए ये विषम या अनियमित अस्थियां (irregular bones) कहलाती हैं ।

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(5) सीसेमोइड अस्थियाँ जोड़ के आस-पास स्नायु (tendon) में पायी जाती हैं (पटेला) ।

अस्थि की संरचना:

अस्थि शरीर में सबसे कठोर (hard), सन्धि तन्तु (कनेक्टिव टिश) है । इसके मध्य में इनऔरगेनिक साल्ट जमा रहते हैं । ये साल्ट ज्यादातर सोडियम, फास्फेट तथा मैगनेशियम व कार्बोनेट भी होते हैं जो कि अस्थि को मजबूती प्रदान करते हैं ।

अस्थिवरण (पेरिआस्ट्रियम) अस्थि के बाहरी हिस्से को ढकता है, सिवाय जोड़ों के ऊपर । यहाँ पर इसे आरटिक्यूलेट कार्टिलेज ढकती है । इन हिस्सों में रक्त वाहिकाएं अस्थिआवरण में प्रवेश करके, अस्थि के अन्दर तक पहुँचती हैं । अस्थियों के अनुप्रस्थ काट (cross section) को देखने से पता चलता है कि अस्थियां दो प्रकार (चित्र 1.2 क व 1.2 ख) की होती हैं:

काम्पेक्ट तथा स्पोन्जी । कोमपैक्ट अस्थि को माइक्रोस्कोप में देखने पर उस में सुचारु रूप का सिस्टम मिलता है जिसे हैवरसीयन सिस्टम कहते हैं । (चित्र 1.3 व 1.4) जबकि स्पोन्जी अस्थि में लेमिला होती है ।

करोटि (Skull):

सिर के अस्थिककाल को करोटि कहते है । इसमें 22 अस्थियां होती हैं । सिवाय मैण्डीयल (निचले जबड़े) के, बाकी अस्थियों के बीच में गति नहीं हो सकती । ऊपर से देखने से करोटि की रूपरेखा मे भिन्नता पाई जाती है । कुछ में वह बहुत अंडाकार और कुछ में वृत्ताकार दिखती है ।

चित्र 1.5 करोटी ऊपर से चित्र 1.6 करौटी अग्र और से चित्र 1.6 करोटि, की नेम गुहा का दृश्य सामने से । चित्र 1.8 करोटी, पार्श्व ओर का दृश्य जबकि इसका अग्र में दिखने वाला चित्र काफी भिन्न होता है (चित्र 1.6A) । करोटी के नेत्र गुहा का दृश्य बड़े रूप में सामने से (चित्र 1.7) व पार्श्व और से (चित्र 1.8) देखा जा सकता है ।

 

करोटि के आधार (base) के वामार्थ का अभ्यान्तर (1.9) भाग से और भी भिन्न होता है । कपाल का ऊर्ध्व भाग काट कर उसके अभ्यान्तर चित्र 1.10 आधार का भी अध्ययन किया जाता है । अस्थियों के मिलने से उनमें तथा उनके किनारों के बीच छिद्र तथा रन्ध्र बन जाते हैं जिनमें होकर, तान्त्रिकाएं तथा शिराएँ बाहर जाती हैं और धमनियां करोटि के भीतर जाती हैं ।

करोटि के आधार का दृश्य देखने से कई महत्वपूर्ण अस्थि छिद्रों (foramen) का पता चलता है । करोटि का सामने तथा कुछ दूर तक ऊपर और पार्श्व का भाग ललाटस्थि (Frontal Bone) से बनता है । सिर का ऊपरी सामने का भाग इस ही के कारण ललाट कहलाता है ।

पीछे की ओर पार्श्विका (Parietal Bone) अस्थियां इससे मिली हुई हैं (चित्र 1.5) । दोनों और की पार्श्विकाएं कपाल के बीच में जुड़ जाती हैं और सामने की ओर ललाटस्थि से मिल जाती है । ललाटीस्थ और पार्श्विकाओं के किनारों से मिलने से किराटी सीवनी (coronal suture) बनती है और दोनों पार्श्विकाओं के बीच की अग्र-पश्च सीवनी (sagittal suture) कहलाती है । जो सामने ललाटस्थि से पीछे पश्चकपालास्थि तक चली जाती है ।

दोनों ओर की पार्श्विकाएं अपने पीछे किनारों से पश्चकपालस्थि (Occipital bones) से पश्चकपाल सीविनी (Lambdoidal Suture) पर जुड़ीं रहती है । इसको पार्श्व पश्चकपाल सीवनी (Parietal occipital) भी कहते हैं । इस प्रकार ये चारों अस्थियां दोनों ओर की पार्श्विकाएं और ललाटस्थि सामने और पश्चादि का पीछे कपालका ऊर्ध्व और अग्र तथा पश्च भाग बना देती हैं । शंखास्थियां (Temporal Bone) पार्श्विकाओं के नीचे की किनारों पर पीछे की ओर से और जतुकास्थि (sphenoid bone) के वृहद पक्ष आगे की और से लगकर कपाल मलवा को पूर्ण कर देते हैं ।

करोटि आधार का अभ्यन्तर (Interior Base of Skull):

समग्र करोटि के आधार का अभ्यान्तर (चित्र 1.10) पृष्ठ अग्र, मध्य और पश्च तीन खातों में बंटा हुआ है चित्र 1.11, 1.12, व 1.13) । समस्त पृष्ठ विषम हैं विशेषतया अग्र और मध्य खात में जहाँ मस्तिष्क के संचलनों (gyrus) के रहने के चिन्ह बने होते हैं । दृढ़ तन्त्रिका या डुरामेटर (duramater) सारे पृष्ठ पर आच्छादित है । जिसका वाहय स्तर (अंत: कपाल कला) रूधों और विदिरों में होकर कपालस्थियों की पर्यास्थि से मिल जाता है ।

नासागुदा (Nasal Cavity):

नासागुदा प्रथम (चित्र 1.14) वायुमार्ग है जो मुख की छत से लेकर ऊपर करोटि तक विस्तृत है । यह असमान आकृति की होती है । यह विभाजन पर (Septum) द्वारा दो लम्बी सुरंगों में विभक्त है । प्रत्येक ओर की नासा सुरंग में छत (roof) अभिमध्य भित्ति, तल या अध: पृष्ठ और  बाह्य भित्ति की व्याख्या की जाती है । इसके विभिन्न भाग चित्र 1.14 व 1.15 में देखे जा सकते हैं ।

पृष्ठ वंश, मेरूदंड (Vertebral Column):

पृष्ठवंश शरीर का मध्यस्थ अक्ष है । यह अक्ष क्रमहीन आकार के अस्थि के वलयों (छल्लों) का बना हुआ है । (चित्र 1.16) । एक दूसरे से ऊपर स्थित होकर एक लम्बे दंड का रूप ले लेते हैं । इनको कशेरूका कहा जाता है इनकी संख्या 33 होती है । ये आपस में स्नायुओं (ligaments) द्वारा जुड़े रहते हैं ।

और उनके बीच-बीच में उपास्थि की चक्रिकायें (discs) लगी हुई है जिससे ये आपस में नहीं रगड़ते । इस प्रकार के प्रबंध से यह दंड चारों और को झुक सकता है । कशेरूका इस प्रकार बने हुए हैं कि उनके मिलने से उनके पश्चभाग में एक नली बन गई है जिसमें मेरुरज्जु (spinal cord) पश्चकपाल के महारन्ध्र से निकलकर नीचे कटि भाग तक चली जाती है ।

वर्णन के लिए प्रदेशों के अनुसार कशेरूकाओं को ग्रैव (ervical), वक्ष (Thoracic), कटि (Lumbar), त्रिक (Sacral) और अनुत्रिक (Coc-cygeal) कशेरुका कहा जाता है । (चित्र 1.17) विभिन्न प्रदेशों की कशेरुकाओं को चित्र 1.18 क, 1.18 ख, 1.19 क, में दर्शाया गया है ।

त्रिकास्थि (Sacrum) (चित्र 1.20 क,  व 1.20 ख) यह एक बड़ी त्रिकोणकार अस्थि है जो पाँच कशेरुकाओं के जुड़ जाने से बनी है । वयस्क अस्थि के सभी हिस्से आपस में जुड़कर एक अस्थि बनाते हैं । त्रिकास्थि, व अनुत्रिका पेशी (coccygeus) मिलकर बोनी पेलविस का पश्च पृष्ठ बनाते हैं । त्रिकास्थि का ऊपर का भाग फैला हुआ होता है व नीचे का भाग (coccygeus) तिकोना होता है । अनुत्रिकास्थि चार मूल रूप (rudimentary) कशेरुकों के जुड़ने से बनी हुई होती है ।

पर्शुकाएं (ribs) दोनों तरफ बारह-बारह होती हैं । चित्र 1.21 ये वक्ष (Thorax) के चारों तरफ की अस्थि दीवार बनाती हैं । उरोस्थि और पर्शुक उपास्थियां, अग्र भाग (sternum) जिससे पर्शुक आगे की ओर से जुड़ी होती है वक्ष की: अग्रभित्ति का मध्य भाग बनाता है । चित्र 1.21 ।

हाथ की अस्थियाँ (Bones of Upper Extrimities):

कंधे की मेखला स्केपुला (पश्च भाग) व क्लेविकल (अग्र भाग) से बनी होती है ।

हाथ को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है:

(1) सबसे ऊपर का भाग जिसमें केवल एक लम्बी अस्थि प्रगंडिका (Humerus) बाहु में स्थित होती है ।

(2) मध्य भाग जिसमें दो अस्थियां प्रकोष्ठिका (radius) व

(3) अन्त: प्रकोष्ठिका (ulna) होती है ।

हाथ की अस्थियां जोकि आठ कारपल अस्थि, पांच मेटाकारपल व 14 फैलेन्जस होती हैं । जन्तुक (Clavicle) चित्र 1.22 अ, व 1.22 ब) अंग्रेजी के अक्षर के एस S आकार की होती हें । ये बाकी लम्बी अस्थियों से अलग अस्थि हैं क्योंकि इसमें मेडयूलरी केवेटी नहीं होता तथा ये ओसीफाइड मेम्ब्रेन है । इसका अभिमध्य प्रांत (end) अरोस्थि से जुड़ा होता है जबकि अंस प्रांत एक्रोमियन प्रोसेस से जुड़ा होता है ।

अंगफलक (Scapulae):

ये कँधे के मेखला का पश्च भाग है । (चित्र 1.23 क, 1.23 ख व चित्र 1.23 ग) यह फैली हुई चपटी तिकोनी अस्थि हैं इसके अन्य भाग में फैला हुआ हिस्सा होता है । जिसमें अंसर्गत गुहा (glenoid cavity) विद्यमान होती है जो कि प्रगंडास्थि (Humerus) के गोल सिर से संधि करता है पश्च भाग में स्पाइन इसके शरीर को दो भागों में विभक्त करता है ।

प्रगंडिका (Humerus) (चित्र 1.25 अ व 1.25 ब) अर्ध्व शाखा वर्ग में सबसे लम्बी अस्थि है जो बाजू में स्थित है और स्कन्ध के नीचे कुहनी या कफोणि (Elbow) तक फैली हुई है । प्रगंडिका का प्रमुख भाग इसका सिर जो कि स्कैपुला से जुड़ा होता है अस्थि का कंड (Shaft of bones) दोनों प्रान्तों के बीच का अस्थि का लम्बा भाग है जो कि ऊपर के भाग में वर्तुलाकार किन्तु नीचे के भाग में त्रिभुजाकार है ।

अध: प्रान्त (lower end) जो स्थूलक (Condyle) है अनुप्रस्थ दिशा में चौड़ा और चपटा हो गया है । तथा इसमें मीडियल इपिकोन्डाइल व लेट्रल इपिकोन्डाइल बढ़े हुए भाग होते हैं । इस में अग्र, अभिमध्य और पार्श्व तीन धाराएं हैं ।

अन्त: प्रकोष्ठिका (ulna) वह बहि: प्रकोष्ठिका (Radius) चित्र 1.24 अ व चित्र 1.24 ब) इनका ऊर्ध्व प्रान्त (upper end) मोटा व दृढ़ होता है । अध: प्रान्त कुछ चौड़ा होता है । और इन दोनों प्रान्तों के बीच अस्थि कंड (Shaft of bone) होता है ।

कारपल अस्थियां (चित्र 1.26 अ व 1.26 ब) दो लाईन में स्थित होती हैं, इनकी संख्या आठ होती है । इनकी समीपस्थ लाइन में स्केफायड से मीसीफोर्म तथ दशमिमुख लाईन में मध्य से पार्श्व की और ट्रेपिजीयम से हैमेट तक पहचाना जा सकता है । मेटाकार्पल अस्थियां पांच होती हैं व फ्लेन्जेस (चित्र 1.26 अ व 1.26 ब) की संख्या चौदह होती हैं ।

पांव की अस्थियाँ (The Bones of the Lower Extrimities):

पांव को भी तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है:

1. जांघ

2. टांग

3. पंजे

नितम्बस्थि (Hip bone) एक बड़ी, क्रमहीन, आकार की अस्थि है जिसका बीच का भाग संकुचित है और उसके ऊपर और नीचे के भाग चौड़े विस्तृत हैं उसके पार्श्व (चित्र 1.27 अ  वाह्य प्रष्ठ व 1.27 व आभ्यान्तर प्रष्ठ)

पृष्ठ पर एक गहरा प्याले के आकार का गड्‌ढा होता है जो एसीटेबुलम (Acetabulum) कहा जाता है । जिसमें उर्ध्वास्थि का गोल सिर लगता है । ऐसीटेबुलम से नीचे और उसके आगे अस्थि में एक बड़ा अंडाकार या त्रिभुजाकार रंध्र है जो गवाक्षरंध्र (Obturator Foramen) कहलाता है ।

ऐसी टेबुलम से ऊपर कोई अस्थि एक चौड़ी चपटी पट्‌टिका बनाती है जिसकी लम्बी, मुड़ी हुई चौड़ी धारा है व इसको श्रोणिफलक शिखा (Iliac-crest) कहते हैं । प्रत्येक नितम्बास्थि में तीन भाग होते हैं, श्रोणिफलक (ileum) आसनास्थि (ischium) और जंघनास्थि (pubis) । ये तीनों अल्प आयु तक उपास्थि से जुड़े रहते हैं और युवावस्था पर अस्थि द्वारा जुड़ते हैं ।

श्रोणि (Pelvis):

एक बेसिन के समान दीखती है । एक मोटा भाग अस्थिकृत वलय है जिस पर पृष्ठवंश आधारित है और नीचे लगी अध: शाखाओं पर आश्रित है । श्रोणि का पिछला भाग सेक्रम (sacrum) अग्र व पार्श्व भाग यथार्थ नितम्बास्थि से बनता है । श्रोणि को ऊपर व निचला दो भागों मे विभक्त किया जा सकता है ।

स्त्रियों में श्रोणिफ्लक चौड़े और विस्तृत होते हैं यद्यपि दोनों ओर की शिखाओं (crest) के बीच अन्तर कम होता है किन्तु अग्र उर्ध्व कंटकों (Ant. sup-spines) के बीच का अन्तर अधिक होता है । इसी कारण स्त्रियों के नितम्ब अधिक चौड़े दिखाई देते हैं । श्रोणिगुहा चौड़ी होती है (चित्र 1.28 अ, 1.28 ब) किन्तु उसकी गहराई पुरूषों की श्रोणि से कम होती है ।

उर्विका (Femur) शरीर के सबसे लम्बी और दृढ़ अस्थि है । चित्र 1.29 अस्थि में ऊर्ध्व और अध: दो प्रान्त और उनके बीच में वर्तुलाकार लम्बा कंड है जो आगे की और कुछ उत्तल है ।

उर्ध्व प्रान्त कै भीतर और भीतर की ओर से गोल सिर (head) निकला हुआ है जो गात्र के साथ एक लम्बी ग्रीवा से जुड़ा रहता है । यह अस्थि खड़े होने पर कुछ भीतर की ओर मुड़ी या झुकी रहती है । दोनों ओर की अस्थियों के सिर श्रोणि अलूखल में रहने के कारण उन दोनों के बीच में श्रोणि की चौड़ाई के समान अन्तर रहता है ।

ऊर्ध्व प्रान्त में एक सिर, ग्रीवा और बृहद और लघु शिखरक है । शरीर भार को अर्न्तधिका के सिर पर संचालित करने के लिए ऊर्ध्वस्थि का निम्न प्रान्त चपटा और विस्तृत हो गया है, और अन्तिम सिरे पर अभिमध्य और पार्श्व दो स्थूलक (condyles) बन गए हैं ।

कोन्डाइल अग्र भाग में जुड़े होते हैं । (चित्र 1.29 ब) व पश्च भाग में “यूं” शेप की “नोच” से अलग रहते हैं । इसको इन्ट्रकोन्डइलर नोच (Intercondy larnotch) भी कहते हैं । जानुका (Patella) एक सबसे बड़ी कण्डरास्थि (Sesamoid bone) है । (चित्र 1.30 अ व चित्र 1.30 ब) इस चपटी त्रिकोणाकार अस्थि में अग्र और पश्च दो पृष्ठ हैं और ऊर्ध्व अभिमध्य और पार्श्व धाराएं तथा शिखर हैं ।

इस बड़े संघायक पृष्ठ के नीचे को निकला हुआ त्रिकोणाकार शिखर है जिसके खुरदरे पृष्ठ पर जानुका स्नायु (Ligament patelle) लगती है । उससे ऊपर अवजानुका बर्सा (Infrapatellar bursa) रहता है । टिबिया (tibia) जंघा प्रान्त में भीतर की ओर रहने वाली अस्थि है जो दूसरी अस्थि के अपेक्षा कहीं अधिक दृढ और मोटी है ।

अभिमध्य भाग से फिबूला से जुड़ी रहती है । (चित्र 1.31 अ व 1.31 ब) । फिबुला लम्बी, पतली अस्थि है जो जंघा में बाहर की ओर रहती है । अंतर्रधिका की अपेक्षा यह कहीं दुर्बल है क्योंकि उसका निर्माण शरीर का भार उठाने के लिए नहीं हुआ है । इसमें भी ऊर्ध्व प्रान्त और अध: प्रान्त है और उनके बीच में लम्बा बांड हैं नीचे का प्रान्त अनुप्रस्थ दिशा में चपटा है किन्तु सामने से पीछे की दिशा में चौड़ाई । (चित्र 1.31 अ व चित्र 1.31 ब)

पदकूच (Tarsus):

यह पांव का पीछे की ओर का लगभग आधा भाग है । इसमें (चित्र 1.32 अ व 1.32 ब) टेलस, केलकेनियम, क्यूवोयड, नेवीक्यूलर, मीडियल, इन्टसमिडियेट और लेट्रल क्यूनीफोर्म अस्थियां होती हैं ।

प्रपदस्थियां (Metatarsal): पांच अस्थियां होती हैं व तीन भागों में देखी जा सकती हैं । फ्लेन्जस (अंगुलसस्थियां) को हम चित्र 1.32 अ व चित्र 1.32 व में देख सकते हैं जहाँ ये प्रपदस्थियों से जुड़ी होती हैं ।

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